Brahma Kumaris

ब्रह्माकुमारीज़ की प्रथम प्रशासिका का जीवन और विरासत

ब्रह्माकुमारीज़ की प्रथम प्रशासिका का जीवन और विरासत
Journey
Key Takeaway

मातेश्वरी जी की अपने बचपन से लेकर संस्था की प्रथम प्रशासिका बनने तक की यात्रा, एक गहरी तपस्या, साहस और मातृ-स्नेह से भरे जीवन को दर्शाती है। उनकी सेवाओं और उन्हें निकट से जानने वालों की स्मृतियों के माध्यम से यह संक्षिप्त जीवन-चित्र उनकी प्रेरणादायी यात्रा की एक सुंदर झलक प्रस्तुत करता है। इसे पढ़ते समय मम्मा के जीवन का कौन-सा पहलू आपको सबसे अधिक प्रेरित करता है?

कुछ आत्माएँ ऐसी होती हैं, जिनका प्रभाव पद, उपलब्धियों या सार्वजनिक पहचान से कहीं परे होता है। वे लोगों की स्मृतियों में इसलिए जीवित रहती हैं, क्योंकि उन्होंने अपने प्रेम, करुणा और आत्मिक शक्ति से अनगिनत जीवनों को स्पर्श किया होता है और न जाने कितने हृदयों में आशा और प्रेम जगाया होता है। लोग उन्हें इस बात के लिए याद करते हैं कि उन्होंने किस प्रकार दूसरों के मर्म को जाना, उन्हें निश्छल प्रेम और संबल दिया, कठिन समय में तटस्थ रहकर उनका मार्ग प्रशस्त किया और उन्हें अपने सत्य स्वरूप व परमपिता परमात्मा के साथ गहरे संबंध का अनुभव कराया।

ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान में सबके हृदय में "मम्मा" के रूप में बसी मातेश्वरी जी ऐसी ही एक महान आत्मा थीं।

जिन लोगों ने उन्हें देखा और उनके साथ समय बिताया, उनके लिए वे केवल प्रारंभिक संगठन की मुख्य व्यवस्थापिका, एक आध्यात्मिक शिक्षिका या संस्थापक सदस्यों में से एक नहीं थीं। वे कठिन और अनिश्चित परिस्थितियों में सबके लिए स्थिरता और सहारे का आधार थीं। जब कोई भ्रमित होता, निराश होता या पुरुषार्थ में संघर्ष कर रहा होता, तो वह मम्मा के पास जाता। वे अपने परिपक्व अनुभवों के द्वारा सभी को मातृवत् ज्ञान की पालना देतीं थीं।

बहुतों ने उन्हें एक माँ के रूप में अनुभव किया। इसलिए नहीं कि उन्होंने स्वयं को कभी माँ कहा था, बल्कि इसलिए कि उनके व्यवहार में स्वाभाविक रूप से मातृत्व, प्रेम और अपनापन झलकता था।

आज उनके अव्यक्त होने के कई दशक बीत जाने के बाद भी उनका स्नेह, उनकी शिक्षाएँ और उनका प्रभाव लोगों के हृदयों में जीवित हैं। जिन्होंने उनके साथ समय बिताया, उनसे सीखा और उन्हें निकट से जाना, उनकी स्मृतियों और अनुभवों के माध्यम से मम्मा का स्नेहमय अस्तित्व आज भी महसूस किया जाता है।

लेकिन यह समझने के लिए कि वे सबकी प्रिय "मम्मा" कैसे बनीं, हमें समय की धारा में थोड़ा पीछे जाना होगा—

उस दौर में, जब वे अभी मम्मा के रूप में विख्यात नहीं हुई थीं।

और जब वे "ओम राधे" के नाम से भी प्रसिद्ध नहीं थीं।

बल्कि वे केवल राधे नाम की एक साधारण-सी युवती थीं।

और राधे से मम्मा बनने की यह यात्रा बताती है कि किस प्रकार एक सरल, लेकिन शक्तिशाली आत्मा अपने प्रेम, अटूट विश्वास, निःस्वार्थ सेवा और समर्पण भाव के द्वारा कई सदियों तक लोगों के जीवन को छू सकती है और उन्हें प्रेरणा दे सकती है।

प्रतिभाशाली और उज्ज्वल भविष्य से धनी एक होनहार बालिका

मातेश्वरी जी (मम्मा) का बचपन में नाम राधे था। उनके पिता का नाम पोकरदास और माता का नाम रोचा था। उनका जन्म सन् 1919 में अमृतसर में हुआ था और बचपन में उन्हें सब 'राधे' कहकर पुकारते थे।

वे बचपन से ही बहुत बुद्धिमान, रचनात्मक और उत्साह से भरी हुई थीं। राधे पढ़ाई में हमेशा नम्बर वन थी। गाने में नम्बर वन और डान्स करने में भी नम्बर वन थी। स्कूल में जब भी कोई स्पर्धा होती थी तो उन्हें प्रथम पुरस्कार मिलता था। और बे सभी से खूब सराहना पाती थीं। जो लोग उन्हें जानते थे, उनका कहना था कि राधे बहुमुखी प्रतिभा की धनी थीं। वे किसी भी बात को बहुत जल्दी सीख लेती थीं, अपने विचार पूरी स्पष्टता से व्यक्त करती थीं और उनमें एक स्वाभाविक आत्मविश्वास था।

अपनी उम्र की अन्य बालिकाओं की तरह उन्हें फॅशन का भी शौक था। वे अपने कपड़ों की डिज़ाइन खुद तैयार करती थीं, जिसमें उनकी मौलिकता और सुरुचिपूर्ण रचनात्मकता साफ झलकती थी।

जब उनके जीवन ने अचानक करवट ली

अक्सर एक महान आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत जीवन के किसी ऐसे मोड़ से होती है, जो देखने में चुनौतीपूर्ण, पर वास्तव में परिवर्तन का द्वार होता है। राधे के जीवन में भी ऐसा ही हुआ।

उनके पिता के अचानक निधन के बाद परिवार की परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल गईं। जो सुख-सुविधाएँ और सुरक्षा पहले हासिल थीं, वे एक पल में जैसे दूर हो गईं। राधे अपनी माता और छोटी बहन गोपी के साथ बम्बई (मुंबई) से हैदराबाद (जो आज पाकिस्तान के सिंध प्रांत में है) अपने रिश्तेदारों के पास रहने चली गईं।https://www.brahmakumaris.com/wisdom/anubhavgatha/hin/dadi-dhyani-adi-ratan

पूरा परिवार गहरे दुःख में था। परिवार के अन्य सदस्यों ने भी अपने प्रियजनों को खोया था। जैसे राधे की माता विधवा हुई थीं, वैसे ही उनकी बुआ ध्यानी (जो बाद में 'दादी ध्यानी जी' के नाम से प्रसिद्ध हुईं) भी अपने पति को खो चुकी थीं और परिवार के साथ रहने लगी थीं। राधे, उनकी बड़ी बहन पार्वती और छोटी बहन गोपी भी पिता के बिछड़ने के दुःख में थीं।

घर की माताएँ मन की शांति के लिए प्रार्थना करती थीं। वे धार्मिक ग्रंथ पढ़तीं और एक-दूसरे को सांत्वना देने का प्रयास करतीं, लेकिन दुःख अभी गहरा और ताज़ा था। हर दुःखी परिवार की तरह उनके मन में भी कई प्रश्न उठते थे,

जीवन में दुःख क्यों आता है? मृत्यु के बाद क्या होता है? मन को फिर से शांति कैसे मिले?

