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3 May 1972
“‘लॉ मेकर' बनो, ‘लॉ ब्रेकर' नहीं”
3 May 1972 · हिंदी
अपने को लव-फुल और लॉ-फुल दोनों ही समझते हो? जितना ही लवफुल उतना ही लॉ-फुल हो कि जब लवफुल बनते हो तो लॉ-फुल नहीं बन सकते हो वा जब लॉ-फुल बनते हो तो लवफुल नहीं बन सकते हो? क्या दोनों ही साथ-साथ एक ही समय कर्म में वा स्वरूप में दिखाई दे सकते हैं? क्योंकि जब तक लॉ और लव दोनों ही समान नहीं हुए हैं तब तक कार्य में सदा सफलता-मूर्त बन नहीं सकते। सफलता-मूर्त वा सम्पूर्ण मूर्त बनने के लिए इन दोनों की आवश्यकता है। लॉ-फुल अपने आपके लिए भी बनना होता है। न कि सिर्फ दूसरों के लिए लॉ-फुल बनना पड़ता है लेकिन जो स्वयं अपने प्रति लॉ-फुल बनता है वही दूसरों के प्रति भी लॉ-फुल बन सकता है। अगर स्वयं अपने प्रति कोई भी लॉ को ब्रेक करता है तो वह दूसरों के ऊपर लॉ चला नहीं सकता। कितना भी दूसरों के प्रति लॉ-फुल बनने का प्रयत्न करेगा लेकिन बन नहीं सकेगा। इसलिए अपने आपसे पूछो कि मैं अपने प्रति वा अन्य आत्माओं के प्रति लॉ-फुल बना हूँ? प्रात: से लेकर रात तक मन्सा स्वरूप में अथवा कर्म में, सम्पर्क वा एक-दो के सहयोग देने में वा सेवा में कहाँ भी किस प्रकार का लॉ ब्रेक तो नहीं किया? जो लॉ-ब्रेकर होगा वह नई दुनिया का मेकर नहीं बन सकेगा। वा पीस मेकर, न्यु-वर्ल्ड मेकर नहीं बन सकेगा। तो अपने आपको देखो कि मैं न्यु-वर्ल्ड मेकर वा पीस मेकर, लॉ-मेकर हूँ वा लॉ-ब्रेकर हूँ? जो स्वयं लॉ-मेकर हैं वही अगर लॉ को ब्रेक करता है, तो क्या ऐसे को लॉ-मेकर कहा जा सकता है? ईश्वरीय लॉज (कायदे) वा ईश्वरीय नियम क्या हैं, वह सभी स्पष्ट जान गये हो वा अभी जानना है? जानने का अर्थ क्या होता है? जानना अर्थात् चलना। जानने के बाद मानना होता है, मानने के बाद फिर चलना होता है। तो ऐसे समझें कि यह जो भी बैठे हुए हैं वह सभी जान गये हैं अर्थात् चल रहे हैं?
