ब्रह्माकुमारीज़ नेविगेशन
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ब्रह्माकुमारी कमलेश दीदी जी – अनुभवगाथा

मेरा लौकिक जन्म जनवरी, 1940 में एक धनी धार्मिक और व्यवसायी परिवार में कोलकाता में हुआ। मुझे बाल्यकाल से ही भक्ति और सेवा कार्य में विशेष रुचि थी इसलिए मेरा संकल्प था कि मैं बड़ी होकर या तो मीराबाई की तरह भक्ति करूँ या अनाथों की सेवा करूँ या किसी भी अन्य तरीके से देश की सेवा अवश्य ही करूँ। उन दिनों यह गीत बहुत लोकप्रिय था “भगवान तुझे मैं खत लिखता पर तेरा पता मालूम नहीं।” मेरे मन में प्रश्न उठता था कि क्या मैं ईश्वर को ढूँढ़ सकूँगी? भीतर से आवाज आती थी कि अवश्य पा सकूँगी। इसी आन्तरिक प्रेरणा को लेकर मैं ईश्वर की खोज में लगी रही। लौकिक पिताजी को यह भय था कि कहीं मीराबाई की तरह वैरागी बनकर यह किसी सत्संग में न मिल जाए इसलिए सन् 1957 में उन्होंने मेरे हाथ पीले कर दिए। बेड़ियों जैसा कठोर लगा मुझे यह बन्धन !

भक्ति की कट्टरता से ज्ञान की सत्यता की ओर

भक्ति के रस में मगन मेरे मन में तो सारा दिन यही बातें घूमती थी कि ईश्वर क्या है, संसार क्या है, दिन के 6-8 घण्टे इन्हीं विचारों में मैं बिता देती थी। जनवरी, 1962 में मुझे शिकोहाबाद जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। वहाँ मेरी लौकिक भाभीजी भी आई, जो ईश्वरीय ज्ञान में 2 वर्ष से चल रही थी। उन्होंने मुझे ईश्वरीय ज्ञान की बातें सुनाई और कहा कि तुम भक्ति मार्ग के कष्ट उठाना छोड़ो, सहज ईश्वरीय ज्ञान मार्ग पर चलो। परन्तु मुझे भक्ति का, साक्षात्कारों का अभिमान था। मैं श्रीकृष्ण तथा श्री विष्णुजी की विशेष पुजारिन थी। अन्य देवी-देवताओं को भी मानती थी इसलिए भाभी जी की नेक सलाह को सुनते हुए भी मैंने अनसुना कर दिया।

रामायण सृष्टि थमाने के लिए लिखी थी

एक बार भाभी जी अन्य आत्माओं के समक्ष ईश्वरीय अनुभवों का वर्णन कर रही थी, पास में उपस्थित होने के कारण न चाहते हुए भी वह वर्णन मेरे कानों में पड़ ही गया। भाभीजी कह रही थी कि मुझे ब्रह्माकुमारी बहनें ज्ञान सुनने के लिए बुलाने आई तो मैं एक दिन तो सुनने चली गई पर अगले दिन जादू हो जाने के डर से नहीं गई और बहनें बुलाने आई तो नौकर से कहलवा दिया कि मेम साहब घर में नहीं है। भाभीजी ने आगे बताया कि मैं रामायण की पक्की भक्तिन थी। रात को जब सोई तो स्वप्न आया कि तुलसीदास जी बगीचे में बैठे हैं। मैंने उनके पास जाकर पूछा कि बाबा, आपकी लिखी रामायण सच्ची है या सफेद वस्त्रधारी बहनें सच्ची हैं। उन्होंने उत्तर दिया, “रामायण तो मैंने सृष्टि को थमाने के लिए लिखी थी, ये बहनें शिव-शक्तियाँ हैं, सत्य ज्ञान सुनाती हैं, आप इन्हें सुनो। सुबह होने पर मैं सेवाकेन्द्र गई और बहनों से अपने संशय के लिए माफी माँगी, फिर ज्ञान सुना और अब ज्ञान से अपूर्व सुख-शान्ति का अनुभव कर रही हूँ। भाभीजी का यह अनुभव सुनकर मैं बहुत प्रभावित हुई और ज्ञान की तरफ आकर्षित भी हुई परन्तु परमात्मा पिता पर पूर्ण निश्चय मुझे कुछ और व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर ही हुआ।