इन्हीं दिनों दादा लेखराज (जो बाद में 'ब्रह्मा बाबा' के नाम से जाने गए) की धर्मपत्नी जशोदा माता ने इस दुःखी परिवार को देखा। एक दिन उन्होंने बड़े स्नेह से उन्हें दादा लेखराज के घर पर होने वाली आध्यात्मिक सभा में आने का निमंत्रण दिया।

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वह सभा जिसने आशा की नई किरण जगाई

जशोदा माता के निमंत्रण पर राधे की माता जी और बुआ ध्यानी उस सभा में गईं। वे अपने भारी मन और अनेक अनसुलझे प्रश्नों के साथ वहाँ पहुँची थीं।https://www.brahmakumaris.com/wisdom/soul-sustenance/eng/purifying-the-soul-with-rajyoga-meditation

वहाँ ब्रह्मा बाबा आत्मा के अमर स्वरूप के बारे में समझा रहे थे। उन्होंने बताया कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है, बल्कि आत्मा पुराना शरीर छोड़कर एक नया शरीर धारण करती है। उन्होंने आत्मा और परमात्मा के शाश्वत संबंध को स्पष्ट करते हुए बताया कि अपने सच्चे स्वरूप को पहचानकर ही सच्ची शांति प्राप्त की जा सकती है।

उनके शब्द सरल थे, लेकिन उनमें सत्यता की गहरी शक्ति थी।

बहुत समय बाद पहली बार उन माताओं ने भीतर से शांति का अनुभव किया। परिस्थितियाँ नहीं बदली थीं, न ही उनके प्रियजन वापस आए थे, लेकिन उनके मन की स्थिति बदल गई थी। जो दुःख अब तक असहनीय लगता था, वह अब कुछ हल्का महसूस होने लगा था।

घर लौटने पर राधे ने अपनी माता जी और बुआ जी के चेहरों पर यह बदलाव तुरंत महसूस कर लिया।

जिन चेहरों पर पहले केवल उदासी दिखाई देती थी, वहाँ अब एक अलौकिक सुख और शांति की झलक थी। जिज्ञासावश उन्होंने अपनी माता जी से पूछा, "कल तो आप दोनों बहुत रोती थीं, आज तो चेहरे खुशनुमा हैं, वहाँ क्या मिला आपको?”

अगले दिन राधे भी उनके साथ उस सभा में गईं। जो यात्रा केवल जिज्ञासा और जानने की इच्छा से शुरू हुई थी, वही आगे चलकर उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण और युग परिवर्तन करने वाली घटना बनने वाली थी।https://courses.brahmakumaris.com/a-personal-journey-for-transformation

गाइडेड मेडिटेशन द्वारा आत्मा का अनुभव

सत्संग के बाद, जब ब्रह्मा बाबा की नज़र राधे पर पड़ी, तो उन्हें तुरंत महसूस हुआ कि यह बच्ची आगे चलकर इस ईश्वरीय कार्य में एक विशेष भूमिका निभाएगी। उसी समय, ब्रह्मा बाबा के माध्यम से राधे को एक अलौकिक अनुभव हुआ। उन्होंने उस परमपिता परमात्मा के प्रति गहरा आकर्षण महसूस किया, जिन्हें प्रेम से 'शिव बाबा' कहा जाता था। उन्हें ऐसा लगा, मानो ब्रह्मा बाबा के द्वारा स्वयं परमात्मा का स्नेह उन्हें मिल रहा हो।

इस पहली मुलाकात ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ दी।

जो यात्रा केवल जिज्ञासा से शुरू हुई थी, वह शीघ्र ही उनके जीवन का एक नियमित हिस्सा बन गई। राधे हर दिन सभाओं में जाने लगीं, वे पूरे ध्यान से ज्ञान सुनतीं और सुनी हुई बातों पर गहराई से मनन-चिंतन करतीं। जितना अधिक वे इस ज्ञान को समझती गईं, उतना ही उनका मन आत्मा के इस नए स्वरूप और परमात्मा की ओर आकर्षित होता गया। इन शिक्षाओं के माध्यम से उन्हें परमपिता परमात्मा के प्रेम और ज्ञान का गहरा अनुभव होने लगा, जिसने उनके जीवन को एक नई दिशा और उद्देश्य प्रदान किया।

उन्हें अभी यह पता नहीं था कि आगे उनके सामने एक ऐसा ऐतिहासिक निर्णय आने वाला है, जो न केवल उनके जीवन को, बल्कि आने वाली असंख्य आत्माओं के जीवन को भी बदल देगा।

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एक प्रश्न जिसने जीवन की दिशा बदल दी

जैसे-जैसे राधे नियमित रूप से सभाओं में जाने लगीं, उनका मन इस आध्यात्मिक ज्ञान की ओर खिंचता गया। जो खोज कुछ सवालों के जवाब पाने से शुरू हुई थी, वह धीरे-धीरे जीवन जीने का दृष्टिकोण बन गई। इस ज्ञान ने उनके दिल को छू लिया और उन्हें जीवन का एक स्पष्ट उद्देश्य मिल गया।

एक दिन ब्रह्मा बाबा ने उनसे एक ऐसा प्रश्न पूछा, जिसने उनके पूरे जीवन की दिशा तय कर दी। उन्होंने पूछा— "क्या तुम समाज की परंपरा के अनुसार विवाह करके गृहस्थ जीवन जीना चाहती हो, या इस आध्यात्मिक ज्ञान और विश्व-कल्याण की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित करना चाहती हो?".

बाबा ने उन्हें सोचने के लिए समय भी दिया, लेकिन राधे के मन में कोई दुविधा नहीं थी। इसलिए उन्हें समय लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। उनके हृदय से तुरंत उत्तर निकला। उन्होंने बिना किसी झिझक के उत्तर दिया कि वे अपना जीवन इस पवित्र मार्ग के लिए समर्पित करना चाहती हैं और विश्व के कल्याण के कार्य में अपना योगदान देना चाहती हैं। इतनी कम उम्र की बालिका के लिए यह सचमुच एक असाधारण निर्णय था, विशेषकर उस समय जब समाज महिलाओं के लिए एक बिल्कुल अलग जीवन-मार्ग की अपेक्षा रखता था।.

राधे पूरी तरह इस ईश्वरीय कार्य में लग गईं

राधे पूरी तरह इस ईश्वरीय कार्य में लग गईं
राधे पूरी तरह इस ईश्वरीय कार्य में लग गईं
राधे पूरी तरह इस ईश्वरीय कार्य में लग गईं

उस दिन के बाद से राधे पूरी तरह इस ईश्वरीय कार्य में लग गईं। उनकी सच्चाई, समझदारी और दृढ़ निश्चय को देखकर ब्रह्मा बाबा ने उन्हें इस बढ़ते हुए आध्यात्मिक परिवार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ देनी शुरू कर दीं।

राधे को सितार बजाने का बहुत शौक था और वे उसे बहुत मधुरता से बजाती थीं। उनके संगीत में एक विशेष आध्यात्मिक मिठास होती थी, जो सुनने वालों के हृदय को छू जाती थी। विशेष रूप से वे ‘ओम ध्वनि' कराने के लिए याद की जाती हैं। जब वे गंभीर स्वर में "ओम" का उच्चारण करती थीं, तो पूरा वातावरण शांति और शक्ति की तरंगों से भर जाता था। बहुतों को ऐसा अनुभव होता था कि उनका मन देह-भान से ऊपर उठकर शिव बाबा की याद में खो गया। इस तरह, राधे का नाम 'ओम राधे' हो गया।

उन शुरुआती दिनों में कुछ लोगों को दिव्य साक्षात्कार भी होते थे। ब्रह्मा बाबा और मम्मा को देखते हुए उन्हें देवी-देवताओं या अपने इष्ट देवी-देवता के स्वरूप का अनुभव होता था। इन अनुभवों से सभाओं का आध्यात्मिक वातावरण और भी गहरा हो जाता था और वहाँ आने वाले अनेक लोगों का विश्वास और मजबूत होता था।

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मम्मा का अलौकिक जन्म

जैसे-जैसे राधे ईश्वरीय सेवा में आगे बढ़ती गईं, उनकी आध्यात्मिक समझ और गहराई सबके सामने प्रकट होने लगी। वे केवल ज्ञान सुनती नहीं थीं, बल्कि उस पर गहराई से मनन-चिंतन भी करती थीं।.

