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28 Nov 1981
“आप पूर्वजों से सर्व आत्माओं की आशाएं”
28 November 1981 · हिंदी
आज ग्रेट ग्रेट ग्रैन्ड फादर अपनी सारी वंशावली से मिल रहे हैं। कितनी बड़ी वंशावली है, इसको आप सब जानते हो। आप सभी इस वंशावली के आदि फाउन्डेशन हो वा वंशावली के वृक्ष के मूल तना हो। आप लोगों द्वारा वंशावली कैसे वृद्धि को पाती है, यह सब राज़ अच्छी तरह से जानते हो ना? किसी भी आत्मा को देखते हो वा सम्पर्क में आते हो तो यह स्मृति में आता है कि सर्व आत्माओं के हम पूर्वज हैं वा सारे वृक्ष की शाखायें, उपशाखायें, सबके मूल आधार हैं अर्थात् फाउन्डेशन हैं। यह स्मृति सदा इमर्ज रुप में रहती है? इस श्रेष्ठ स्मृति से स्वत: ही समर्थ स्वरुप हो ही जायेंगे। अगर तना अर्थात् मूल फाउन्डेशन कमज़ोर होता है तो सारा वृक्ष कमज़ोर बन जाता है। तना शक्तिशाली है तो वृक्ष भी शक्तिशाली है। सारे वृक्ष के हर पत्ते का सम्बन्ध बीज के साथ-साथ तना से भी होता है। बीज की शक्ति तना द्वारा ही शाखाओं, उपशाखाओं को पहुंचती है। तो आज आपकी सर्व वंशावली को आप पूर्वजों द्वारा वा मूल आधार द्वारा कौन-सी शक्ति चाहिए? सर्व आत्मायें आप पूर्वजों को किस आशाओं से याद कर रहीं हैं? कौन-सी शुभ चाहना आप मास्टर दाता, वरदाताओं द्वारा चाहते हैं? सर्व आत्माओं की अर्थात् अपनी बेहद की वंशावली के शुभ संकल्प वा इच्छाओं को जानते हो?
आज सर्व आत्माओं का एक ही आवाज़ सुनने में आ रहा है। सबका एक ही आवाज़ है - दो घड़ी के लिए भी सुख और चैन से जीना चाहते हैं। बेचैन हैं। सम्पत्ति और साधन होते हुए भी सुख और चैन की नींद आंखों में नहीं है। आजकल मैजारिटी सच्चे सुख और शान्ति के वा सच्ची खुशी के प्यासे होने के कारण रास्ता ढूंढ रहे हैं। अनेक अल्पकाल के रास्ते अनुभव करते, सन्तुष्टता न मिलने के कारण अब धीरे-धीरे उन अनेक रास्तों से लौट रहे हैं, यह भी नहीं, यह भी नहीं। अब नेती-नेती के अनुभव में आ रहे हैं। अभी, ''सही रास्ता कुछ और है“, ऐसी अनुभूति करने लगे हैं। ऐसे समय पर आप पूर्वजों का कार्य है - ऐसी आत्माओं को शमा बन रास्ता दिखाना। अमर ज्योति बन अंधकार से ठिकाने पर लाना। ऐसे संकल्प आते हैं? यह स्मृति रहती है कि हम पूर्वज आत्मायें सर्व वंशावली के आगे जो करेंगे वो ही सारे वंशावली तक पहुंचता है? आप पूर्वजों की वृत्ति विश्व के वातावरण को परिवर्तन करने वाली है। आप पूर्वजों की दृष्टि सर्व वंशावली को ब्रदरहुड की स्मृति दिलाने वाली है। आप पूर्वजों की बाप की स्मृति, सर्व वंशावली को स्मृति दिलायेगी कि हमारा बाप आया है। आप पूर्वजों के श्रेष्ठ कर्म वंशावली को श्रेष्ठ चरित्र अर्थात् चरित्र निर्माण की शुभ आशा उत्पन्न करेंगे।