ज्ञान-मुरली का चिन्तन

भाभी जी मेरी सच्ची शुभचिन्तक थी। जिस अतीन्द्रिय आनन्द के झूले में वह स्वयं झूलती थी, उसमें मुझे भी झुला देना चाहती थी इसलिए एक दिन बड़ी युक्ति से उसने ज्ञान-मुरली मेरे सिरहाने रख दी। मैंने उसे आदि से लेकर अन्त तक पढ़ा। ज्ञान-मुरली के प्रारम्भ में लिखा था, “शिवभगवानुवाच” इस मीठे-प्यारे शब्द ने रूहानी जादू का काम किया। मेरे शान्त हृदय-सागर में विचारों की लहरें उठने लगी कि क्या ये महावाक्य सचमुच भगवान द्वारा बोले गए हैं, क्या भगवान धरती पर अवतरित हो चुके हैं, क्या इन महावाक्यों में कोई नया, समझने योग्य राज़ समाया हुआ है? प्रश्नों से घिरी हुई मैंने अपने इष्ट श्री विष्णु जी से मन-ही-मन कहा, “हे प्रभुजी, सच में ही मेरा मन लगे, झूठ में नहीं।” इसके बाद स्वप्न में, श्री विष्णु जी ने मुझे यह कहकर निश्चिंत कर दिया कि सत्य में ही तुम्हारा मन लगेगा, झूठ में नहीं। अगले दिन की सुबह मेरे लिए नया सन्देश लेकर आई। मेरे संस्कार भक्ति मार्ग की पुरानी राह पर चलने की कोशिश कर रहे थे परन्तु विवेक, ज्ञान मार्ग के नए अनुभवों के लिए लालायित हो उठा था।

ब्रह्मचर्य की दृढ़ प्रतिज्ञा

आखिर विवेक (समझ) की विजय हुई और मैंने भाभीजी के समक्ष ज्ञान को समझ लेने की अपनी इच्छा व्यक्त कर दी। वे मुझे एटा (उत्तर प्रदेश) ले गई जहाँ भाई साहब सिविल सर्जन के पद पर कार्यरत थे। उनके पास आबू पर्वत (मुख्यालय) से ज्ञान-मुरली आती थी। मैंने साप्ताहिक पाठ्यक्रम और ज्ञान-मुरली के द्वारा सब बातों को अच्छी तरह परखा-समझा और फिर पूर्ण निश्चय हो गया कि भगवान धरती पर आ चुके हैं। इस प्रकार, जन्म-जन्मान्तर की भक्ति का सुखदाई फल, ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हुआ और आत्मिक उन्नति होने लगी। एक बार प्यारे बाबा ने कहा, “लौकिक दुनिया में बड़े आदमी से उनके समान पोजिशन (स्थिति) बनाकर मिलना होता है। इसी प्रकार, भगवान से मिलने के लिए भी उन जैसा पवित्र बनना होगा। जहाँ काम है वहाँ राम नहीं, जहाँ राम है वहाँ काम नहीं।” पवित्र जीवन से सम्बन्धित यह ज्ञान-बिन्दु मुझे बहुत मनभावन लगा। जिस प्रभु को होश सम्भालते ही खोजना प्रारम्भ किया और पुण्यों के संचित बल से उसे प्राप्त भी कर लिया तो मैं किसी भी कीमत पर उसे छोड़ना नहीं चाहती थी। मैंने दृढ़ संकल्प कर लिया कि अवश्य ही ब्रह्मचर्य में रहकर जीवन व्यतीत करूँगी। उस समय मैं समाज में नामीग्रामी परिवार की 23 वर्षीय जिम्मेवार बहू थी। इतनी छोटी आयु में अध्यात्म की ओर झुकाव होने का अर्थ था घर में हंगामे को निमन्त्रण देना। लेकिन ईश्वरीय बल के सामने, प्रभु-प्रेम के सामने लोक-लाज की बातें छोटी पड़ जाती हैं। मीरा ने भी तो छोटी आयु में “कुल की कानि” (लोक-लाज) को त्यागकर प्रियतम प्रभु के संग रास रचाई थी। मैं भी उसी प्रकार की भावनाओं से भरी हुई थी। मैं ईश्वरीय ज्ञान की सभी प्रकार की सामग्री लेकर, साहसी बनकर पोरसा (ससुराल) चली गई। पहले तो मैं खुलकर बोल भी नहीं सकती थी परन्तु अब प्यारे प्रभु ने वाक् बल भी वरदान रूप में दे दिया और मैंने परिवार के सभी सदस्यों को ईश्वरीय ज्ञान सुनाना प्रारम्भ कर दिया।