अमृतवेले से लेकर जो भी दिनचर्या बता रहे हो वह सभी ईश्वरीय लॉज के प्रमाण बिता रहे हो कि इसमें कुछ परसेन्टेज है? जानने में परसेन्टेज है? अगर जानने में परसेन्टेज नहीं है और जानकर चलने में परसेन्टेज है तो उसको जानना कैसे कहेंगे? यथार्थ रूप से नहीं जाना है तब चल नहीं पाते हो वा जान गये हैं बाकी चल नहीं पाते हो, क्या कहेंगे? जब कहते हो यहाँ जानना, मानना, चलना एक ही है; फिर यह अन्तर क्यों रखा है? अज्ञानियों को यह समझाते हो कि आप जानते हो हम आत्मा हैं, लेकिन मानकर चलते नहीं हो। आप भी जानते हो कि यह ईश्वरीय नियम हैं, यह नहीं हैं। जानकर फिर चलते नहीं हो तो इस स्टेज को क्या कहेंगे? (पुरुषार्थ) पुरुषार्थी जीवन में ग़लती होना माफ है, ऐसे? जैसे ड्रामा की ढाल सहारा दे देती है वैसे ‘पुरुषार्थी' शब्द भी हार खाने में वा असफलता प्राप्त होने में बहुत अच्छी ढाल है। अलंकारों में यह ढाल दिखाई हुई है? ऐसे को पुरुषार्थी कहेंगे? ‘पुरुषार्थ' शब्द का अर्थ क्या करते हो? इस रथ में रहते अपने को पुरुष अर्थात् आत्मा समझकर चलो, इसको कहते हैं पुरुषार्थी। तो ऐसे पुरुषार्थ करने वाला अर्थात् आत्मिक स्थिति में रहने वाला इस रथ का पुरुष अर्थात् मालिक कौन है? आत्मा ना। तो पुरुषार्थी माना अपने को रथी समझने वाला। ऐसा पुरुषार्थी कभी हार नहीं खा सकता। तो पुरुषार्थ शब्द को इस रीति से यूज़ न करो। हाँ, ऐसे कहो कि जब हम पुरुषार्थहीन हो जाते हैं तब हार होती है। अगर पुरुषार्थ में ठीक लगा हुआ है तो हार हो नहीं सकती है। जानने और चलने में अगर अन्तर है तो ऐसी स्टेज वाले को पुरुषार्थी नहीं कहा जायेगा। पुरुषार्थी सदैव मंजिल को सामने रखते हुए चलते हैं, वह कभी रुकते नहीं। बीच-बीच में मार्ग में जो सीन आती हैं उनको देखने लगते हैं लेकिन रुकते नहीं। देखते हो वा देखते हुए नहीं देखते हो? जो भी बात सामने आती है उनको यदि देखकर रुकते हो तो ऐसी अवस्था में चलने वाले को पुरुषार्थी नहीं कहा जा सकता। पुरुषार्थी कभी भी अपनी हिम्मत और उल्लास को छोड़ते नहीं हैं। हिम्मत, उल्लास सदा साथ है तो विजय सदैव है ही। हिम्मतहीन जब बनते हैं अथवा उल्लास के बजाय किसी-न-किसी प्रकार का आलस्य जब आता है तब ही हार होती है। और छोटी-सी ग़लती करने से लॉ-फुल बनने के बजाय स्वयं ही लॉ-मेकर होते हुए लॉ को ब्रेक करने वाले बन जाते हैं। वह छोटी-सी ग़लती कौन-सी है? सिर्फ एक मात्रा की ग़लती है। एक मात्रा के अन्तर से लॉ-मेकर के बजाय लॉ को ब्रेक करने वाले बन जाते हैं। वह एक मात्रा के अन्तर का शब्द है - ‘शिव' के बजाय ‘शव' को देखते हैं। शव को देखने से शिव को भूल जाते हैं। ‘शिव' शब्द बदलकर ‘विष' बन जाता है। विष, विकारों का विष। एक मात्रा के अन्तर से उल्टा बन जाने से विष भर जाता है। उसका फिर परिणाम भी ऐसा ही निकलता है। उल्टे हो गये तो परिणाम भी जरूर उल्टा ही निकलेगा। इसलिए कभी भी