जब वे मुश्किल से 20 वर्ष की थीं, तब भी उनकी समझ इतनी गहरी और परिपक्व थी कि स्वयं ब्रह्मा बाबा, जो उस समय लगभग 60 वर्ष के थे, कई बार मुख्य क्लास से पहले उनसे ज्ञान चर्चा करने के लिए कहते थे। जब भी ब्रह्मा बाबा यात्राओं पर बाहर जाते, तो वे आध्यात्मिक मार्गदर्शन से भरे हुए पत्र भेजते थे। मम्मा उन पत्रों को सभा में पढ़तीं और उन्हें इतनी सरलता, प्रेम और गहराई से समझातीं कि सभी को आत्मिक पालना का अनुभव होता था।

उम्र में छोटी होने के बावजूद, उनके बोलने, सुनने और सबका ध्यान रखने के तरीके में माँ जैसा स्नेह झलकता था। लोग अपनी उलझनों, शंकाओं और व्यक्तिगत समस्याओं को लेकर उनके पास आते और मम्मा सबको धैर्य, स्पष्टता और आंतरिक शक्ति से भर देती थीं। धीरे-धीरे राधे के नाम के साथ सबके मन में एक नया भाव जुड़ गया। वे केवल ज्ञान समझाने वाली नहीं थीं, बल्कि सबको आत्मिक पालना और आध्यात्मिक शक्ति देने वाली शक्तिदायनी बन गई थीं।.

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साथ ही, उनके मातृत्व के गुण दैनिक जीवन में भी दिखाई देते थे। वे सबकी देखभाल बहुत ही ध्यान, प्रेम और जिम्मेदारी के साथ करती थीं। ब्रह्मा बाबा की सुपुत्री, दादी निर्मलशांता जी अपने संस्मरणों में कहतीं हैं कि बचपन में ब्रह्मा बाबा ने उन्हें मम्मा की देखरेख में सौंप दिया था। मम्मा ने उन्हें इतना प्यार और स्नेह दिया कि वे स्वाभाविक रूप से उन्हें "मम्मा" कहने लगीं।

धीरे-धीरे अन्य लोगों के मन में भी वही भाव जाग उठा। इस प्रकार "मम्मा" नाम किसी औपचारिक घोषणा से नहीं पड़ा। यह उन लोगों के दिलों से सहज रूप से निकला, जिन्होंने उनके प्रेम और पालना का अनुभव किया था। ओम राधे "मम्मा" इसलिए बनीं, क्योंकि उनके सान्निध्य में सभी को एक माँ की ममता, विवेकपूर्ण समझ और सुरक्षा का अनुभव होता था।

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ईश्वरीय सेवा के एक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व की शुरुआत

जैसे-जैसे यह आध्यात्मिक परिवार बढ़ता गया, ब्रह्मा बाबा ने मम्मा की आध्यात्मिक परिपक्वता को उनके व्यवहार और कार्यों में स्पष्ट रूप से देखा।

वे अभी बहुत युवा थीं, लेकिन उनकी समझ बहुत गहरी थी। वे न तो प्रशंसा से प्रभावित होती थीं और न ही कठिन परिस्थितियों में विचलित होती थीं। उस समय समाज में महिलाओं को बड़ी जिम्मेदारियाँ देना सामान्य बात नहीं थी। फिर भी, ब्रह्मा बाबा ने मम्मा की आंतरिक शक्ति को पहचाना और उनपर पूरा विश्वास किया।

उन्होंने संस्था के प्रबंधन के लिए माताओं और बहनों की एक समिति बनाई और ओम राधे को उसका मुख्य प्रशासिका नियुक्त किया। इसके साथ ही उन्होंने अपनी संपूर्ण चल-अचल संपत्ति को ईश्वरीय सेवा के लिए समर्पित करते हुए एक ट्रस्ट की स्थापना की और उसकी जिम्मेदारी भी इन माताओं और बहनों को सौंप दी। इस प्रकार, मम्मा संगठन की पहली मुख्य प्रशासिका बनीं।

उस दौर में यह वास्तव में एक असाधारण कदम था।

यह केवल मम्मा के प्रति ब्रह्मा बाबा के गहरे विश्वास को ही नहीं दर्शाता था, बल्कि इतनी कम उम्र में मम्मा की दृढ़ता और परिपक्वता को भी प्रकट करता था। उस समय एक युवा महिला के हाथों में इतनी बड़ी जिम्मेदारी होना अपने आप में एक अनोखी बात थी। मम्मा ने इसे बहुत विनम्रता से स्वीकार किया। उन्होंने इसे अधिकार या पद के रूप में नहीं देखा। उनके लिए यह केवल सेवा थी।

इस घटना ने मम्मा के व्यक्तित्व की एक विशेषता को उजागर किया— उनके पास एक माँ जैसा हृदय, एक शिक्षक जैसा ज्ञान और एक ट्रस्टी जैसी दृढ़ता थी।

चुनौतियों के बीच अचल अडोल रहना

जैसे-जैसे आध्यात्मिक सभाओं का विस्तार होता गया, वैसे-वैसे अधिक से अधिक लोग ओम मंडली से जुड़ने लगे। ज्ञान और आध्यात्मिक अभ्यासों के माध्यम से अनेक लोगों के जीवन में गहरा परिवर्तन आने लगा। कई लोगों ने उन विकारों और आदतों को भी छोड़ने का साहस पाया, जो वर्षों से उनके जीवन का हिस्सा थे। इन शिक्षाओं ने लोगों को पवित्रता, सादगी और आत्मिक जागरूकता से भरा जीवन अपनाने की प्रेरणा दी।

लेकिन जैसे-जैसे यह आध्यात्मिक परिवार बढ़ा, चुनौतियाँ भी बढ़ती गईं।

उस समय समाज के लिए पवित्र जीवन जीने का विचार समझना आसान नहीं था। परिवारों ने इन शिक्षाओं पर प्रश्न उठाने शुरू कर दिए और तरह-तरह की गलतफहमियाँ फैलने लगीं। कुछ लोग यह स्वीकार नहीं कर पा रहे थे कि महिलाएँ भी आध्यात्मिक जीवन को अपना रही हैं। धीरे-धीरे विरोध बढ़ने लगा। प्रदर्शन हुए, आलोचनाएँ की गईं और ओम मंडली (ब्रह्माकुमारीज़) की गतिविधियों को रोकने के प्रयास भी किए गए। अंततः यह मामला अदालत तक पहुँच गया।

अदालत में सत्यता और अदम्य साहस की मिसाल

ऐसे ही एक मुकदमे के दौरान मम्मा को अपना बयान देने के लिए अदालत में बुलाया गया। उस समय उनकी उम्र मुश्किल से बीस वर्ष के आसपास थी, फिर भी वे अद्भुत साहस और स्पष्टता के साथ अदालत में खड़ी हुईं।

सबसे पहले न्यायाधीश ने उनसे गीता हाथ में लेकर सत्य बोलने की शपथ लेने को कहा। शपथ लेने के समय, जब उनसे यह कहने के लिए कहा गया कि भगवान सर्वव्यापी हैं, तो ओम राधे ने बड़े विनम्र भाव से उत्तर दिया कि वे ईमानदारी से ऐसी शपथ नहीं ले सकतीं।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार वे न्यायाधीश को अपनी आँखों से देख रही हैं, उसी प्रकार वे भगवान को अपनी स्थूल आँखों से नहीं देख सकतीं, इसलिए वे यह नहीं कह सकतीं कि भगवान सर्वव्यापी हैं।

हाँ, वे यह शपथ लेने के लिए तैयार हैं कि वे न्यायाधीश को एक 'आत्मा' समझकर देख रही हैं और जो कुछ भी कहेंगी, परम सत्य ही कहेंगी।

उनका उत्तर सुनकर वहाँ उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। कुछ लोग हँसने लगे, कुछ ने तालियाँ बजाईं और कुछ उनकी निडरता देखकर चकित रह गए। न्यायाधीश ने उन्हें याद दिलाया कि यह अदालत है, कोई सत्संग नहीं, और कहा कि शपथ लेने से इंकार करना अदालत का अपमान माना जा सकता है। फिर भी मम्मा पूरी तरह शांत और निश्चल रहीं। फिर उन्होंने शांत भाव से समझाया कि परमात्मा शांति, प्रेम, ज्ञान और पवित्रता का सागर है। इसलिए वह मनुष्यों में दिखाई देने वाले विकारों और कमजोरियों में विद्यमान नहीं हो सकता। न्यायाधीश ने उन्हें फिर से सोचने का समय दिया, लेकिन वे अपने निर्णय पर अटल रहीं। एक समय तो हथकड़ियाँ लाने का आदेश भी दिया गया। तब भी उनके चेहरे पर न डर था और न ही कोई घबराहट। उनकी अडिग निष्ठा को देखकर अंततः बिना शपथ के ही कार्यवाही आगे बढ़ाई गई।

