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27 Mar 1983
“बाप समान बेहद की वृत्ति को धारण कर बाप समान बनो”
27 March 1983 · हिंदी
(कुमारियों की भट्ठी में)
आज बापदादा सब बच्चों से कहाँ मिलन मना रहे हैं? किस स्थान पर बैठे हो? सागर और नदियों के मिलन स्थान पर मिलन मना रहे हैं। सागर का कण्ठा पसन्द आता है ना। सिर्फ सागर नहीं लेकिन अनेक नदियों का सागर के साथ मिलन स्थान कितना श्रेष्ठ होगा। सागर को भी नदियों का मिलन कितना प्यारा लगता है। ऐसा मिलन मेला फिर किसी युग में होगा? इस युग का मिलना सारा कल्प भिन्न-भिन्न रूप और रीति से गाया मनाया जायेगा। ऐसा मेला मनाने के लिए आये हो ना, यहाँ वहाँ से इसलिए भागे हो ना। सागर में समाए, समान मास्टर ज्ञान सागर बन जाते हो अर्थात् बाप समान बेहद के स्वरूप में स्थित हो जाते हो। ऐसा बेहद का अनुभव करते हो? बेहद की वृत्ति अर्थात् सर्व आत्माओं के प्रति कल्याण की वृत्ति - मास्टर विश्व कल्याणकारी। सिर्फ अपने वा अपने हद के निमित्त बनी हुई आत्माओं के कल्याण अर्थ नहीं, लेकिन सर्व के कल्याण की वृत्ति हो। मैं तो ब्रह्माकुमारी बन गई, पवित्र आत्मा बन गई - अपनी उन्नति में, अपनी प्राप्ति में, अपने प्रति सन्तुष्टता में राज़ी होकर चल रहे हैं, यह बाप समान बेहद की वृत्ति रखने की स्थिति नहीं है। हद की वृत्ति अर्थात सिर्फ स्वयं प्रति सन्तुष्टता की वृत्ति। क्या यहाँ तक ही सिर्फ रहना है वा आगे बढ़ना है? कई बच्चे बेहद की सेवा का समय, बेहद की प्राप्ति का समय, बाप समान बनने का गोल्डन चान्स वा गोल्डन मैडल लेने के बजाए, मैं ठीक चल रही हूँ, कोई गलती नहीं करती, लौकिक, अलौकिक जीवन दोनों अच्छा निभा रही हूँ, कोई खिट-खिट नहीं, कोई संगठन के संस्कारों का टक्कर नहीं, इसी सिल्वर मैडल में ही खुश हो जाते हैं। बाप समान बेहद की वृत्ति तो नहीं रही ना। बाप विश्व कल्याणकारी और बच्चे - स्व कल्याणकारी, ऐसी जोड़ी अच्छी लगेगी? सुनने में अच्छी नहीं लग रही है और जब बनकर चलते हो तब अच्छी लगती है? सर्व खजानों के मालिक के बालक खजानों के महादानी नहीं बने तो उसको क्या कहा जायेगा? किसी से भी पूछो तो बाप के सर्व खजानों के वर्से के अधिकारी हो? तो सब हाँ कहेंगे ना! खजाना किसलिए मिला है? सिर्फ स्वयं खाओ पियो और अपनी मौज में रहो, इसलिए मिला है? बाँटो और बढ़ाओ, यही डायरेक्शन मिले हैं ना। तो कैसे बाँटेंगे? गीता पाठशाला खोल ली वा जब चांस मिला तब बाँट लिया, इसमें ही सन्तुष्ट हो? बेहद के बाप से बेहद की प्राप्ति और बेहद की सेवा के उमंग-उत्साह में रहना है। कुमारी जीवन संगमयुग में सर्व श्रेष्ठ वरदानी जीवन है। तो ऐसी वरदानी जीवन ड्रामा अनुसार आप विशेष आत्माओं को स्वत: प्राप्त है। ऐसी वरदानी जीवन सर्व को वरदान, महादान देने में लगा रहे हो? स्वत: प्राप्त हुए वरदान की लकीर श्रेष्ठ कर्म की कलम द्वारा जितनी बड़ी खींचने चाहो उतनी खींच सकते हो। यह भी इस समय को वरदान है। समय भी वरदानी, कुमारी जीवन भी वरदानी, बाप भी वरदाता। कार्य भी वरदान देने का है। तो इसका पूरा पूरा लाभ लिया है? 