शव को न देखो अर्थात् इस देह को न देखो। इनको देखने से अथवा शरीर के भान में रहने से लॉ ब्रेक होता है। अगर इस लॉ में अपने आपको सदा कायम रखो कि शव को नहीं देखना है; शिव को देखना है तो कभी भी कोई बात में हार नहीं होगी, माया वार नहीं करेगी। जब माया वार करती है तो हार होती है। अगर माया वार ही नहीं करेगी तो हार कैसे होगी? तो अपने आपको बाप के ऊपर हर संकल्प में बलिहार बनाओ तो कब हार नहीं होगी। संकल्प से भी अगर बाप के ऊपर बलिहार नहीं हो, तो संकल्प कर्म में आकर हार खिला देते हैं। इसलिए अगर लॉ-मेकर अपने को समझते हो तो कभी भी इस लॉ को ब्रेक नहीं करना।
चेक करो - यह जो संकल्प उठा वह बाप के ऊपर बलिहार होने योग्य है? कोई भी श्रेष्ठ देवताएं होते हैं, उनको कभी भी कोई भेंट चढ़ाते हैं तो देवताओं के योग्य भेंट चढ़ाते हैं, ऐसे-वैसे नहीं चढ़ाते। तो हर संकल्प बाप के ऊपर अर्थात् बाप के कर्तव्य के ऊपर बलिहार जाना है। यह चेक करो - जैसे ऊंच ते ऊंच बाप है वैसे ही संकल्प भी ऊंच है जो भेंट चढ़ावें? अगर व्यर्थ संकल्प, विकल्प हैं तो बाप के ऊपर बलि चढ़ा नहीं सकते, बाप स्वीकार कर नहीं सकते। आजकल शक्तियों और देवियों का भोजन होता है तो उसमें भी शुद्धि पूर्वक भोग चढ़ाते हैं। अगर उसमें कोई अशुद्धि होती है देवी भी स्वीकार नहीं करती है, फिर वह भक्तों को महसूसता आती है कि देवी ने हमारी भेंट स्वीकार नहीं की। तो आप भी श्रेष्ठ आत्मायें हो। शुद्धि पूर्वक भेंट नहीं है तो आप भी स्वीकार नहीं करते हो। ऊंच ते ऊंचे बाप के आगे क्या भेंट चढ़ानी है वह तो समझ सकते हो। हर संकल्प में श्रेष्ठता भरते जाओ, हर संकल्प बाप और बाप के कर्तव्य में भेंट चढ़ाते जाओ। फिर कब भी हार नहीं खा सकेंगे। अभी फिर भी कोई व्यर्थ अथवा अशुद्ध संकल्प चलने की प्रत्यक्षरूप में कोई सजा नहीं मिल रही है, लेकिन थोड़ा आगे चलेंगे तो कर्म की तो बात ही छोड़ो लेकिन अशुद्ध वा व्यर्थ संकल्प जो हुआ, किया उसकी प्रत्यक्ष सजा का भी अनुभव करेंगे। क्योंकि जब व्यर्थ संकल्प करते हो तो संकल्प भी खजाना है। खज़ाने को जो व्यर्थ गंवाता है उसका क्या हाल होता है? व्यर्थ धन गंवाने वाले की रिजल्ट क्या निकलती है? दिवाला निकल जाता है। ऐसे ही यह श्रेष्ठ संकल्पों का खजाना व्यर्थ गंवाते-गंवाते बाप द्वारा जो वर्सा प्राप्त होना चाहिए वह प्राप्ति का अनुभव नहीं होता। जैसे कोई दिवाला मारते हैं तो क्या गति हो जाती है? ऐसे स्थिति का अनुभव होगा। इसलिए अभी जो समय चल रहा है वह बहुत सावधानी से चलने का है, क्योंकि अभी यात्री चलते-चलते ऊंच मंजिल पर पहुँच गये हैं। तो ऊंच मंजिल पर कदम-कदम पर अटेन्शन रखने की बहुत आवश्यकता होती है। हर कदम में चेकिंग करने की आवश्यकता होती है। अगर एक कदम में भी अटेन्शन कम रहा तो रिजल्ट क्या होगी? ऊंचाई के बजाय पांव खिसकते-खिसकते नीचे आ जायेंगे। तो वर्तमान समय इतना अटेन्शन