सरल हृदय रमा से दादी प्रकाशमणि जी तक: आध्यात्मिक नेतृत्व और विश्व सेवा की प्रेरणादायी यात्रा

सरल हृदय रमा से दादी प्रकाशमणि जी तक: आध्यात्मिक नेतृत्व और विश्व सेवा की प्रेरणादायी यात्रा
Key Takeaway

दादी प्रकाशमणि जी ने बहुत ही खूबी से समझाया कि सच्चा आध्यात्मिक नेतृत्व पद, अधिकार या पहचान पाने के बारे में नहीं है। बल्कि यह तो जो हम सीखते हैं, उसे अपने जीवन में जीने, दूसरों की विशेषताओं और संभावनाओं को पहचानने, मतभेदों के बीच भी एकजुट रहने, विनम्रता से सेवा करने और हर जिम्मेदारी के केंद्र में परमात्मा को रखने का नाम है। जैसे-जैसे विश्वभर में सेवा का विस्तार होता गया, उनकी सरलता, आध्यात्मिक अनुशासन और स्वयं को परमात्मा का निमित्त समझने की भावना हमेशा अटल रही।

यज्ञ के शुरुआती दिनों से लेकर ब्रह्माकुमारीज़ संस्था के विश्वव्यापी विस्तार तक, दादी प्रकाशमणि जी ने लोगों को सँवारने, सेवा को मजबूत बनाने और हजारों लोगों को उनकी आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन उनकी यात्रा तब और भी अर्थपूर्ण हो जाती है, जब हम स्वयं से यह प्रश्न करते हैं कि—एक चौदह वर्ष की कन्या ने कैसे स्वयं को इस योग्य बनाया कि आगे चलकर विश्वव्यापी आध्यात्मिक परिवार की जिम्मेदारी संभाल सके?

इसका उत्तर केवल उनके जीवन की बड़ी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उन अनुभवों में छिपा है, जिन्होंने उन्हें धीरे-धीरे भीतर से तैयार किया—कम उम्र में ही जिम्मेदारियाँ स्वीकार करना, ब्रह्मा बाबा और मम्मा (मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती) के मार्गदर्शन में तपस्या और प्रशिक्षण के वर्षों से गुजरना, लोगों को समझना और उन्हें सँवारना सीखना, दूसरों पर विश्वास करना और सेवा का क्षेत्र बढ़ते जाने के बावजूद अपनी सरलता को बनाए रखना।

दादी प्रकाशमणि जी को, जिन्हें बाद में हजारों लोगों ने एक आध्यात्मिक माँ और कुशल नेतृत्वकर्ता के रूप में जाना, समझने के लिए हमें सबसे पहले रमा से मिलना होगा—एक ऐसी छोटी-सी कन्या, जिसका हृदय गहरी भक्ति से भरा था, जो सरल थी और जिसके भीतर परमात्मा को अनुभव करने की गहरी तड़प थी। यहीं से उनकी सच्ची यात्रा शुरू होती है।

भाग एक : रमा — दादी प्रकाशमणि बनने से पहलेhttps://www.brahmakumaris.com/dadiprakashmani/

दादी प्रकाशमणि जी का जन्म 1922 में अविभाजित भारत के हैदराबाद, सिंध प्रांत में हुआ था। उनके बचपन का नाम रमा था।

नेतृत्व, प्रशासन और विश्व सेवा की विशाल जिम्मेदारियाँ संभालने से बहुत पहले ही उनके जीवन की नींव गहरी भक्ति और ईश्वर-प्रेम पर टिकी थी। सात-आठ वर्ष की उम्र से ही रमा शायद ही कोई दिन ऐसा जाने देतीं थीं, जब वे श्रीकृष्ण को याद और उनकी पूजा न करती हों। उनके घर के पास राधा-कृष्ण का एक मंदिर था और वे रोज सुबह-शाम वहाँ जाती थीं। रात को वे बड़े प्यार से कृष्ण की मूर्ति को झूले में झुलातीं और फिर स्नेहपूर्वक उन्हें सुलातीं। आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ना और धार्मिक कहानियाँ सुनना भी उनके बचपन का स्वाभाविक हिस्सा था।

उनके पिता व्यापारी होने के साथ-साथ ज्योतिषी भी थे और आध्यात्मिक विषयों में उनकी गहरी रुचि थी। इसलिए घर में धर्म और आध्यात्मिक जीवन से जुड़ी बातें सहज रूप से होती रहती थीं। ऐसे वातावरण में छोटी रमा के मन में एक सरल लेकिन गहरी इच्छा पैदा हुई—वह मीरा जैसी बनना चाहती थीं।

बचपन की सामान्य खुशियाँ उन्हें बहुत अधिक आकर्षित नहीं करती थीं। बाद में उन्होंने याद करते हुए बताया कि वे शायद ही कभी अपने लिए विशेष कपड़े, अपनी पसंद का खाना या कहीं घूमने जाने की इच्छा करती थीं। लेकिन इस शांत संतुष्टी के पीछे एक चाह हमेशा बनी रही—

आखिर वे कब श्रीकृष्ण को वास्तव में देख पाएँगी?

फिर 1936 की दीपावली की छुट्टियों में, जब रमा लगभग चौदह वर्ष की थीं, उनकी यह चाह एक ऐसे मोड़ पर आ पहुँची, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी।

वह दीपावली, जिसे उन्होंने अपना आध्यात्मिक जन्म कहा

दीपावली की उन छुट्टियों में एक सुबह, जब रमा अभी बिस्तर पर ही थीं, उन्हें एक अनोखा अनुभव हुआ।

उन्होंने एक विशाल बगीचा देखा, जो प्रकाश से भरा हुआ था। दूर उन्हें श्रीकृष्ण की एक छोटी-सी छवि दिखाई दी। उनके हाथ में बाँसुरी थी और वे उनकी ओर आ रहे थे। उनके पीछे सफेद वेषधारी फ़रिश्ता खड़ा था। इस दिव्य दृश्य ने रमा को अपार खुशी से भर दिया।

रमा ने इसके बारे में किसी को नहीं बताया। उन्होंने सुना था कि ऐसे दिव्य अनुभव को अपने तक ही शांत भाव से रखना चाहिए। लेकिन अंदर ही अंदर उनके मन में एक चाह जाग उठी—वे इस अनुभव को फिर से करना चाहती थीं। वे माला लेकर बैठीं और श्रीकृष्ण को याद करने लगीं। हमेशा की तरह मंदिर भी गईं। प्रतीक्षा करती रहीं।

लेकिन वह दृश्य दोबारा घटित नहीं हुआ।

कुछ दिनों बाद रमा अपनी सहपाठी लीला के घर गईं। उन्होंने देखा कि लीला बहुत गहरी ध्यान की अवस्था में बैठी थीं। जब लीला उस अवस्था से बाहर आईं, तो उन्होंने रमा से कहा कि वे उन्हें ऐसी जगह ले जा सकती हैं, जहाँ रमा श्रीकृष्ण से मिलने का अनुभव कर सकती हैं। रमा हँस पड़ीं। भला कोई किसी दूसरे व्यक्ति को इस तरह श्रीकृष्ण के दर्शन कराने कैसे ले जा सकता है?