विरोध और परीक्षाएँ

प्रारम्भ के तीन-चार मास तक मुझे सभी का बहुत सहयोग मिला परन्तु पवित्रता तथा अन्य नियमों के बारे में जानकारी मिलने पर सभी विरोधी बन गए। मेरी सभी ईश्वरीय गतिविधियों पर प्रतिबन्ध लग गया परन्तु मन इन प्रतिबन्धों को कहाँ स्वीकार कर पा रहा था? बन्धनों ने ईश्वरीय लगन की अग्नि में घी का काम किया। मैं टॉर्च की रोशनी में भी छिपकर ज्ञान-मुरली का अध्ययन कर लेती।

चार बार मुरली पढ़ना तो बहुत सहज बात हो गई थी। मुरली की एक-एक बात जीवन में उतरने लगी। योग का चार्ट भी चार घण्टे तक पहुँच जाता था। कार्य किया और फिर आधा घण्टा योगाभ्यास में मस्त हो जाती थी, ऐसी दिनचर्या बन गई। उपन्यास, सिनेमा आदि से मन पूर्णतया हट गया। खान-पान की शुद्धि तथा अन्य सभी श्रेष्ठ धारणाएँ जीवन का अंग बन गई। “मेरा तो एक शिव बाबा दूसरा न कोई” यह रूहानी नशा मन-बुद्धि पर छा गया। सभी के सो जाने पर मैं रात्रि जागरण करके भी ज्ञान-योग का दिव्य रसपान करती थी। कभी नींद आने लगती तो आँखों में कुछ लगाकर भी सफलतापूर्वक जागरण कर लेती थी। मन में उठने वाले सभी प्रश्नों का उत्तर, योगाभ्यास के दौरान प्यारे शिव बाबा से प्राप्त हो जाता था। अनेक प्रकार के दिव्य साक्षात्कार भी हुए जिनमें मैंने महाभारी महाविनाश का दृश्य भी देखा तो आने वाली सतयुगी सृष्टि का भी। प्यारे शिवबाबा के साथ सर्व सम्बन्धों के अतीन्द्रिय सुख में आत्मा रमण करने लगी। अन्दर की बेहद खुशी, हँसी बनकर चेहरे पर नाचने लगी। समय और स्थान की हदों को सहज ही लाँघकर आत्मा निर्बन्धन पक्षी की तरह तीनों लोकों की सैर करने लगी। विघ्नों ने जितनी ज्यादा दीवारें खड़ी करने की कोशिश की, मन ने उतना ही ज्यादा ऊँचा उड़ना सीख लिया और उनको पार करने में सफल होता गया। गोपीवल्लभ शिव की सच्ची गोपिका मुझ आत्मा के सामने हर समस्या माखन से बाल निकलने जैसी जादुई सरलता से हल होने लगी।