है वा अलबेलापन है? पहला समय और था, वह समय बीत चुका। जैसे-जैसे समय बीत चुका तो समय के प्रमाण परिस्थितियों के लिए बाप रहमदिल बन कुछ-न-कुछ जो सैलवेशन देते आये हैं वह समय प्रमाण अभी समाप्त हो चुका। अभी रहमदिल नहीं। अगर अब तक भी रहमदिल बनते रहे तो आत्मायें अपने ऊपर रहमदिल बन नहीं सकेंगी। जब बाप इतनी ऊंच स्टेज की सावधानी देते हैं तब बच्चे भी अपने ऊपर रहमदिल बन सकें। इस कारण अभी यह नहीं समझना कि बाप रहमदिल है इसलिए जो कुछ भी हो गया तो बाप रहम कर देगा। नहीं, अभी तो एक भूल का हजार गुणा दण्ड का हिसाब-किताब चुक्तू करना पड़ेगा। इसलिए अभी जरा भी ग़फलत करने का समय नहीं है। अभी तो बिल्कुल अपने कदम-कदम पर सावधानी रखते हुए कदम में पद्मों की कमाई करते पद्मपति बनो। नाम है ना पद्मापद्म भाग्यशाली। तो जैसा नाम है ऐसा ही कर्म होना चाहिए। हर कदम में देखो - पद्मों की कमाई करते पद्मपति बने हैं? अगर पद्मपति नहीं बने तो पद्मापद्म भाग्यशाली कैसे कहलायेंगे? एक कदम भी पद्म की कमाई बिगर न जाए। ऐसी चेकिंग करते हो वा कई कदम व्यर्थ जाने बाद होश आता है? इसलिए फिर भी पहले से ही सावधान करते हैं।
अन्त का स्वरूप शक्तिपन का है। शक्ति रूप रहमदिल का नहीं होता है। शक्ति का सदैव संहारी रूप दिखाते हैं। तो संहार का समय अब समीप आ रहा है। संहार के समय रहमदिल नहीं बनना होता है। संहार के समय संहारी रूप धारण किया जाता है। इसलिए अभी रहमदिल का पार्ट भी समाप्त हुआ। बाप के सम्बन्ध से बच्चों का अलबेलापन वा नाज़ सभी देखते हुए आगे बढ़ाया, लेकिन अब किसी भी प्रकार से पावन बनाकर साथ ले जाने का पार्ट है सद्गुरु के रूप में। जैसे बाप बच्चों के नाज वा अलबेलापन देख फिर भी प्यार से समझाते चलाते रहते हैं। वह रूप सद्गुरु का नहीं होता। सद्गुरु का रूप जैसे सद्गुरु है वैसे सत संकल्प, सत बोल, सत कर्म बनाने वाला है। फिर चाहे नॉलेज द्वारा वा पुरुषार्थ द्वारा बनावे, चाहे फिर सजा द्वारा बनावे। सद्गुरु नाज़ और अलबेलापन देखने वाला नहीं है। इसलिए अब समय और बाप के रूप को जानो। ऐसे न हो - बाप के इस अन्तिम स्वरूप को न जानते हुए अपने बचपन के अलबेलेपन में आकर अपने आपको धोखा दे बैठो। इसलिए बहुत सावधान रहना है। शक्तियों को अभी अपना संहारी रूप धारण करना चाहिए। जैसे दिखाया हुआ है - कोई भी आसुरी संस्कार वाला शक्तियों का सामना नहीं कर सकता, आसुरी संस्कार वाले शक्तियों के सामने आंख उठाकर देख नहीं सकते। तो ऐसे संहारी रूप बनकर स्वयं में भी आसुरी संस्कारों का संहार करो और दूसरों के भी आसुरी संस्कार के संहार करने वाले संहारीमूर्त बनो। ऐसी हिम्मत है? माता रूप में रहम आ जाता, शक्ति रूप में रहम नहीं आता। माता बनकर पालना तो बहुत की और माता के आगे बच्चे लाडकोड करते भी हैं। शक्तियों के आगे किसकी हिम्मत नहीं जो अलबेलापन दिखा सके। अपने प्रति भी अब संहारी बनो। ऐसी स्टेज बनाओ जो आसुरी संस्कार संकल्प में भी ठहर न सकें। इसको कहते हैं - एक ही नज़र से असुर संहारनी।