फिर भी यह बात उनके मन में रह गई। अगले दिन पिता की अनुमति लेकर वे उस आध्यात्मिक सभा में गईं, जिसके बारे में लीला ने बताया था। दादा लेखराज—जो आगे चलकर ब्रह्मा बाबा के नाम से जाने गए—वहाँ सभा कर रहे थे। कमरे में ओम की ध्वनि गूँज रही थी। जैसे ही रमा ने उनके मस्तक की ओर देखा, उन्हें प्रकाश चमकता हुआ दिखाई दिया।

और फिर, लगभग उसी क्षण, वही सपनों वाला बगीचा उनके सामने आ गया। श्रीकृष्ण फिर दिखाई दिए। उनके पीछे सफेद वस्त्र पहने वो फ़रिश्ता भी फिर से दिखाई दिया।

जिस अनुभव की रमा प्रतीक्षा कर रही थीं, वह अचानक उनके सामने साकार हो गया।

रमा ध्यान में इतनी गहराई से लीन हो गईं कि उन्हें पता ही नहीं चला कि सभा कब समाप्त हो गई। इसके बाद आने वाले दिनों में वे बार-बार उसी गहरी आंतरिक अवस्था में जाने लगीं। चौदह वर्ष की रमा के भीतर कुछ बदल चुका था। बचपन में श्रीकृष्ण को देखने की जो चाह उनके मन में जगी थी, अब वही उन्हें एक बिल्कुल अलग आध्यात्मिक यात्रा की ओर ले जा रही थी।

कई वर्षों बाद, दीपावली के आसपास के उन दिनों को याद करते हुए दादी प्रकाशमणि जी ने उन्हें अपना अलौकिक जन्म—आध्यात्मिक जन्म कहा।

School photo.jpg

चौदह वर्ष की उम्र से ही विद्यार्थी से शिक्षिका बनने की शुरुआत

दीपावली के उन दिनों का अनुभव केवल रमा की बचपन की इच्छा पूरी होने तक सीमित नहीं था। उसने धीरे से उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। लगभग चौदह वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना जीवन आध्यात्मिक अध्ययन और ईश्वरीय सेवा के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया।

इसके बाद ओम मंडली के वे आधारभूत वर्ष शुरू हुए, जिसे आगे चलकर ब्रह्माकुमारीज़ के नाम से जाना गया। ये सामूहिक जीवन, आध्यात्मिक अध्ययन, मेडिटेशन, अनुशासन और तपस्या के वर्ष थे—ऐसे वर्ष, जिनमें रमा स्वयं भी सीख रही थीं और आगे बढ़ रही थीं।

फिर भी आश्चर्यजनक रूप से, उन्हें उसी समय दूसरों के विकास की जिम्मेदारी भी दी जाने लगी।

1937 में आध्यात्मिक परिवार से जुड़े बच्चों के लिए एक बोर्डिंग स्कूल औपचारिक रूप से शुरू किया गया। लगभग पचास छोटे बच्चे वहाँ रहते और पढ़ते थे। रमा स्वयं केवल लगभग चौदह वर्ष की थीं, फिर भी उन्हें अपने से थोड़े ही छोटे बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई। बाद में वे उन शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताती थीं कि उस समय न कोई प्रोफेशनल डिग्री थी और न ही कोई औपचारिक योग्यता। एक जिम्मेदारी दी गई थी और उसे निभाते-निभाते वे सीखते गए।

शायद यहीं से दादी के जीवन की एक सबसे मजबूत विशेषता ने आकार लेना शुरू किया।

ब्रह्माकुमारीज़ की प्रशासनिक प्रमुख बनने से तीन दशक से भी अधिक पहले, रमा प्रशासन नहीं, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण एक बात सीख रही थीं—दूसरे व्यक्ति के विकास की जिम्मेदारी कैसे निभाई जाती है।

Mamma dadiji and sister.jpg

रमा से कुमारका और फिर प्रकाशमणि बनने का अलौकिक सफ़र

जैसे-जैसे दादी जी का आध्यात्मिक जीवन गहरा होता गया, वैसे-वैसे उनके नाम से जुड़ी पहचान भी बदलती गई।

ब्रह्मा बाबा उन्हें प्यार से “कुमारका” कहते थे। यह नाम उस छोटी कुमारी की कोमलता, पवित्रता और मासूमियत को दर्शाता था, जो बाबा को उनमें दिखाई देती थी। फिर वह नाम आया, जिससे आगे चलकर दुनिया उन्हें जानने लगी—प्रकाशमणि, अर्थात् “प्रकाश की मणि”। यह नाम संस्था के शुरुआती वर्षों में निराकार परमात्मा शिव द्वारा आध्यात्मिक नामकरण के माध्यम से दिया गया था। धीरे-धीरे रमा, प्रकाशमणि बनती गईं—केवल नाम से नहीं, बल्कि अपनी तपस्या और सेवा के द्वारा।

Baba mamma and dadiji.jpg

संस्था के इन प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने ब्रह्मा बाबा और मम्मा (जगदम्बा सरस्वती) को बहुत करीब से देखा और उनसे सीखा। उनसे उन्होंने एक ऐसी विशेषता ग्रहण की, जो जीवनभर उनके व्यक्तित्व में दिखाई देती रही—लोगों के प्रति गहरी ममता और स्नेह रखते हुए भी सिद्धांतों के मामले में स्पष्ट और अडिग रहना।

कम उम्र में ही आसपास के लोग उन्हें प्यार से “मुन्नी मम्मा” कहने लगे थे। वे सांसारिक अर्थों में माँ नहीं थीं, फिर भी जिस तरह वे सभी की देखभाल करती थीं, उसमें लोगों को एक माँ जैसी ममता और अपनापन अनुभव होता था।