सबकी नज़र आप पूर्वजों को ढूंढ रही है। अब बेहद के स्मृति स्वरुप बनो, तो हद की व्यर्थ बातें स्वत: ही समाप्त हो जायेंगी। उल्टे वृक्ष के हिसाब से बीज के साथ तना भी ऊपर ऊंचा है। डायरेक्ट बीज और मुख्य दो पत्ते, त्रिमूर्ति के साथ समीप के सम्बन्ध वाले तना हो। कितनी ऊंची स्टेज हो गई। इसी ऊंची स्टेज पर स्थित रहो तो हद की बातें क्या अनुभव होंगी! बचपन के अलबेलेपन की बातें अनुभव होंगी। अपने बेहद के बुजुर्गपन में आओ तो सदा सर्व अनुभवी मूर्त हो जायेंगे। जो बेहद के पूर्वज-पन का आक्युपेशन है, उसको सदा स्मृति में रखो। अब कितना कार्य रहा हुआ है? सदा यह स्मृति में रखो। लेकिन यह सारा कार्य सहज सम्पन्न कैसे होगा? जैसे आपकी रचना साइन्स वाले विस्तार को सार में समा रहे हैं। अति सूक्ष्म और शक्तिशाली साधन बना रहे हैं। जिससे समय, सम्पत्ति और शस्त्र कम से कम खर्चा हो। पहले विनाश के कार्य में कितनी बड़ी सेना, कितने शस्त्र और कितना समय लगता था। और अब विस्तार को सार में लाया है ना! ऐसे आप मास्टर रचयिता बन स्थापना के कार्य में ऐसे ही सूक्ष्म द्वारा निमित्त स्थूल साधन कार्य में लगाओ। नहीं तो स्थूल साधनों के विस्तार में सूक्ष्म शक्ति गुप्त हो जाती है। स्थूल साधन का विस्तार, जैसे वृक्ष का विस्तार बीज को छुपा देता है, वैसे सूक्ष्म शक्ति की परसेन्टेज गुप्त हो जाती है। आप पूर्वज आत्माओं की अलौकिकता - ''सूक्ष्म शक्ति“ है। जो सब अनुभव करें कि पूर्वजों द्वारा कोई विशेष शक्ति उत्पन्न हो रही है। वंशावली आप आत्माओं द्वारा कोई नवीनता चाहती है। साधनों की शक्ति, वाणी की शक्ति यह तो सबके पास है। लेकिन अप्राप्त शक्ति कौन-सी है? वह है श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति, शुभ वृत्ति की शक्ति। स्नेह और सहयोग की दृष्टि। यह किसके पास नहीं है। तो हे पूर्वज आत्मायें! अपनी वंशावली की प्राप्ति के, आशाओं के दीपक जलाए यथार्थ मंजिल तक लाओ। समझा क्या करना है? जो लोग करते हैं वह किया तो क्या किया। आप तो अल्लाह लोग हो, न्यारे लोग हो। अभी वाणी के बॉम्बस फेंकते हो लेकिन यह अभी बेबी बॉम्बस हैं। अभी प्राप्ति के अनुभूति के बॉम्बस चलाओ, जो सीधा जीवन परिवर्तन कर दें। दिमाग तक तीर लगाये हैं, दिल का तीर नहीं लगाया है।
आगे क्या करना है, वह प्लैन तो देना पड़ेगा ना। अभी मुख का आवाज़ निकलता है कि अच्छा कार्य कर रहे हैं। लेकिन दिल से आवाज़ निकले कि, ''यही एक मार्ग है“। मुख का सौदा करने वाले बहुत होते हैं, दिल से सौदा करने वाले कोटों में कोई होते हैं। लेकिन आप सभी दिलवाला के बच्चे हो, दिल से सौदा कराने वाले हो। तो अब क्या करेंगे? ऐसा शक्तिशाली सेवा का चक्र चलाओ जो सर्व आत्मायें अपने पूर्वजों को पहचान प्राप्ति के अधिकार को प्राप्त कर लें। कुछ सुना, अच्छा सुना, इसके बदले, कुछ मिला ऐसी अनुभूति करें। समझा? सुनाते अच्छा हैं, नहीं, बनाते अच्छा हैं। कम खर्चा, कम शक्ति, कम समय - इसी विधि से सिद्धि स्वरुप बनो।
