12 मई को, हम ब्रह्माकुमार जगदीश चंद्र जी, जिन्हें प्यार से जगदीश भाई जी के नाम से जाना जाता है, को उनके 25वें स्मृति दिवस (आरोहण दिवस) पर श्रद्धापूर्वक याद करते हैं। उन्होंने एक ऐसा जीवन जिया जो परमात्मा की व्यक्तिगत खोज से शुरू होकर ज्ञान, लेखन, शिक्षण, संगठन और विश्व सेवा के माध्यम से सेवा का एक माध्यम (इंस्ट्रूमेंट) बनने तक पहुँचा।
उन्होंने संस्था के मुख्य प्रवक्ताओं में से एक के रूप में सेवा की और विभिन्न प्रकार के श्रोताओं के सामने आध्यात्मिक ज्ञान को स्पष्टता और गहराई के साथ प्रस्तुत किया। उन्होंने ब्रह्माकुमारीज़ द्वारा सिखाए गए राजयोग ध्यान, मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक ज्ञान पर हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में 200 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उन्होंने 'ज्ञानामृत', 'द वर्ल्ड रिन्यूअल' और 'प्यूरिटी' जैसी पत्रिकाओं के मुख्य संपादक के रूप में कार्य किया और वे 'इंडियन एडिटर्स गिल्ड' के सदस्य भी थे। उन्होंने 50 देशों की यात्रा की, समाचार पत्रों, रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से आध्यात्मिक संदेश साझा करने में मदद की, और 80 देशों के हजारों सेवाकेंद्रों में सेवा के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
फिर भी, ये विवरण उनके जीवन की कहानी का केवल एक प्रारम्भ हैं।
ये उनकी सेवा की व्यापकता को तो दर्शाते हैं, लेकिन उस आंतरिक यात्रा को नहीं जिसने इसे आकार दिया—गहन चिंतन (मंथन), अनुशासन और ईश्वरीय सेवा के प्रति पूर्ण समर्पण की एक यात्रा। ऐसा जीवन एक पल में नहीं बनता और न ही ऐसी गहराई एक पल में प्रकट होती है।
तो, कैसे वे अपने जीवन के प्रारंभिक बीसवें साल (युवावस्था) में ब्रह्माकुमारीज़ के संपर्क में आए और ईश्वरीय सेवा के इतने महान माध्यम बने? इस यात्रा को समझने के लिए, हमें वहीं वापस जाना होगा जहाँ से यह सब शुरू हुआ था।
परमात्मा की खोज में आकार लेता उनका बचपन
जगदीश भाई, जिन्हें बाद में इसी नाम से जाना गया, का जन्म मुल्तान में 'ऋषि' नामक बालक के रूप में हुआ था। बचपन से ही उनके नाम में उनका स्वभाव झलकता था। उनके अंदर न केवल ईश्वर से मिलने की गहरी तड़प थी, बल्कि आत्मा की जागरूकता में स्थिर होने और “स्व’ का अनुभव करने की भी प्रबल इच्छा थी।
यह कोई साधारण धार्मिक रुचि नहीं थी। उन्होंने बड़ी सहजता से यह निर्णय ले लिया था कि परमात्म-प्राप्ति ही उनके जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। इसलिए, जहाँ कहीं भी सत्संग, धार्मिक सभा या आध्यात्मिक चर्चा होती, वे वहाँ पहुँच जाते। 12 वर्ष की आयु से ही उन्होंने शास्त्रार्थों में भाग लेना शुरू कर दिया था। वे संतों, योगियों और आध्यात्मिक गुरुओं से मिले और भारतीय दर्शन, वैदिक संस्कृति व विभिन्न विश्व धर्मों की शिक्षाओं का अध्ययन किया।
उन्होंने भक्ति मार्ग के कई नियमों का पालन किया—रात 2 बजे उठना, स्नान, पूजा-अर्चना, शास्त्रों का अध्ययन, तीर्थों की यात्रा और दूसरों द्वारा सुझाए गए तरीकों को अपनाना। वे केवल जानकारी नहीं खोज रहे थे; बल्कि वे परमात्मा को अनुभव करने की सच्ची विधि की तलाश में थे।
शायद ही ऐसा कोई प्रमुख शास्त्र शेष रहा हो जिसे उन्होंने पढ़ा न हो, और शायद ही उस समय का कोई महत्वपूर्ण धार्मिक विचारक हो जिससे उन्होंने इस बारे में बात करने की कोशिश न की हो। इन सबके पीछे उनके मन में सदा एक ही सरल और शक्तिशाली प्रश्न था:
मैं वास्तव में परमात्मा से कैसे मिल सकता हूँ?