भाग दो : तपस्या से विश्व सेवा के विस्तार तक

शुरुआती वर्षों ने दादी जी को भीतर से तैयार कर दिया था। अब वही आंतरिक तैयारी सेवा के रूप में सामने आने लगी। उनकी सेवा की शुरुआत बड़े-बड़े मंचों, उपाधियों या विशाल सभाओं से नहीं हुई। यह तो बहुत सरल तरीकों से शुरू हुई।

दादी रतनमोहिनी जी के साथ जापान सेवा की शुरुआत

दादी रतनमोहिनी जी के साथ जापान सेवा की शुरुआत

दादी प्रकाशमणि जी की शुरुआती अंतरराष्ट्रीय यात्राओं में से एक 1954 में हुई, जब वे दादी रतनमोहिनी जी के साथ एक अंतरराष्ट्रीय धार्मिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए जापान गईं। वहाँ अपने प्रवास के दौरान दादी प्रकाशमणि जी और दादी रतनमोहिनी जी ने अनेक लोगों से मुलाकात की और संस्था के कार्य व आध्यात्मिक समझ को उनके साथ साझा किया। यह अंतरराष्ट्रीय सेवा की एक छोटी-सी शुरुआत थी, लेकिन इसमें दादी के जीवन का एक ऐसा सिद्धांत स्पष्ट दिखाई देता है, जिसे उन्होंने हमेशा निभाया—सेवा कभी मंच की विशालता से नहीं, बल्कि भावना की गहराई से बड़ी होती है।

Dadi with baba.jpg

मुंबई: जहाँ सेवा सीखने का माध्यम बनी

अंतरराष्ट्रीय सेवा के अलावा दादी जी ने उस समय भारत के अलग-अलग स्थानों, जैसे पटना आदि में भी सेवा की। लेकिन मुंबई उनके सेवा-जीवन का एक विशेष और महत्वपूर्ण अध्याय बना।

उस समय सेवा की सीमाएँ बहुत सहज थीं। जो व्यक्ति लेक्चर देता, वही भोजन भी बना सकता था। जो किसी सेंटर का मार्गदर्शन करता, वही बैठकर प्रदर्शनी के पैनल पर लिखे शब्दों को ठीक भी कर सकता था। कोई वरिष्ठ बहन किसी आने वाले अतिथि का स्वयं स्वागत और उसकी देखभाल भी कर सकती थी।

दादी ने सेवा के लगभग हर पहलू को इसी तरह सीखा—दूर रहकर नहीं, बल्कि स्वयं करके।

वर्ष 1964 की एक घटना बताती है कि ब्रह्मा बाबा का कुमारका पर विश्वास कितना बढ़ चुका था।

उस समय आध्यात्मिक प्रदर्शनियों के माध्यम से जनसेवा का एक नया रूप विकसित हो रहा था। “सच्चा वैष्णव कौन?” शीर्षक वाला पहला चित्र ब्रह्मा बाबा के पास स्वीकृति के लिए भेजा गया।

जब वह चित्र वापस आया, तो उसमें लिखे शब्दों को सुधारकर दोबारा लिखा गया था। रमेश भाई ने तुरंत एक बात नोटिस की—लिखावट ब्रह्मा बाबा की नहीं थी। उत्सुकतावश उन्होंने पत्र लिखकर पूछा कि ये सुधार किसने किए हैं। बाबा का उत्तर बहुत सरल था—

कुमारका उनके पास थीं और उन्होंने ही उस लेख को ठीक किया था।

इसके बाद दादी जी प्रदर्शनी के चित्रों के साथ दिए जाने वाले विवरण और उनकी व्याख्याओं को अंतिम रूप देने के कार्य में भी जुड़ गईं। यह केवल शब्दों को संपादित करने का कार्य नहीं था। चुनौती यह थी कि आध्यात्मिक ज्ञान को इस तरह सरल और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया जाए कि पहली बार उसे देखने वाला व्यक्ति भी आसानी से समझ सके। जिस चौदह वर्ष की रमा को कभी बिना किसी औपचारिक योग्यता के बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई थी, वही अब यह तय करने में योगदान दे रही थीं कि आध्यात्मिक ज्ञान को आम लोगों तक किस रूप में पहुँचाया जाए।

Mamma with dadi.jpg

मम्मा के स्नेहिल सान्निध्य में

जैसे-जैसे दादी जी ने सेवा के अनेक व्यावहारिक पहलुओं को सीखा, वैसे-वैसे उनका व्यक्तित्व एक ऐसी महान आत्मा के सान्निध्य में भी निखर रहा था, जिन्हें वे बहुत करीब से देखती थीं—मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती जी, जिन्हें सभी प्यार से मम्मा कहते थे। वे ब्रह्माकुमारीज़ की पहली प्रशासनिक प्रमुख थीं।

1965 तक दादी प्रकाशमणि जी मम्मा से मार्गदर्शन लेती रहीं। वे मम्मा के जीवन को और संस्था की देखभाल करने के उनके तरीके को देखकर बहुत कुछ सीखती थीं। मम्मा की कार्यशैली में सटीकता और अनुशासन था। वे प्रेम से लोगों को संभालती थीं, लेकिन सिद्धांतों के मामले में दृढ़ रहती थीं। और शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उनके व्यक्तित्व में आध्यात्मिक अधिकार और मातृत्व का भाव इतने स्वाभाविक रूप से एक साथ दिखाई देता था।

इन गुणों की गहरी छाप दादी प्रकाशमणि जी पर भी पड़ी।

दादी सीख रही थीं कि एक आध्यात्मिक परिवार को संभालने के लिए शक्ति और कोमलता—दोनों की आवश्यकता होती है। सही बात पर कायम रहने की दृढ़ता भी चाहिए और ऐसा हृदय भी, जिससे हर व्यक्ति को अपनापन और देखभाल का अनुभव हो।

Last Brahma baba meeting all.jpg

भाग तीन : जब जिम्मेदरियां सेवा का माध्यम बनीं

तपस्या, शिक्षण और सेवा के वर्षों ने दादी प्रकाशमणि जी को इस तरह तैयार किया था, जिसका पूरा महत्व शायद तभी सामने आया, जब उनके सामने बड़ी जिम्मेदारी निभाने का समय आया।

18 जनवरी 1969 को ब्रह्मा बाबा ने अपनी दैहिक यात्रा पूरी की। जो भाई-बहन दशकों से उनका प्रत्यक्ष मार्गदर्शन और स्नेह पाते आए थे, उनके लिए बाबा का भौतिक रूप से सामने न होना स्वाभाविक रूप से कई प्रश्न लेकर आया होगा।

अब परिवार का मार्गदर्शन कौन करेगा?