बाद में उनसे पूछा गया कि इतनी युवा महिलाएँ अपना घर छोड़कर ओम मंडली से क्यों जुड़ रही हैं। ओम राधे ने उत्तर दिया कि वे आध्यात्मिक ज्ञान और पवित्र जीवन से आकर्षित हुई हैं। उन्होंने समाज के दोहरे मापदंडों पर प्रश्न उठाते हुए कहा, "यदि पुरुष संसार का त्याग कर संन्यास लेते हैं, तो समाज उन्हें पूजता है; फिर जब महिलाएँ पवित्रता और ज्ञान का मार्ग चुनती हैं, तो उन पर पाबंदियाँ क्यों?" उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि परमात्मा की दृष्टि में स्त्री और पुरुष दोनों समान हैं।

इस घटना ने वहाँ उपस्थित लोगों के मन पर गहरी छाप छोड़ी। उस समय जब महिलाओं से चुप रहने की अपेक्षा की जाती थी, मम्मा ने सत्यता, गरिमा और आध्यात्मिक निष्ठा के साथ सत्ता के सामने अपनी बात रखी। उनकी शक्ति किसी तर्क-वितर्क से नहीं, बल्कि परमपिता परमात्मा पर उनके अटूट विश्वास और ज्ञान की गहन समझ से आती थी।

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मम्मा का तपस्वी जीवन

मम्मा की सेवा और उनकी अचल अडोल स्थिति के पीछे गहन तपस्या का जीवन था।

जो लोग उनके साथ रहे, वे अक्सर उनके मौन और बाबा के प्रति प्रेम को याद करते थे। वे प्रायः रात 2 बजे उठकर गहरे ध्यान में बैठ जाती थीं। शिव बाबा की याद में उनका प्रेम इतना गहरा था कि उनके पास मात्र बैठने से ही बहुतों को शांति और शक्ति का अनुभव होता था।

मम्मा केवल शब्दों से सेवा नहीं करती थीं। उनकी स्थिति ही दूसरों को शक्ति देती थी। उनका शांत चेहरा, स्थिर दृष्टि और मधुर मुस्कान पूरे वातावरण को शांति से भर देती थी। यही तपस्या उनकी सेवा, उनकी गहरी समझ और बढ़ते हुए आध्यात्मिक परिवार की पालना का आधार थी।

इतिहास हमें संस्था के लिए मम्मा के योगदान के बारे में बताता है, लेकिन उनके गुणों को सबसे अच्छी तरह वे लोग समझ सकते हैं, जिन्होंने उनके साथ रहकर, उनकी पालना में पलकर और उनके साथ सेवा करते हुए जीवन बिताया। आइए, अब उन लोगों द्वारा मम्मा को जानने और अनुभव करने का प्रयास करें, जिन्होंने उन्हें बहुत करीब से जाना था।

आइए, परमात्म शक्ति और गुणों की अनुभव करें

मम्मा के साथ बिताए गए पलों की स्मृतियाँ

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मम्मा गहरे ज्ञान को सरल बना देती थीं

मम्मा को सुनने वाले लोग न केवल उनके गहरे आध्यात्मिक ज्ञान से प्रभावित होते थे, बल्कि इस बात से भी आश्चर्यचकित होते थे कि वे कठिन से कठिन बात को भी इतनी सरलता से समझा देती थीं कि हर कोई उसे आसानी से समझ सके।

भाई ओम प्रकाश जी याद करते थे कि बाबा की मुरलियों में बहुत गहरे आध्यात्मिक रहस्य और सूक्ष्म बातें होती थीं। नए विद्यार्थियों और जिज्ञासुओं के लिए कुछ बातें समझना आसान नहीं होता था। लेकिन मम्मा के पास एक विशेष कला थी। वे पहले बाबा की मुरली को बहुत ध्यान से सुनतीं और फिर उस पर गहराई से मनन-चिंतन करतीं।

वे ज्ञान को केवल शब्दों के रूप में नहीं समझाती थीं। पहले उसे स्वयं अपने जीवन में धारण करती थीं। उस पर विचार करती थीं, अनुभव के आधार पर उसे समझती थीं और फिर उसे बहुत व्यावहारिक ढंग से दूसरों के सामने रखती थीं। इसलिए जब मम्मा किसी मुरली के पॉइंट को समझाती थीं, तो हर किसी को लगता था कि यह बात विशेष रूप से उसके लिए कही जा रही है। गहरी से गहरी बातें भी जीवन में अपनाने योग्य और सरल लगने लगती थीं। उनके एक या दो घंटे के क्लास में, पूरे हॉल में गहरा सन्नाटा छा जाता था। कहा जाता था कि यदि उस समय सुई भी गिर जाती, तो उसकी आवाज़ भी सुनाई दे जाती। कोई उठकर जाना नहीं चाहता था और किसी का ध्यान इधर-उधर नहीं भटकता था।

उनके शब्द मधुर, संतुलित और अर्थपूर्ण होते थे। वे कभी अनावश्यक नहीं बोलती थीं। उनके हर वाक्य में कोई न कोई मूल्य छिपा होता था। इसी विशेषता के कारण मम्मा गहरे आध्यात्मिक ज्ञान और उसे व्यवहार में लाने वाली जीवनशैली के बीच एक सुंदर सेतु बन गई थीं।

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हर मिलने वाले ने उनमें एक माँ का अनुभव पाया

मम्मा की विशेषताओं में से एक यह थी कि उनके पास आने वाला हर व्यक्ति अपने को प्रेम, अपनेपन और समझ का अनुभव करता था।

एक वरिष्ठ भाई बताते हैं कि अलग-अलग पृष्ठभूमियों से अनेक लोग मम्मा से मिलने आते थे—लंबे समय से ज्ञान में चलने वालों से लेकर पहली बार आने वालों तक, और बड़े अधिकारियों एवं प्रतिष्ठित व्यक्तियों से लेकर शांति की तलाश में आए साधारण लोगों तक।

लेकिन मम्मा सबका स्वागत एक समान प्रेम और सहजता से करती थीं।

उनसे मिलने वालों में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे माननीय बी.पी.सिन्हा जी भी थे। मम्मा से मिलकर उन्होंने केवल उनके ज्ञान या बुद्धि की ही प्रशंसा नहीं की। उनके मन को सबसे अधिक जिस बात ने छुआ, वह था मम्मा के सान्निध्य में मिला मातृ-स्नेह। यह केवल उनका अनुभव नहीं था। बहुत से लोग यही अनुभव करते थे।

मम्मा अपने पास आने वाले हर व्यक्ति की बात ध्यान से सुनती थीं। वे बिना किसी आलोचना या भेदभाव के उनकी समस्याएँ, प्रश्न और चिंताएँ सुनती थीं। उनके पास से लौटते समय लोगों को अपनेपन का अनुभव होता था। चाहे कोई पुराना विद्यार्थी हो या ज्ञान में बिल्कुल नया, बहुतों का अनुभव एक जैसा ही होता था।

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मम्मा का बाबा पर अटूट निश्चय: हर बात पर "जी बाबा"

यह घटना मम्मा के, ब्रह्मा बाबा के प्रति गहरे विश्वास को बहुत सुंदर ढंग से दिखाती है।

एक बार लच्छू बहन को बाबा की कुटिया में चिड़िया के दो छोटे अंडे मिले। उन्होंने उन्हें सावधानी से एक कागज़ पर रखकर बाबा के कमरे में लाकर दिखाया। बाबा ने उन अंडों को बड़े प्यार से देखा। फिर हँसते हुए बोले, "मम्मा को बुलाओ।"

वहाँ खड़ी एक छोटी बहन यह सोचकर उत्सुक हो गई कि बाबा मम्मा को अंडे दिखाने के लिए क्यों बुला रहे हैं। जब मम्मा कमरे में आईं, तो बाबा ने उनसे कहा,