एक खोज जो असहनीय हो गई
किसी आत्मा की जीवन यात्रा में कुछ ऐसे पल आते हैं जब उनके अंदर की तड़प व खोज इतनी तीव्र हो जाती है कि साधारण जीवन अधूरा लगने लगता है। जगदीश भाई ने अपनी इसी अवस्था का वर्णन करते हुए कहा कि उन्हें ऐसा महसूस होता था जैसे वे एक कमरे के भीतर बंद हैं और वहां से मुक्त होना चाहते हैं। कभी-कभी यह तड़प इतनी बढ़ जाती थी कि वे स्वयं से पूछते, "भगवान मुझे क्यों नहीं मिलते हैं?"
एक समय पर आकर यह आंतरिक खिंचाव इतना प्रबल हो गया कि उन्होंने बिना किसी को बताए घर से दूर हैदराबाद, सिंध और करांची की ओर निकल पड़े, यह सोचकर कि शायद उन्हें वह मिल जाए जिसे वे खोज रहे थे। वे वहाँ तीन-चार दिनों तक रहे।
वहाँ उन्होंने सफेद वस्त्रों में कुछ महिलाओं को देखा, लेकिन बाहरी तौर पर उन्हें कुछ भी स्पष्ट नहीं हुआ। फिर भी, उनके मन को गहराई में कुछ सूक्ष्मता से महसूस हुआ—एक ऐसा अहसास जैसे उनकी तलाश का जवाब यहीं कहीं है, भले ही उस वक्त वे इसे पूरी तरह समझ नहीं पा रहे थे। इसलिए वे घर तो लौट आए, पर उनके मन के सवाल शांत नहीं हुए। बाद में, राजनीति विज्ञान की पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने सिंध की 'ओम मंडली' (जिसे अब ब्रह्माकुमारीज़ कहा जाता है) के बारे में पढ़ा और फिर लोगों से इसके बारे में पूछना शुरू किया।
जीवन का निर्णायक मोड़
वर्ष 1952 में उनकी इस आंतरिक खोज को एक दिशा मिली।
ओखला में अपने शिक्षक प्रशिक्षण (टीचर ट्रेनिंग) के दौरान, उन्होंने थियोसोफिकल सोसाइटी के एक कार्यक्रम में भाग लिया, जहाँ ब्रह्माकुमारी बहनों को भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया था। यद्यपि वे उनकी भाषा पूरी तरह से नहीं समझ पा रहे थे, क्योंकि उसमें सिंधी लहजे का समावेश था, फिर भी शब्दों से परे कुछ ऐसा था जो उनके दिल को छू गया। वहाँ एक सूक्ष्म आध्यात्मिक खिंचाव था—एक ऐसा अहसास जिसे वे समझा नहीं सकते थे, लेकिन अनदेखा भी नहीं कर सकते थे। उनके भीतर कहीं न कहीं यह महसूस हुआ कि उनकी खोज का उत्तर यहाँ मिल सकता है।
भाषण के बाद प्रश्न पूछने की परंपरा थी। जगदीश भाई जी खड़े हुए और उन्होंने पूछा,
"आज आपको व्यावहारिक राजयोग सिखाना था, लेकिन आपने केवल व्याख्यान दिया।"