क्या सभी एकजुट रहेंगे?

क्या ब्रह्मा बाबा के भौतिक रूप से साथ न होने पर भी सेवा आगे बढ़ पाएगी?

इन प्रश्नों के उत्तर केवल किसी घोषणा से नहीं मिल सकते थे। वे तो उन लोगों के जीवन, कर्म और व्यवहार में दिखाई देने थे, जो अब जिम्मेदारी संभालने वाले थे और पूरे परिवार को साथ लेकर आगे बढ़ने वाले थे।

Didi and dadiji.jpg

इस नए दौर में दादी प्रकाशमणि जी और दीदी मनमोहिनी जी दो प्रमुख प्रशासनिक आधार के रूप में सामने आईं।

उनका आपसी संबंध आगे आने वाले वर्षों की एक बड़ी शक्ति बना। वे एक-दूसरे से सलाह करतीं, एक-दूसरे के गुणों का सम्मान करतीं और सबसे बढ़कर, अपने सामने कार्य को रखती थीं। परिवार में उनकी पूरक भूमिकाओं को बाद में एक सरल अभिव्यक्ति में बताया गया—दादी प्रकाशमणि जी “माइक” थीं और दीदी मनमोहिनी जी “माइट”। भूमिकाएँ जरूर अलग थीं, लेकिन दोनों के उद्देश्य समान थे। उन्हें करीब से देखने वाले लोग उनके इस संबंध को एक और सरल वाक्य में याद करते थे—दो शरीर, लेकिन उद्देश्य एक।

एकजुट नेतृत्व से विश्व बंधुत्व तक

एकजुट नेतृत्व से विश्व बंधुत्व तक

दादी और दीदी की यह साझेदारी एक गहरी एकता, जिम्मेदारी और निःस्वार्थ सेवा की भावना को दर्शाती थी। यही मूल्य आज भी ब्रह्माकुमारीज़ की विभिन्न सेवाओं और पहलों को प्रेरणा देते हैं। इसका एक सुंदर उदाहरण रक्तदान अभियान है, जहाँ देने की भावना मानवता की सेवा और देखभाल के एक व्यावहारिक रूप में सामने आती है।

और जानने के लिए

हल्केपन के साथ नेतृत्व

हल्केपन के साथ नेतृत्व
हल्केपन के साथ नेतृत्व
हल्केपन के साथ नेतृत्व
हल्केपन के साथ नेतृत्व
हल्केपन के साथ नेतृत्व

भाग चार : दादी के नेतृत्व ने दूसरों में नेतृत्व भाव जगाया और उन्हें आगे बढ़ाया

यह दादी प्रकाशमणि जी के नेतृत्व का शायद सबसे महत्वपूर्ण पहलू था।

जैसे-जैसे जिम्मेदारियाँ बढ़ती गईं, दादी दूसरों को आगे बढ़ने के अवसर देती रहीं। वे किसी व्यक्ति की क्षमता को पहचानतीं, उसके सामने कोई जिम्मेदारी रखतीं और फिर उसे उस जिम्मेदारी में आगे बढ़ने के लिए पूरा अवसर देतीं।

कई बार उस व्यक्ति को स्वयं भी अपनी क्षमता का पता नहीं होता था। एक बहन याद करतीं हैं कि दादी ने एक बार उनसे प्रेस रिलीज तैयार करने को कहा। वे हैरान रह गईं और बोलीं कि उन्होंने पहले कभी प्रेस रिलीज नहीं लिखी है। दादी का उत्तर बहुत सरल था—

“किसी कार्य को करने का पहला दिन तो होता ही है। मान लो कि वह दिन आज है।”

वह प्रेस रिलीज तैयार हुई और अगले ही दिन प्रकाशित भी हो गई।

एक और अवसर पर एक बहन को म्यूज़ियम सजाने में मदद करने के लिए कहा गया। उन्हें बिल्कुल विश्वास नहीं था कि वे यह काम कर पाएँगी। उन्होंने पहले कभी ऐसा काम किया ही नहीं था। लेकिन दादी को उन पर विश्वास था।

“तुम जाओ। दादी को पूरा विश्वास है कि तुम कर सकती हो।”

दादी जी का सभी भाई बहनों पर यह दृढ़ विश्वास ही उनके लिए पर्याप्त होता था। दादी का भरोसा ही वह शक्ति बन गया, जिसके सहारे उस बहन ने पहला कदम उठाया।

शायद दादी के नेतृत्व को समझने का यह सबसे सुंदर तरीका है—वे ऐसी लीडर थीं, जो दूसरों में भी लीडरशिप की शक्ति जगाती थीं। वे हमेशा यह इंतजार नहीं करती थीं कि व्यक्ति पहले स्वयं को जिम्मेदारी के लिए तैयार महसूस करे। कई बार वे उसे जिम्मेदारी इसलिए देती थीं, ताकि वह जिम्मेदारी निभाते-निभाते तैयार हो सके।

और दूसरों को आगे बढ़ाने की इस क्षमता के पीछे उनके नेतृत्व का एक और उतना ही महत्वपूर्ण गुण था—स्वयं पीछे हट जाने की सहजता।

Dadi Prakashmani ji.jpg

“पहले आप” — नेतृत्व में विनम्रता का भाव

दादी के पास बहुत बड़ी जिम्मेदारियाँ और अधिकार थे, फिर भी उनके साथ रहने और काम करने वाले लोगों ने उनके व्यवहार में एक सरल सिद्धांत बार-बार देखा—

वो था “पहले आप।” दादी ने सबको आगे रखा। 'पहले आप' करने में बड़ी दिल, सच्ची दिल थी। वे सभी भाई-बहनों को सम्मान देती थीं और यही सम्मान दूसरों को आगे आने का अवसर देता था।

वे अपना ध्यान अपनी ओर नहीं खिंचवाती थीं और न ही किसी पहचान या श्रेय की अपेक्षा रखती थीं। इसके पीछे उनका एक गहरा विश्वास था—सेवा उनकी नहीं है। सेवा तो ईश्वर की है।

जिस चेतना के साथ वे कार्य करती थीं, उसे वे बहुत सरल शब्दों में व्यक्त करती थीं—

“परमात्मा, जो कर्ता हैं वे मेरे द्वारा कार्य करा रहे हैं। दादी तो केवल एक माध्यम है।”