धर्म का पथ इतना अडिग हो गया कि बड़ी-बड़ी धमकियाँ भी उसे डोलायमान न कर सकी। इतना होते हुए भी मैंने अपने कर्त्तव्य में कभी लापरवाही नहीं की। परिवार के हर सदस्य की सेवा में खरी उतरती रही। मेरी इस कर्त्तव्यपरायणता ने विरोधियों के बीच में भी अनेकों को मेरा सहयोगी बनाए रखा। मेरे मुख पर एक ही मन्त्र रहता था, “जिसका साथी है भगवान, उसको क्या रोकेंगे माया के आँधी और तूफान।” एक गीत के ये बोल, “निर्बल से लड़ाई बलवान की, यह कहानी है दिए की और तूफान की”, भी मुझे बहुत प्रेरणा देते थे।

बाबा के प्रेम भरे पत्रों का सहारा

मैं आँसुओं और रक्त में लेखनी डुबोकर प्यारे बाबा को पत्र लिखती थी। एक या दो सप्ताह के अन्दर ही बाबा का प्रेरणाओं और शिक्षाओं से भरा पत्रोत्तर मिल जाता था। डाक पर प्रतिबन्ध होने के कारण ब्रह्माकुमारी बहनें ही मेरे लिए सन्देशवाहक थी। मेरी उत्सुक और चात्रक निगाहें प्रभु के प्रेम-पत्रों का बेसब्री से इन्तजार करती थी। चारों और फैले अज्ञानता के गहन तिमिर में, ये पत्र मानो प्रकाश- स्तम्भ थे। विघ्नों और बाधाओं की ऊँची-ऊँची प्रचण्ड लहरों से घिरी जीवन-नैया के लिए बाबा ही पतवार थे। बाबा लिखते थे, “बच्ची, तुम विजयी रत्न हो।” इन शब्दों से अन्तर्मन में हिम्मत का ज्वार उठने लगता था।

पुनः साहस आ गया

एक बार बाबा ने लिखा, “बच्ची, तुम एकलव्य हो, अर्जुन गुरु के पास रहता था और एकलव्य दूर रहकर सीखता था पर एकलव्य अर्जुन से आगे गया, तुम भी ऐसे ही हो ना।” पत्र के इन शब्दों में छिपी शक्तिशाली प्रेरणा, धैर्य और हिम्मत ने मुझे उड़ने के पँख दे दिए। एक बार मेरे दिल के सहारे पत्रों को तथा झाड़ और त्रिमूर्ति के चित्रों को जला दिया गया। कटे पँख वाले पंछी की तरह मन छटपटाया पर धैर्य देने वाले परमात्मा का अगले ही क्षण सांत्वना भरा पत्र प्राप्त हुआ। बाबा ने लिखा था, “बच्ची, सेवा की जितनी सामग्री चाहिए तुम्हें फिर-फिर मिल जाएगी, किसी बात में घबराना या चिन्ता नहीं करना।” पुनः मुझमें साहस आ गया। भक्ति मार्ग में मैने भागवत खूब पढ़ी थी। उसमें गोपियों के और भगवान के चरित्र पढ़-पढ़ कर खूब हँसते भी थे, रोते भी थे। अब महसूस होने लगा था कि वे चरित्र संगमयुग के हैं और हम ही गोपीवल्लभ की सच्ची-सच्ची गोपियाँ हैं। एक बार बाबा को मैंने, एक बहन के हाथों अँगूठी भेजी, जो इस बात का प्रतीक थी कि मेरे मन की लगन प्रभु के साथ पक्की है, मुझ आत्मा ने अपनी सगाई परमात्मा से रचा ली है। बाबा ज्ञान-मुरली में, खून से पत्र लिखने वाली बाँधेली गोपियों की महिमा करता तो मुझे विशेष रूहानी खुशी प्राप्त होती थी। 

