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12 Jan 1977
“संगमयुग पर ‘बालक सो मालिक’ बनने वालों के तीनों कालों का साक्षात्कार”
12 January 1977 · हिंदी
आज बापदादा हर बच्चे के तीनों कालों को देख रहे हैं। पास्ट में आदि काल के भक्त हैं या मध्यकाल के? क्या भक्ति काल समाप्त हो गया है? भक्ति का फल - ज्ञान सागर और ज्ञान की प्राप्ति प्राप्त करते हुए ज्ञानी तू आत्मा बने हैं या बन रहे हैं? भक्ति के संस्कार अधीनता अर्थात् किसी के अधीन रहना, मांगना, पुकारना, स्वयं को सदा सम्पन्नता से दूर समझना, इस प्रकार के संस्कार अभी तक अंश मात्र में रहे हुए हैं या वंश रूप में भी हैं? वर्तमान समय बाप समान गुण, कर्तव्य और सेवा में कहाँ तक सम्पन्न बने हैं? वर्तमान के आधार से भविष्य प्रारब्ध कितनी श्रेष्ठ बना रहे हैं? ऐसे हरेक के तीनों कालों को देखते हुए, ‘बालक सो मालिक' बनने वालों को देखते हुए गुण भी गाते हैं, लेकिन साथ-साथ कहीं-कहीं आश्चर्य भी लगता है। अपने आप से पूछो और अपने आपको देखो कि अभी तक भक्तपन के संस्कार अंश रूप में भी रह तो नहीं गए हैं? अगर अंश मात्र भी किसी स्वभाव, संस्कार के अधीन हैं, नाम, मान, शान के मंगता (मांगने वाले) हैं; ‘क्या' और ‘कैसे' के क्वेश्चन में चिल्लाने वाले, पुकारने वाले, भक्त समान ‘अन्दर एक बाहर दूसरा', ऐसे धोखा देने के बगुले भक्त के संस्कार हैं, तो जहाँ भक्ति का अंश है वहाँ ज्ञानी तू आत्मा हो नहीं सकती, क्योंकि भक्ति है रात और ज्ञान है दिन। रात और दिन इकट्ठे नहीं हो सकते।
ज्ञानी तू आत्मा, सदा भक्ति के फल-स्वरूप, ज्ञान सागर और ज्ञान में समाया हुआ रहता है, इच्छा मात्रम् अविद्या, सर्व प्राप्ति स्वरूप होता है। ऐसे ज्ञानी तू आत्मा का चित्र अपनी बुद्धि द्वारा खींच सकते हो? जैसे आपके भविष्य श्रीकृष्ण के चित्र को जन्म से ही ताजधारी दिखाते हैं, मुख में गोल्डन स्पून अर्थात् जन्मते ही सर्व प्राप्ति स्वरूप दिखाते हैं। हेल्थ (स्वास्थ्य), वेल्थ (सम्पत्ति), हैपीनेस (खुशी) सबमें सम्पन्न स्वरूप हैं। प्रकृति भी दासी है। ये सब बातें, जो भविष्य में प्राप्त होने वाली हैं, उसका अनुभव अब संगमयुग में भी होना है या स़िर्फ भविष्य का ही गायन है? संस्कार यहाँ से ले जाने हैं या वहां बनने हैं? त्रिकालदर्शी की स्टेज अभी है या भविष्य में? सन्मुख बाप और वर्से की प्राप्ति अभी है अथवा भविष्य में? श्रेष्ठ स्टेज अब है या भविष्य में? अभी श्रेष्ठ है ना?
संगमयुग के ही अन्तिम सम्पूर्ण स्टेज का चित्र भविष्य चित्र में दिखाते हैं। भविष्य के साथ पहले सर्व प्राप्ति का अनुभव संगमयुगी ब्राह्मणों का है। अन्तिम स्टेज पर ताज, तख्त, तिलकधारी, सर्व अधिकारी मूर्त बनते हो, मायाजीत, प्रकृतिजीत बनते हो। सदा साक्षीपन के तख्त नशीन, बापदादा के दिल तख्त-नशीन, विश्व-कल्याणकारी के ज़िम्मेवारी के ताजधारी, आत्म-स्वरूप की स्मृति के तिलकधारी, बाप द्वारा मिली हुई अलौकिक सम्पत्ति - ज्ञान, गुण और शक्तियां इस सम्पत्ति में सम्पन्न होते हो। सिंगल ताज भी नहीं, डबल ताजधारी होते हो। जैसे डबल तख्त - दिल तख्त और साक्षीपन की स्टेज का तख्त है, वैसे जिम्मेवारी अर्थात् सेवा का ताज और साथ-साथ सम्पूर्ण प्योरिटी लाइट का क्राउन भी होता है। तो डबल ताज, डबल तख्त और सर्व प्राप्ति सम्पन्न स्वरूप गोल्डन स्पून तो क्या लेकिन हीरे-तुल्य बन जाते हो। हीरे के आगे तो सोना कुछ भी नहीं। जीवन ही हीरा बन जाता है। ज्ञान के गहने, गुणों के गहनों से सजे-सजाए बनते हो। भविष्य का श्रृंगार इस संगमयुगी श्रृंगार के आगे कोई बड़ी बात नहीं लगेगी। वहां तो दासियां श्रृंगारेगी और यहाँ स्वयं ज्ञान-दाता बाप श्रृंगारता है। वहाँ सोने वा हीरे के झूले में झूलेंगे, यहाँ बापदादा की गोदी में झूलते हो, अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलते हो। तो श्रेष्ठ चित्र कौन-सा हुआ? वर्तमान का या भविष्य का? सदैव अपने ऐसे श्रेष्ठ चित्र को सामने रखो। इसको कहा जाता है - ज्ञानी तू आत्मा का चित्र।
