विज्ञान ने चमत्कार कर दिखाए, लेकिन अगर हमारी सोच सही दिशा में न हो, तो यही विज्ञान विनाश ला सकता है। आज ज़रूरत है ऐसी शिक्षा की जो वैज्ञानिक सोच को नैतिकता से जोड़ दे। माउंट आबू यही संतुलन सिखाता है – रचनात्मक सोच, सकारात्मक दृष्टिकोण और बेहतर इंसान बनना।
जिस विज्ञान और टैक्नॉलॉजी ने इतनी प्रगति की है अभी श्री प्रेमचंद आप उसका वर्णन कर रहे थे मैं उसको दोहराना नहीं चाहता कि आज़ टेलीग्राम का जमाना नहीं है टेलीफोन का जमाना है हम कुछ ही दिनों में विश्व की परिक्रमा कर सकते हैं कि हमने स्मॉलपॉक्स को जीत लिया है टीबी पर विजय प्राप्त की अब मनुष्य की भी आयु बढ़ गई है जो मनुष्य ने चंद्रमा पर अपने चरण चिह्न अंकित कर दिए है लेकिन मनुष्य चंद्रमा तक पहुंच गया है इस धरती पर उसको किस तरह से जिंदा रहना चाहिए यह नहीं सीख पाया है ।
हम पक्षी की तरह आकाश में उड़ सकते हैं हम मछली की तरह से सागर में तैर सकते हैं मगर हम इंसान की तरह से धरती पर नहीं चल सकते जिंदा नहीं रह सकते यह शिक्षा कहाँ मिलेगी यह संस्कार कहाँ प्राप्त होंगे विज्ञान अगर जीवन को सुखमय बना सकता है तो विज्ञान एटम बम का निर्माण भी कर सकता है और अगर वह एटम बम गलत राजनीतिक नेता के हाथ में पड़ जाएगा तो विनाश भी कर सकता है और आज तो संसार बारूद के ढ़ेर पर ही बैठा है ।
कभी कभी मैं सोचता हूं कि हम अच्छी दुनिया की कल्पना करें बेटर वर्ल्ड (Better World) कि ये चिंता करें यह दुनिया बचेगी कि नही बचेगी।
एटॉमिक लड़ाई साधारण लड़ाई नहीं होगी उसमें हारने वाला तो हारेगा ही जीतने वाला भी बर्बाद हो जाएगा है प्रश्न ये है विज्ञान का उपयोग कैसा होता है कि आग से खाना भी पकाया जा सकता है आग से घर को भी जलाया जा सकता है | अब हमारी बुद्धि निर्माण की बुद्धि हो विनाश की नहीं और यह थीम भी आज़ की यही है
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(Our Approach should be creative, positive not destructive and negative)
मगर यह सीख कहां से मिलेगी यह शिक्षा कहां से मिलेगी, इसके लिए माउंट आबू आना पड़ेगा।
– स्व.श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी
पूर्व प्रधानमंत्री