
Experience Your Divinity By Connecting With God (Part 1)
Discover the spiritual message on Navratri 2025 🌸. Learn the meaning of Ma Shakti, rituals, wisdom, and the inner powers that connect soul to God.
हाल ही में हमारे दो वर्ष कोरोना महामारी में गुज़र गए, जिन्होंने हमें आने वाले वर्षों के लिए बहुत कुछ प्रेरणाएं दीं। बहुत लोग हिम्मत हार कर बैठ गए और बहुतों के दिल में आज भी मशाल जल रही है और जलनी भी चाहिए क्योंकि ज़िंदगी का सार हार और थक कर बैठ जाना नहीं है। ज़िंदगी का सार है – सामना करना, लड़ना, जीतना और अगर हार भी जाये तो भी फिर से उठना और फिर लड़ना।
फौजी को देखा है कभी? क्या सीख मिलती है उससे? क्या वो अपनी सेना के सैनिकों को जब दम तोड़ते या घायल होते देखता है, तो क्या वो स्वयं को भी अपनी दुश्मन सेना के सामने समर्पित कर देता है या हार मान कर बैठ जाता है? नहीं ना, वो ऐसा तो हरगिज़ नहीं करता। वो लड़ता है अपने आखिर दम तक। ऐसा ही हमें भी करना चाहिए।
अगर हमारे अपने हमें छोड़कर भी चले गए तो क्या उनके गम में स्वयं हार कर बैठना सही है? ये समझदारी नहीं है, क्योंकि हमारा जीवन भी तो कर्मक्षेत्र है उस सैनिक की तरह। वहाँ (उस युद्ध के मैदान में) हमला होता है दूसरे देश की सेना का और यहाँ हमला होता है स्वयं की सेना का। स्वयं की सेना माना अपने ही मन व बुद्धि जिसके राजा हम स्वयं हैं और ये हमारी प्रजा है। वहाँ हमला करने वाले हथियार हैं- बंदूक व तोप और यहाँ हमला करने वाले हथियार हैं- व्यर्थ व नकारात्मक संकल्प, क्योंकि यही तो हमें मार गिराते हैं। एक सैनिक तब तक नहीं हारता, जब तक वो स्वयं से ना हार माने, फिर चाहे सामने से कितना ही भयंकर हमला क्यों ना हो। ठीक ऐसे ही यहाँ भी एक आत्मा तब तक नहीं हारती, जब तक वो स्वयं से हार ना मान लें।
वहाँ के सैनिक की प्रतिदिन ट्रेनिंग होती है और साथ ही साथ उनके भोजन का ख्याल हर वक्त रखना होता है। अब सवाल आता है कि हमारी ट्रेनिंग और भोजन क्या है? आइए जानते हैं।
देखिये, हमारे मन का भोजन है ‘संकल्प’ और बुद्धि का भोजन है ‘ज्ञान’। हमारे मन का कार्य है ‘सोचना’। इसको हम रोक नहीं सकते परंतु हम इसको दिशा दे सकते हैं। इसकी दिशा हम हर रोज़ ज्ञानामृत का पान करने से बदल सकते हैं और ये ज्ञानामृत है ‘ईश्वरीय महावाक्य’, जिसका प्रत्येक दिन श्रवण करने से हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है। वास्तव में यह ज्ञान ऐसा है जो हमें यथार्थ निर्णय लेने में मददगार बनाता है।
अब हमारी ट्रेनिंग है – हमारा योगाभ्यास। जितना हम मन और बुद्धि की ड्रिल करते हैं माना योग करते हैं, उतना हम तंदरूस्त बनते हैं। सरल शब्दों में कहें तो जितना हम अपने मन की तार परमात्मा से जोड़ते हैं, उतना ही हम शक्तिशाली बनते हैं। कोरोना काल को देखें, तो उनमें जो व्यक्ति स्वयं के मन से जीत गया वो कोरोना से भी जीत गया था और जो स्वयं से हारा था, वो कोरोना से भी हार कर दम तोड़ गया था।
कहते हैं किसी के वर्तमान को देख उसके भविष्य की कल्पना मत करना क्योंकि भविष्य में इतनी ताकत है कि वो कोयले को हीरे में बदल सकता है। तो क्या हमारा जीवन नहीं बदल सकता! समस्या आती ही जाने के लिए है, परंतु हम उसे सदाकाल का समझ कर हिम्मत खो देते हैं। पहले भी ना जाने कितनी महामारियां आई संसार में, तो क्या सभी सदाकाल के लिए रहीं? नहीं ना! वो 2,4,6 वर्षों में खत्म हो ही गयीं ना! सभी यही सिखाकर गयी कि समय भी अपना समय आने पर बदल ही जाता है। कुछ भी स्थाई नहीं है जीवन में।
जो भी हमारे जीवन में होता है सब कल्याणकारी है, ये लाइन भी सदैव याद रखिये। और हाँ, ज़िंदगी कभी विद्यालय के अध्यापक की तरह सीधे-सीधे नहीं पढ़ाती, यह सदैव पहले परिस्थिति का उदाहरण देती, तत्पश्चात् समझाती है ताकि आपको सदाकाल के लिए इसके पढ़ाये हुए पाठ याद रह सकें।
तो अब आगे कभी परिस्थिति आये, तो यही स्मरण रखना कि ज़िंदगी अब फिर से नया पाठ, नये उदाहरण के साथ समझा रही है और विशाल बुद्धि बन, धैर्यता से समझने का प्रयास करना, फिर एक दिन आप फतह का झंडा निश्चित रूप से लहरायेंगे, ये हमारा विश्वास है।