21 जन्मों तक लम्बी लकीर खींचने का चांस, 21 पीढ़ी सदा सम्पन्न बनने का चान्स जो मिला है वह ले लिया? कुमारी जीवन में जितना चाहो कर सकते हो। स्वतंत्र आत्मा का भाग्य प्राप्त है। अपने से पूछो - स्वतन्त्र हो या परतन्त्र हो? परतन्त्रता के बन्धन अपने ही मन के व्यर्थ कमजोर संकल्पों की जाल है। उसी रची हुई जाल में स्वयं को परतन्त्र तो नहीं बना रहो हो? क्वेश्चन की जाल है? जो जाल रचते हो उसका चित्र निकालो तो क्वेश्चन का ही रूप होगा। क्वेश्चन क्या उठते हैं, अनुभवी हो ना। क्या होगा, कैसे होगा, ऐसे तो नहीं होगा, यह है जाल। पहले भी सुनाया था - संगमयुगी ब्राह्मणों का एक ही सदा समर्थ संकल्प है कि - ‘जो होगा वह कल्याणकारी होगा। जो होगा श्रेष्ठ होगा, अच्छे ते अच्छा होगा।' यह संकल्प है जाल को समाप्त करने का। जबकि बुरे दिन, अकल्याण के दिन समाप्त हो गये। संगमयुग का हर दिन बड़ा दिन है, बुरा दिन नहीं। हर दिन आपका उत्सव है ना। हर दिन मनाने का है। इस समर्थ संकल्प से व्यर्थ संकल्पों की जाल को समाप्त करो।
कुमारियाँ तो बापदादा की, ब्राह्मण कुल की शान हैं। फर्स्ट चान्स कुमारियाँ को मिलता है। पाण्डव हँसते हैं कि छोटी-छोटी कुमारियाँ टीचर बन जातीं, दादी बन जातीं, दीदी बन जातीं। तो इतना चान्स मिलता है। फिर भी चान्स न लें तो क्या कहेंगे। क्या बोलती हो, पता है? सहयोगी रहेंगे लेकिन समर्पण नहीं होंगे। जो समर्पण नहीं होंगे वह समान कैसे बनेंगे बाप ने क्या किया? सब कुछ समर्पित किया ना। वा सिर्फ सहयोगी बना? ब्रह्मा बाप ने क्या किया? समर्पण किया वा सिर्फ सहयोगी रहा? जगत अम्बा ने कया किया? वह भी कन्या ही रही ना। तो फालो फादर मदर करना है वा एक दो में सिस्टर्स फालो करते हो। “इसका जीवन, जीवन देखकर मुझे भी यही अच्छा लगता है।'' तो फालो सिस्टर्स हो गया ना! अब क्या करेंगी? डर सिर्फ अपनी कमजोरी से होता है और किसी से नहीं होता। अब क्या लेंगी? गोल्डन मैडल लेंगी वा सिल्वर ही ठीक है। कमजोरियों को नहीं देखो। वह देखेंगी तो डरेंगी। न स्वयं कमजोर बनो, न दूसरों की कमजोरियों को देखो। समझा क्या करना है!
बापदादा को तो कुमारियाँ देख करके खुशी होती है। लोगों के पास कुमारी आती है तो दु:ख होता है। और बापदादा के पास जितनी कुमारियाँ आवें उतना ज्यादा से ज्यादा खुशी मनाते हैं क्योंकि बापदादा जानते हैं कि हर कुमारी विश्व कल्याणकारी, महादानी, वरदानी है। तो समझा कुमारी जीवन का महत्व कितना है। आज विशेष कुमारियों का दिन है ना। भारत में अष्टमी पर कुमारियों को खास बुलाते हैं। तो बापदादा भी अष्टमी मना रहे हैं। हर कन्या अष्ट शक्ति स्वरूप है। अच्छा।
ऐसे सर्व श्रेष्ठ वरदानी जीवन अधिकारी, गोल्डन चांस अधिकारी, 21 पीढ़ी की श्रेष्ठ तकदीर की लकीर खींचने के अधिकारी, स्वतंत्र आत्मा के वरदान अधिकारी, ऐसे शिव वंशी ब्रह्माकुमारियों, श्रेष्ठ कुमारियों को विशेष रूप में और साथ-साथ सर्व मिलन मनाने वाले पद्मापदम भाग्यवान आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