तो बापदादा सबके तीनों कालों को देख रहे हैं कि हरेक का प्रैक्टिकल चित्र कहाँ तक तैयार हुआ है? सबका चित्र तैयार हुआ है? जब चित्र तैयार हो जाता है तब दर्शन करने वालों के लिए खोला जाता है। ऐसे चैतन्य चित्र तैयार हो जो समय का पर्दा खुले? दर्शन सदैव सम्पूर्ण मूर्ति का किया जाता है, खंडित मूर्ति का दर्शन नहीं होता। किसी भी प्रकार की कमी अर्थात् खंडित मूर्ति। दर्शन कराने योग्य बने हो? स्वयं का सोचते हो या समय का सोचते हो? स्वयं के पीछे समय तो परछाई है। स्वयं को भी भूल जाते हो; इसलिए मास्टर त्रिकालदर्शी बन अपने तीनों कालों को जानते हुए स्वयं को सम्पन्न-मूर्त अर्थात् दर्शनीय मूर्ति बनाओ। समझा।
समय की गिनती नहीं करो। बाप के गुणों व स्वयं के गुणों की गिनती करो। स्मृति दिवस तो मनाते रहते हो, लेकिन अब स्मृति-स्वरूप दिवस मनाओ। इसी स्मृति दिवस का यादगार शान्ति स्तम्भ, पवित्रता स्तम्भ, शक्ति स्तम्भ बनाया है, वैसे ही स्वयं को सब बातों का स्तम्भ बनाओ जो कोई हिला न सके। बाप के स्नेह के सिर्फ गीत नहीं गाओ, लेकिन स्वयं बाप समान अव्यक्त स्थिति स्वरूप बनो, जो सब आपके गीत गायें। गीत भले गाओ, लेकिन जिसके गीत गाते हो वो स्वयं आपके गीत गाए, ऐसे अपने को बनाओ।
इस स्मृति दिवस पर बाप स्नेह का प्रैक्टिकल रूप देखना चाहते हैं। स्नेह की निशानी है - कुर्बानी। जो बाप बच्चों से कुर्बानी चाहते हैं, वह सब जानते भी हो। प्रैक्टिकल स्वरूप स्वयं की कमज़ोरियों की कुर्बानी। इस कुर्बानी के मन से गीत गाओ कि बाप के स्नेह में कुर्बान किया। स्नेह के पीछे कुर्बान करने में कोई मुश्किल व असम्भव बात भी सम्भव और सहज अनुभव होती है। अब का स्मृति दिवस समर्थी दिवस के रूप में मनाओ। स्मृति स्वरूप समर्थ स्वरूप। समझा। बाप उस दिन विशेष देखेंगे कि किस-किस ने कौन-कौन सी कुर्बानी और किस परसेंट और किस रूप में चढ़ाई है। मजबूरी से या मोहब्बत से, नियम प्रमाण नहीं करना। नियम है इसलिए करना है - ऐसे मजबूरी से नहीं करना। दिल के स्नेह का ही स्वीकार होता है। अगर स्वीकार नहीं हुआ तो बेकार हुआ। इसलिए सुनाया कि बगुला भगत नहीं बनना स्वयं को धोखा नहीं देना। सत्य बाप के पास सत्य ही स्वीकार होता है। बाकी सब पाप के खाते में जमा होता है, न कि बाप के खाते में। पाप का खाता समाप्त कर बाप के खाते में भरो; कदम में पद्मों की कमाई कर पद्मपति बनो। अच्छा।
ऐसे इशारे से समझने वाले, समय को नहीं लेकिन स्वयं की सोचने वाले, बाप के स्नेह में एक सेकेण्ड के दृढ़ संकल्प में कुर्बानी करने वाले, डबल ताज, डबल तख्त-नशीन, ज्ञानी तू आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
टीचर्स के साथ :- टीचर्स अर्थात् सेवाधारी। सेवा में सफलता का मुख्य साधन है - त्याग और तपस्या। दोनों में से अगर एक की भी कमी है तो सेवा की सफलता में भी इतने परसेन्ट कमी होती है। त्याग अर्थात् मन्सा संकल्प से भी त्याग, सरकमस्टांस के कारण या मर्यादा के कारण मजबूरी से त्याग बाहर से कर भी लेंगे तो संकल्प से त्याग नहीं होगा। त्याग अर्थात् ज्ञान-स्वरूप से संकल्प से भी त्याग, मजबूरी से नहीं। ऐसे त्यागी और तपस्वी अर्थात् सदा बाप की लगन में लवलीन, प्रेम के सागर में समाए हुए, ज्ञान, आनन्द, सुख, शान्ति के सागर में समाये हुए को ही कहेंगे - तपस्वी। ऐसे त्याग, तपस्या वाले ही सेवाधारी कहे जाते हैं। ऐसे सेवाधारी हो ना? त्याग ही भाग्य है। बिना त्याग के भाग्य नहीं बन सकता। इसको कहा जाता है टीचर। तो नाम और काम दोनों टीचर के हैं? केवल नाम टीचर का नहीं। टीचर अर्थात् पोजीशन नहीं, लेकिन सेवाधारी। टीचर्स अर्थात् सभी को पोजीशन दिलाने वाली, न कि पोजीशन समझ उसमें अपने को नामधारी टीचर समझने वाली। जैसे कहा जाता है देना, देना नहीं लेकिन लेना है - ऐसे ही टीचर अपने पोजीशन का त्याग करती हैं तो यही भाग्य लेना है। अच्छा।