पंजाब का ज़ोन है ना? पंजाब को क्या बनायेंगे? ऐसी कुछ नवीनता करके दिखाओ - अनुभव कराना अर्थात् वारिस बनाना। अच्छा सुनने वाले, अच्छा-अच्छा कहने वाले, वह हो गई प्रजा। अब चाहिए वारिस क्वालिटी। एक वारिस के पीछे प्रजा तो आपेही आ जायेगी। पंजाब क्या करेगा? क्वान्टिटी नहीं बढ़ती तो क्वालिटी तो निकाल सकते हो। क्या करेंगे? अभी वारिस क्वालिटी चारों ओर कम है। तो पंजाब इसमें नम्बरवन हो जाओ। कोई क्वान्टिटी में नम्बरवन, तो कोई क्वालिटी में नम्बरवन हो जाओ। समझा, पंजाब वाले क्या करेंगे? क्वालिटी वाला एक और क्वान्टिटी कितनी होगी क्योंकि एक क्वालिटी वाला क्वान्टिटी को स्वत: ही ले आता है। उनके नाम से आपका काम हो जायेगा। यह तो सहज है ना? अच्छा।
आज पंजाब और मधुबन का टर्न है। पंजाब वाले सबको मधुबन में आकर सरेन्डर करायेंगे। पंजाब से नदियां निकलेंगी और समायेंगी कहाँ? मधुबन है ही सागर का कण्ठा। तो पंजाब और मधुबन का मेल हो गया। विशेष टर्न पंजाब का है इसीलिए पंजाब को कह रहे हैं। बाकी तो उसमें सब आ गये। मधुबन में तो सब आ गये। सबको किसमें समाना है? मधुबन में ना! अच्छा।
चारों ओर के सर्व पूर्वज आत्माओं को, सदा सर्व की आशायें सदाकाल के लिए पूर्ण करने वाले, अप्राप्त आत्माओं को प्राप्ति के अंचली की अनुभूति कराने वाले, सर्व को अनेक रास्तों से निकाल एक रास्ते पर लाने वाले, ऐसे सर्व आत्माओं के मूल आधार, सदा सर्व को एक बाप के अधिकारी बनाने वाले ऐसी श्रेष्ठ पूर्वज आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
सुना तो बहुत है अब विशेषता है स्वरुप बन स्वरूप बनाना। जितना स्वयं सर्व प्राप्ति स्वरुप होंगे उतना सर्व को प्राप्ति स्वरुप बना सकेंगे। आजकल सर्व आत्मायें पाना चाहती हैं, न कि सुनना। जब पा लेते हैं तब ही खुशी से यह गीत गायेंगे कि पाना था वो पा लिया। जैसे आप लोग यह खुशी का गीत गाते हो ना! पा लिया। ऐसे अन्य आत्मायें भी यह खुशी का गीत गायेंगी। वर्तमान समय आत्माओं को यही आवश्यकता है। जो आवश्यकता है उसी को पूर्ण करना, यही आप श्रेष्ठ आत्माओं का कर्तव्य है। इसी कर्तव्य में सदा अनुभवी मूर्त अनुभव कराते चलो। यही चाहते हैं ना, इसी चाहना को पूर्ण करने वाले अर्थात् सर्व को तृप्त आत्मा बनाने वाले। तो सदा तृप्त आत्मा हो? सदा सर्व खजानों से सम्पन्न। जो सम्पन्न होगा वही तृप्त होगा। और जो स्वयं के पास होगा वही औरों को भी जरुर देगा। तो सदा प्राप्ति स्वरुप के नशे और खुशी में रहो - यही संगमयुग के जीवन की विशेषता है। बाप को पाया अर्थात् संगमयुग का प्रत्यक्षफल पाया। प्रत्यक्षफल है सर्व प्राप्ति। इसी स्थिति से सर्व सिद्धि हो जायेंगी।
