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“जब स्वयं को सुख स्वरूप, भरपूर और सबको सुख देने वाली आत्मा के रूप में अनुभव करना चाहें, तब यह ध्यान करें।”
इस ध्यान के अनुभव से स्वयं को मस्तक के बीच विराजमान चैतन्य शक्ति, सुख स्वरूप आत्मा के रूप में अनुभव किया जा सकता है। सुख के सागर पिता परमात्मा को अनुभव करते हुए स्वयं को भरपूर और सुखी आत्मा के रूप में देखने का भाव गहरा होता है।
सबको सुख देने वाली सुख स्वरूप आत्मा बनने और पिता परमात्मा की तरह दुःख हरकर सुख देने का अनुभव होता है। अपने जीवन में कोई अप्राप्ति नहीं है—इस भाव से सुख स्वरूप आत्मा की अनुभूति और भी गहरी होती है।
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ओम शांति।
मैं इस शरीर की मालिक, मस्तक के बीच विराजमान चैतन्य शक्ति, आत्मा, सुख स्वरूप आत्मा हूँ।
मेरे पिता परमात्मा सुख के सागर हैं। मैं इस संसार की सबसे सुखी आत्मा हूँ। भरपूर हूँ। मेरे जीवन में कोई अप्राप्ति नहीं है। सबको सुख देने वाली सुख स्वरूप आत्मा हूँ। मैं अपने पिता परमात्मा की तरह दुःख हरता, सुख करता हूँ, सबको सुख देती हूँ।
मैं सुख स्वरूप आत्मा हूँ।
ओम शांति।
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