निमित्त बनना उनके लिए निष्क्रिय हो जाना नहीं था। बल्कि इसी भावना ने उन्हें बड़ी जिम्मेदारियाँ लेने और कठिन निर्णय करने की स्वतंत्रता दी, क्योंकि उन्हें हर बात को अपने से जोड़ने की आवश्यकता नहीं रहती थी। जब सिद्धांतों का प्रश्न होता या संस्था के हित और कल्याण की बात होती, तो दादी बहुत दृढ़ हो सकती थीं। संस्था की प्रमुख होने की भावना को उन्होंने एक बार बहुत सुंदर ढंग से समझाया—

“जब आप स्वयं को ‘हेड’ समझते हैं, तो सिरदर्द होता है। जब स्वयं को निमित्त समझते हैं, तो सिरदर्द समाप्त हो जाता है।”

दादी के लिए नेतृत्व लोगों से ऊपर हेड बनने का नाम नहीं था। यह तो लोगों को आगे बढ़ाने, उन्हें विकसित होने में मदद करने और स्वयं इतना हल्का रहने का नाम था कि वे दूसरों के मार्ग में बाधा न बनें।

Dadiji with sisters and btohers.jpg

व्यक्ति को नहीं, परिस्थिति को सुधारना

यदि दादी का नेतृत्व लोगों को अपनी शक्तियाँ पहचानने में मदद करता था, तो उनकी कमजोरियों के प्रति उनका दृष्टिकोण भी उतना ही सुंदर था। दादी अक्सर कहती थीं कि ईश्वर ने उन्हें अपने बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी दी है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति का स्वभाव कठिन हो, तो उसे छोड़ देना कोई विकल्प नहीं था।

वे यह नहीं कह सकती थीं— “यह व्यक्ति ऐसा ही है, इसे छोड़ दो।” उनकी सोच अलग थी—

“अगर हम इसे छोड़ देंगे, तो यह जाएगा कहाँ?”

इसलिए वे लोगों के साथ चलती थीं। अलग-अलग स्वभाव के लोगों को स्वीकार करतीं, उन्हें आगे बढ़ने में मदद करतीं और हर व्यक्ति के भीतर उस विशेषता को खोजतीं, जिसे प्रोत्साहित करके सेवा में उपयोग किया जा सके| उनका एक सिद्धांत बहुत स्पष्ट था—

“किसी की कमजोरी को अपने दिल में मत रखो।”

दादी रिश्तों की एक बहुत व्यावहारिक बात समझती थीं। यदि हम बार-बार किसी दूसरे की कमजोरी के बारे में सोचते रहें, तो धीरे-धीरे उस व्यक्ति के प्रति हमारी दृष्टि भी उसी कमजोरी से प्रभावित होने लगती है। फिर वह कमजोरी हमें उस व्यक्ति से भी बड़ी दिखाई देने लगती है।

दादी की दृष्टि में हर व्यक्ति में कोई न कोई विशेषता जरूर थी। उनका कार्य केवल उसे ढूँढ निकालना था। दादी हृदयमोहिनी जी याद करते हुए कहती थीं कि यह समझ दादी के रोजमर्रा के व्यवहार में कितनी सहजता से दिखाई देती थी।

Dadi with sister.jpg

यदि कोई छोटी बहन रोते हुए दादी के पास आती और कहती कि किसी वरिष्ठ बहन ने उसे दुख पहुँचाया है, तो दादी पहले उसे इतना प्यार देतीं कि उसका मन शांत हो जाए। फिर ही उस विषय को समझाया जा सकता था। सिद्धांतों की बात की जा सकती थी। जरूरत पड़ने पर कक्षा में सुधार भी किया जा सकता था—लेकिन इस तरह नहीं कि एक व्यक्ति दूसरे के विरुद्ध हो जाए।

दादी परिस्थिति को सुधारती थीं, लेकिन गलती को व्यक्ति की पहचान नहीं बनने देती थीं। जो लोग उनके करीब रहते थे, उन्होंने उनकी एक और विशेषता देखी। दादी किसी की गलती को बहुत दृढ़ता से बता सकती थीं। लेकिन थोड़ी देर बाद उसी व्यक्ति से वे बिल्कुल उसी प्रेम और अपनत्व से मिलतीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। पिछली बात का बोझ वे अपने मन में नहीं रखती थीं।

कभी-कभी लोग आश्चर्य होकर सोचते—वे ऐसे कैसे व्यवहार कर सकती हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं?

उनका उत्तर बहुत सरल और प्यारा होता—

“क्या बात थी? मुझे तो याद ही नहीं।”

दादी जी और वरिष्ठ भाई बहनों की अनमोल झलकियाँ

हजारों दिलों की एक माँ : सबके साथ सहज और हल्की

शायद लोगों की कमजोरियों से आगे देखने की यही क्षमता एक कारण थी कि इतने लोग दादी के पास सहजता से पहुँच पाते थे। जैसे-जैसे ब्रह्माकुमारीज़ का परिवार बढ़ता गया, दादी की जिम्मेदारियाँ भी बहुत बढ़ती गईं। फिर भी उनसे मिलने के लिए कोई औपचारिकता या दूरी नहीं बढ़ी।

सभी लोग जानते थे कि वे आज भी दादी के पास जा सकते हैं।

वे बच्चों के साथ जितनी सहजता से बैठ सकती थीं, उतनी ही सहजता से प्रशासकों, विद्वानों या सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों से भी मिलती थीं। जब मधुबन में हजारों लोग आने लगे, तब भी दादी की इच्छा रहती थी कि वे लोगों से व्यक्तिगत रूप से मिलें। यदि वे आराम कर रही होतीं और कोई उन्हें बताता कि कोई आगंतुक उनसे मिलने की आशा लेकर आया है, तो वे अक्सर तुरंत उठकर उससे मिलने के लिए तैयार हो जातीं। उनकी एक करीबी साथी याद करती हैं कि दादी को यह कहना बिल्कुल पसंद नहीं था—“मेरे पास समय नहीं है।”

यदि रसोई की जिम्मेदारी संभालने वाले किसी व्यक्ति को भोजन का स्वाद चखाने के लिए दादी की आवश्यकता होती, ताकि भोजन बनाने में देरी न हो, तो वे तुरंत सहयोग करतीं। उनके लिए ये किसी अधिक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के बीच आने वाले व्यवधान नहीं थे। यही तो उनकी जिम्मेदारी थी।

