26 जून 2026 को पुणे के शिवाजीनगर स्थित कृषि महाविद्यालय में ब्रह्माकुमारीज़ के कृषि एवं ग्राम विकास प्रभाग द्वारा राष्ट्रीय परिषद का भव्य आयोजन किया गया। इस परिषद ने आध्यात्मिकता, कृषि और ग्राम विकास के अद्भुत समन्वय को प्रस्तुत करते हुए “सशक्त किसान, समृद्ध गांव एवं मूल्यनिष्ठ समाज” के निर्माण का प्रेरणादायी संदेश दिया।
कार्यक्रम में कृषि एवं ग्राम विकास प्रभाग की अध्यक्षा बीके सरला दीदी, राष्ट्रीय समन्वयक बीके सुंदरी दीदी, प्रभाग के उपाध्यक्ष बीके राजू भाई, महाराष्ट्र शासन के पूर्व अपर मुख्य सचिव डॉ. सुधीर कुमार गोयल तथा महाराष्ट्र के कृषि मंत्री दत्ताजी राव भरने विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष शेखर मुंदड़ा, महाराष्ट्र कृषि शिक्षण एवं संशोधन परिषद के उपाध्यक्ष तुषार पवार, कृषि आयुक्त सूरज मांडरे, महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ के कुलगुरु डॉ. विलास सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने परिषद को संबोधित किया।
कृषि विशेषज्ञों, प्रशासनिक अधिकारियों, शिक्षाविदों, किसानों तथा समाजसेवियों की उल्लेखनीय उपस्थिति में आयोजित इस परिषद में भारतीय पारंपरिक कृषि पद्धतियों को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा आध्यात्मिक मूल्यों के साथ अपनाने पर विशेष बल दिया गया। वक्ताओं ने किसानों की विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए सामूहिक प्रयास, सकारात्मक सोच तथा मूल्यनिष्ठ जीवनशैली की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
अपने संबोधन में वक्ताओं ने कहा कि
जब मनुष्य अपने विचारों और भावनाओं को पवित्र बनाकर परमात्मा से बुद्धि का संबंध जोड़ता है, तब उसके संकल्पों में दिव्य शक्ति का संचार होता है और सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं। योगिक खेती को एक प्रभावी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत करते हुए बताया गया कि यह कृषि क्षेत्र की अनेक चुनौतियों का समाधान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
डॉ. सुधीर कुमार गोयल ने अपने प्रशासनिक अनुभव साझा करते हुए
योगिक खेती पर किए गए अध्ययनों की सराहना की और इसे कृषि क्षेत्र के लिए नई दिशा देने वाला प्रयास बताया।
परिषद में देशी गौवंश के संरक्षण, संवर्धन एवं स्वास्थ्य पर भी विशेष बल दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि सशक्त पशुधन ही सशक्त खेती का आधार है, और सशक्त खेती से ही सशक्त किसान तथा समृद्ध गांव का निर्माण संभव है।
कार्यक्रम के समापन पर आध्यात्मिकता के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए बताया गया कि आध्यात्मिकता का अर्थ स्वयं को एक अविनाशी चेतन आत्मा के रूप में पहचानना तथा परमात्मा से शक्ति प्राप्त कर जीवन, कृषि और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। परिषद ने सभी प्रतिभागियों को आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित सतत कृषि, ग्राम विकास और समृद्ध भारत के निर्माण हेतु सक्रिय योगदान देने की प्रेरणा दी।


























