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8 Jul 1973
“समय की पुकार”
8 July 1973 · हिंदी
आप सभी कहाँ बैठे हैं? क्या सभी मेले में बैठे हो? यह है प्रैक्टिकल मेला और सभी हैं यादगार के मेले। अभी के इस मधुर मिलन के मेले से, अनेक स्थानों पर और अनेक नामों से मेले मनाते आते हैं। मेले में विशेष मिलन होता है। मेला अर्थात् मिलना। यह मिलन अर्थात् मेला कौन-सा है? इस समय मुख्य मेला है ही आत्मा रूप से परमात्मा बाप के साथ मिलने का अथवा यूँ कहें कि आत्मा और परमात्मा का मेला है। न सिर्फ एक सम्बन्ध से, लेकिन सर्व-सम्बन्धों से, सर्व सम्बन्धी बाप से मिलन का मेला है अथवा सर्व-प्राप्तियों का यह मेला है। एक सेकण्ड में सर्व-सम्बन्धों से सर्व-सम्बन्धी बाप से मिलन मनाने से प्राप्ति स्वत: ही हो जाती है और अन्य मेले तो खर्च करने के होते हैं। लेकिन यह मेला सर्व-प्राप्ति करने का है और दूसरे मेले में अगर कुछ प्राप्ति भी करेंगे तो कुछ देकर ही प्राप्त करेंगे परन्तु यहाँ देते क्या हो? जिसको सम्भाल नहीं सकते हो, तुम वही देते हो ना? कोई यहाँ अच्छी चीज देते हो क्या? जिन चीजों को आप सम्भाल नहीं सकते हो तुम वही तो बाप को देते हो इससे बाप को क्या बना दिया? सेवाधारी बनाया है ना? जैसे कि अपनी चीज को सम्भालने के लिए कोई सर्वेन्ट को रखा जाता है। बाप को देते भी वही हो जिसको आप कन्ट्रोल नहीं कर पाते हो। बाकी बाप को और कुछ दिया है क्या? किचड़ पट्टी देकर अगर पद्मों की प्राप्ति हो जाय तो उसको देना कहेंगे या लेना? उसे लेना कहेंगे ना? तो और सभी मेले देने के होते हैं और वहाँ यदि देकर कुछ लिया हो तो वह क्या बड़ी बात है। लेकिन यह मेला सर्व प्राप्ति करने का मेला है। जो चाहो और जितना चाहो आप उतनी प्राप्ति कर सकते हो। तो ऐसा सर्व-प्राप्तियों का मेला कभी कहीं देखा है? ऐसे मेले पर आप सभी आये हुये हो, तो मेले में एक होता है मिलन और दूसरा क्या होता है? और मेले में तो मैले बनते हैं और यहाँ क्या बनते हो? स्वच्छ। स्वच्छ तो बन गये हो ना या आप अभी तक स्वच्छ बन रहे हो? स्वच्छ बनने के बाद क्या होता है? श्रृंगार होता है और तिलक लगाया जाता है। अभी सदा स्मृति का तिलक स्वयं को लगा रहे हो और दिव्य गुणों के गहनों से अपने आप को सजा रहे हो? तो मेले में मिलना हुआ और मनाना भी हुआ। साथ-साथ मेले में खेल-पाल भी होता है। मेला और खेला-दोनों साथ-साथ ही होते हैं। तो मेला और खेल-यह दो शब्द अगर सदा याद रखो तो आपकी कौन-सी स्टेज बन जायेगी?
