
“जब धन, कमी या जिम्मेदारियों की चिंता हो, तब यह मेडिटेशन करें और स्वयं को परमात्मा की संतान, भरपूर और सुरक्षित अनुभव करें।”
इस मेडिटेशन के अनुभव के बाद आत्मा अपने सच्चे स्वरूप को याद करती है। यह अनुभव होता है कि मैं शरीर नहीं, एक ज्योति स्वरूप आत्मा हूँ, परमात्मा की संतान हूँ, पूर्ण हूँ, संपन्न हूँ और मेरे जीवन में कोई कमी नहीं है।
यह मेडिटेशन धन, अभाव और डर के विचारों को समाप्त करके मन में सुरक्षा, शांति और भरोसे का अनुभव कराता है। परमात्मा की दिव्य शक्ति से आत्मा स्वयं को समर्थ, भरपूर और निश्चिंत अनुभव करती है, जिससे जीवन में नए रास्ते खुलते हैं और सभी कार्य सहजता से पूर्ण होते जाते हैं।
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ओम शांति। आराम से बैठें। अपने शरीर को ढीला कर दीजिए। चाहे तो आँखें बंद रखें, चाहे तो खुली रखें। एक गहरी सांस लेकर छोड़ें और रिलैक्स हो जाएँ।
अपने सारे ध्यान को बाहर से हटाकर मस्तक के बीच केंद्रित करें। अपने आप को देखने का प्रयास कीजिए। मैं एक शक्ति हूँ, इस शरीर की मालिक हूँ। मैं ज्योति स्वरूप आत्मा, मस्तक के मध्य में चमक रही हूँ। अपने प्रकाश का अनुभव कीजिए। यह शरीर मेरा इंस्ट्रूमेंट है। मैं इस शरीर से भिन्न हूँ। मैं इसकी मालिक हूँ।
आज मैं अपनी सच्ची पहचान को याद करती हूँ। कौन हूँ मैं? मैं परमात्मा की संतान हूँ। मैं पूर्ण हूँ। संपन्न हूँ। भरपूर हूँ। मेरे पिता परमात्मा इस सृष्टि के पालनहार हैं, सृजनहार हैं। मैं उनकी संतान हूँ। मेरे जीवन में कोई कमी नहीं है। मेरे पास बहुत धन है। सब कुछ पर्याप्त है। कोई कमी नहीं है।
मेरे सारे कार्य सहजता से पूर्ण हो रहे हैं, क्योंकि मैं परमात्मा की संतान हूँ। मेरी जिम्मेवारी उनकी है। वह मेरे साथ हैं। आज मैं कुछ क्षण अपने पिता से मिलने चलती हूँ। अनुभव करती हूँ कि मैं आत्मा, इस शरीर रूपी चोले से कुछ क्षण के लिए डिटैच होकर, इस संसार से ऊपर की ओर जा रही हूँ। आकाश से ऊपर, सूर्य, चाँद, तारों से भी ऊपर, रोशनी की दुनिया में, जहाँ चारों ओर असीम शांति है, शक्ति है, प्रकाश है।
मैं वहाँ अपने पिता परमात्मा को देखती हूँ। उनसे दिव्य प्रकाश की किरणें मेरी ओर प्रवाहित हो रही हैं। सुनहरी रोशनी, जो शांति, शक्ति और संपन्नता से भरपूर है। मैं उस प्रकाश और शक्ति को अपने अंदर भरती जा रही हूँ। यह दिव्य ऊर्जा मेरे सारे अभाव के विचारों को समाप्त कर रही है। मेरे सारे डर समाप्त हो रहे हैं।
अनुभव होता है, मैं संपन्न हूँ। मेरे सामने परमपिता परमात्मा हैं। मैं सुरक्षित अनुभव करती हूँ। मैं समर्थ और भरपूर अनुभव कर रही हूँ। परमात्मा मेरे साथ हैं। उनकी शक्ति असीम शक्ति है। वह शक्ति के सागर हैं। उनकी शक्तियों के प्रकंपन मुझ आत्मा को संपन्न कर रहे हैं।
परमात्मा निराकार हैं, जो मेरे पिता हैं। उनके साथ मैं आत्मा वापस अपने स्थूल जगत की ओर लौटती हूँ। अपने शरीर के मस्तक के बीच बैठ जाती हूँ। और अनुभव करती हूँ कि मेरे पिता परमात्मा मेरे मस्तक के ऊपर निराकार ज्योति रूप में चमक रहे हैं। उनकी शक्तियों का भंडार प्रकाश और ऊर्जा के रूप में मेरे चारों ओर बरस रहा है।
स्वयं भगवान मेरे साथ हैं। परमात्मा मेरे साथ हैं। इसलिए मेरे सारे कार्य सहज रूप से हो रहे हैं। मेरे जीवन में नए-नए रास्ते खुलते जा रहे हैं। मैं शांत हूँ। शक्तिशाली हूँ। संपन्न हूँ। मेरे जीवन में कोई कमी नहीं है। मैं धन से भरपूर, संपन्न स्वरूप आत्मा हूँ।
मेरे घर का भंडार भरपूर है। मेरे घर में संपन्नता है, क्योंकि मेरे घर के मालिक स्वयं परमात्मा हैं। वह हमें संभाल रहे हैं। मैं बिल्कुल निश्चिंत हूँ। मेरी क्षमता से अधिक मिला है और बढ़ता ही जा रहा है। मुझसे धनवान इस संसार में कोई नहीं। मैं संपन्न आत्मा हूँ। ओम शांति, शांति, शांति।
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