
“जब संसार की हर आत्मा के प्रति प्रेम की भावना जागृत करनी हो और प्रेम स्वरूप आत्मा का अनुभव करना हो, तब यह ध्यान करें।”
इस ध्यान के अनुभव से स्वयं को इस शरीर को चलाने वाली चैतन्य शक्ति, प्रेम स्वरूप आत्मा के रूप में अनुभव किया जा सकता है। प्रेम के सागर पिता परमात्मा की संतान होने का अनुभव मन में प्रेम की शक्ति को जागृत करता है।
जब प्रेम देना ही अपना संस्कार बनता है, तब संसार की हर आत्मा को प्रेम देने और प्यार लुटाने का भाव अनुभव होता है। प्रेम की शक्ति मुझ आत्मा से निकलकर पूरे संसार में प्रवाहित हो रही है—इस अनुभव से प्रेम स्वरूप आत्मा के भाव को गहराई मिलती है।
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ओम शांति। मैं इस शरीर को चलाने वाली चैतन्य शक्ति, आत्मा, प्रेम स्वरूप आत्मा हूँ। मैं प्रेम के सागर पिता परमात्मा की संतान हूँ। संसार की हर आत्मा को प्रेम देने वाली प्रेम स्वरूप आत्मा हूँ। कोई मुझे प्यार दे न दे, पर मैं...
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