यदि कभी भी स्थिति डगमग होती है तो उसका कारण है कि मेला अर्थात् मिलन उससे बुद्धि को किनारे कर देते हो अर्थात् मेले से निकल जाते हो और उसे खेल नहीं समझते हो। तो मेला और खेल-यह दो शब्द सदा याद रखो। मेले में सभी बातें आ जाती हैं। जैसे पहले सुनाया था ना कि मिलन किन-किन बातों का होता है? मेला शब्द याद आने से संस्कारों का मिलन, बाप और बच्चों का मिलन और सर्व-सम्बन्धों से सदा प्राप्ति का मिलन - सभी इस मेले में आ जाते हैं। यह सृष्टि एक खेल है, यह तो मुख्य बात है। लेकिन यह माया की भिन्न-भिन्न परीक्षायें व परिस्थितियाँ जो आती हैं यह भी आप लोगों के लिए एक खेल है। अगर इसको खेल समझो तो खेल में कभी परेशान नहीं होंगे, हँसते रहेंगे। तो परीक्षायें भी एक खेल हैं। तीसरी बात, खेल समझने से जो भी भिन्न-भिन्न वैरायटी संस्कारों का पार्ट देखते हो, उन पार्टधारियों का इस बेहद के खेल में यह पार्ट अर्थात् खेल नूँधा हुआ है-यह स्मृति में आने से कभी भी अवस्था डगमग नहीं होगी। सदैव एकरस अवस्था रहेगी। जब स्मृति में रहेगा कि यह वैरायटी पार्ट, ड्रामा अर्थात् खेल है तो वैरायटी खेल में पार्ट न हो-कभी यह हो सकता है क्या? जब नाम ही है वैरायटी ड्रामा। जैसे हद के सिनेमा में भिन्न-भिन्न नाम से भिन्न-भिन्न खेल होते हैं, समझो नाम ही है खूनी नाहेक खेल फिर उसमें अगर कोई भयानक व दर्दनाक सीन देखो तो विचलित होंगे क्या? क्योंकि समझते हो कि खेल ही खूनी नाहेक का है। पहले से ही ऐसा समझकर फिर उसे देखेंगे। वैसे ही मानों कोई लड़ाई, झगड़े, क्रोध की स्टोरीज़ हैं तो उसको देखकर हँसेंगे या रोयेंगे? जरूर हँसेंगे ना? क्योंकि जानते हो कि यह एक खेल है। ऐसे ही इस बेहद के खेल का नाम ही है - वैरायटी ड्रामा अर्थात् खेल। तो उसमें वैरायटी संस्कार व वैरायटी स्वभाव व वैरायटी परिस्थितियाँ देखकर कभी विचलित होंगे क्या? या उसे भी साक्षी हो एकरस स्थिति में स्थित हो देखेंगे? तो अगर यह समझो व याद रखो कि यह एक वैरायटी खेल है तो जो पुरुषार्थ करने में मुश्किल समझते हो, क्या वह सहज नहीं हो जायेगा?
यह दो शब्द भी भूल जाते हो, मेले को भी और खेल को भी भूल जाते हो और भूलने से ही स्वयं को परेशान करते हो। क्योंकि स्मृति अर्थात् साक्षीपन की सीट छोड़ देते हो। सीट को छोड़कर अगर कोई ड्रामा देखे तो फिर क्या हाल होगा उसका? तो सीट पर सेट होकर वैरायटी ड्रामा की स्मृति रखते हुए, अगर एक-एक पार्टधारी का हर पार्ट देखो तो सदैव हर्षित रहेंगे। मुख से वाह-वाह निकलेगी। वाह! मीठा ड्रामा! यह क्या हुआ, क्यों हुआ-यह नहीं निकलेगा बल्कि ‘वाह-वाह' शब्द मुख से निकलेंगे अर्थात् सदा खुशी में झूमते रहेंगे। सदा अपने को मास्टर सर्वशक्तिमान अनुभव करेंगे। क्या ऐसे स्वयं को प्रैक्टिकल में अनुभव करते हो?
