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अपने मूल स्वभाव; शांति और प्रेम का अनुभव करें-(भाग 2)

May 11, 2024

अपने मूल स्वभाव; शांति और प्रेम का अनुभव करें-(भाग 2)

हममें से अधिकांश लोग, हमेशा अलग-अलग स्वभाव संस्कार के लोगों से डील करते हैं, चाहे वह हमारे कार्यक्षेत्र में हों या फिर हमारे परिवार में। यहां सबसे बड़ी चुनौती है; बिना क्रोधित हुए उनके साथ बातचीत करने में। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारे व्यक्तित्व वा स्वभाव और हमारी राय भी अलग-अलग होती है। कभी-कभी, दो लोग अपने-अपने तरीके से सही होते हैं, फिर भी किसी विशेष स्थिति में उनके विचार मेल नहीं खाते। इसी के चलते उनकी आपसी बातचीत में गुस्सा आ जाता है। इसके अलावा, जब दो लोग अपने-अपने तरीके, अपने-अपने दृष्टिकोण के साथ सही होते हैं तो उनके बीच का अहंकार; शांति और सद्भाव को उस विशेष रिश्ते का हिस्सा नहीं बनने देता। इसलिए, क्रोध और अहंकार जीवन के किसी भी क्षेत्र में, किसी भी रिश्ते में; चाहे पर्सनल या प्रोफेशनल, बहुत बड़े दुश्मन हैं।

 

इसके अलावा, जब क्रोध और अहंकार पर काबू पाने की बात आती है, तो सबसे पहला कदम अपने अंदर जाकर, शांति और प्रेम के रियल खजाने तक पहुंचना होता है। हमें उसके लिए, बस अपने स्पिरिचुअल सेल्फ यानि कि आत्मा का एहसास करके अभ्यास में लाने की जरूरत है। ऐसे एहसास से, शांति और प्रेम जैसे सकारात्मक गुण हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, आध्यात्मिक स्व को सर्वोच्च सत्ता यानि कि परमपिता परमात्मा के साथ जोड़ने से भी ये आंतरिक ख़ज़ाने बढ़ते हैं। परमात्मा एक अभौतिक सत्ता; शांति और प्रेम के महासागर हैं। उनके साथ संबंध जोड़ना ही योग कहलाता है। इसके साथ साथ, पूरे दिन में जिससे भी मिलें, उन्हें आत्मा के रूप में देखने का अभ्यास करें: जिसका गुण शांति और प्रेम है, भले ही उनमें क्रोध और अहंकार ही अधिक दिखाई देता हो। ऐसा इसलिए है, क्योंकि क्रोध और अहंकार अर्जित माना धारण किए गए संस्कार हैं जबकि शांति और प्रेम हर आत्मा के मूल संस्कार हैं। तो हर एक के मूल संस्कार को देखने से उनमें पॉजीटिव एनर्जी की फीलिंग्स आती हैं। इससे उनमें ये मूल संस्कार सर्फेस होते हैं और सिचुएशन आने पर क्रोध और अहंकार जैसे नेगेटिव संस्कारों का उपयोग करने के बजाय वे पॉजिटिव संस्कारों को यूज़ करने के लिए प्रेरित होते हैं।

(कल जारी रहेगा…)

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