शायद इसी कारण, जब परिवार हजारों की संख्या में बढ़ता गया, तब भी लोगों को उनमें एक माँ का अनुभव ही होता रहा।

Dadi reading murli.jpg

बाबा की मुरली—उनके जीवन का केंद्र बिंदु

दादी जो लोगों के लिए इतनी सहजता से उपलब्ध रह पाती थीं क्योंकि बाहरी रूप से इतनी व्यस्तता के पीछे उनका आंतरिक जीवन बहुत अनुशासित था। उसके केंद्र में था मुरली के प्रति उनका प्रेम—प्रतिदिन मिलने वाली आध्यात्मिक शिक्षाएँ।

दादी के साथ करीब से सेवा करने वाले लोग याद करते हैं कि वे मुरली का बहुत ध्यानपूर्वक अध्ययन करती थीं। वे सुबह की क्लास से पहले मुरली पढ़तीं, दिन में फिर उसे देखतीं और अक्सर रात को भी एक बार और पढ़तीं, चाहे कितनी भी देर क्यों न हो जाए।

उनके लिए मुरली कोई ऐसी चीज नहीं थी जिसे सुबह एक बार पढ़कर रख दिया जाए। वे बार-बार उसका अध्ययन करतीं, शब्दों पर मनन करतीं और उन्हें अपने जीवन, सेवा तथा निर्णयों में जीवंत करती थीं। शरीर कमजोर होने पर भी मुरली के साथ उनका यह संबंध कभी कम नहीं हुआ।

अस्पताल में रहने के दौरान भी यदि कोई उनसे पूछता कि क्या वे मुरली सुनना चाहेंगी, तो उनका उत्तर हाँ होता। अपने अंतिम दिनों में भी वे मुरली की पंक्तियाँ याद कर सकती थीं और उनके भावों को समझा सकती थीं।

सेवा का विस्तार पूरी दुनिया में हो रहा था, लेकिन उनके जीवन की आंतरिक नींव वही रही, जो शुरुआती वर्षों में थी—

अध्ययन, याद और पवित्रता।

वैश्विक मंच पर शांति का सम्मान

वैश्विक मंच पर शांति का सम्मान
वैश्विक मंच पर शांति का सम्मान
वैश्विक मंच पर शांति का सम्मान
वैश्विक मंच पर शांति का सम्मान

भाग पाँच : छोटे से आध्यात्मिक परिवार से विश्व सेवा तक

जिस परिवार को दादी ने इतने प्रेम और सावधानी से संभाला था, वह लगातार बढ़ता गया। धीरे-धीरे उसकी सीमाएँ भारत से बहुत आगे तक फैलने लगीं और जापान में रखी गई नींव पर विश्व सेवा का विस्तार होने लगा।

1980 में संस्था को संयुक्त राष्ट्र के साथ संबद्धता मिली और 1983 में उसे ECOSOC के साथ परामर्शदात्री दर्जा प्राप्त हुआ। ब्रह्माकुमारीज़ के संस्थागत इतिहास में 1984 में दादी प्रकाशमणि जी से जुड़ा हुआ यू.एन.शांति पुरस्कार भी दर्ज है। फिर 1986 में अंतरराष्ट्रीय शांति वर्ष के दौरान एक ऐसी पहल सामने आई, जिसका विचार बहुत सरल था—यदि लोग शांति के लिए धन या संसाधन नहीं दे सकते, तो शायद अपना समय दे सकते हैं।

Million Minutes of Peace पहल के अंतर्गत दुनिया भर के लोगों को मेडिटेशन, प्रार्थना और सकारात्मक विचारों में बिताए गए समय के मिनट शांति के लिए समर्पित करने का निमंत्रण दिया गया। इसके अंत तक एक अरब से अधिक शांति-मिनट एकत्र हुए।

1987 में संस्था को UN Peace Messenger की मान्यता मिली। इसके बाद भी कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ जुड़ती गईं। 1992 में दादी प्रकाशमणि जी को उदयपुर, राजस्थान के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टर ऑफ लिटरेचर की उपाधि मिली। अगले वर्ष उन्हें शिकागो में आयोजित Parliament of the World’s Religions को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया।

दादी प्रकाशमणि जी की विशिष्ट व्यक्तित्वों के साथ मुलाकातें

दादी प्रकाशमणि जी की विशिष्ट व्यक्तित्वों के साथ मुलाकातें
दादी प्रकाशमणि जी की विशिष्ट व्यक्तित्वों के साथ मुलाकातें
दादी प्रकाशमणि जी की विशिष्ट व्यक्तित्वों के साथ मुलाकातें
दादी प्रकाशमणि जी की विशिष्ट व्यक्तित्वों के साथ मुलाकातें
दादी प्रकाशमणि जी की विशिष्ट व्यक्तित्वों के साथ मुलाकातें
दादी प्रकाशमणि जी की विशिष्ट व्यक्तित्वों के साथ मुलाकातें

संस्था का विस्तार वास्तव में लोगों के विकास का विस्तार था

दादी प्रकाशमणि जी के नेतृत्व के बाद के वर्षों तक ब्रह्माकुमारीज़ का स्वरूप बहुत व्यापक हो चुका था। संस्था के आधिकारिक विवरण के अनुसार, उनके जीवनकाल में इसकी सेवाएं 90 देशों तक पहुँच गईं थीं और 5,000 से अधिक सेंटर एवं सब-सेंटर स्थापित हो गए थे।

दादी हमेशा जिम्मेदारियों को विकेंद्रीकृत करती थीं। वे दूसरों पर विश्वास करती थीं कि वे कार्य को आगे बढ़ाएँगे। और जब वे सेवा से लौटते, तो दादी यह जानना चाहती थीं कि उन्होंने वहाँ से क्या सीखा।

क्या नया सीखा?

क्या नई योजना बनाई?

किससे मिले?

उन्होंने आपसे क्या पूछा?