मधुबन निवासी भाई-बहिनों के साथ:-
मधुबन निवासी इतने खुशनसीब हो जो सब देखकर खुश हो रहे हैं। इतनी अपनी तकदीर को जानते हो ना! कितने तकदीरवान हो जो सदा सागर के कण्ठे पर रहते हो। सदा स्थूल में भी बाप और श्रेष्ठ आत्माओं का साथ है तो कितना बड़ा भाग्य हो गया! तो सदा अपने भाग्य के गुण गाते रहते हो? बस यही गुण गाते और खुशी के झूले में झूलते रहो। मधुबन निवासी अर्थात् सदा मधु के समान मीठे। तो सदा मुख मीठा रहना और सदा सर्व का मुख मीठा करने वाले। सागर के कण्ठे पर रहने वाले होलीहंस हो। हंस क्या करते हैं? सदा मोती चुगते हैं। कंकड़ को देखते नहीं, रत्नों को देखते हैं। तो सभी रत्नों को ग्रहण करने वाले हो ना! महान तीर्थ स्थान पर रहने वाली महान आत्मायें हो। तो यह महात्माओं का ग्रुप हो गया ना! महात्मा अर्थात् जो सदा महान वस्तु को देखे। तो महान वस्तु कौन-सी है? (आत्मा) तो महात्मा की नज़र कहाँ जायेगी? महान वस्तु पर। तो सदा महान देखने वाले, महान बोल बोलने वाले और महान कर्म करने वाले, इसको कहा जाता है महात्मा। तो पाण्डव सभी महात्मा हो! बापदादा की सबसे ज्यादा आशायें किसमें हैं? मधुबन निवासियों में। मधुबन वालों को आशाओं के दीपक जगाने आते हैं ना? तो सदा मधुबन में दीवाली है ना! सदा शुभ आशाओं के दीप जग रहे हैं तो रोज़ दीपावली हो गई। तो मधुबन में कभी अंधकार हो नहीं सकता। मधुबन वाले मास्टर शिक्षक हो। आप सिखाओ न सिखाओ लेकिन आपका हर कर्म हरेक आत्मा को शिक्षा देता रहता है। चाहे साधारण भी करेंगे तो भी सीखकर जाते हैं और श्रेष्ठ करते हो तो भी सीखकर जाते हैं। शिक्षा देते नहीं हो लेकिन मधुबन निवासी बनना अर्थात् मास्टर शिक्षक बनना। तो सदा याद रखो कि मैं मास्टर शिक्षक हूँ। तो हर कर्म, हर बोल शिक्षा देने वाला हो। आप लोगों को खास तख्त पर बैठकर सिखाने की जरुरत नहीं। चलते-फिरते शिक्षक हो। जैसे आजकल चलती-फिरती लाइब्रेरी होती है ना! तो आप चलते-फिरते मास्टर शिक्षक हो। आपका स्कूल अच्छा है ना! तो सदा अपने सामने स्टूडेण्ट को देखो, अकेले नहीं हो, सदा स्टूडेण्ट के सामने हो। सदा स्टडी कर भी रहे हो और करा भी रहे हो। योग्य शिक्षक कभी भी स्टूडेण्ट के आगे अलबेले नहीं होंगे, अटेन्शन रखेंगे। आप सोते हो, उठते हो, चलते हो, खाते हो, हर समय समझो - हम बड़े कालेज में बैठे हैं, स्टूडेण्ट देख रहे हैं, तो वन्डरफुल शिक्षक हो गये ना!
