
महिला सशक्तिकरण का अनूठा कार्य
प्रकृति का शाश्वत नियम है रात के बाद दिन और दिन के बाद रात आने का। ठीक उसी तरह जब-जब मानव अपने धर्म-कर्म-मर्यादाओं से गिर जाता है तब-तब कोई न
यह वृतान्त सन् 1953 का है। उस समय ईश्वरीय विश्वविद्यालय का मुख्यालय माउंट आबू में भरतपुर के महाराजा की ‘बृजकोठी’ में था। यह स्थान आज भी वर्तमान बस अड्डे से आबू रोड की ओर थोड़ी दूरी पर स्थित है। कोठी के एक हिस्से को ‘सरदारी क्वार्टर’ कहा जाता था। ऊपर की मंज़िल पर बड़े कमरों में चारपाइयाँ रखी रहती थीं।
एक रात बाबा एक कमरे में विश्राम के लिए लेटे हुए थे। वहाँ 5–7 बच्चे उपस्थित थे। बाबा बहुत स्नेह और वात्सल्य से ईश्वरीय जीवन, ईश्वरीय ज्ञान और आत्मिक उन्नति की मीठी बातें साझा कर रहे थे। उन बातों का इतना गहरा प्रभाव हुआ कि मन करता था यह चर्चा चलती ही रहे—क्योंकि मन शांत हो रहा था और भीतर एक मीठा-सा योग का अनुभव बढ़ रहा था।
कुछ समय बाद साथ बैठी वरिष्ठ बहनों ने कहा, “जगदीश भाई, अब चलो, बाबा को आराम करने दें; काफी देर हो गई है।” मुझे भीतर से थोड़ा अफ़सोस हुआ, क्योंकि बाबा के सान्निध्य में जो शांति मिल रही थी वह बहुत प्रिय लग रही थी। लेकिन बाबा के आराम में बाधा भी नहीं बनना था। बाबा ने मुस्कुराकर, स्नेहभरी दृष्टि से मेरी ओर देखा। वह दृश्य मन में बस गया और मैं वहाँ से चल पड़ा। उस समय मन जाना नहीं चाहता था, बुद्धि कहती थी जाना चाहिए—और कदम जैसे दोनों के बीच उलझे हुए थे। बाहर चाँदनी फैल रही थी, उस शांति ने भीतर की स्थिति को और हल्का कर दिया। इतने में मैं अपने कमरे तक आ पहुंचा। यहाँ आकर कुछ देर अपनी चारपाई पर इसी मस्ती में बैठा रहा क्योंकि उस स्थिति में नींद का तो नाम ही नहीं था।
बाबा की वह तस्वीर भुलाये नहीं भूलती थी। वही मुस्कान भीतर की आंखों के सामने आती रही और वही बन्द होठ कुछ बोलते हुए सुनायी देते रहे और वहीं नयन कुछ इशारा करते हुए महसूस होते रहे। इस अजब हालत में समय गुज़रते पता भी नहीं चला परन्तु सोचने से ऐसे लगा कि तब रात्रि के 12:30 या 1:00 का समय हो गया होगा क्योंकि लगभग 11 बजे तो मैंने बाबा के यहाँ से प्रस्थान किया था।
इतने में देखता क्या हूं कि अकेले बाबा उस कमरे में मेरे सामने आ खड़े हुए हैं और प्यार से पुचकार कर कह रहे हैं क्यों बच्चे, नींद नहीं आ रही ?” बाबा को देखकर मुझे बेहद – ख़ुशी भी हुई और साथ-साथ मुझे अपनी आंखों और अपने कानों पर एतबार भी नहीं हो रहा था। मैंने थोड़ा उठने की कोशिश की कि बाबा की ओर बढ़े परन्तु बाबा ही मेरे सिरहाने की ओर बढ़े और मस्तक पर हाथ रखते हुए बोले “बच्चे, अब सो जाओ, फिर सुबह मिलेंगे।
“काश, मुझे वह शिष्टाचार भी नहीं आया कि उठकर बाबा के कमरे तक साथ चला जाता परन्तु यह बाबा का ही प्रभाव था कि बस, यादों में खोये हुए मुझ पर धीरे-धीरे नींद ने अपनी चादर डाल दी। बस, इसके बाद जब प्रातः उठा तो रात का वो दृश्य फिर याद हो आया और मैंने सोचा कि हमारे बाबा, शिव बाबा के माध्यम होने से दोनों किस प्रकार हमारी याद से अपनी याद का तार जोड़े हुए हैं और किस प्रकार वह करुणाकर एक नाचीज़ बच्चे के याद करने पर उसके प्यार की डोरी से खिंचे चले आते हैं और अपने वरद हस्तों से उसे दुलार देकर सुलाते हैं। यह सब तो अनुभव की बात है, परन्तु इससे यह भी तो स्पष्ट हुआ कि ज्ञान और प्रेम की डोरी द्वारा बाबा से याद की तार कैसे जोड़ी जा सकती है।
इसीलिए ही तो मैं जगा रहता था
ऐसे अनुभव कई बार हुए। जब मैं पाण्डव भवन में पहले जाया करता था, तो नये भवन का कुछ हिस्सा बन जाने पर मेरे रहने की व्यवस्था प्रायः उसी कमरे में होती थी। सामने ही बाबा का कमरा था। रात को क्लास इत्यादि समाप्त होने के घण्टे दो घण्टे बाद तक भी बाबा के कमरे की लाइट जग रही होती थी तब मैं भी प्रायः अपनी लाइट का स्विच ऑफ नहीं करता।
बहुत बार ऐसा होता था कि बाबा लच्छू बहन, सन्देशी बहन, सन्तरी बहन या जवाहर बहन, जो उन दिनों वहां बाबा के साथ होती थीं – उन्हों को कहते “देखो, जगदीश के कमरे की लाइट जग रही है ?” बहुधा तो जग ही रही होती थी तो बाबा उन्हें कहते – “अच्छा, उसे बुला लाओ ।
इसीलिए ही तो मैं जाग रहा होता था। जब मैं बाबा के कमरे में पहुँचता तब कई बार खड़े-खड़े ही दूसरे दिन के लिए कुछ आवश्यक निर्देश दे देते और कभी-कभी अपनी चारपाई पर बिठा देते और जिस बात के लिए बुलाया होता, यह बात भी करते रहते और कई बार साथ में लिटा कर ही ईश्वरीय बातें करते रहते।
ऐसा भी होता कि प्रातः कभी मेरी यदि ढाई बजे या तीन बजे नींद खुल जाती तो खिड़की में से झाँक लेता कि क्या बाबा के कमरे की लाइट हो रही है और में पाता कि प्रायः लाइट जग रही होती थी तो मैं भी अपनी लाइट का स्विच ऑन कर देता। शीघ्र ही बाबा के कमरे से बुलावा आ जाता। इस प्रकार, कभी 3 बजे, कभी 3-30 बजे, कभी 4 बजे एकान्त और शान्ति के समय में साकार रूप में भी बाबा से रूहरिहान करने का सौभाग्य प्राप्त होता था।

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