"मम्मा, अपना मुँह खोलो। बाबा आपको ये चिड़िया के अंडे खिलाएँगे।"

पास खड़ी बहन यह सुनकर हैरान रह गई। क्या सचमुच बाबा मम्मा को अंडे खिलाएँगे? अब मम्मा क्या करेंगी? लेकिन बिना कोई प्रश्न किए, बिना सोच-विचार किए और बिना एक पल की देर किए, मम्मा ने एक छोटे बच्चे की तरह अपना मुँह खोल दिया। क्योंकि, उन्हें बाबा पर पूरा निश्चय था।

यह देखकर बाबा मुस्कुराए और प्यार से उन्हें दृष्टि दी। फिर बच्चों की ओर देखकर बोले,

"मम्मा 'जी बाबा' के पेपर में पास हो गई है।"

बेशक, बाबा सचमुच उन्हें अंडे खिलाने वाले नहीं थे। इस खेल-खेल में वे सबको एक अनमोल समझानी दे रहे थे। मम्मा की पहली प्रतिक्रिया हमेशा बाबा पर अटूट निश्चय और विश्वास की होती थी। वे सोच-विचार करने के बजाय, पूरे निश्चय से "जी बाबा" कहती थीं।

इस घटना को देखने वालों ने उस दिन एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझी। "जी बाबा" का संस्कार मम्मा के अंदर बहुत गहराई से समाया हुआ था। इस छोटी-सी घटना ने उनकी आध्यात्मिक महानता के एक आधार को प्रकट कर दिया। जब बाबा कुछ कहते थे, तो सबसे पहले उनका दिल "जी बाबा" कहता था। यही अटूट विश्वास उनके पूरे जीवन में दिखाई देता रहा।

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मम्मा का करुणामय स्वभाव: जहाँ क्रोध भी शांत हो जाता

अमृतसर की एक यात्रा के दौरान, कुछ लोग बहुत शोर-शराबा करते हुए सेंटर पर आए। वे मम्मा से मिलना चाहते थे और काफी हंगामा कर रहे थे।

मम्मा के साथ ऊपर खड़ी एक बहन यह सब देख रही थीं। सभी बहनें स्वाभाविक रूप से चिंतित थीं। वे सोच रही थीं कि यदि ये लोग ऊपर आकर कुछ कठोर या अपमानजनक बातें कहें तो क्या होगा। लेकिन मम्मा पूरी तरह शांत और स्थिर थीं। स्थिति को देखकर उन्होंने नीचे संदेश भेजा कि उस समूह के प्रमुख लोगों को ऊपर भेजा जाए। जब वे लोग मम्मा के सामने आए, तो एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला।

मम्मा के प्रेम और शांति की शक्तिशाली तरंगों का उन पर तुरंत प्रभाव पड़ने लगा। जो व्यक्ति सबसे अधिक क्रोधित दिखाई दे रहा था, वह कुछ बोल ही नहीं पाया। कुछ देर तक वह चुपचाप बैठा रहा। फिर धीरे-धीरे उसने एक-दो प्रश्न बहुत शांत स्वर में पूछे। वहाँ उपस्थित लोगों ने देखा कि मम्मा की आध्यात्मिक स्थिति के सामने उसका क्रोध मोम की तरह पिघल गया।

मम्मा ने न कोई तर्क किया न बहस की। न अपने बचाव में कुछ कहा। न कोई प्रतिक्रिया दी। वे केवल प्रेम में स्थित और शांत बनी रहीं। जैसे ठंडा जल आग को शांत कर देता है, वैसे ही उनके शीतल सान्निध्य में क्रोधित स्वभाव वाले लोग भी आकर शांत हो जाते थे। इस घटना ने दर्शाया कि सच्ची आध्यात्मिक शक्ति को स्वयं को सिद्ध करने के लिए शोर करने की आवश्यकता नहीं होती। वह शांति, प्रेम और पवित्र वाइब्रेशन्स के माध्यम से मौन रहकर भी हृदयों को स्पर्श कर देती है और अपना प्रभाव छोड़ जाती है।

दण्ड नहीं लेकिन, प्रेम से परिवर्तन

मम्मा का दृढ़ विश्वास था कि केवल दंड देने से किसी व्यक्ति में परिवर्तन नहीं आता है। उनके अनुसार, सच्चा परिवर्तन तब होता है, जब व्यक्ति अपनी गलती को ईमानदारी से स्वीकार करे, दिल से पश्चाताप करे और स्वयं को बदलने का प्रयास करे।

करांची के दिनों की एक सुंदर घटना इसे बहुत अच्छी तरह दर्शाती है।

उस समय बहनें नियमित रूप से टेनिस कोर्ट में ड्रिल का अभ्यास करने जाती थीं। और सभी अभ्यास के दौरान जूते पहनती थीं। एक दिन मम्मा अभ्यास देखने आईं। उन्होंने देखा कि एक बहन जूतों की जगह चप्पल पहने हुए थी।

मम्मा ने प्यार से पूछा, "आज तुमने जूते क्यों नहीं पहने?"

बहन ने उत्तर दिया, "मम्मा, पिछले कुछ दिनों से मेरे पैरों में दर्द है, इसलिए मैं जूते नहीं पहन सकी।"

यह बात सुनने में ठीक लग रही थी, लेकिन सच नहीं थी। बहन जानती थी कि उसके पैरों में कोई दर्द नहीं था और वह जूते पहन सकती थी। इसलिए उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कारने लगी। उसे बाबा की शिक्षा याद आई कि गलती होने पर व्यक्ति को सच्चे दिल से स्वयं को सुधारना चाहिए। इसलिए उसने प्रायश्चित के रूप में नाश्ता न करने का निश्चय किया।

बाद में, जब सभी बहनें मम्मा के साथ बैठी थीं, तो वह बहन खड़ी हुई और उसने सबके सामने अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा,

"मम्मा, आज मैंने आपसे झूठ बोला था। इसलिए मैंने स्वयं को दंड दिया है।"

मम्मा ने धैर्य से उसकी बात सुनी और पूछा, "तुमने अपने लिए क्या दंड रखा है?" जब उन्हें पता चला कि उसने नाश्ता नहीं किया है, तो मम्मा ने बड़े प्यार से कहा,

"तो तुमने कुछ नहीं खाया? मम्मा ने भी अभी नाश्ता नहीं किया है। आओ, मम्मा के साथ नाश्ता करो।"

फिर उन्होंने उसे अपने पास बिठाया और उसके साथ मिलकर नाश्ता किया। यह घटना मम्मा के मानव स्वभाव की गहरी समझ को प्रकट करती है। वे सभी में डर और दण्ड से नहीं, बल्कि प्रेम से परिवर्तन लाती थीं।

वे मानती थीं कि जो आत्मा अपनी गलती को ईमानदारी से स्वीकार कर ले, उसे और नीचे नहीं गिराना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को प्रेम, प्रोत्साहन और सहारे से आगे बढ़ाना चाहिए।

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मम्मा का अटूट निश्चय "बाबा ने कहा है, तो अवश्य होगा"

एक बार कुछ भाई-बहन बाबा और मम्मा से मिलने आबू आए थे। वे उसी दिन वापस जाने की तैयारी करने लगे। वे जब विदा लेने आये, तो उस समय अचानक बाबा ने मम्मा से कहा,

"बच्चे जा रहे हैं, इनके लिए हलवा बनाओ।"

मम्मा ने बिना एक पल की देर किए उत्तर दिया,

"जी बाबा।"

पास खड़ी एक बहन यह सुनकर सोच में पड़ गई। बच्चे तो अभी जा रहे हैं और हलवा बनाने में समय लगेगा। फिर वह उनके पास कैसे पहुँचेगा? लेकिन मम्मा के मन में न कोई चिंता थी, न कोई प्रश्न, न कोई हिसाब-किताब और न ही कोई संदेह।

वे मुस्कुराकर केवल इतना बोलीं, "बाबा ने कहा है, तो अवश्य होगा।"

