सेना के कड़े अनुशासन में रहकर मैंने शरीर को तो फौलाद बना लिया था, लेकिन सेवा के दौरान लगे संगदोष ने मेरे मन को खोखला करना शुरू कर दिया। सेवानिवृत्ति के बाद जब मैं फिजिकल ट्रेनर के रूप में कार्य कर रहा था, तब पिछले 8-9 वर्षों से शराब और तंबाकू की लत मेरी सबसे बड़ी कमजोरी बन चुकी थी।
जो अनुशासन मेरी पहचान था, वह धुंधला पड़ने लगा और उसकी जगह चिड़चिड़ेपन और क्रोध ने ले ली। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई थी कि मन की बेचैनी मुझे आत्मघाती विचारों की ओर धकेलने लगी थी। मेरी एकाग्रता खत्म हो रही थी और वह आत्मविश्वास, जो एक सैनिक का गहना होता है, पूरी तरह गिर चुका था। मैं दूसरों को फिट रहने की सलाह देता था, पर स्वयं भीतर से हार रहा था।
मेरे जीवन का 'रेस्क्यू ऑपरेशन' तब शुरू हुआ, जब इंटरनेट पर मैंने राजयोग का एक वीडियो देखा। वह मार्ग इतना सहज और तार्किक लगा कि मैं तुरंत ब्रह्माकुमारीज़ सेवा केंद्र पहुँच गया। राजयोग के पहले अभ्यास ने ही मुझे वह 'आंतरिक शक्ति' और 'सच्ची खुशी' महसूस कराई, जिसके सामने नशे का हर सुख फीका और बनावटी लगने लगा। वह आत्मिक आनंद इतना गहरा था कि व्यसनों की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई। परमात्मा की याद से मिले उस आत्मबल ने मुझे न केवल व्यसनों से मुक्त किया, बल्कि मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास भी लौटा दिया। आज मैं न केवल शारीरिक रूप से फिट हूँ, बल्कि मानसिक रूप से भी फौलाद की तरह मजबूत हूँ। आज मैं अपने प्रशिक्षण के साथ-साथ अनेक लोगों को नशा मुक्त जीवन के लिए प्रेरित कर रहा हूँ।
मेरा अनुभव आज हर युवा और सैनिक से यही कहता है- 'सच्ची ताकत केवल मांस-पेशियों में नहीं, बल्कि मन की शुद्धता और आत्मबल में होती है।





