अंदर के 'मैं' का अहसास और अनुभव (भाग 1)

हम सभी अपना जीवन बहुत तेज़ गति से जीते हैं। एक दृश्य समाप्त होते ही हम अगले दृश्य में प्रवेश कर जाते हैं। फिर पिछले दृश्य को भूल जाते हैं, या कभी उसकी यादों को अगले दृश्य में साथ ले जाते हैं। लेकिन क्या हमने कभी रुककर स्वयं से पूछा है कि हमारी असली पहचान क्या है? क्या वह हमारा प्रोफेशन, हमारा रोल, हमारा रंग रूप, हमारे कपड़े, हमारा जेंडर, देश या जाति है? जब हम 'आत्म-परिचय' शब्द सुनते हैं, तो दो बातें सामने आती हैं—एक 'मैं' और दूसरी 'पहचान'। प्रश्न यह है कि मैं, आत्मा, किससे अपनी पहचान जोड़ रहा हूँ? अक्सर हम अपनी पहचान उन चीज़ों से जोड़ लेते हैं जो वास्तव में हम नहीं हैं—वे केवल बाहरी रूप हैं, असली स्वरूप नहीं। हमारी शिक्षा, व्यक्तित्व और शारीरिक रूप सब अर्जित किए हुए हैं।
लेकिन जो मैं वास्तव में हूँ, वह इन सबके पहले भी था। अपनी पढ़ाई से पहले और शरीर की बनावट से पहले भी था।
इसलिए आज से हमें स्वयं को यह सिखाना चाहिए कि हम अपने आपको आध्यात्मिकता के दर्पण में देखें और सच्चे 'मैं' को पहचानें। यही वह 'मैं' है जो आँखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन यही हमारा वास्तविक केंद्र है, जिसे हम बीइंग कहते हैं। जैसे नारियल का मुलायम अंदरूनी भाग हमें पोषण देता है, वैसे ही हमारा आंतरिक स्वरूप हमें शक्ति देता है, जबकि बाहरी कठोर आवरण उतना महत्वपूर्ण नहीं होता।
जो लोग अपने दिन की शुरुआत केवल भौतिक दर्पण में स्वयं को देखकर करते हैं, उन्हें अपनी बाहरी विशेषताएँ ही याद आती हैं। परिणामस्वरूप वे भूल जाते हैं कि बाहरी रूप के पीछे एक आंतरिक चेहरा भी है, जिसे हर दिन साफ़, सुंदर और शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता है। वास्तव में यही वह हिस्सा है जो हर दिन मिलने वाले लोगों के हृदय से जुड़ता है। यही आंतरिक व्यक्तित्व लोगों पर तब स्थायी प्रभाव छोड़ता है, जब कपड़ों और रूप का प्रभाव समाप्त हो जाता है। आखिर मुस्कान, शर्ट से अधिक मूल्यवान है। सुंदर सूट का क्या लाभ, यदि उसे पहनने वाला व्यक्ति अहंकारी और ईर्ष्यालु हो? आत्मा की सच्चाई में जीने से ही हम दूसरों के प्रति प्रेम, करुणा और सम्मान से भरपूर व्यवहार कर पाते हैं, और स्वयं भी संतुष्ट व शांत रहते हैं।
(कल जारी रहेगा…)
आज का अभ्यास
आज स्वयं को केवल शरीर नहीं, एक शांत और शक्तिशाली आत्मा समझने का अभ्यास करें। यही सच्ची पहचान जीवन में स्थायी संतोष लाती है
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