कर्मभोग पर कर्मयोग की विजय:- कर्मभोग पर विजय पाने वाले विजयी रत्न हो ना! वे कर्मभोग भोगने वाले होते और आप कर्मयोगी हो। भोगने वाले नहीं हो लेकिन सदा के लिए भस्म करने वाले हो। ऐसा भस्म करते हो जो 21 जन्म कर्मभोग का नाम निशान न रहे। आयेगा तब तो भस्म करेंगे? आयेगा जरूर लेकिन आता है, भस्म होने के लिए न कि भोगने के लिए। विदाई लेने के लिए आता है। क्योंकि कर्मभोग को भी पता है कि हम अभी ही आ सकते हैं फिर नहीं आ सकते। इसलिए थोड़ा-थोड़ा बीच में चाँस लेता है। जब देखते यहाँ तो दाल गलने वाली नहीं है तो वापस चला जाता। दादी दीदी को देखते हुए:- इतने हैण्ड्स देखकर खुशी हो रही है ना? जो स्वप्न देख रही थी वो साकार हो गया ना। इतने हैण्डस हों, इतने सेन्टर बढ़ें, यह स्वप्न देख रही थी ना क्योंकि हैण्ड्स की दादी दीदी को सबसे ज्यादा आश रहती है। तो इतने सब बने बनाये हैण्ड्स देखकर खुशी होगी ना। भारत की कुमारियों में और विदेश की कुमारियों में भी अन्तर है, इन्हें कमाई की क्या आवश्यकता है! (डिग्री लेनी है) जब तक सेवा में प्रैक्टिस नहीं की है तब तक डिग्री की भी वैल्यु नहीं है। डिग्री की वैल्यु सेवा से है। पढ़ाई पढ़कर कार्य में नहीं लगाया, पढ़ाई के बाद भी गृहस्थी में रहे तो लौकिक में भी कहते हैं, पढ़ाई से क्या लाभ। अनपढ़ भी बच्चे सम्भालते और यह भी सम्भालते तो फ़र्क क्या हुआ। ऐसे ही यह भी पढ़कर अगर स्टेज पर आ जाएं जो डिग्री की वैल्यु भी है। अगर यहाँ चांस मिलता है तो डिग्री आप ही मिल जायेगी। यह डिग्री कम है क्या! जगदम्बा सरस्वती को कितनी बड़ी डिग्री मिली। यहाँ की डिग्री तो वर्णन भी नहीं कर सकते हो। कितनी बड़ी डिग्री मिली है - मास्टर ज्ञान सागर, मास्टर सर्वशक्तिमान कितनी डिगी हैं। इसमें एम.ए., बी.ए. सब आ जाता है। इंजीनियर डॉ. सब आ जायेगा। अच्छा।
कुमारियों के अलग-अलग ग्रुप से बापदादा की मुलाकात
1\. वरदानी कुमारियाँ हो ना! धीरे-धीरे चलने वाली हो या उड़ने वाली हो? उड़ने वाली अर्थात् हद की धरनी को छोड़ने वाली। जब धरनी को छोड़ें तब उड़ेंगी ना! नीचे तो नहीं उड़ेंगी। नीचे वाले को शिकारी पकड़ लेते हैं। नीचे आया पिंजरे में फंसा। उड़ने वाला पिंजरे में नहीं आता। तो पिंजरा छोड़ दिया! अभी क्या करेंगी? नौकरी करेंगी? ताज पहनेंगी या टोकरी उठायेंगी? जहाँ ताज होगा वहाँ टोकरी चलेगी नहीं। ताज उतारेंगी तब टोकरी रख सकेंगी। टोकरी रखेंगी तो ताज गिर जायेगा। तो ताजधारी बनना है या टोकरीधारी। अभी विश्व की सेवा की ज़िम्मेवारी का ताज और भविष्य रत्न जड़ित ताज। अभी विश्व की सेवा का ताज पहनो तो विश्व आपको धन्य आत्मा, महान आत्मा माने। इतना बड़ा ताज पहनने वाले टोकरी क्या उठायेंगे! 63 जन्म तो टोकरी उठाते रहे, अब ताज मिलता है तो ताज पहनना चाहिए ना! क्या समझती हो? दिल नहीं है लेकिन करना पड़ता है! क्या ऐसे सरकमस्टांस हैं? धीरे-धीरे लौकिक को सन्तुष्ट करते अपने को निर्बन्धन कर सकती हो। निर्बन्धन होने का प्लैन बनाओ। बेहद सेवा का लक्ष्य रखो तो हद के बन्धन स्वत: टूट जायेंगे। लक्ष्य दो तरफ का होता है तो लौकिक अलौकिक दोनों में सफल नहीं हो सकते। लक्ष्य क्लियर हो तो लौकिक में भी मदद मिलती है। निमित्त मात्र लौकिक, लेकिन बुद्धि में अलौकिक सेवा हो तो मजबूरी भी मुहब्बत के आगे बदल जाती है।