आप सबकी क्या महिमा करें? मधुबन वालों की जो भी महिमा है वह सब है। ऐसे महान समझते हुए सदा चलो। बाप जितनी महिमा करेंगे उतनी फिर निभानी भी पड़ेगी। तो निभाने में भी होशियार हो ना! मधुबन का नक्शा सारे विश्व में चला जाता है। सबकी बुद्धि में सदा क्या याद रहता है? मधुबन में क्या हो रहा है। तो सर्व की बुद्धि में स्मृति स्वरुप हो। मधुबन निवासी हरेक लाइट, माइट का गोला बनो। तो लाइट और माइट के अन्दर स्वयं ही सभी आकर्षित होकर आयेंगे। अभी तो बाप का कर्तव्य चल रहा है, उसके कारण बाप के बनने वाले बच्चे सहज ही अनुभव कर रहे हैं और करते रहेंगे। आपका कर्तव्य अभी गुप्त है। आप अभी अपने शक्ति स्वरुप से वायुमण्डल बनाओ। यह तो ड्रामा अनुसार होना ही है, बढ़ना ही है, चलना ही है इसलिए चलाने वाला चला रहा है लेकिन अभी ऐसे ही फालो फादर करो। अभी हर आत्मा शक्ति स्वरुप हो जाए। जिसके भी सम्पर्क में आते हो वह अलौकिकता का अनुभव करे। अभी वह पार्ट चलना है। सुनाया ना अभी अच्छा-अच्छा कहते हैं, लेकिन अच्छा बनना है यह प्रेरणा नहीं मिल रही है। उसका एक ही साधन है - संगठित रुप में ज्वाला स्वरुप बनो। एक-एक चैतन्य लाइट हाउस बनो। सेवाधारी हो, स्नेही हो, एक बल एक भरोसे वाले हो, यह तो सब ठीक है, लेकिन मास्टर सर्वशक्तिवान की स्टेज, स्टेज पर आ जाए तो सब आपके आगे परवाने के समान चक्र लगाने लग जाएं। अभी सिर्फ बाप शमा की आकर्षण है और सर्व शमा की आकर्षण हो जाए तो क्या होगा? शमा तो हो लेकिन अभी स्टेज पर नहीं आये हो। स्टेज पर आओ तो देखो आबू वाले कैसे आपके पीछे-पीछे दौड़ते हैं। आप लोगों को जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी वह स्वयं आकर कहेंगे जी हजूर, कोई सेवा!
अभी लाडले बच्चे बने हो, इसमें तो ठीक, बच्चे और बाप के साथ लाडकोड में, सम्बन्ध निभाने में ठीक हो लेकिन अब मास्टर शिक्षक बनकर, मास्टर सतगुरु बनकर स्टेज पर आओ। अभी यह दो पार्ट रहे हुए हैं। समझा, अच्छा। मधुबन निवासियों को बापदादा सदा विशेष आत्मा के रुप में देखते हैं। सदा बाप की आशाओं के दीपक मधुबन निवासी हैं। सभी सन्तुष्ट तो सदा हो ना? सन्तुष्ट रहना और सन्तुष्ट करना यही आप सबका सदा का स्लोगन हो। सदा आपके बोर्ड पर कौन सा स्लोगन लिखा है? सन्तुष्ट रहना भी है और करना भी है। इसी सर्टीफिकेट वाले भविष्य में भी राज्य भाग्य का सर्टीफिकेट ले लेंगे। तो मधुबन वालों ने यह सर्टीफिकेट तो लिया है ना। सदा अमृतवेले इस स्लोगन को स्मृति में लाओ। जैसे बोर्ड पर स्लोगन लिखते हो वैसे सदा अपने मस्तक के बोर्ड पर यह स्लोगन दौड़ाओ। तो सभी सन्तुष्ट मूर्तियां हो जायेंगे। अच्छा।