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In today’s world, Christmas signifies both the end of one year and the beginning of another, prompting various preparations and reflections. Beyond the festivity, its true significance lies in the arrival of Christ, signifying a shift in the calendar and a profound spiritual transformation. Christ symbolises the triumph of virtues over vices, advocating for love and humility in a world now plagued by fear and arrogance. The commercialised “Santa Claus” tale might conceal a deeper message, hinting at the arrival of divinity during times of moral decline.

Dussehra’s lesson is that, like Lord Ram facing the never-ending emergence of new heads when he struck one down, we must focus on eradicating the root of all our vices I,e Body consciousness by practising Meditation and Spiritual Knowledge.

On the fourth day of Kartik month of Hindu Calendar Year, comes ‘Karva Chauth’ – a fast observed by Hindu wives. On this day, the

नवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व—दीपक, उपवास, सात्विकता और गरबा नृत्य हमें आत्मा की शुद्धता, रिश्तों की समझ और दिव्यता का अनुभव कराते हैं।

In Indian culture, the festival of Makara Sakranti is very prominent and significant. It commemorates the beginning of the harvest season and cessation of the

This post beautifully redefines Mother’s Day, urging us to find motherly love in every corner—from nature’s embrace to strangers’ kindness. 🍃❤️ Reflecting on how God, as a universal mother, surrounds us with care is inspiring. Have you noticed these small, nurturing moments in your life? How can we pass this loving care to others every day?

नवरात्रि हमें देवी की पूजा के साथ-साथ अपनी आंतरिक शक्तियों का अनुभव कराती है। शिव से जुड़कर आत्मा अपनी अष्ट शक्तियों को जागृत करती है। व्रत, सात्विकता और जागरण का असली संदेश हमें जीवन को सरल, शक्तिशाली और आनंदमय बनाने की प्रेरणा देता है।

आज किसान खेती के अवशेषों को जलाते हैं माना माँ धरती की चमड़ी को ही जला देते हैं। जिससे धरती के जीवन तत्व नष्टहोतेहैं तथा धरती की उर्वरक क्षमता भी नष्ट हो जाती है। मानव जीवन में मिट्टी का विशेष महत्व है क्योंकि स्वस्थ खाद्य स्वस्थ मृदा का आधार होती है। मृदा पानी का संग्रहण करती है और उसे स्वच्छ बनाती है।

This piece explores how simple things like Christmas decorations can become beautiful and bring joy, just like we can change and find happiness within ourselves. It says that when we take care of ourselves and grow inside, it’s like making something pretty. It’s like decorating a tree – we should fill our lives with happiness and love instead of feeling sad or fake. And it shows how changing our inside (the soul) can make us happier and help us spread love to others, even when times are tough during the holidays.