संकल्पों को परिवर्तन करने में कितना समय लगता है? सेकेण्ड। और नज़र से देखने में कितना समय लगता है? एक सेकेण्ड। तो नज़र से असुर संहार करने वाले अर्थात् एक सेकेण्ड में आसुरी संस्कारों को भस्म करने वाले, ऐसे बने हो? कि आसुरी संस्कारों के वशीभूत हो जाते हो? आसुरी संस्कारों के वशीभूत होने वाले को किस सप्रदाय में गिना जायेगा? आप कौन हो? (ईश्वरीय सप्रदाय) तो ईश्वरीय सप्रदाय वालों के पास आसुरी संस्कार भी नहीं आने चाहिए। अभी आसुरी संस्कार आते हैं वा भस्म हो गये हैं? (आते हैं) तो फिर क्या बन जाते हो? अपना रूप बदल बहुरूपी बन जाते हो क्या? अभी-अभी ईश्वरीय सप्रदाय, अभी-अभी आसुरी संस्कारों के वश हो गये तो क्या बन गये? बहुरूपी हो गये ना। अगर अभी-अभी अपने से आसुरी संस्कारों को भस्म करने की हिम्मत रखकर संहारी रूप बने तो मुबारक है। अभी यह भी ध्यान रखना, सूक्ष्म सजाओं के साथ-साथ स्थूल सजायें भी होती हैं। ऐसे नहीं समझना - सूक्ष्म सजा तो अपने अन्दर भोग कर खत्म करेंगे। नहीं। सूक्ष्म सजाएं सूक्ष्म में मिलती रहती हैं और दिन प्रतिदिन ज्यादा मिलती जायेंगी लेकिन ईश्वरीय मर्यादाओं के प्रमाण कोई भी अगर अमर्यादा का कर्तव्य करते हैं, मर्यादा का उल्लंघन करते हैं तो ऐसी अमर्यादा से चलने वाले को स्थूल सज़ाएं भी भोगनी पड़ेंगी। फिर तब क्या होगा? अपने दैवी परिवार के स्नेह, सम्बन्ध और जो वर्तमान समय की सम्पत्ति का खजाना है उनसे वंचित होना पड़ेगा। इसलिए अब बहुत सोच-समझकर कदम उठाना है। ऐसे लॉज (नियम) शक्तियों द्वारा स्थापन हो रहे हैं। पहले से ही सावधान करना चाहिए ना। फिर ऐसे न कहना कि ऐसे तो हमने समझा नहीं था, यह तो नई बात हो गई। तो पहले से ही सुना रहे हैं। सूक्ष्म लाज़ के साथ स्थूल लाज वा नियम भी हैं। जैसी-जैसी ग़लती, उसी प्रमाण ऐसी ग़लती करने वाले को सजा। इसलिए लॉ-मेकर हो तो लॉ को ब्रेक नहीं करना। अगर लॉ-मेकर भी लॉ को ब्रेक करेंगे तो फिर लॉ-फुल राज्य करने के अधिकारी कैसे बनेंगे? जो स्वयं को ही लॉ के प्रमाण नहीं चला सकता वह लॉ-फुल राज्य कैसे चला सकेगा? इसलिए अब अपने को लॉ-मेकर समझकर हर कदम लॉ-फुल उठाओ अर्थात् श्रीमत प्रमाण उठाओ। मन-मत मिक्स नहीं करना। माया श्रीमत को बदलकर मनमत को मिक्स कर उसको ही श्रीमत समझाने की बुद्धि देती है। माया के वश मनमत को भी श्रीमत समझने लग पड़ते हैं, इसलिए परखने की शक्ति सदैव काम में लगाओ। कहाँ परखने में भी अन्तर होने से अपने आपको नुकसान कर देते। इसलिए कहाँ भी अगर स्वयं नहीं परख सकते हो तो जो श्रेष्ठ आत्मायें निमित्त हैं उन्हों से सहयोग लो। वेरीफाय कराओ कि यह श्रीमत है वा मनमत है? फिर प्रैक्टिकल में लाओ। अच्छा, ऐसे लॉ-फुल और लवफुल जो दोनों ही साथ-साथ रख चलने वाले हैं, ऐसी आत्माओं को नमस्ते।