मेले से बाहर निकल जाते हो तो परेशान हो जाते हो और जब हाथ छोड़ देते हैं तो भी परेशान हो जाते हैं। ऐसे ही तुम यहाँ भी बाप का हाथ छोड़ देते हो। ‘हाथ छोड़ देना' क्या इसका अर्थ समझते हो? बाप का स्थूल हाथ तो है नहीं। श्रीमत है हाथ और बुद्धि-योग है साथ। तो मेले में जब हाथ और साथ दोनों ही छोड़ देते हो अर्थात् बाप से किनारा कर देते हो तब भी परेशान होते हो। हाथ और साथ अगर न छोड़ो तो सदा खुशी में रहेंगे इसलिए अब सदैव मेला और खेल समझकर ही अपने पार्ट और दूसरे के पार्ट को देखो। यह तो सहज बात है और कॉमन अर्थात् पुरानी बात है। पुरानी बात को निरन्तर बनाया है या कभी-कभी भूल जाते हो और कभी समय पर याद करते हो? यह इसलिए बतलाया कि यदि वह दो शब्द भी निरन्तर याद रखो तो निरन्तर खुशी में और निरन्तर शक्ति स्वरूप में रह सकते हो। अभी समय छोटी-छोटी बातों में व साधारण संकल्पों के विघ्नों में गँवाने का नहीं है। अभी तो मास्टर रचयिता बन अपने भविष्य की प्रजा और भक्त दोनों को अपनी प्राप्त की हुई शक्तियों द्वारा वरदान देने का समय आ पहुँचा है। अभी देने का समय है, न कि स्वयं लेने का समय है। अगर देने के समय भी कोई लेते रहे तो देंगे कब? क्या सतयुग में? वहाँ आवश्यकता होगी क्या? तो अभी ही अपनी रचना को भरपूर करने का समय है। अभी अपने प्रति समय गँवाना व अपने प्रति सर्व-शक्तियों का प्रयोग करना, उसी में सर्व शक्तियों को समाप्त कर देना अर्थात् जो कमाया वह खाया, ऐसा करने का अभी समय नहीं है। पहले समय था कि कमाया और खाया। लेकिन अभी समय कौन-सा है? जो जमा किया है उसको सर्व आत्माओं के प्रति देने का समय है। नहीं तो आपकी प्रजा व भक्त इन प्राप्तियों से वंचित रह जायेंगे और वे भिखारी के भिखारी ही रह जायेंगे। तो क्या दाता और वरदाता के बच्चे वरदाता व दाता नहीं बनेंगे? जिस समय सर्व आत्मायें आपके सामने भिखारी बन लेने आयेंगी तो क्या रहमदिल बाप के बच्चे सर्व आत्माओं के प्रति रहम नहीं करेंगे? क्या उस समय उन पर तरस नहीं आयेगा, क्या उसे तड़पता हुआ देख सकेंगे? लौकिक रूप में भी हद का रचयिता अपनी रचना को दु:खी व तड़पता हुआ देख नहीं सकता। तो अभी तुम भी मास्टर रचयिता हो ना? अथवा यह बाप का ही काम है या आपका भी काम है? जब आप लोग भी सभी मास्टर रचयिता हो तो मास्टर रचयिता अपनी रचना के दु:ख के विलाप व तड़पन को कभी देख नहीं सकेंगे। उस समय उन्हें कुछ देना पड़ेगा। अगर अभी से स्टॉक इकट्ठा नहीं करेंगे और जो कमाया, उसे खाते और खत्म करते रहेंगे तो उन्हें देंगे क्या? अब अपने पोतामेल को देखना है। अभी के समय प्रमाण मास्टर रचयिता को कौन-सा पोतामेल देखना है? क्या-क्या गलती की, यह तो बचपन का पोतामेल है लेकिन मास्टर रचयिता को अपना कौन-सा चार्ट चेक करना है? आप हर शक्ति को सामने रखते हुये यह पोतामेल देखो कि आज के दिन सर्व-शक्तियों में से कौन-सी शक्ति और कितनी परसेन्टेज में शक्ति जमा की? अभी जमा के खाते का पोतामेल देखना है। खर्चे को फुल स्टॉप देना है। अभी तक भी अपने प्रति खर्च करते रहेंगे क्या? दूसरों को देना, वह खर्चा नहीं। यह तो एक देना फिर लाख पाना है। वह खर्चे के खाते में नहीं, जमा के खाते में हुआ। जब अपने विघ्नों के प्रति शक्ति का प्रयोग करते हो-वह होता है खर्च। जब कोई भी विघ्न पड़ता है तो उनको समाप्त करने में जो समय खर्च करते हो या जो ज्ञान धन को खर्च करते हो तो इतना सभी खर्चा अभी से बचाना पड़े।
