प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज द्वारा अध्यात्म के द्वारा श्रेष्ठ समाज की स्थापना विषय पर एक भव्य संत महासम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में भारत के चारों दिशाओं से पधारे प्रसिद्ध संतों एवं महामंडलेश्वरों ने अपनी गहन वाणी से समाज को मार्गदर्शन प्रदान किया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ तथा गीत एवं नृत्य प्रस्तुतियों ने वातावरण को आध्यात्मिकता से सराबोर कर दिया।
महामंडलेश्वर आचार्य कमल किशोर जी ने अपने प्रेरक संबोधन में कहा कि आध्यात्मिकता से ही स्वर्णिम भारत का निर्माण संभव है। उन्होंने संत की परिभाषा देते हुए कहा कि संत वह है जो जीवन की किसी भी परिस्थिति — नाम, मान, शान, दुख या सुख — से अप्रभावित रहता है। साथ ही उन्होंने सन्यासी की व्याख्या करते हुए कहा कि सन्यासी वह है जिसे किसी भी वस्तु की चिंता नहीं होती, चाहे उसकी जेब में धन हो या न हो, पर वह सदैव निश्चिंत रहता है।
प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज के अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय माउंट आबू, राजस्थान से धार्मिक प्रभाग के कोऑर्डिनेटर ब्रह्मा कुमार रामनाथ भाई जी ने कहा कि सारी बीमारियों की जड़ हमारा मन है। यदि मन स्वस्थ और शांत है तो हमारे सभी कार्य सफल होते हैं। शांत मन से उत्पन्न शुद्ध विचार हमें परमात्मा से जोड़ते हैं।
इंदौर से जोनल कोऑर्डिनेटर धार्मिक प्रभाग ब्रह्मा कुमार नारायण भाई जी ने कहा कि आध्यात्मिकता हमें हमारी असली पहचान कराती है। स्वयं को बदलने से संसार को बदला जा सकता है। दृष्टिकोण बदलते ही जीवन के दृश्य बदल जाते हैं।
महानदी गीत की सुप्रसिद्ध गायिका प्रज्ञा भारती जी ने कहा कि यह देश महान है यहां के महापुरुषों के कारण। हमारे साधु-संतों की उपस्थिति ने ही भारत को महान बनाया है।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से परमानंद गिरि महाराज जी, बिलासपुर की महापौर पूजा विधानी जी, चित्रकूट से पधारे महाराज पुष्पेंद्र जी, मध्य प्रदेश कटनी से राजयोगिनी लक्ष्मी दीदी जी, राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी भारती दीदी जी, राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी स्वाती दीदी जी, राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी कांता दीदी जी, राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी रमा दीदी जी, राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी छाया दीदी जी तथा सिंधी समाज की राष्ट्रीय अध्यक्ष विनीता भावनानी जी सहित अनेक संत, महंत एवं पुजारीगण उपस्थित रहे।
राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी राखी दीदी जी ने कार्यक्रम का सफल संचालन किया। सभी महानुभावों के प्रेरक विचारों से लाभान्वित हुए लगभग 150 से अधिक श्रोता, जिन्होंने इस अवसर पर आध्यात्मिकता की शक्ति का अनुभव किया।
अंत में, उपस्थित सभी अतिथियों ने एक स्वर में यह संकल्प लिया कि अध्यात्म के माध्यम से श्रेष्ठ समाज की स्थापना हेतु निरंतर प्रयासरत रहेंगे। इस प्रकार यह संत महासम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।