विघ्न हरा न सका

कुछ समय बाद मेरा कोलकाता में लौकिक माता-पिता के पास जाना हुआ। वहाँ भी मैं प्रातः कक्षा में सबसे पहले पहुँचती थी और आगे-आगे बैठती थी। एक दिन भोग था, उस समय सन्देशी बहन के तन के माध्यम से बाबा ने मुझसे प्रतिज्ञा करवाई। कागज़-पेन लेकर मुझे लिखने को कहा कि कितने भी विघ्न आएँगे पर पवित्रता की प्रतिज्ञा नहीं तोडूंगी। मुझे नशा और निश्चय अटूट था इसलिए झट लिख दिया, “रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन न जाई।” सन्देशी के द्वारा ही तब बाबा ने बहुत-बहुत स्नेह और सम्मान दिया। मैं समझ गई कि प्रभु के इस प्यार की परीक्षा लेने के लिए माया का विघ्न जोर से आएगा। सचमुच ऐसा ही हुआ। कोलकाता से वापस ससुराल लौटने पर परीक्षाएँ विकराल होती गई परन्तु माया का कोई भी विघ्न मुझे हरा न सका। एक बार मुझे बन्दूक लेकर डराया गया पर मैं शेरनी की तरह निडर रही, पथ से विचलित नहीं हुई। माया कागज़ के शेर का रूप धारण करके आई थी परन्तु उसकी बनावटी चाल की पोल खुल गई क्योंकि बन्दूक में कारतूस ही नहीं थे।

लोक-लाज से बेपरवाह

मैंने मन में यह ठाना हुआ था कि जब तक किसी एक आत्मा को ईश्वरीय सन्देश नहीं दूंगी तो खाना नहीं खाऊँगी, इस लगन में मगन मैं किसी-न-किसी को, चाहे गरीब-अमीर, छोटा-बड़ा, नौकर आदि कोई भी हो, ज्ञान अवश्य सुना देती थी, तभी भोजन को छूती थी। कई लोग मुझे पागल कहने लगे थे और कई “दीवानी मीरा” परन्तु मैं किसी भी प्रकार की लोक-लाज से बेपरवाह थी। ससुर को किसी ने मेरी शिकायत कर दी और मुझे रोकने के लिए उकसाया। वे समझदार थे, उन्होंने कहा कि एक ब्रह्माकुमारी एक हज़ार ब्रह्माकुमारियों को तैयार करती है, तुम किस- किस को रोकोगे। बाबा को मैंने पत्र लिखकर एक निमित्त शिक्षिका भेजने की माँग की तो बाबा ने मुझे उमंग दिया कि तुम खुद ही शिक्षिका बनो और कमरा लेकर क्लास शुरू करो। मैंने ऐसा ही किया। बहनों को बुलाती भी थी तो बन्धनों के कारण उन्हें सबके सामने प्रकट नहीं कर पाती थी। एक दिन मैंने स्पष्ट शब्दों में ससुर को लिख दिया कि मैं रोटी और कपड़ों से ज्यादा सत्संग को प्रीत करती हूँ, सत्संग बिना नहीं रहूँगी। उन्होंने कहा कि ऐसी तपस्या तो जंगल में ही हो सकती है। मेरे बहुत आग्रह को देख आखिर उन्हें छुट्टी देनी पड़ी और मैं निर्बन्धन होकर सेवाकेन्द्र पर आ गई। प्यारे बाबा को नयनों और दिल में बसाकर साथ ले आई। जब तक जान रहेगी प्यारे बाबा साथ रहेंगे। बाबा, पढ़ाई और पवित्रता को साथ रखकर चलने से हज़ार- हज़ार विघ्न भी पार होते हैं।