इसके बाद हॉल को ध्यान (मेडिटेशन) के सत्र के लिए तैयार किया गया। दादी जानकी जी ने राजयोग पर संक्षिप्त स्पष्टीकरण दिया और एक व्यावहारिक योग सत्र कराया। जब वह समाप्त हुआ, तो उन्होंने हाथ उठाया और कहा कि पहली बार उन्होंने पूर्ण एकाग्रता का अनुभव किया है।
इस समय तक उनकी आंतरिक खोज उस चरम बिंदु पर पहुँच चुकी थी जहाँ प्रतीक्षा करना अब संभव नहीं था। इसी मोड़ पर वे ब्रह्माकुमारीज़ सेंटर पहुँचे। यहाँ, राजयोगिनी दादी जानकी जी और राजयोगिनी दादी कुंज जी उन्हें ईश्वरीय ज्ञान में लाने के निमित्त बनीं।
लेकिन दिल्ली में कमला नगर सेंटर की दूरी भी कम नहीं थी। फिर भी जगदीश भाई दूर से—अक्सर साइकिल चलाकर—सिर्फ राजयोग कोर्स करने आते थे। यह उनके लिए कोई पुरुषार्थ नहीं था; यह तो उनकी वर्षों पुरानी खोज और तड़प का उत्तर था।
लेकिन, यहाँ जो हुआ वह केवल धीरे-धीरे ज्ञान को स्वीकार करना मात्र नहीं था। उनकी बुद्धि पहले से ही शास्त्रों, धार्मिक चर्चाओं और विभिन्न आध्यात्मिक मार्गों से बहुत कुछ ग्रहण कर चुकी थी। अब, सहज राजयोग और ईश्वरीय ज्ञान के माध्यम से उन पुरानी समझ को एक स्पष्ट अर्थ मिलने लगा।
उन्हें यह पहचानने में देर नहीं लगी कि ब्रह्मा बाबा के माध्यम से स्वयं परमात्मा ही कार्य कर रहे हैं और इस ज्ञान को प्रकट कर रहे हैं। यह पहचान मिलते ही, उन्होंने अपने प्रोफेसर पद को त्यागकर, अपना पूरा जीवन ईश्वरीय सेवा में समर्पित कर दिया।
यज्ञ के शुरुआती दिन
कमला नगर राजयोग सेवाकेंद्र के शुरुआती दिन बहुत सरल थे और सुविधाएँ बहुत सीमित थीं। फिर भी उस सादगी के भीतर एक गहरी आध्यात्मिक नींव रखी जा रही थी।
उनके सीखने का तरीका बहुत विशिष्ट था। जब तक कोई बात पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो जाती, वे आगे नहीं बढ़ते थे। जो उन्हें सिखाते थे, उन्होंने भी इस बात को स्पष्ट रूप से महसूस किया। दादी कुंज जी बाद में याद करते हुए कहती थीं कि जब वे कोई प्रश्न पूछते थे, तो वे तब तक आगे नहीं बढ़ते थे जब तक कि उत्तर उनकी बुद्धि में पूरी तरह से बैठ न जाए। वे एक ही प्रश्न को अलग-अलग तरीकों से पूछते थे जब तक कि वह उसके मर्म को पूरी तरह समझ न जाएं।
दादी जी एक ऐसी ही घटना को बड़े चाव से याद करती हैं। उन दिनों राजयोग कोर्स शुरू करने से पहले छात्रों से एक फॉर्म भरवाया जाता था। जब आत्मा के परमपिता का नाम लिखने की बात आई, तो वे कुछ क्षण के लिए रुक गए। उन्होंने गहराई से सवाल किया,
यदि आत्मा और परमात्मा दोनों अनादि हैं, तो एक पिता कैसे हो सकता है?