जैसे यह गवर्मेन्ट भी आजकल बचत की स्कीम बनाती है। तो ऑलमाइटी गवर्मेन्ट भी अब सब बच्चों को ऑर्डर करती है कि अब बचत की स्कीम बनाओ। खर्चे को फुल स्टॉप लगाओ। अभी तो देते रहो, अभी लेने का कुछ रहा है क्या? अगर रहा है तो इससे सिद्ध होता है कि बाप ने पूरा वर्सा दिया नहीं है। लेकिन बाप ने अपने पास कुछ रखा ही नहीं है। वह तो एक सेकण्ड में पूरा ही वर्सा दे देते हैं, जो कुछ भी लेने का रहता ही नहीं। तो अभी बचत करनी आयेगी न कि खर्च करने की आदत पड़ गई है? बहुत ऐसे होते हैं जिसको जमा करना आता ही नहीं, जमा कर ही नहीं सकते, उन्हें और ही खर्च करते-करते उधार लेने की आदत पड़ जाती है। यहाँ भी जब अपनी शक्ति खर्च कर देते हो तब कहते हो फलानी दीदी, दादी व बापदादा कुछ दे देवे। उधार ले लेते हो। पहले सोचो कि हम किसके बच्चे हैं? अखुट खज़ाने के मालिक के बालक हैं। नशा है न? जब अखुट खजाने के बालक सो मालिक हो और ऐसे फिर दूसरों से शक्ति का उधार लेवे, उनको क्या कहा जाये? बहुत समझदार! ऐसे बहुत समझदार तो कभी नहीं बनते हो न? क्या बचत करने की युक्तियाँ अथवा बचत की स्कीम जानते हो? बचत करने का भी सबसे सहज और श्रेष्ठ तरीका कौन-सा है, जिससे कि सर्व शक्तियों की बचत कर सको? बजट भी कैसे बनायेंगे? पहले बनायेंगे तब तो चेक करेंगे न? कैसे बनायेंगे जिससे कि ऑटोमेटिकली जण्मा हो? बजट बनाना अर्थात् अपनी बुद्धि का, वाणी का और फिर कर्म का, सभी का अपना हर समय का प्रोग्राम फिक्स करना।
जैसे बजट बनाते हैं तो उसमें फिक्स करते हैं ना कि इतना खर्चा इस पर करेंगे। उसी अनुसार ही फिर खर्चे को चलाते हैं। तब बजट प्रमाण कार्य सफल हो सकता है। तो बजट बनाना अर्थात् अमृतवेले उठकर रोज़ अपनी बुद्धि के प्लेन का, वाणी द्वारा क्या-क्या करना है और कर्म द्वारा क्या-क्या करना है, उन सभी को फिक्स करो अर्थात् अपने तीनों प्रकार की रोज़ की डायरी बनाओ। तो रोज़ डायरी बनाने से जो बुद्धि के प्रति कर्तव्य फिक्स किया है वह फिर चेक करना पड़े कि जैसे मैंने बजट बनाया, क्या उसी प्रमाण कार्य किया? या बजट एक और प्लैन दूसरा तो नहीं? तो अपनी सर्व-शक्तियों को जमा करने की सहज युक्ति यही है कि रोज़ अपना प्लेन बनाओ मनसा, वाचा और कर्मणा का। बुद्धि को सारे दिन में किस कर्तव्य में बिजी रखना है, यदि वह भी अमृतवेले फिक्स करो तो फिर सभी व्यर्थ खत्म हो जायेगा। व्यर्थ खत्म किया तो समर्थ बन जायेंगे। व्यर्थ को समाप्त करने के लिए प्लेनिंग बुद्धि बनाओ। प्लेनिंग बुद्धि बनाने से ही अपनी सर्व शक्तियों को जमा कर सकेंगे। क्योंकि जो भी शक्तियाँ खर्च करते हो वह सभी व्यर्थ खर्च करते