फिर वे शांत भाव से बैठकर हलवा बनाने लगीं। इस बीच, अतिथि भाई-बहन जा चुके थे। थोड़ी देर बाद किसी ने आकर कहा, "वे लोग तो निकल गए हैं।" मम्मा ने शांत स्वर में कहा, "अच्छा।"

वे पूरी एकाग्रता और शांति के साथ हलवा बनाती रहीं। जब हलवा तैयार हो गया, तो उसे पैक किया गया और एक भाई उसे लेकर जल्दी से बस स्टैंड पहुँचे। संयोग से बस अभी चलने ही वाली थी। उन्होंने हलवा यात्रियों को दे दिया।

जब भाई-बहनों को पता चला कि मम्मा ने विशेष रूप से उनके लिए प्रेम से हलवा बनाया है, तो वे भाव-विभोर हो गए।

हलवे के इस छोटे-से प्रसंग के माध्यम से मम्मा ने एक गहरा पाठ सिखाया— जब हमें बाबा पर पूरा निश्चय होता है, तो कठिनाइयाँ बड़ी नहीं लगतीं और समाधान अपने आप सामने आ जाते हैं।

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मम्मा की दूरदर्शी पालना: "मच्छरों वाला कमरा" बन गया सबसे प्रिय स्थान

मम्मा की बुद्धि बहुत सूक्ष्म और दूरदर्शी थी। वे आने वाली परिस्थितियों को पहले से समझ लेती थीं और बच्चों को बड़े प्रेम और समझदारी से उसके लिए तैयार करती थीं। उनकी पालना केवल स्नेह देने तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें व्यावहारिक प्रशिक्षण भी शामिल होता था।

मम्मा ने कुछ ऐसी बहनों का एक छोटा-सा ग्रुप तैयार किया था, जो हर समय एवर-रेडी रहकर "हाँ जी" कहकर सेवा के लिए तैयार रहती थीं। वे भरोसे, सहयोग और साहस के साथ मम्मा के हर निर्देश का पालन करती थीं।

उन्हीं दिनों परिसर में एक कमरा था, जिसे सब "मच्छर वाला कमरा" कहते थे। वहाँ बहुत मच्छर थे, इसलिए कोई भी वहाँ रहना नहीं चाहता था। जब भी रहने की व्यवस्था की जाती, सब उस कमरे से बचने का प्रयास करते थे।

लेकिन मम्मा संस्था की आवश्यकता को भली भांति समझती थीं। यदि कोई उस कमरे में नहीं रहता, तो स्थान की समस्या बनी ही रहती। इसलिए उन्होंने बड़े प्यार और युक्ति से "एवर-रेडी ग्रुप" की बहनों से पूछा, "क्या तुम लोग उस कमरे में रह सकती हो?"

मम्मा की बात सुनते ही उन्होंने तुरंत कहा, "हाँ जी, मम्मा।"

उन्होंने अपने आराम के बारे में नहीं सोचा और न ही मच्छरों के बारे में शिकायत की। वे सभी उस कमरे में रहने लगीं। मुश्किल होती थी, लेकिन उनकी आज्ञापालन की भावना और एकता उससे अधिक मजबूत थी। धीरे-धीरे उन्होंने कमरे को साफ किया, व्यवस्थित किया और उसका वातावरण बदल दिया। साथ ही, वे प्रेम से आध्यात्मिक अध्धयन, योग और सेवा करती रहीं।

धीरे-धीरे उस कमरे का रूप बदलने लगा। जो कमरा पहले असुविधा के लिए जाना जाता था, वही योग, पढ़ाई, सहयोग और सेवा का स्थान बन गया। कुछ समय बाद दूसरी बहनों को भी वही कमरा अच्छा लगने लगा। वे कहने लगीं कि यदि उस कमरे में कोई बिस्तर खाली हो जाए, तो वे वहाँ रहना चाहेंगी।

मम्मा की पालना हमेशा व्यावहारिक थी। वे केवल त्याग, सहयोग और तत्परता की बातें नहीं करती थीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ बनाती थीं, जिनसे इन गुणों को अपने जीवन में अपनाकर अनुभव कर सकें।

नारी सशक्तिकरण का अद्भुत मिसाल

नारी सशक्तिकरण का अद्भुत मिसाल

मच्छरों वाला कमरा मम्मा की पालना का केवल एक छोटा-सा उदाहरण था। ऐसी ही अनेक परिस्थितियों के माध्यम से वे चुपचाप बहनों को आत्मनिर्भर, साहसी और जिम्मेदार बनाना सिखा रही थीं। इसी पालना ने ऐसी महिलाओं की एक पीढ़ी तैयार की, जो आगे चलकर विश्व सेवा की निमित्त बनीं। आइए उस प्रेरणादायी यात्रा को समझें, जिसमें महिलाएँ सामाजिक सीमाओं की छाया से निकलकर आध्यात्मिक नेतृत्व के प्रकाश तक पहुँचीं और सद्भावना, साहस तथा आशा के मजबूत स्तंभ बनीं।

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तेज बुद्धि के साथ आज्ञापालन भी जरूरी है

एक बार परिसर में जगह की कमी थी, इसलिए सोने की व्यवस्था की जा रही थी। ब्रह्मा बाबा ने सुझाव दिया कि दिन के समय एक छोटी खाट को बड़ी खाट के नीचे रख दिया जाए और रात को आवश्यकता पड़ने पर उसे बाहर निकाल लिया जाए।

एक भाई बाबा के सामने खाट को व्यवस्थित करने का प्रयास कर रहे थे। पास ही प्रेम बहन खड़ी हुई थीं। उन्हें विश्वास था कि छोटी खाट बड़ी खाट के नीचे नहीं जा सकेगी। बिना सोचे उन्होंने तुरंत कह दिया,

"बाबा, यह खाट नीचे नहीं जा पाएगी।"

फिर भी, भाई ने बाबा की आज्ञा के अनुसार उसे नीचे रखने का प्रयास किया। और सचमुच, वह खाट नीचे नहीं जा सकी।

उसी शाम मम्मा ने प्रेम बहन को बुलाया। मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा, "प्रेम, तुम्हारी बुद्धि बहुत तेज है। तुम जल्दी और सही निर्णय ले लेती हो।" प्रेम बहन कुछ समझ नहीं पाईं। उन्होंने पूछा, "क्या मुझसे कोई गलती हुई है?"

तब मम्मा ने बहुत प्यार से समझाया। उन्होंने कहा, "तुम्हारी समझ सही थी। खाट वास्तव में नीचे नहीं जा सकी। लेकिन जब ब्रह्मा बाबा सामने खड़े थे और खाट को रखने के लिए कह रहे थे, तो पहले हमारी जिम्मेदारी उनकी बात पर अमल करने की थी। यदि खाट नहीं जाती, तो बाबा स्वयं कह देते।"

फिर मम्मा ने एक और गहरी शिक्षा दी।

उन्होंने समझाया कि यदि किसी को हर समय अपनी समझ को सही साबित करने की आदत पड़ जाए, तो धीरे-धीरे सूक्ष्म अहंकार आ सकता है। मन में यह भाव आ सकता है कि,

"मेरी समझ हमेशा सही है।”

और जब बुद्धि में अहंकार आ जाता है, तो वह दिव्य नहीं बन सकती। मम्मा यह नहीं कह रही थीं कि प्रेम बहन की बात गलत थी। वे यह सिखा रही थीं कि केवल सही होना ही पर्याप्त नहीं है। विनम्रता भी उतनी ही आवश्यक है। आज्ञापालन भी उतना ही आवश्यक है। सही समझ के साथ सही भावना भी होनी चाहिए।

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जब मम्मा के स्नेह ने बदल दी सोच

मम्मा की आध्यात्मिक शक्ति का एक सुंदर उदाहरण दिल्ली के कमला नगर के एक परिवार से जुड़ा है।

एक बहन नियमित रूप से सेवा केंद्र पर जाती थीं। उन्हें बाबा का ज्ञान बहुत प्रिय था और वे बड़ी निष्ठा से राजयोग का अभ्यास करती थीं। लेकिन उनके पति उनके आध्यात्मिक जीवन का विरोध करते थे। दूसरों की बातों से प्रभावित होकर वे उन्हें सेंटर जाने से रोकते थे।