आखिर दादी ने कहा कि आत्मा तो अनादि और अविनाशी है मगर जब पतित बन जाती है तो पावन कौन बनाता है? जो रिज्युनेट करता है, वही उसको रि-बर्थ (मरजीवा जन्म) देता है। बस, उस लाइन पर वह कनविन्स (राज़ी) हो गए।
और ये प्रश्न किसी असंतुष्टता के कारण नहीं थे। न ही यह कोई संदेह था; बल्कि सत्य को पूरी तरह से समझने का एक प्रामाणिक प्रयास था।
पाँचवें दिन जब वे क्लास के लिए आए, तो बहनें एक लेख का उत्तर तैयार करने में व्यस्त थीं, जिसमें संस्था के बारे में कुछ गलतफहमी फैलाई गई थी। ऐसा लगा कि उनका कोर्स स्थगित करना पड़ सकता है। उसी क्षण, उन्होंने प्रस्ताव दिया कि यदि उन्हें ड्राफ्ट दे दिया जाए, तो वे हिंदी में उस उत्तर को बना कर देंगे; और इस तरह उनका कोर्स जारी रह सकता है।
यह एक छोटी सी शुरुआत थी, लेकिन इसने उनकी सेवा के योगदान का आरंभ कर दिया।
अध्ययन और लेखन के साथ-साथ, वे पूरी तरह से 'ओम् मण्डली' के दैनिक जीवन की गतिविधियों में शामिल हो गए। संसाधन सीमित थे, फिर भी वहाँ आध्यात्मिक परिवार के अपनेपन की आत्मीयता थी। वे हर उस तरीके से सेवा करते थे जिसकी आवश्यकता होती थी—सुविधाओं की व्यवस्था करना, दैनिक गतिविधियों में सहयोग देना और जहाँ भी संभव हो मदद करना।

इसके अलावा उन शुरुआती दिनों में, जगदम्बा सरस्वती (मम्मा) और ब्रह्मा बाबा के साथ उनकी निकटता भी गहरी होती गई। उन्हें उनकी प्रत्यक्ष पालना मिली, न केवल संवाद के माध्यम से, बल्कि अवलोकन (ऑब्जर्वेशन) द्वारा भी। उन्होंने देखा कि बाबा कैसे बोलते थे, कैसे सेवा करते थे, सभी को कैसे स्नेह देते थे, कैसे साधारण तरीके से रहते थे और कैसे ज्ञान को व्यावहारिक बनाते थे। ब्रह्मा बाबा के ये संस्कार उनके भीतर गहराई से समा गए।
"संजय" का उदय
जैसे-जैसे वर्ष बीतते गए, जगदीश भाई जी की यज्ञ में भूमिका स्वाभाविक रूप से बहुत गहरी होती गई। उन्होंने अध्ययन, चिंतन और सूक्ष्म अवलोकन के माध्यम से जो कुछ भी ग्रहण किया था, वह अब अभिव्यक्ति का रूप लेने लगा था। ज्ञान को गहराई से समझने और उसे स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने की उनकी क्षमता तेजी से निखरने लगी।
उनके इस गुण को पहचानते हुए, ब्रह्मा बाबा स्नेह से उन्हें "संजय" कहते थे (महाभारत में संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त थी और वे उन घटनाओं का स्पष्ट वर्णन कर सकते थे जिन्हें दूसरे नहीं देख सकते थे), और कहते थे कि उनकी बुद्धि "सात फुट लंबी" है। यह उनके द्वारा निभाई गई भूमिकाओं में स्पष्ट रूप से दिखता था—एक ऐसा व्यक्ति जो गहराई से देख सकता था, ज्ञान का मंथन कर सकता था और दूसरों के लिए उसे स्पष्टता के साथ व्यक्त कर सकता था।
ब्रह्मा बाबा के साथ उनका अटूट संबंध ही हमेशा हर सेवा का केंद्र रहा। उन्होंने जो कुछ भी लिखा, बोला या योजना बनाई, वह उसी संबंध से उपजा था। उनकी बुद्धि न केवल कुशाग्र थी, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि वह ईश्वर के प्रति संपूर्ण रूप से समर्पित थी।

साहित्य के माध्यम से ईश्वरीय संदेश: आध्यात्मिक जागृति का आधार”
उन शुरुआती वर्षों में, जब हिंदी में साहित्य अभी भी सीमित था, एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो ज्ञान को एक लिखित स्वरूप दे सके। जगदीश भाई जी धीरे से इसका माध्यम बन गए।