हो। अगर व्यर्थ का खाता ही समाप्त हो जायेगा तो बचत ऑटोमेटिकली हो जायेगी। व्यर्थ को समाप्त करने के लिए डेली डायरी बनाओ। इस रीति अपने समय को भी फिक्स करो कि आज के दिन बुद्धि में विशेष कौन-सा संकल्प रखेंगे या आज वाणी द्वारा क्या कर्तव्य करेंगे? वह फिक्स होने से साधारण व व्यर्थ बोल जो एनर्जी को वेस्ट करते हैं वह सब बच जायेंगे। जो वेस्ट नहीं करते वह बेस्ट बन जाते हैं। वेस्ट करने वाले कभी बेस्ट नहीं बन सकते। सभी बातों को देखो और अपनी बचत की स्कीम को बढ़ाओ। तब ही मास्टर रचयिता बन सकेंगे। अभी मास्टर रचयिता बन कर रचना की पालना करने की सामर्थ्य नहीं आई है। मास्टर रचयिता नहीं बनेंगे तो क्या बनना पड़ेगा? अगर किसी को सम्भालना नहीं आता है तो किसी के सम्भालने में चलना पड़े ना। तो मास्टर रचयिता के बदले रचना बनना पड़े। बनना तो मास्टर रचयिता है ना? सिर्फ दो शब्द जो सुना - मेला और खेला, सदैव इनको स्मृति में रखो तो भी बचत की स्कीम हो जायेगी। व्यर्थ संकल्प, व्यर्थ समय और व्यर्थ शक्ति जो खर्च कर देते हो वह बच जायेगी। इसके लिए सिर्फ अपना नियम मजबूत रखो। सोचते हो कि यह करेंगे लेकिन नियमित रूप से नियम बनाते नहीं हो। एक मास जोश में रहते हो और बाद में फिर माया का आना शुरू हो जाता है अथवा माया बेहोश करने का काम शुरू कर देती है। इसलिए क्या करना पड़े?
जैसे देखो जब कोई होश में नहीं आता, उसके लिए इन्जेक्शन पिछाड़ी इन्जेक्शन लगाते रहते हैं या जब कोई ऑपरेशन करते हैं तो उसको देख कर फीलिंग न आये, इसलिये भी इन्जेक्शन लगाते रहते हैं। तो जिस समय अनुभव करते हो कि अब जोश बेहोश के रूप में जा रहा है अर्थात् माया का जोश शुरू है तो कौन-सा इन्जेक्शन लगायेंगे? अटेन्शन और चेकिंग तो है ही। लेकिन उसके साथ-साथ अमृतवेले पॉवर हाउस से फुल पॉवर लेने का जो नियम है उसको बार-बार चेक करो। यही बड़े से बड़ा इन्जेक्शन है। अमृतवेले बाप से कनेक्शन जोड़ लिया तो सारा दिन माया की बेहोशी से बचे रहेंगे। इस इन्जेक्शन की ही कमी है। कनेक्शन ठीक होना चाहिए। ऐसे नहीं कि सिर्फ उठकर बैठ जाना है। उठकर तो बैठ गये, यह तो नियम का पालन किया लेकिन क्या कनेक्शन ठीक है अर्थात् प्राप्तियों का अनुभव होता है? अगर इन्जेक्शन लगावें लेकिन शक्ति का अनुभव न हो तो समझेंगे इन्जेक्शन ने पूरा काम नहीं किया। इसी प्रकार अमृतवेले का कनेक्शन अर्थात् सर्व पॉवर्स का और सर्व प्राप्तियों का अनुभव होना, यह बड़े से बड़ा इन्जेक्शन है।
पहले यह चेक करो कि अमृतवेले का आदिकाल ठीक है। अगर आदिकाल ठीक नहीं होगा तो मध्य और अन्त भी ठीक नहीं होगा। आदिकाल में अनुभव करने का अभ्यास नहीं है तो सृष्टि के आदि अथवा आदि काल में सर्व सुखों का अनुभव नहीं कर सकेंगे। जैसे सारे दिन का यह आदि काल है, उस आदि काल को अगर छोड़ कुछ समय के बाद व कुछ घण्टों के बाद जागते व बैठते हो व कनेक्शन जोड़ते हो तो जितना यहाँ लेट, उतना वहाँ लेट। क्योंकि बापदादा से बच्चों के मिलन का, अपॉइन्टमेन्ट का समय जो है उसमें पहला चान्स बच्चों