सेवाधारियों के साथ:- सेवाधारी किस स्थान के सेवाधारी हो? यह तो अच्छी तरह से जानते हो ना कि महायज्ञ के सेवाधारी हैं। जो महायज्ञ के सेवाधारी हैं उन्हों को यज्ञ से प्रसाद मिलता है। यज्ञ के प्रसाद का बहुत महत्व होता है ना। वैसे भी लौकिक में भी प्रसाद मिलने वाले को महान आत्मा, भाग्यवान आत्मा कहा जाता है। सबको प्रसाद नहीं मिलता है, भाग्यवान को मिलता है। तो यह है महायज्ञ का महाप्रसाद। महाप्रसाद क्या है? सदा कमाई जमा होना, सर्व खजाने प्राप्त होना यही महाप्रसाद है क्योंकि देखो, यहाँ यज्ञ सेवा करने से जो सबसे श्रेष्ठ खजाना है शक्तियों का, सुख का, शान्ति का... वह सर्व खजानों की अनुभूति होती है ना। तो यही यज्ञ प्रसाद है। इसी प्रसाद द्वारा सदा प्रसन्न भी रहते हो और आगे भी सदा प्रसन्न रहेंगे। तो सबसे बड़ा खजाना वा प्रसाद है - प्रसन्नता की प्राप्ति। यहाँ रहते सदा प्रसन्न रहे हो ना? किसी भी प्रकार के वातावरण में प्रसन्न रहने के अभ्यासी बन गये। वातावरण आपको अपनी तरफ न खींचे। लेकिन आप वातावरण को परिवर्तन कर लो यह है महावीर की निशानी। तो क्या आप समझते हो, महाप्रसाद मिला? महाप्रसाद लेने वाले महान भाग्यवान हो।
जितनी भी आत्माओं की सेवा की उन सर्व आत्माओं की शुभ भावना आपके प्रति आशीर्वाद का रुप बन गई। तो कितनी आत्माओं की आशीर्वाद मिली होगी? सर्वश्रेष्ठ आत्माओं की आशीर्वाद अनेक जन्मों के लिए सदा सम्पन्न बना देती है। तो सबकी आशीर्वाद ली? सदा राज़युक्त अर्थात् राजी रहे? कभी सेवा में नाराज़ तो नहीं हुए? सदा राज़ी। कोई नाराज़ करे तो भी नाराज़ न हों क्योंकि जो राज को जानते हैं कि यह वैरायटी वृक्ष है, तो इस राज़ को जानने वाले कभी नाराज़ नहीं होते। नाराज़ होना अर्थात् इस राज़ को न जानना। तो सभी राज़युक्त हो।
सेवा का चान्स मिला अर्थात् लॉटरी का लकी नम्बर खुल गया। सेवाधारी अर्थात् लकी नम्बर वाले। लकी नम्बर है ना? लकी नम्बर बहुत थोड़ों का निकलता है और लकी नम्बर में सर्वश्रेष्ठ प्राप्ति होती है। लकी नम्बर अर्थात् स्वयं लकी बन गये। अच्छा।
माताओं ने जन्म-जन्म का खाता जमा किया। एक जन्म में अनेक जन्मों की प्रालब्ध बनाना, यह तो सस्ता सौदा हो गया ना। थोड़ा सा समय मेहनत और जन्म-जन्म का फल। तो सभी ने सस्ता सौदा करके अपनी कमाई जमा कर ली! मातायें सदा सहयोगी रहीं, इसकी मुबारक हो। जैसे यहाँ सेवा का भाग्य बनाया वैसे इस भाग्य को सदा साथ रखना। सदा भाग्य का दीपक जगा रहे इसके लिए सदा अटेन्शन। अपना भाग्य साथ रखना अर्थात् भाग्यविधाता को साथ रखना। आपके भाग्य का सितारा चमकता हुआ देख औरों का भी भाग्य खुल जायेगा। अच्छा।
कुमारियों को कौन-सी कमाल करके दिखानी चाहिए? सबसे बड़े ते बड़ी कमाल है, बाप ने कहा और बच्चों ने किया। जैसे चात्रक होता है ना, बूंद आई और धारण की। तो सबसे बड़ी कमाल है बाप का हर बोल करके दिखाना। कर्म से बाप के बोल को प्रत्यक्ष करना - यह है कुमारियों की कमाल। इसीलिए यादगार में भी दिखाते हैं कुमारियों ने बाप को प्रत्यक्ष किया। विजय प्राप्त की ना! तो वह कौन-सी कुमारी थी? हरेक समझे मैं। इसमें हरेक अपने को आगे रखे। पहले मैं। इसको कहा जाता है कुमारियों की कमाल। हरेक बाप को प्रत्यक्ष करने वाली निमित्त आत्मा बन जाए तो सभी अमूल्य रत्न हो जायेंगे। अच्छा!