जब उस बहन को पता चला कि मम्मा दिल्ली आ रही हैं, तो उन्होंने अपने पति से प्रेमपूर्वक कहा, "मातेश्वरी जी आ रही हैं। आप उनसे केवल एक बार मिल लीजिए। यदि उनसे मिलने के बाद भी आपको लगे कि यह मार्ग ठीक नहीं है, तो मैं सेंटर जाना छोड़ दूँगी।" उनके पति इस बात के लिए तैयार हो गए।

जब दोनों मम्मा से मिले, तो मम्मा ने बड़े स्नेह से उनका स्वागत किया। कुछ समय वे सब परमात्मा की याद में बैठे और फिर मम्मा ने बहुत प्यार से कुछ बातें कहीं। मम्मा की पवित्रता, उनकी मधुर वाणी और अपनेपन की भावना ने उस व्यक्ति के हृदय को छू लिया। वही व्यक्ति, जो पहले अपनी पत्नी के आध्यात्मिक जीवन का विरोध करता था, अब मम्मा के सामने शांत और सम्मान के साथ बैठा था।

यह घटना दिखाती है कि कैसे मम्मा लोगों के हृदय को छू लेती थीं। वे लोगों को तर्क से नहीं बदलती थीं। बल्कि वे प्रेम से दिलों को बदल देती थीं।

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"यदि हम प्यार नहीं देंगे, तो कौन देगा?"

एक वरिष्ठ भाई ने एक बार मम्मा से ईमानदारी से एक प्रश्न पूछा। उन्होंने कहा, "मम्मा, जो भी आपके पास आता है, वह या तो अपना दुःख सुनाता है या किसी और की कमजोरियों की बात करता है। कोई अच्छी बातें बताने नहीं आता।"

मम्मा ने मुस्कुराकर कहा, "हाँ, यह बात सही है।"

फिर भाई ने पूछा, "जब लोग ऐसी बातें बताते हैं, तो उसका असर हम पर पड़ता है। हम भी उस व्यक्ति को उसी दृष्टि से देखने लगते हैं। क्या इसका प्रभाव आप पर नहीं पड़ता?"

मम्मा का उत्तर, उनकी मातृभावना की गहराई को प्रकट करता है।

उन्होंने कहा कि वे सभी को एक पुरुषार्थी आत्मा के रूप में देखती हैं। हर आत्मा बदलने, आगे बढ़ने और स्वयं को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास कर रही है। कोई तेज गति से आगे बढ़ता है, कोई धीरे-धीरे। कोई बीच में रुक जाता है और कोई कभी-कभी असफल भी हो जाता है। लेकिन यह एक आध्यात्मिक विश्वविद्यालय है। और एक विश्वविद्यालय में हर प्रकार के विद्यार्थी होते हैं। कुछ बहुत तेज होते हैं, कुछ कमजोर। कुछ अच्छे अंकों से पास होते हैं और कुछ असफल होकर फिर से प्रयास करते हैं।

इसी कारण मम्मा कभी किसी की कमजोरियों को अपने दिल में नहीं रखती थीं। यदि कोई किसी दूसरे की कमियों की बात लेकर आता था, तो मम्मा दोनों के लिए शुभभावना रखती थीं। जो बात कहने आया, उसके लिए भी उनके मन में प्रेम और सम्मान होता था और जिसके बारे में कहा जा रहा था, उसके लिए भी। वे कहा करती थीं,

"यदि हम उन्हें प्यार नहीं देंगे, तो कौन देगा?"

यह एक वाक्य ही मम्मा के विशाल हृदय की गहराई को दिखाता है। वे केवल उनसे प्रेम नहीं करती थीं जिनसे प्रेम करना आसान था। वे विशेष रूप से उनको प्रेम देती थीं, जिन्हों को उसकी सबसे अधिक आवश्यकता होती थी। उनका प्रेम किसी की कमजोरी को नज़रअंदाज़ नहीं करता था, लेकिन कमजोरी के कारण आत्मा को ठुकराता भी नहीं था। वे हर आत्मा को आशा और शुभभावना की दृष्टि से देखती थीं।

कठिन परीक्षा के समय शांति का अडिग स्तंभ

ऐसी ही एक कठिन परीक्षा तब सामने आई, जब राजस्थान सरकार ने कोटा हाउस और धौलपुर हाउस (उस समय ब्रह्माकुमारीज़ हेड क्वार्टर) को खाली कराने का निर्णय लिया। इमारतों को खाली कराने के लिए अनेक पुलिस अधिकारी और सरकारी कर्मचारी मुख्यालय पहुँचे। उस समय वहाँ कई वृद्ध माताएँ और समर्पित भाई-बहन रह रहे थे।

तुरंत मुख्यालय को कहीं और स्थानांतरित करने के लिए कोई उपयुक्त स्थान उपलब्ध नहीं था। आर्थिक स्थिति भी चुनौतीपूर्ण थी। स्थिति को और कठिन बनाने वाली बात यह थी कि उस समय ब्रह्मा बाबा सेवा के सिलसिले में बाहर गए हुए थे।

ऐसी परिस्थिति में कोई भी सामान्य व्यक्ति चिंतित व घबरा सकता था। लेकिन मम्मा ने अलग ढंग से प्रतिक्रिया दी। उन्होंने राजयोग की शक्ति का सहारा लिया। एक विशेष योग-भट्ठी का आयोजन किया गया।

मम्मा की शांत, स्थिर और अचल स्थिति को देखकर बाकी सभी भी शांत रहे। वे न घबराए और न ही भयभीत हुए। सभी ने उस परिस्थिति का सामना साक्षीभाव से किया। उसी समय भाई जगदीश चंद्र ने भी बहुत साहस दिखाया। उन्होंने संबंधित अधिकारियों से मिलकर स्थिति को समझाया और तीन महीने की अतिरिक्त मोहलत दिलाने में सफलता प्राप्त की।

इस कठिन परीक्षा ने मम्मा के गुणों को व्यवहार में प्रकट कर दिया। उनकी शांति केवल उनके भीतर तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह आसपास के सभी लोगों के लिए शक्ति का स्रोत बन गई। उनकी स्थिति यह सिखाती थी कि जब आत्मा परमात्मा से जुड़ी रहती है, तब बड़ी से बड़ी कठिन परिस्थिति का भी सामना गरिमा, शांति और निश्चय के साथ किया जा सकता है।

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बीमारी के समय "ड्रामा की भावी" पर अटल विश्वास

वरिष्ठ भाई-बहनों द्वारा सुनाई गई अनेक यादों में, भाई रमेश का अनुभव मम्मा के ड्रामा पर अटूट विश्वास का एक बहुत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है।

अप्रैल 1964 में, जब मम्मा विभिन्न सेवा केन्द्रों के दौरे पर थीं, तब कानपुर में हुई एक चिकित्सीय जाँच के दौरान उनके सीने में एक गाँठ का पता चला। डॉक्टरों ने आगे की जाँच के लिए उन्हें मुंबई के टाटा अस्पताल ले जाने की सलाह दी। बाबा से परामर्श के बाद, मम्मा को सीधे कानपुर से मुंबई लाया गया।

जाँच के बाद डॉक्टरों ने ऑपरेशन करना आवश्यक बताया। ऑपरेशन के बाद मम्मा लगभग छह सप्ताह तक मुंबई में रहीं। डॉक्टरों ने हर तीन महीने में नियमित जाँच कराने की सलाह दी। जनवरी 1965 की जाँच के बाद, मम्मा ने फिर से पहले की तरह अपनी सेवाएँ शुरू कर दीं। वे यात्राएँ करती रहीं, क्लास कराती रहीं और सेवाओं के प्रसार में लगी रहीं।

फिर अप्रैल 1965 में वे दोबारा जाँच के लिए मुंबई पहुँचीं। इस बार डॉक्टरों ने एक कठिन समाचार दिया। बीमारी तेजी से बढ़ चुकी थी और डॉक्टरों के अनुसार अब बहुत कम समय शेष था।

जब मम्मा को यह बात बताई गई, तो उन्होंने केवल इतना कहा—

"ड्रामा की भावी।" (जो होना होगा वो होगा)