आपने क्या उत्तर दिया? आदि।

और ये केवल रिपोर्ट लेने के प्रश्न नहीं होते थे। इन प्रश्नों के माध्यम से वे लोगों को देखने, सोचने, प्रयोग करने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती थीं। यदि कोई दादी से कहता—“मैंने यह काम पहले कभी नहीं किया है।” तो उनकी सहज प्रतिक्रिया हमेशा यह नहीं होती थी कि किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढा जाए जो पहले से वह काम जानता हो। कई बार वे उसी व्यक्ति को पहली बार वह काम करने में मदद करती थीं।

यही सिद्धांत वे एक आध्यात्मिक शिक्षक से भी अपेक्षा करती थीं। उनकी एक करीबी छात्रा याद करती हैं कि दादी सिखाती थीं कि एक शिक्षक आध्यात्मिक रूप से निष्ठावान, आसक्ति से मुक्त, अध्ययन में दृढ़, अनुशासित और अलग-अलग प्रकार की सेवा करने में सक्षम होना चाहिए। दादी चाहती थीं कि लोग हर क्षेत्र में सक्षम और संपूर्ण बनें—ऑल-राउंडर बनें।

वे कहती थीं कि किसी व्यक्ति में कोई विशेषता होना बहुत मूल्यवान है। लेकिन वह विशेषता ऐसी सीमा नहीं बननी चाहिए, जिसके आगे व्यक्ति स्वयं को असहाय समझने लगे।

ट्रस्टीपन — निमित्त और निर्मान भाव

दादी के लिए आसक्ति केवल रिश्तों या वस्तुओं तक सीमित नहीं थी। यह चुपचाप “मैं” और “मेरा” जैसे शब्दों में भी छिपी हो सकती थी। इसका समाधान था—ट्रस्टीपन, अर्थात् निमित्त भाव।

वे जिन चीजों की देखभाल करती थीं, उनमें से कुछ भी व्यक्तिगत रूप से उनका नहीं था—न कोई भवन, न कोई पद, न कोई सेवा-प्रोजेक्ट और न ही लोगों का कोई समूह। सब कुछ परमात्मा का था। उन्हें तो केवल कुछ समय के लिए उसकी देखभाल करने का अवसर मिला था।शायद यही उस हल्केपन का एक रहस्य था, जिसके साथ वे इतनी बड़ी जिम्मेदारियाँ निभा पाती थीं।

सेवाकार्य लगातार और बड़ा होता गया। लेकिन उसके साथ उन्हें स्वयं को बड़ा बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

Dadiji with family.jpg

सभा में तीस हजार लोग—फिर भी सबसे मिलना चाहती थीं

मधुबन में बड़े कार्यक्रमों के दौरान हजारों लोग एकत्र होते थे। एक स्मृति के अनुसार, कभी-कभी 30,000 तक भाई-बहन भी उपस्थित होते थे। फिर भी दादी चाहती थीं कि लोग उनके सामने से गुजरें और उनसे दृष्टि लें।

यदि कोई उनके आराम करने के समय उनसे मिलने आता, तो वे अक्सर तुरंत उठकर उससे मिलने के लिए तैयार हो जातीं। उनके लिए विश्वव्यापी संस्था की प्रमुख बन जाने का अर्थ यह नहीं था कि वे लोगों से दूर हो जाएँ। शायद यही कारण है कि बाद में बहुत से लोगों ने अलग-अलग शब्दों में एक ही भावना व्यक्त की—

“दादी मेरी दादी थीं।”

सिर्फ दादी नहीं। मेरी दादी।

लोगों को उनके करीब महसूस होने का एक और कारण था। दादी से जुड़ने के लिए यह जरूरी नहीं था कि हर व्यक्ति पहले उनकी दुनिया में आए। वे स्वयं सामने वाले व्यक्ति के संसार में सहजता से प्रवेश कर जाती थीं।

बच्चों के साथ वे उनके जैसी चंचल हो जातीं।

युवाओं के साथ प्रोत्साहित करने वाली।

जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति के साथ स्पष्ट और सटीक।

दुखी व्यक्ति के साथ बेहद संवेदनशील।

विद्वान के साथ ज्ञान की चर्चा करने वाली।

प्रशासक के साथ व्यवस्था की बात कर सकती थीं।

उनकी सहजता केवल इतनी नहीं थी कि उनके कमरे का दरवाजा सबके लिए खुला रहता था। बात यह थी कि उनका मन सामने वाले व्यक्ति के करीब पहुँच जाता था।

“सिंपल रहो, सैंपल बनो”

दादी बार-बार सभी को याद दिलाती थीं—

“सिंपल रहो, सैंपल बनो”— सरल रहो, उदाहरण बनो।

उनका अपना जीवन इस बात का प्रमाण था। जब उनके करीब रहने वाले लोगों ने सुझाव दिया कि उनके पुराने बाथरूम का नवीनीकरण करवा देना चाहिए, तो दादी को इसमें विशेष रुचि नहीं थी। जो था, वह पर्याप्त था। फिर व्यक्तिगत आराम को प्राथमिकता क्यों दी जाए?

उनका विचार था कि वे जो भी करेंगी, वह दूसरों के लिए एक उदाहरण बनेगा और लोग उसका अनुसरण कर सकते हैं।

यह सिद्धांत उनके जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई देता था।

यदि वे सादगी और मितव्ययिता की अपेक्षा रखती थीं, तो स्वयं भी उसका पालन करती थीं।

यदि वे मर्यादा की बात करती थीं, तो स्वयं मर्यादा में रहती थीं।

यदि वे दूसरों से सेवा की अपेक्षा करती थीं, तो स्वयं सेवा करती थीं।

यदि वे मुरली पढ़ने के लिए कहती थीं, तो स्वयं भी मुरली पढ़ती थीं।

यदि वे चाहती थीं कि लोग हल्के रहें, तो स्वयं भी बातों को मन में नहीं रखती थीं।

उनकी बातों में प्रभाव इसलिए था क्योंकि वे पहले स्वयं करके दिखाती थीं।

व्यक्तिगत परिवर्तन से सामाजिक परिवर्तन तक

व्यक्तिगत परिवर्तन से सामाजिक परिवर्तन तक

दादी का मानना था कि सच्चा परिवर्तन वहीं से शुरू होता है, जिसे हम स्वयं अपने जीवन में अपनाते हैं। यही भावना आज नशा मुक्त भारत अभियान के माध्यम से भी आगे बढ़ रही है—लोगों को मनोबल मजबूत करने, हानिकारक व्यसनों से बाहर आने और नशामुक्त भारत के लिए व्यक्तिगत संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

अभियान के बारे में जानें

भाग छ : आंतरिक यात्रा और अधिक स्पष्ट होती गई

जीवन का अंतिम दिन: “चश्मा लाओ, दादी मुरली पढ़ेंगी”

जीवन के अंतिम दिनों में उनका शरीर अधिक से अधिक आराम माँगने लगा था। लेकिन उन दिनों की कुछ यादें बहुत साधारण और सहज हैं। उनके देह का त्याग करने से लगभग एक सप्ताह पहले कोई मुरली पढ़ रहा था और उसमें गीत की पंक्ति आई—“रात के राही…”