2\. सभी कुमारियों ने अपनी तकदीर का फैसला कर लिया है या करना है? जितना समय अपने जीवन के फैसले में लगाती हो उतना प्राप्ति का समय चला जाता है। इसलिए फैसला करने में समय नहीं गंवाना चाहिए। सोचा और किया - इसको कहा जाता है नम्बरवन सौदा करने वाले। सेकेण्ड में फैसला करने वाले गोल्डन मैडल लेते हैं। सोच-सोचकर फैसला करने वाले सिल्वर मैडल लेते और सोचकर भी फैसला नहीं कर पाते वह कॉपर वाले हो गये। आप सब तो गोल्डन मैडल वाले हो ना! जब गोल्डन ऐज में जाना है तो गोल्डन मैडल चाहिए ना। राम सीता बनने में कोई हाथ नहीं उठाते। लक्ष्मी नारायण तो गोल्डन एजेड हैं ना। तो सभी ने अपने तकदीर की लकीर ऐसी खींच ली है या कभी-कभी हिम्मत नहीं होती। सदा उमंग-उत्साह में उड़ने वाली, कुछ भी हो लेकिन अपनी हिम्मत नहीं छोड़ना। दूसरे की कमजोरी देखकर स्वयं दिलशिकस्त नहीं होना। पता नहीं हमारा तो ऐसा नहीं होगा! अगर एक कोई खड्डे में गिरता है तो दूसरा क्या करेगा? खुद गिरेगा या उसको बचाने की कोशिश करेगा? इसलिए कभी भी दिलशिकस्त नहीं होना। सदा उमंग उत्साह के पंखों से उड़ते रहना। किसी भी आकर्षण में नहीं आना। शिकारी जब फँसाते हैं तो अच्छा-अच्छा दाना डाल देते हैं। माया भी कभी ऐसे करती है इसलिए सदा उड़ती कला में रहना तो सेफ रहेंगी। पीछे की बात सोचना, कमजोरी की बात सोचना पीछे देखना है, पीछे देखना अर्थात् रावण का आना।
3\. शक्ति सेना हो ना! सबके हाथ में विजय का झण्डा है। विश्व के ऊपर विजय का झण्डा है या सिर्फ स्टेट के ऊपर है? विश्व के अधिकारी बनने वाले विश्व सेवाधारी होंगे। हद के सेवाधारी नहीं। बेहद के सेवाधारी जहाँ भी जायें वहाँ सेवा करेंगे। तो ऐसे बेहद सेवा के लिए तैयार हो? विश्व की शक्तियाँ हो तो स्वयं ही ऑफर करो। 2 मास 6 मास की छुट्टी लेकर ट्रायल करो। एक कदम बढ़ायेंगी तो 10 कदद बढ़ जायेंगे, एक दो मास निकल कर अनुभव करो। जब कोई बढ़िया चीज से दिल लग जाती है तो घटिया स्वत: छूट जाती है। ऐसे ट्रायल करो। संगमयुग आगे बढ़ने का समय है। ब्रह्माकुमारी बन गयी, ज्ञान स्वरूप बन गयी, यह तो बहुत समय हो गया। अब आगे बढ़ो, कुछ तो आगे कदम बढ़ाओ वहाँ ही नहीं ठहरो। कमजोर को नहीं देखो। शक्तियों को देखो, बकरियों को क्यों देखते! बकरियों को देखने से खुद का भी कांध नीचे हो जाता। डर लगता है पता नहीं क्या होगा? कमजोर को देखने से डरते हो इसलिए उन्हें मत देखो। शक्तियों को देखो तो डर निकल जायेगा।
4\. आप सब कुमारियाँ अपने को विशेष आत्मायें समझती हो ना? विशेष आत्मायें अर्थात् विशेष कार्य के निमित्त। एक-एक विशेष कार्य के निमित्त बनी हुई हो। एक-एक कुमारी 21 कुल तारने वाली हैं। जब भी जहाँ भी आर्डर मिले तो हाजिर। ऐसे निर्विघ्न सेवाधारी हो ना! जिस समय जो भी सेवा मिले, हाजिर। सेवा करना अर्थात् प्रत्यक्ष फल खाना। जब प्रत्यक्षफल मिल जाता है, तो फल खाने से शक्ति आती है। प्रत्यक्षफल खाने से आत्मा शक्तिशाली बन जाती है। जब ऐसी प्राप्ति हो तो करनी चाहिए ना। लौकिक में तो एक मास नौकरी करेंगे फिर पीछे तनख्वाह मिलेगी। यहाँ तो प्रत्यक्षफल मिलता है। भविष्य तो जमा ही होता है लेकिन वर्तमान में भी मिलता