13 वर्ष की कोमल आयु में तम्बाकू और 15 वर्ष की उम्र में शराब से मेरे व्यसन की शुरुआत हुई। देखते ही देखते 21 साल बीत गए और नशा मेरी दिनचर्या की अनिवार्य शर्त बन गया। तंबाकू की तो कोई सीमा ही नहीं थी; मुझे लगता था कि बिना नशे के जीवन बेस्वाद और फीका है। मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा इन व्यसनों की भेंट चढ़ जाता था। स्थिति यहाँ तक बिगड़ गई कि मेरा शरीर जवाब देने लगा-पाचन शक्ति इतनी कमजोर हो गई कि पानी तक पचाना दूभर हो गया था। मैं इस दलदल से निकलना चाहता था, तड़पता था, पर हर कोशिश नाकाम हो रही थी। संकल्प की शक्ति जवाब दे चुकी थी। मेरे जीवन का सुधार तब हुआ, जब मैं मैं ब्रह्माकुमारीज़ के संपर्क में आया और राजयोग का मार्ग चुना। वहाँ मिले एक दिव्य विचार ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया-
'मैं एक पवित्र आत्मा हूँ।'
इस बोध ने मेरे अंतर्मन में सोया हुआ स्वाभिमान जगा दिया। शुद्ध विचारों की खाद और परमात्मा की याद के नियमित अभ्यास ने मुझे वह 'आत्मबल' दिया, जिसकी तलाश मैं 21 सालों से कर रहा था।
आज, वह दो दशक पुरानी लत पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। जीवन पूरी तरह संतुलित और सुखद है। मेरे इस परिवर्तन को देख मेरे एक करीबी संबंधी ने भी राजयोग अपनाया और आज वे भी एक सुंदर जीवन जी रहे हैं।