का है। फिर है भक्तों का टाइम। अगर भक्तों के टाइम में भी कनेक्शन जोड़ा तो बच्चों जैसा वरदान नहीं पा सकेंगे। इसलिये इस काल का उस काल से कनेक्शन है। सभी से बड़ा बजट का पहला-पहला आइटम तो यह रहा, अमृतवेले अर्थात् आदि काल। उस समय अपने को चेक करो कि हम आदिकाल में आने वाले हैं या कुछ जन्म र्पीछे आने वाले हैं? यहाँ के घण्टे, वहाँ के जन्म। जितने यहाँ घण्टे कम उतने वहाँ जन्म कम हो जायेंगे। कमज़ोरी इसी की है। बैठ तो जाते हैं सभी। उस समय की सीन देखो तो बड़ा मज़ा आयेगा। उस समय का दृश्य ऐसा होता है जैसे कि जयपुर में एक हठयोगियों का म्युज़ियम है। भिन्न-भिन्न प्रकार के हठयोग दिखाये हुए हैं। तो अमृतवेले भी उस समय की सीन ऐसी होती है, कोई हठ से नींद को कन्ट्रोल करते तो कोई मज़बूरी से टाइम पास करते और कोई उल्टे लटके हुए होते हैं अर्थात् जिस कार्य के लिये बैठते हैं वह उनसे नहीं होता। जैसे उन हठयोगियों को दिखाते हैं कि कोई एक टांग पर, कोई उल्टे और कोई कैसे होते हैं। यहाँ भी उस समय का दृश्य ऐसा होता है। कोई एक सेकण्ड तो अच्छा व्यतीत करते हैं, फिर दूसरा सेकण्ड देखो तो एक टांग पर ठहरते तो दूसरी टांग फिर गिर जाती। सोचते हैं आज के दिन कुछ जमा करेंगे परन्तु होता नहीं है। वह सीन भी देखने की होती है। कोई फिर सोते-सोते भी योग करते हैं। जैसे वह हठ करते हैं, काँटों पर सोते हैं। यहाँ शेष शैया पर होते। यहाँ के उस समय का पोज़ भी वण्डरफुल होता है। इसलिये सुनाया कि अमृतवेले के महत्व को जानने और उन्हें जानकर जीवन में लाने से महान बन सकते हो। अगर अमृतवेले अपना प्लैन नहीं बनायेंगे तो प्रैक्टिकल में क्या लायेंगे?
कोई लौकिक कार्य भी तब सफल होता है जब पूरा प्लैन बनाते हैं। अगर प्लैन नहीं बनाते तो सफलता नहीं हो सकती। इस प्रकार अमृतवेले अपना प्लैन फिक्स नहीं करते हो तो मन, वाणी अथवा कर्म द्वारा जो सफलता होनी चाहिए वह नहीं कर पाते हो। अभी इस महत्व को जानकर महान बनो। अभी तो स्पष्ट सुनाया ना कि अब बाकी क्या पुरुषार्थ रह गया है। अमृतवेले का ठीक करेंगे तो सभी ठीक हो जायेगा। जैसे अमृत पीने से अमर बन जाते हैं। तो अमृतवेले को सफल करने से अमर भव का वरदान मिल जाता है। फिर सारा दिन कोई भी विघ्नों में मुरझायेंगे नहीं। सदा हर्षित रहने में और सदा शक्तिशाली बनने में अमर रहेंगे। अमृतवेले जो अमरभव का वरदान मिलता है वह अगर नहीं लेंगे तो फिर मेहनत बहुत करनी पड़ेगी। मेहनत और खर्चा दोनों करते हो। नहीं तो अमरभव के वरदानों से मेहनत और खर्चा दोनों से छूट जायेंगे। अच्छा!
ऐसे सदा बाप के साथ रहने वाले व सदा हर सेकण्ड, हर संकल्प में मिलन मनाने वाले, एक संकल्प व एक सेकण्ड भी मेले से अलग नहीं होने वाले, सदैव साक्षी और स्मृति की सीट पर सेट हो हर सीन देखने वाले खिलाड़ी व देखने वाले तीव्र पुरुषार्थी, एक सेकण्ड में संकल्प और स्वरूप बनने वाले अर्थात् जो संकल्प किया और वह स्वरूप बने। ऐसे तीव्र पुरुषार्थी अमरभव के वरदानी बच्चों को बापदादा की याद-प्यार और नमस्ते।