एक बार उन्होंने एक पुस्तक लिखी। तब ब्रह्मा बाबा ने कहा कि दिल्ली सेवाकेंद्र की बहनें उसे पढ़कर अपने सुझाव दें। एक-एक करके 12 बहनों ने अपने अनुभव के आधार पर पुस्तक की समीक्षा की। हर सुझाव के बाद जगदीश भाई पूरी पुस्तक को फिर से अपने हाथों से लिखते थे। यह काम कई बार हुआ। फिर भी उन्होंने कभी असंतोष नहीं किया और न ही अपनी लिखी हुई बातों से लगाव रखा।
इस प्रक्रिया से बाबा उनके अंदर धैर्य, सरलता, सम्मान और सेवा को सबसे आगे रखने की भावना विकसित कर रहे थे।
बाद में मधुबन में, बाबा ने उनसे वही पुस्तक प्रकाशित करने को कहा जो उन्होंने सबसे पहले लिखा था। ब्रह्मा बाबा ने उन्हें वरदान देते हुए कहा कि अब से उन्हें अपनी पुस्तक के लिए किसी की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है। उनकी यही निरहंकारिता और आज्ञाकारिता उनके लिए एक वरदान बन गई। उस समय से, लिखने से पहले, वे कुछ पलों के लिए परमात्मा को याद करते थे—ताकि परमात्मा उनका मार्गदर्शन कर सकें। यह दर्शाता था कि जगदीश भाई जी की बुद्धि कितनी समर्पित थी।
उन्होंने आध्यात्मिक प्रदर्शनियों के लिए सामग्री तैयार करना, लेख लिखना और शुरुआती प्रकाशनों में योगदान देना शुरू किया। अक्सर, वे पहले हिंदी में लिखते थे, जिसके बाद उसका अनुवाद करके आगे भेजा जाता था। उन्होंने कुंभ मेले के लिए साहित्य तैयार करने में भी मदद की, जो उनके पहले प्रमुख लेखन योगदानों में से एक बना। राजयोग के अपने गहरे अध्ययन और अनुभव के आधार पर, जगदीश भाई ने उन विषयों को समझाने पर कार्य किया जिन्हें अक्सर सूक्ष्म माना जाता था—आत्म-चेतना, परमात्म याद, कर्म दर्शन, पवित्रता, मूल्य, स्व-परिवर्तन और एक नई दुनिया का लक्ष्य। उन्होंने इसे रोजमर्रा के जीवन, सामाजिक मुद्दों, पारिवारिक जीवन, शिक्षा, चरित्र निर्माण और विश्व परिवर्तन से जोड़ा।
इससे उनके लेखन की पहुँच व्यापक हो गई। इसने छात्रों, पेशेवरों, परिवारों और उन लोगों से बात की जो आध्यात्मिकता को समझने का एक व्यावहारिक तरीका खोज रहे थे।
उन्होंने संस्था के लिए साहित्य का एक विशाल भंडार तैयार किया। उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू भाषा में 200 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उन्होंने 'ज्ञानामृत', 'द वर्ल्ड रिन्यूअल' और 'प्यूरिटी' जैसी विभिन्न आध्यात्मिक पत्रिकाओं के मुख्य संपादक के रूप में भी कार्य किया। 'इंडियन एडिटर्स गिल्ड' के साथ उनका जुड़ाव भी लेखन और संपादन के क्षेत्र में उनके योगदान की गंभीरता और विश्वसनीयता को दर्शाता है।
कई लोग जो उनसे व्यक्तिगत रूप से कभी नहीं मिले थे, वे उनकी लेखनी से प्रभावित होकर संस्था के संपर्क में आए।

ज्ञानसुधा : जीवन परिवर्तन की प्रेरणाएँ
ज्ञानसुधा भाग 3 में बी.के. जगदीश भाईजी के जीवन से जुड़े प्रेरणादायक अनुभवों और आध्यात्मिक विचारों का सुंदर संग्रह है। यह पुस्तक आत्मा, परमात्मा और आत्मा-परमात्मा के दिव्य संबंध को सरल रूप में समझाती है तथा जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने की प्रेरणा देती है।
अभी पढ़ेंसेवा का विस्तार: विश्व स्तर पर पहुँच












सेवा का विस्तार: विश्व स्तर पर पहुँच
लेखन के साथ-साथ एक वक्ता के रूप में भी उनकी भूमिका को एक नया आयाम मिलने लगा था।