बाबा ने दी शाबाशी

पहली बार जब मैं मधुबन में गयी तो निर्मलशान्ता दीदी जी हमारे साथ में थीं। मुझे प्रथम मिलन में बाबा ने कहा, “ बच्ची, तुम्हें मोह नहीं आयेगा? देखो, मैं अपने बच्चों को कितना मोह करता हूँ,” एक बच्ची के माथे पर हाथ फिराते हुए बाबा ने ये शब्द बोले थे, इस प्रकार मेरी परीक्षा भी ली और मुझे मजबूत भी किया। मैंने कहा, “बाबा, मोह नहीं आयेगा, हम तो आपके बच्चे हैं, हम आपकी सेवा में सारा जीवन बिता देंगे।” तब बाबा ने बहुत ही प्यार से मेरी पीठ ठोक कर कहा, “शाबाश बच्ची, तुम ऐसे ही हँसते-हँसते सेवा करते आगे बढ़ते रहना। बाबा को ऐसी हिम्मतवान बच्चियाँ चाहियें।” बाबा ने तुरन्त निर्मलशान्ता दीदी जी की तरफ देख कर कहा, “सुना बच्ची, इस बच्ची को बाबा के घर में जी भरकर रहने दो, जब तक यह चाहे।” तब मैं तीन मास तक रही मधुबन में और खूब अतीन्द्रिय सुखों का अनुभव किया। इस प्रकार स्थिति और निश्चय मजबूत और अटूट होते गए।

जानीजाननहार बाबा

मधुबन के इस पहले सफर में मेरा एक पर्स रास्ते में गुम हो गया जिसमें पेस्ट, ब्रश, साबुन आदि थे। वहाँ पहुँचकर मैने विचार किया कि बाज़ार से ये सब सामान खरीद कर ले आयेंगे लेकिन बाजार जाने से पहले ही बाबा ने महावाक्यों में उच्चारा कि बच्चे, बाप के घर में आये हो, कोई वस्तु गुम हो गयी हो तो लज्जा ना करना, यहाँ सब मिलेगा, बाहर से खरीदने की जरूरत नहीं, यह तुम्हारा घर है। बाबा की ऐसी बातों का हम बहनों पर गहरा प्रभाव पड़ा। बाबा सचमुच जानीजाननहार हैं! कैसे हम बच्चों को अधिकारी बनाते हैं!

कदम-कदम पर बाबा की सीख

प्यारे बाबा की परखशक्ति ज्ञान-योग में जितनी तीव्र थी, स्थूल कार्यों के प्रति भी उतनी ही अधिक थी। एक बार जब मैं मधुबन में भण्डारे की सेवा पर उपस्थित थी तो सब्जी की छँटाई कर रही थी। अचानक बाबा आए और मुझसे पूछा कि आप क्या कर रही हो? मैंने जब कहा कि कच्चे और पक्के टिंडों को छाँटकर अलग-अलग रख रही हूँ, तो बाबा ने कहा, “बच्ची, आपके कच्चे टिंडों में से पके हुए और पके टिंडों की ढेरी में से कच्चे निकालकर दिखाऊँ?” सचमुच बाबा ने तुरन्त दोनों ढेरियों में से ऐसे-ऐसे टिंडे निकाल दिए। जानीजाननहार परमात्मा पिता और अनुभवी रथ ब्रह्मा बाबा की इस कम्बाइन्ड जोड़ी ने हम बच्चों को कदम-कदम पर क्या-क्या सिखाया, सचमुच वर्णनातीत है! एक बार मेरे मन में आया कि प्यारे बाबा रात को दो या ढाई बजे उठकर क्या करते हैं, कैसे तपस्या करते हैं? इसी प्रश्न का उत्तर जानने के लिए मैं 3 बजे उठकर ज्योंहि बाबा के कमरे की तरफ जाने लगी तो देखा कि सामने से बाबा आ रहे थे, प्यारे बाबा ने तुरन्त पूछा, “बच्ची, तुम बाबा को देखने आ रही थी’, ऐसा कहकर मुझे बहुत-बहुत स्नेह दिया।

