क्रोध को पहचानें और उससे जुड़ी गलत मान्यताओं को चुनौती दें

क्रोध को पहचानें और उससे जुड़ी गलत मान्यताओं को चुनौती दें

हम सभी कभी न कभी ऐसी स्थिति में रह चुके हैं, जब किसी ने बिना हमारी गलती के हम पर गुस्सा किया हो, या फिर हमने भी किसी पर बिना उसकी गलती के गुस्सा कर दिया हो। पृथ्वी पर सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते हमें जीवन के हर पहलू पर नियंत्रण रखना अच्छा लगता है। हम तो यह भी चाहते हैं कि दुनिया हमारी सोच के अनुसार चले। लेकिन जब परिस्थितियाँ हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होतीं, तो हम अक्सर क्रोध की भावना पैदा कर लेते हैं। हम मानते हैं कि हम तो स्वभाव से शांत हैं, लेकिन परेशान करने वाले लोग या नकारात्मक परिस्थितियाँ हमें गुस्सा दिला देती हैं। ज़रा जाँचिए, क्या आप भी क्रोध के बारे में इन गलत मान्यताओं में से किसी पर विश्वास करते हैं?

  • दूसरे लोग और परिस्थितियाँ मेरे गुस्से का कारण हैं।
  • गुस्सा करना एक सामान्य मानवीय प्रतिक्रिया है।
  • गुस्सा अपने-आप आ जाता है।
  • थोड़ा-सा गुस्सा नुकसान नहीं करता, बल्कि उससे ऊर्जा मिलती है।
  • सही तरीके से और समय पर कार्य करवाने के लिए गुस्सा करना ज़रूरी है।
  • कुछ परिस्थितियों में गुस्सा करना उचित है।

हम गुस्सा होने के अलग-अलग कारण बताते हैं—अपनी अपेक्षाएँ पूरी न होना, लोगों का हमारे अनुसार व्यवहार न करना, किसी का गलती करना, परिस्थितियों का प्रतिकूल होना या थकान महसूस होना। और यदि इनमें से कोई कारण न मिले, तो हम अपने छोटे स्वभाव के लिए ग्रह-नक्षत्रों, कुंडली या अपने जीन्स को ज़िम्मेदार ठहरा देते हैं। फिर भी हमें यही लगता है कि हमारे गुस्से का कारण हमेशा बाहर है। लेकिन यह सच नहीं है।

क्रोध हमारा अपना चुनाव है और हमारी आंतरिक रचना है। यह आत्म-नियंत्रण की कमी, धैर्य की कमी और किसी परिस्थिति के प्रति सही ढंग से सोचने की जागरूकता के अभाव का परिणाम है। क्रोध सबसे पहले हमारे मन में विषैले और अशांत विचारों के रूप में शुरू होता है। जब हम इन विचारों पर नियंत्रण नहीं रखते, तो यही अशांत ऊर्जा अधीरता पैदा करती है। जब गलत विचार और बढ़ते जाते हैं, तो वे झुंझलाहट का रूप ले लेते हैं। अगला चरण निराशा का होता है। यदि इस समय भी हम अपने विचार नहीं बदलते, तो यही कड़वी भावनाएँ क्रोध में बदल जाती हैं। और जब क्रोध अपनी चरम अभिव्यक्ति पर पहुँचता है, तो वह उग्र क्रोध (रौद्र रूप) बन जाता है। ध्यान दीजिए कि हर अगला चरण पहले से अधिक असहज और पीड़ादायक होता जाता है। जब हम क्रोध और उससे पैदा होने वाली नकारात्मकता को पहचानते हैं और उससे जुड़ी गलत मान्यताओं को चुनौती देते हैं, तब हम पहले अपने मन पर और फिर अपने व्यवहार और कर्म पर नियंत्रण पाना शुरू कर देते हैं।

मुख्य सीख

आज जब कोई परिस्थिति हमारी इच्छा के अनुसार न हो, तो अपनी पहली प्रतिक्रिया को जाँचें। दूसरों को क्रोध का कारण मानने के बजाय अपने विचारों को समझें और आत्म-नियंत्रण का अभ्यास करें।

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