
“जब हर परिस्थिति में खुश रहकर आनंद स्वरूप आत्मा का अनुभव करना चाहें, तब यह ध्यान करें।”
इस ध्यान के अनुभव से स्वयं को चैतन्य शक्ति, आनंद स्वरूप आत्मा के रूप में अनुभव किया जा सकता है। सदा खुश रहना अपना संस्कार मानते हुए, हर परिस्थिति में खुश रहने और अपनी खुशी को किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति पर निर्भर न करने का अनुभव होता है।
आनंद के सागर पिता परमात्मा के जैसी आनंद स्वरूप आत्मा बनकर जहाँ भी जाएँ, सबको खुशी देने का भाव जागृत होता है। चेहरे पर सदा मधुर मुस्कान रखने और आनंद स्वरूप आत्मा का अनुभव करने का भाव गहरा होता है।
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ओम शांति। मैं इस शरीर की मालिक, चैतन्य शक्ति, आनंद स्वरूप आत्मा हूँ। सदा खुश रहना मेरा संस्कार है। मेरी खुशी किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति पर निर्भर नहीं करती। मैं हर परिस्थिति में खुश रहने वाली आनंद स्वरूप आत्मा हूँ...
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