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अहंकार को ठेस पहुंचना (भाग 1)

अहंकार को ठेस पहुंचना (भाग 1)
Journey

लगभग हर दिन हम ऐसी स्थितियों का सामना करते हैं जब कोई हमसे कुछ ऐसा कहता है जो हमें अच्छा नहीं लगता, या हम उसे अच्छा नहीं मानते हैं। दोनों ही स्थितियों में, हमें अपमानित महसूस होता है और हम परेशान हो जाते हैं। कुछ मामलों में हम अपनी भावनाएँ व्यक्त करते हैं और प्रतिक्रिया देते हैं जबकि कुछ मामलों में नहीं। दोनों ही परिस्थितियों में, नतीजा यह होता है कि हमारी खुशी कम हो जाती है। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि हमने अपने मन में अपने बारे में एक छवि बना रखी होती है, जिससे हम जुड़े रहते हैं और उसे अपनी पहचान मानते हैं। लेकिन, जब किसी और का नजरिया आपकी इस छवि से मेल नहीं खाता, तो आपको लगता है कि आपका अपमान हुआ है और आप परेशान हो जाते हैं।

जब तक लोगों का आपके प्रति नजरिया आपके मन में बनाई हुई छवि से मेल खाता है, तब तक आप उनसे संतुष्ट रहते हैं। लेकिन जैसे ही यह नजरिया थोड़ा भी अलग होता है, आप विचलित हो जाते हैं क्योंकि आप उस छवि से जुड़े हुए हैं। तो स्वयं की इस इमेज़ से जितना अधिक जुड़ाव होगा, उतना ही अधिक ठेस और नकारात्मक प्रतिक्रिया पैदा होगी। आप इस प्रक्रिया को रोज़ अपने अंदर बारीकी से देख सकते हैं।

इस तरह के लगाव की भावना को “अहंकार” कहा जाता है।

और बताई गई प्रक्रिया को सामान्य भाषा में अहंकार को ठेस पहुंचना कहा जाता है।

कल के संदेश में हम इस प्रक्रिया को एक उदाहरण के साथ और स्पष्ट करेंगे।

(कल जारी रहेगा…)

आज का अभ्यास

आज जब कोई आपकी अपेक्षा के विपरीत कुछ कहे, तो तुरंत प्रतिक्रिया देने से पहले स्वयं से पूछें कि क्या मन वास्तव में शब्दों से आहत हुआ है या अपनी बनाई हुई छवि से।

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