है। तो ऐसे डबल फल मिलने वाला कार्य तो पहले करना चाहिए ना! कईयों को बापदादा, दादी-दीदी डायरेक्शन देते हैं सर्विस करो, श्रीमत पर करने से जिम्मेवार खुद नहीं रहते। अपने मन के लगाव से, कमजोरी से करते तो श्रेष्ठ नहीं बन सकते। ट्रायल में स्वयं भी सन्तुष्ट रहें और दूसरों को भी करें तो सर्टिफिकेट मिल जाता है। अपने को मिलाकर चलने का लक्ष्य हो। मुझे बदलना है। स्वयं को बदलने की भावना वाला सभी बातों में विजयी हो जाता है। दूसरा बदले यह देखने वाला धोखा खा लेते हैं। इसलिए सदैव मुझे बदलना है, मुझे करना है, पहले हर बात में स्वयं को आगे करना है, अभिमान में नहीं - करने में आगे करो तो सफलता ही सफलता है।
5\. बाप का बनना अर्थात् उड़ती कला के वरदानी बनना। इसी वरदान को जीवन में लाने से कभी भी किसी कदम में भी पीछे नहीं होंगे। आगे ही बढ़ते रहेंगे। सर्वशक्तिमान बाप का साथ है तो हर कदम में आगे हैं। स्वयं भी सदा सम्पन्न और दूसरों को भी सम्पन्न बनाने की सेवा करो। किसी प्रकार की कमी अनुभव न हो। सर्व-प्राप्ति स्वरूप। इसको कहा जाता है सम्पन्न। किसी भी प्रकार की रुकावट अपने कदमों को रुकाने वाली न हो। उड़ती कला वाले किसी के बन्धन में नहीं आ सकते। सर्व बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं।
संगठन में सफलता पाने का साधन ही एक है - स्वयं को बदलना है। दूसरे को बदलने का नहीं सोचना लेकिन स्वयं बदलना है। जो मोल्ड होना जानता है वही रियल गोल्ड बन जाता है। क्या थे और क्या बन गये यह भाग्य देख सदा हर्षित रहो। बाप की बनी अर्थात् महान बनी। अभी अनेक आत्माओं को महान बनाने की सेवा करो।
6\. सेवाधारी आत्मायें चलते फिरते याद और सेवा की लगन में रहती है। सदा बाप के परिचय द्वारा सर्व आत्माओं को बाप के समीप लाने का प्लैन बनाती रहती है। लौकिक काम करते भी यही याद रहता है कि मैं ट्रस्टी हूँ। जिसने ट्रस्टी बनाया वह याद रहेगा ना! बाप और सेवा के सिवाए और कुछ नहीं। लौकिक कार्य निमित्त मात्र। लौकिक कार्य भी बाप की याद से सहज और सफल हो जाता है। जब स्वयं की प्रालब्ध बन जाती है तो दूसरों की प्रालब्ध बनाने के बिना रह नहीं सकते। क्योंकि स्वयं को जब अच्छे ते अच्छी चीज़ का अनुभव होता है तो औरों को प्राप्ति कराने के बिना रह नहीं सकते? ऐसा उमंग सदा रहता है ना! अच्छा!
होली की मुबारक:- सभी रंगों में श्रेष्ठ रंग कौन सा है? बाप के श्रेष्ठ संग का रंग। ऐसा रंग जो सदा ही लाल-बाप, लाल-घर, लाल-बच्चे। ऐसे लाल रंग से सदा रंगे हुए हो? यह रंग तो लगाया है ना! इस लाल रंग के संग का रंग ऐसा लगाया है जो 21 जन्म तक नहीं उतरेगा। चाहे कितना भी भट्ठी में डालो नहीं उतरेगा ना। ऐसी होली मना ली है या मनानी हैं? ऐसा होलीएस्ट बाप होली बच्चों से रूहानी होली मना रहे हैं। ऐसी होली जिससे सदा होली बन जायें। होली मनाना क्या लेकिन होली बन गये। मनाना थोड़े समय का होता, बनना सदाकाल का होता है। वह होली मनाते, आप बनते हो। ऐसी रूहानी होली मनाने वाले सभी होली बच्चों को मुबारक हो। हो गई होली, रंग पड़ गया ना! लाल हो गये ना! बाप के लाल बन गये तो लाल हो गये। अच्छा, ओम् शान्ति।