न कोई डर।

न कोई दुःख।

न कोई विरोध।

न कोई शिकायत।

बीमारी की गंभीरता का पता चलने के बाद भी वे पूरी तरह स्थिर रहीं। आने वाले महीनों में शरीर बीमारी से गुजर रहा था, लेकिन उनकी स्थिति श्रेष्ठ और अचल अडोल बनी रही।

जिन लोगों ने मम्मा के जीवन का यह समय देखा, उनके लिए यह एक अविस्मरणीय शिक्षा बन गया। परिस्थितियाँ कठिन होने पर भी उनका विश्वास कभी नहीं डगमगाया। उनकी स्थिरता शरीर की स्थिति पर निर्भर नहीं थी।

ऐसी खबर, जो सामान्य व्यक्ति को हिला सकती थी, उसके सामने भी वे ड्रामा की स्मृति में अडिग रहीं। "ड्रामा की भावी" उनके लिए केवल कहने योग्य शब्द नहीं थे। वे उनके जीवन जीने का तरीका थे

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अंतिम समय तक सेवा

मम्मा का पूरा जीवन सेवा को समर्पित था। संस्था के शुरुआती दिनों में, विरोध के समय में या तपस्या के शांत क्षणों में, उनका ध्यान हमेशा शिव बाबा और दूसरों के आध्यात्मिक कल्याण पर ही रहता था।

यही भावना उनके जीवन के अंतिम चरण तक बनी रही।

जब उनके शरीर में बीमारी के लक्षण दिखाई देने लगे, तब भी उन्होंने अपनी आंतरिक स्थिति को कमजोर नहीं होने दिया। वे शांत और स्थिर बनी रहीं। जीवन के अंतिम चरण में भी, शरीर की स्थिति कैसी भी रही हो, उनके शब्दों में वही मिठास, स्पष्टता और शक्ति बनी रही।

एक बार किसी ने उनकी योग शक्ति और सहनशक्ति को देखकर पूछा कि पुरुषार्थ में इतना आगे बढ़ने का रहस्य क्या है। मम्मा ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया कि उनकी सभी विशेषताएँ बाबा की देन हैं।

मम्मा की आध्यात्मिक शक्ति के चार स्तंभ

मम्मा कभी अपने पद, सेवा या लोगों द्वारा दिए गए सम्मान की बात नहीं करती थीं। वे विनम्रता से कहती थीं कि जो कुछ भी विशेषताएँ हैं, वे बाबा की देन हैं। फिर भी, अपने जीवन को देखते हुए उन्होंने चार ऐसे आधार बताए, जिन्होंने उन्हें सदा मजबूत बनाए रखा।

पहला आधार था शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा पर अटूट निश्चय। उनका विश्वास परिस्थितियों पर निर्भर नहीं था। संस्था की वृद्धि हो, विरोध हो या कठिन समय, वे हर स्थिति में अचल रहती थीं।

दूसरा आधार था कभी मुरली मिस नहीं करनी। मम्मा के लिए मुरली केवल रोज़ का अध्ययन नहीं थी। वह उनका आध्यात्मिक भोजन, मार्गदर्शन और शक्ति का स्रोत थी। वे उसे पूरे ध्यान से सुनतीं, उस पर गहराई से मनन करतीं और जीवन में धारण करती थीं।

तीसरा आधार था मन से भी कभी रोना नहीं। यह उनकी गहरी शिक्षाओं में से एक थी। इसका अर्थ यह नहीं था कि उनमें भावनाएँ नहीं थीं। इसका अर्थ यह था कि वे दुःख, कमजोरी या स्वयं पर दया करने की भावना को अपनी स्थिति पर हावी नहीं होने देती थीं। परिस्थिति आने पर वे परमात्मा को याद करतीं, शक्ति लेतीं और आगे बढ़ जाती थीं।

चौथा आधार था गलती समझ में आने के बाद उसे दोहराना नहीं। यह उनके सच्चे पुरुषार्थ को दिखाता था। वे अपराधबोध में समय नहीं गँवाती थीं। वे सीखती थीं, स्वयं को बेहतर बनाती और आगे बढ़ जाती थीं।

ये चार बातें मम्मा की शक्ति का रहस्य थीं। उनकी महानता किसी एक बड़े कार्य से नहीं बनी थी, बल्कि हर रोज़ के निश्चय, नियमित अध्ययन, आंतरिक साहस और ईमानदारी से स्वयं को आगे बढ़ाने के अभ्यास से बनी थी।

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केवल एक स्मृति नहीं...

23 जून को ब्रह्मा बाबा ने मम्मा से कहा कि उनके लगाए हुए अंगूर की बेल में पहली बार अंगूर तैयार हुए हैं और अगले दिन सुबह वे उन्हें बच्चों को अपने हाथों से खिलाएँ। मम्मा का उत्तर हमेशा की तरह था—"हाँ जी, बाबा।"

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अगली सुबह, शरीर में दर्द होने के बावजूद, मम्मा ने बड़े प्रेम से लगभग 200 बच्चों को अंगूर खिलाए। उनके चेहरे पर वही आध्यात्मिक मुस्कान थी। उनकी दृष्टि में वही शांति और शक्ति थी। जीवन के अंतिम क्षण भी उनके लिए देने, सेवा करने और आशीर्वाद बाँटने के क्षण बन गए।

मम्मा के अंतिम दिनों में उनके पूरे जीवन का सार दिखाई देता है—अटूट निश्चय, बिना शिकायत सेवा, लगाव से परे प्रेम और देह-अभिमान पर संपूर्ण विजय।

24 जून 1965 को मम्मा ने अपने देह का त्याग किया।

लेकिन जो लोग मम्मा के निकट रहे थे, वे जानते थे कि उनकी कहानी वहाँ पूरी नहीं हो सकती थी।

जिन मूल्यों को उन्होंने अपने जीवन में जिया, वे लोगों को प्रेरणा देते रहे। कठिन परिस्थितियों में उनका अटूट विश्वास, परमात्मा के प्रति उनका गहरा प्रेम, उनकी अथक सेवा, संपूर्ण समर्पण की भावना, बड़ी जिम्मेदारियों के बीच भी उनकी विनम्रता और दूसरों की आध्यात्मिक उन्नति के प्रति उनकी निरंतर शुभ भावना — ये सब लोगों के हृदयों में जीवित रहे।

आज कई दशक बाद भी, सभी मम्मा की शिक्षाओं, उनके जीवन से मिली प्रेरणा और उन्हें करीब से जानने वालों की यादों के माध्यम से उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं।

शायद यही एक सफल जीवन की सच्ची पहचान है। जरूरी नहीं कि वह जीवन लंबा हो, बल्कि यह कि उसने कितने लोगों के जीवन को कितनी गहराई से स्पर्श और परिवर्तित किया।

अपने प्रेम, ज्ञान और निस्वार्थ सेवा के माध्यम से मम्मा आज भी अनगिनत आत्माओं की आध्यात्मिक यात्रा में प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बनी हुई हैं।

एक प्रभावशाली एनिमेशन फ़िल्म के माध्यम से मम्मा के जीवन का अनुभव करें

एक प्रभावशाली एनिमेशन फ़िल्म के माध्यम से मम्मा के जीवन का अनुभव करें

मम्मा के जीवन के बारे में पढ़कर हम उनके गुणों और व्यक्तित्व को समझ सकते हैं, लेकिन यह सुंदर वीडियो हमें युवा राधे से लेकर सबकी प्रिय मम्मा बनने तक की उनकी प्रेरणादायी यात्रा को दृश्य रूप में अनुभव कराता है। इसमें उनके जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों, शिक्षाओं और उन अनुभवों को प्रस्तुत किया गया है, जिन्होंने उन्हें एक स्नेहमयी आध्यात्मिक माँ के रूप में सबके हृदय में विशेष स्थान दिलाया।

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आज मैं किसी एक ऐसी परिस्थिति, जिम्मेदारी या निर्देश के प्रति (जिसका मैं सामान्यतः विरोध करता/करती हूँ) "हाँ जी" कहने का अभ्यास करूँगा/करूँगी।

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