सेवा में जगदीश भाई का योगदान लिखित पन्नों से (जहाँ उन्होंने पहली बार संस्था के बारे में एक गलतफहमी के उत्तर को परिष्कृत करने में मदद की थी) सार्वजनिक और संगठनात्मक जिम्मेदारी के व्यापक क्षेत्रों तक पहुँच गया।
वे संस्था के प्रमुख वक्ताओं में से एक बन गए। ज्ञान को स्पष्ट रूप से समझाने, प्रश्नों के उत्तर देने और विभिन्न प्रकार के श्रोताओं के साथ जुड़ने की उनकी क्षमता ने उन्हें सार्वजनिक सेवा के लिए एक स्वाभाविक माध्यम बना दिया।
धीरे-धीरे, वे सेवा के नए रूपों की योजना बनाने में भी गहराई से शामिल हो गए। उन्होंने कई सेवा योजनाएँ तैयार कीं और उन्हें व्यवहारिक स्वरूप देने में मदद की। इस योगदान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विभिन्न 'सेवा प्रभागों' (सर्विस विंग) का निर्माण और विकास था, जिसके माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान समाज के विशिष्ट वर्गों तक अधिक संगठित तरीके से पहुँच सके।
संस्था के भीतर उनकी जिम्मेदारियाँ भी बढ़ती गईं।

सेवा प्रति विभिन्न वर्गों की स्थापना
ब्रह्माकुमारीज़ संस्था ने समाज के विभिन्न वर्गों की सेवा के लिए अलग-अलग विंग्स स्थापित की हैं। इन विंग्स के माध्यम से सेमिनार, कार्यशालाएँ, संवाद और सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं, जिनमें राजयोग और आध्यात्मिक ज्ञान को सरल और व्यावहारिक रूप में समझाया जाता है। साथ ही, ये विंग्स लोगों को विचारों के आदान-प्रदान, नैतिक मूल्यों को अपनाने और जीवन की समस्याओं के सकारात्मक समाधान खोजने के लिए एक साझा मंच भी प्रदान करती हैं।
विदेश की सेवा






भारत के सीमाओं के पार परमात्म संदेश ले जाना
जैसे-जैसे संस्था में सेवाओं का विस्तार जारी रहा, जगदीश भाई जी की भूमिका धीरे-धीरे भारत से बाहर भी फैलने लगी।
उन्होंने लगभग 50 देशों की यात्रा की और विभिन्न संस्कृतियों, पृष्ठभूमियों और अलग सोच के तरीकों वाले लोगों के साथ राजयोग का ज्ञान साझा किया। इन यात्राओं का उद्देश्य लोगों से मिलना, उनके संदर्भ को समझना और आध्यात्मिक ज्ञान को इस तरह से प्रस्तुत करना था जिससे वे इससे जुड़ सकें।
इस दौरान, उन्हें लॉर्ड माउंटबेटन, दलाई लामा, पोप, अर्नोल्ड टॉयन्बी और विभिन्न देशों के नेताओं सहित कई प्रसिद्ध वैश्विक हस्तियों से मिलने का अवसर मिला। ये मुलाकातें शांति, मूल्यों और मानव जीवन में आध्यात्मिकता की भूमिका पर दृष्टिकोण साझा करने के लिए एक संवाद थीं। उनके निरंतर प्रयासों के माध्यम से, संस्था संयुक्त राष्ट्र के साथ एक अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन के रूप में भी जुड़ गई।
रूस की रूहानी सेवा






इस चरण के दौरान उनका एक महत्वपूर्ण योगदान रूस जैसे देशों में सेवा की नींव रखने में मदद करना भी था। जो प्रयास शुरुआती तौर पर शुरू हुए थे, वे बाद में निरंतर सेवा में बदल गए, जहाँ हजारों लोग राजयोग सीखने और अभ्यास करने के लिए आए।
इन प्रयासों के माध्यम से, वे भारत और 80 देशों में फैले हज़ारों सेवाकेंद्रों की प्रगति में योगदान देने वाले मुख्य माध्यमों में से एक बन गए (वर्ष 2026 तक, ब्रह्माकुमारी संस्था विश्व के 130 से अधिक देशों में अपनी आध्यात्मिक सेवाएँ प्रदान कर रही है।) चाहे वाणी द्वारा सेवा करनी हो, योजना बनानी हो, यात्रा करना हो या सेवा का मार्गदर्शन करना हो, उनका लक्ष्य एक ही रहा: ईश्वरीय ज्ञान अधिक से अधिक आत्माओं तक पहुँचे।