कभी मत सोचना, हम गरीब हैं

सर्वप्रथम मैं पटना में दतियाना सेन्टर पर गयी, वहाँ सभी गरीब भाई थे, मकान का भाड़ा नहीं था। जंगल ही था पर हमारे लिए जंगल में मंगल था क्योंकि हम बाबा के प्रेम-पत्रों से सदा उमंग में रहते थे। प्यारे बाबा हमें सप्ताह में एक पत्र अवश्य भेजते थे जिसमें बच्चों को बहुत उमंग-उल्लास देते थे। बाबा सदा लिखते थे, “गरीब निवाज़ के मीठे-प्यारे बच्चो, कहाँ गाँव है, गरीब हैं, मैं हर सप्ताह पत्र से मिलता हूँ। कहाँ शहर है, अमीर हैं, फिर भी बाबा जल्दी-जल्दी पत्र नहीं देते।” यह सुनते ही, पढ़ते ही वहाँ के भाई-बहनों में एक नई उमंग व प्रेरणायें पैदा होती थीं और सेवा में लगे रहते थे। आसपास के करीब 100 गाँवों की सेवा हुई। झोपड़ी में भी सेवार्थ जाकर रहते थे। बाबा को जब समाचार देते थे तो बाबा हमें कितने ही टाइटिल देकर उत्साह बढ़ाते थे, जैसे, मेरे नयनों के नूर बच्चे, पद्मापद्म भाग्यशाली बच्चे। एक बच्चे का नाम जागरूप था। बाबा उन्हें और उमंग देकर कहा करते थे,“बच्चे, तुम सदा जागती ज्योति हो। कभी मत सोचना कि हम गरीब हैं, तुम बाबा के अति समीप के पद्मापद्म भाग्यशाली हो।”

तुम्हारे में बहुत गुण हैं

एक बार मैंने बाबा को सेन्टर पर आये हुए कुछ विघ्नों की बात बताई, तो बाबा ने तुरन्त मुरली में कहा, “बच्ची, क्रोध तो पानी के भरे मटके को भी सुखा देता है।” एक बार मैंने प्यारे बाबा को कहा कि मैं तो निर्गुण हूँ, मुझ में कोई गुण नहीं है, बाबा आपने मुझे कैसे चुन लिया? तब बाबा ने बहुत हिम्मत भरने वाला उत्तर देते हुए कहा, “बच्ची, यह इन्द्रसभा है, यहाँ कोई भी गुणहीन आत्मा प्रवेश नहीं कर सकती। तुम्हारे में बहुत गुण हैं जिनको बाबा जानता है, उन्हीं के आधार से बाबा ने चुनाव किया है। बाबा को तुमसे कार्य कराना है।”

बलिहार जाने वालों की हार नहीं

समर्पण होने के बाद, एक बार मुझे खयाल आया कि लौकिक जीवन की तरफ से पुनः कोई बन्धन मुझे बाँध न ले। जब बाबा को मनःस्थिति बताई तो उन्होंने मुझे पूर्णतया निश्चिंत कर दिया। बाबा ने कहा, “बलिहार जाने वालों की कहीं हार हो नहीं सकती।” अव्यक्त होने से कुछ ही दिन पहले बाबा ने मधुबन के बगीचे में बैठकर मुझे बहुत मार्गदर्शन दिया और कहा कि सेन्टर की जो भी बात हो, पत्र में लिखकर सब समाचार बाबा को दो। तुम सच्चे बाप की सच्ची बच्ची हो। बहुत सौगातें भी दी। मुझे स्थूल तथा सूक्ष्म, दोनों रूपों में भरपूर कर दिया।