उन्होंने दादी से पूछा कि इसके आगे क्या आता है। दादी ने तुरंत उत्तर दिया—

“थक मत जाना।”

यदि मुरली में कोई सिंधी शब्द आता, तो उसका अर्थ भी दादी से पूछा जा सकता था और वे उसे समझा देती थीं। मुरली सुनते-सुनते यदि वे शारीरिक रूप से थक जातीं, तो सहजता से कहतीं कि बाकी शाम को पूरा कर लेंगे। और जब उनसे पूछा जाता कि क्या वे स्वयं मुरली पढ़ना चाहेंगी, तो उनका उत्तर होता—“चश्मा लाओ। दादी मुरली पढ़ेंगी।”

जिस बच्ची की आध्यात्मिक यात्रा ओम मंडली में बैठकर गहरे अनुभवों से शुरू हुई थी, वह सात दशक बाद भी स्वयं को एक विद्यार्थी ही मानती थी।

“मैं बहुत खुश हूँ”

उनके साथ रहने वाले लोग जानते थे कि उनका शरीर कठिन दौर से गुजर रहा था। फिर भी जब उनसे पूछा जाता कि वे कैसी हैं, तो दादी अक्सर कहतीं—“मैं बहुत अच्छी हूँ।”

एक अवसर पर उन्होंने बहुत सहजता से कहा—

“मैं बहुत खुश हूँ।”

इस बीच भाई-बहनों का आना जारी रहा। अंतिम दिनों में कुछ लोग उन्हें केवल दादी कॉटेज की काँच की खिड़की के माध्यम से ही देख पाते थे। फिर भी दादी चाहती थीं कि वे एक व्यवस्थित लाइन में आएँ और टोली लें। उस समय भी उनका सवाल यह नहीं था—“मुझसे मिलने कौन आया है?”

उनकी चिंता अब भी यही थी—“बच्चों की देखभाल ठीक से हुई है?”

25 अगस्त 2007 को दादी प्रकाशमणि जी ने अपनी देह की यात्रा पूरी की।

लेकिन तब तक “प्रकाशमणि” केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं रह गया था। उनके काम करने का तरीका हजारों लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुका था।

Dadi with all sister.jpg

दादी जी वास्तव में क्या छोड़कर गईं?

दादी प्रकाशमणि जी की विरासत को केवल उन देशों, सेंटरों, सम्मेलनों या परिसरों की संख्या से नहीं समझा जा सकता, जो उनके समय में विकसित हुए। ये तो उनकी सेवा के दिखाई देने वाले परिणाम हैं।

उनका गहरा योगदान था—आध्यात्मिक नेतृत्व की एक संस्कृति।

ऐसी संस्कृति, जिसमें— जिम्मेदारी कभी अधिकार या स्वामित्व न बन जाए।

किसी की गलती उसकी स्थायी पहचान न बन जाए।

कोई जूनियर केवल इसलिए जूनियर न बना रहे कि उसने पहले कभी वह कार्य नहीं किया।

संसाधनों को व्यर्थ न किया जाए, क्योंकि वे यज्ञ की अमानत हैं।

संस्कारों की भिन्नता दिलों की दूरी न बन जाए। और सेवा का विस्तार कभी उस आध्यात्मिक नींव से अधिक महत्वपूर्ण न हो, जहाँ से सेवा की शुरुआत हुई थी। उनकी शिक्षाएँ बार-बार उसी आंतरिक कार्य की ओर लौटती थीं—दिल को साफ रखो।हर व्यक्ति से कोई न कोई गुण सीखो। किसी के प्रति मन में शिकायत या रंजिश मत रखो।

शायद यज्ञ के शुरुआती दिनों में उन्हें दिए गए नाम का अर्थ उनकी पूरी यात्रा के अंत में और भी स्पष्ट होता है।

मणि, अर्थात् रत्न, स्वयं प्रकाश पैदा नहीं करता। वह प्रकाश को ग्रहण करके उसे प्रतिबिंबित करता है।

दादी अपने जीवन की भूमिका को भी कुछ इसी तरह समझती थीं। जब कोई कार्यक्रम सफल होता, तो वे उसका श्रेय परमात्मा को देती थीं।

बाबा करनकरावनहार हैं—वही करने वाले और कराने वाले हैं। हम तो निमित्त हैं।” और शायद इसी कारण रमा नाम की वह छोटी बच्ची आगे चलकर इतने बड़े परिवार की जिम्मेदारी उठा सकीं, बिना अपनी नजरों में स्वयं को बड़ा बनाए।

यही दादी प्रकाशमणि जी की यात्रा थी। प्रकाश की वह मणि केवल इसलिए नहीं चमकी कि उन्होंने दुनिया से अपनी ओर देखने को कहा, बल्कि इसलिए कि अपने पूरे जीवन वे स्वयं से आगे, परमात्मा की ओर इशारा करती रहीं।

Watch Video

आज का अभ्यास

दादी प्रकाशमणि जी ने बहुत ही खूबी से समझाया कि सच्चा आध्यात्मिक नेतृत्व पद, अधिकार या पहचान पाने के बारे में नहीं है। बल्कि यह तो जो हम सीखते हैं, उसे अपने जीवन में जीने, दूसरों की विशेषताओं और संभावनाओं को पहचानने, मतभेदों के बीच भी एकजुट रहने, विनम्रता से सेवा करने और हर जिम्मेदारी के केंद्र में परमात्मा को रखने का नाम है। जैसे-जैसे विश्वभर में सेवा का विस्तार होता गया, उनकी सरलता, आध्यात्मिक अनुशासन और स्वयं को परमात्मा का निमित्त समझने की भावना हमेशा अटल रही।

किसे भेजें यह संदेश?किसी को आज इसकी जरूरत है

शेयर

रोज़ सुबह ज्ञान — WhatsApp चैनल पर

हर सुबह एक प्रेरणादायक संदेश सीधे आपके फ़ोन पर

2 आसान कदम

1
चैनल को Follow करें
2
ऊपर दिख रहे बेल आइकन पर टैप करेंयह नोटिफिकेशन चालू कर देता है

जेंटल रिमाइंडर: Follow करने के बाद बेल 🔔 पर टैप करना न भूलें — ताकि हर सुबह का संदेश आप तक पहुँचता रहे।

अपनी पसंद की भाषा चुनें

निजी चैनल — आपकी पहचान कोई नहीं देख सकता