अंतिम चरण: देह से परे जीवन
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में भी, जगदीश भाई जी की सेवाओं की गति कम नहीं हुई।
जब उनका शरीर अस्वस्थ रहने लगा, तब भी उनकी चेतना (अवेयरनेस) पूरी तरह स्थिर थी। वे अक्सर कहते थे,
“शरीर अस्वस्थ है, लेकिन मैं नहीं।”
और यह बात उन्होंने किसी को प्रभावित करने के लिए नहीं कही थी—बल्कि वे वास्तव में इसी अवस्था में जीवन जी रहे थे।
शारीरिक सीमाओं के बावजूद, वे सेवाओं का मार्गदर्शन करते रहे, योजनाएं बनाने में व्यस्त रहे और निरंतर चल रही गतिविधियों का समर्थन करते रहे। कार्य के साथ उनका जुड़ाव शरीर की स्थिति पर निर्भर नहीं था। उनके जीवन के इस चरण ने चुपचाप उस सार को सिद्ध कर दिया जिसे वे वर्षों से समझा रहे थे—आत्मा और शरीर के बीच का अंतर।
कई लोगों के लिए, आध्यात्मिक समझ केवल विचारों के स्तर पर रहती है। उनके मामले में, यह उनके कार्यों और स्थितियों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया के माध्यम से दिखाई देती थी।
अपनी बीमारी को लेकर न तो कोई प्रतिरोध था, न ही कोई खिंचाव और न ही बोझ का अहसास। वहाँ केवल स्वीकार्यता, स्पष्टता और निरंतरता थी। उन्होंने अपना पूरा जीवन ज्ञान द्वारा अध्ययन करने, समझाने और सेवा करने में बिताया था। इन अंतिम वर्षों में, उस ज्ञान को अनुभव के रूप में देखा जा सकता था।

12 मई 2001: एक जीवन की पूर्णता
12 मई 2001 को जगदीश भाई जी ने अपना भौतिक शरीर त्याग दिया।
लेकिन यह कोई अंत नहीं था, बल्कि केवल एक परिवर्तन था। और जब उनके जीवन के संदर्भ में देखा जाए, तो यह पूर्णता का क्षण भी था।
बचपन में जो खोज शुरू हुई थी, उसे उसका उत्तर मिल गया था।
सालों के मंथन से जो समझ विकसित हुई थी, उसे व्यापक रूप से साझा किया जा चुका था।
एक छोटे से सेंटर से जो सेवा शुरू हुई थी, वह कई देशों तक पहुँच चुकी थी।
उनकी जीवंत विरासत...
आज, उनकी उपस्थिति केवल यादों तक सीमित नहीं है।
यह उनके द्वारा साझा किए गए ज्ञान, उनके द्वारा रचे गए साहित्य और आध्यात्मिक समझ में उनके द्वारा लाई गई स्पष्टता के माध्यम से जारी है। उनके शब्द आज भी मार्गदर्शन करते हैं, और उन्होंने कई शिक्षकों और वक्ताओं को भी आकार दिया और प्रेरित किया है जो इस समझ को आगे बढ़ा रहे हैं।
जगदीश भाई जी को याद करना न केवल उनके कार्यों को पीछे मुड़कर देखना है, बल्कि उस जीवन पर चिंतन करना है जो अंत तक ईश्वरीय सेवा के प्रति चुपचाप पूर्णरूपेण समर्पित रहा।
क्या हो यदि हमारी खोज भी उतनी ही ईमानदार हो जाए, हमारी बुद्धि उतनी ही समर्पित हो जाए, और हमारा जीवन ईश्वरीय सेवा में उतना ही उपयोगी हो जाए?

राजयोगी बी.के. जगदीश भाईजी के प्रेरणादायक जीवन अनुभव
यह पुस्तक ब्रह्माकुमार भ्राता जगदीश चन्द्र जी के अनुभवियों के अनुभवों का संग्रह है, जिन्होंने उनके जीवन को बहुत नज़दीक से देखा, दशकों तक उनके अंग-संग रहकर उनसे सीखा और सेवाक्षेत्र में उनके साथ रहकर प्रेरणायें प्राप्त कीं। जगदीश भाई जी एक विद्वान, तपस्वी राजयोगी थे। एक ही व्यक्ति में अनेक विशेषताओं की झलक दिखाई देती थी, इसलिए इस पुस्तक का नाम “व्यक्ति एक, व्यक्तित्व अनेक” रखा गया है।
अभी पढ़ें