मुख्यालय एवं नज़दीकी सेवाकेंद्र

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अनुभवगाथा

Experience with dadi prakashmani ji

आपका प्रकाश तो विश्व के चारों कोनों में फैला हुआ है। बाबा के अव्यक्त होने के पश्चात् 1969 से आपने जिस प्रकार यज्ञ की वृद्धि की, मातृ स्नेह से सबकी पालना की, यज्ञ का प्रशासन जिस कुशलता के साथ संभाला,

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Dadi chandramani ji

आपको बाबा पंजाब की शेर कहते थे, आपकी भावनायें बहुत निश्छल थी। आप सदा गुणग्राही, निर्दोष वृत्ति वाली, सच्चे साफ दिल वाली निर्भय शेरनी थी। आपने पंजाब में सेवाओं की नींव डाली। आपकी पालना से अनेकानेक कुमारियाँ निकली जो पंजाब

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Bk vidhyasagar bhai delhi anubhavgatha

ब्रह्माकुमार विद्यासागर भाई जी, दिल्ली से, अपने प्रथम मिलन का अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि 1964 में माउण्ट आबू में साकार बाबा से मिलना उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। बाबा की गोद में जाते ही उन्होंने

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Dadi brijindra ji

आप बाबा की लौकिक पुत्रवधू थी। आपका लौकिक नाम राधिका था। पहले-पहले जब बाबा को साक्षात्कार हुए, शिवबाबा की प्रवेशता हुई तो वह सब दृश्य आपने अपनी आँखों से देखा। आप बड़ी रमणीकता से आँखों देखे वे सब दृश्य सुनाती

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Mamma anubhavgatha

मम्मा की कितनी महिमा करें, वो तो है ही सरस्वती माँ। मम्मा में सतयुगी संस्कार इमर्ज रूप में देखे। बाबा की मुरली और मम्मा का सितार बजाता हुआ चित्र आप सबने भी देखा है। बाबा के गीत बड़े प्यार से

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Dadi situ ji anubhav gatha

हमारी पालना ब्रह्मा बाबा ने बचपन से ऐसी की जो मैं फलक से कह सकती हूँ कि ऐसी किसी राजकुमारी की भी पालना नहीं हुई होगी। एक बार बाबा ने हमको कहा, आप लोगों को अपने हाथ से नये जूते

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Bk pushpa didi nagpur anubhavgatha

ब्रह्माकुमारी पुष्पा बहन जी, नागपुर, महाराष्ट्र से, अपने अनुभव साझा करती हैं कि 1956 में करनाल में सेवा आरम्भ हुई। बाबा से मिलने के पहले उन्होंने समर्पित सेवा की इच्छा व्यक्त की। देहली में बाबा से मिलने पर बाबा ने

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Bk brijmohan bhai ji anubhavgatha

भारत में प्रथा है कि पहली तनख्वाह लोग अपने गुरु को भेजते हैं। मैंने भी पहली तनख्वाह का ड्राफ्ट बनाकर रजिस्ट्री करवाकर बाबा को भेज दिया। बाबा ने वह ड्राफ्ट वापस भेज दिया और मुझे कहा, किसके कहने से भेजा?

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Dadi gange ji

आपका अलौकिक नाम आत्मइन्द्रा दादी था। यज्ञ स्थापना के समय जब आप ज्ञान में आई तो बहुत कड़े बंधनों का सामना किया। लौकिक वालों ने आपको तालों में बंद रखा लेकिन एक प्रभु प्रीत में सब बंधनों को काटकर आप

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Bk kailash didi gujrati anubhavgatha

गाँधी नगर, गुजरात से कैलाश दीदी ने अपने अनुभव साझा किए हैं कि उनकी जन्मपत्री में लिखा था कि वे 25 वर्ष की आयु में मर जाएँगी। 1962 में बाबा के पास जाने पर बाबा ने कहा कि योगबल से

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