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12 Mar 1972
“सफलता का आधार - संग्रह और संग्राम करने की शक्ति”
12 March 1972 · हिंदी
अपने को सदा सफलता मूर्त समझते हो? वा सहज ही सफलता प्राप्त होते हुए अनुभव करते हो? सदा और सहज ही सफलता मूर्त बनने के लिये मुख्य दो शक्तियों की आवश्यकता है। जिन दो शक्तियों के आधार से सदा और सहज ही सफलता मूर्त बन सकते हैं, वह दो शक्तियाँ कौनसी हैं? निश्चयबुद्धि तो हो ही चुके हो ना। अब सफलता के पुरुषार्थ में मुख्य कौन सी शक्तियाँ चाहिए? एक संग्राम करने की शक्ति, दूसरी संग्रह करने की शक्ति। संग्रह में लोक संग्रह भी आ जाता है। सभी प्रकार का संग्रह। तो एक संग्राम, दूसरा संग्रह - यह दोनों शक्तियाँ हैं तो असफल हो न सके। कोई भी कार्य में वा अपने पुरुषार्थ में असफलता का कारण क्या होता है? या तो संग्रह करना नहीं आता या संग्राम करना नहीं आता। अगर यह दोनों शक्तियाँ आ जायें तो सदा और सहज ही सफलता मिलेगी। इसलिए इन दोनों शक्तियों को अपने में भरने का पुरुषार्थ करना चाहिए। कोई भी कार्य सामने आता है तो कार्य करने के पहले अपने आप को चेक करो कि दोनों शक्तियाँ स्मृति में हैं? भले शक्तियां हैं भी लेकिन कर्तव्य के समय शक्तियों को यूज़ नहीं करते हो, इसलिये सफलता नहीं होती। करने के बाद सोचते हो - ऐसे करते थे तो यह होता था। इसका कारण क्या है? समय पर शक्ति यूज़ करने नहीं आती है। शस्त्र कितने भी अच्छे हों, शक्तियाँ कितनी भी हों, लेकिन जिस समय जो शस्त्र वा शक्ति कार्य में लानी चाहिए, वह कार्य में नहीं लाते तो सफलता नहीं होती। इस कारण कोई भी कार्य शुरू करने के पहले अपने को चेक करो। जैसे फोटो निकालते हो, फोटो निकलने से पहले तैयारी होती है ना। फोटो निकला और सदा का यादगार बना। चाहे कैसा भी हो। इसी रीति यह भी बेहद का कैमरा है, जिसमें एक एक सेकेण्ड के फोटो निकलते रहते हैं। फोटो निकल जाने बाद अगर अपने आपको ठीक करे तो वह व्यर्थ है ना। इसी प्रमाण पहले अपने आपको शक्ति स्वरूप की स्टेज पर स्थित करने के बाद कोई कार्य शुरू करना है। स्टेज से उतरकर अगर कोई एक्ट करे, भले कितनी भी बढ़िया एक्ट करे लेकिन देखने वाले कैसे देखेंगे? यह भी ऐसे होता है। पहले स्टेज पर स्थित हो, फिर हर एक्ट करे तब एक्यूरेट और ‘वाह-वाह करने योग्य' एक्ट हो सकेगी। स्टेज से उतरकर साधारण रीति कर्तव्य करने शुरू कर देते हैं, पीछे सोचते हैं। परन्तु वह स्टेज तो रही नहीं ना। समय बीत गया। फोटो तो निकल गया। इसलिये यह दोनों ही शक्तियां सदैव हर कार्य में होनी चाहिए। कभी संग्राम करने का जोश आता है, संग्रह भूल जाते हैं। कभी संग्रह करने का सोचते हैं तो फिर संग्राम भूल जाते हैं। दोनों ही साथ-साथ हों। सर्व शक्तियों के प्रयोग से रिजल्ट क्या होगी? सफलता। उनका संकल्प, कहना, करना तीनों ही एक होगा। इसको कहा जाता है मास्टर सर्व शक्तिमान। ऐसे नहीं, संकल्प बहुत ऊंच हो, प्लैन्स बनाते रहें, मुख से वर्णन भी करते रहें, लेकिन करने समय कर न पायें तो मास्टर सर्व शक्तिमान हुआ? मास्टर सर्व शक्तिमान का मुख्य लक्षण ही है उनका संकल्प, कहना और करना तीनों एक होगा। अभी समय प्रति समय यह शब्द निकलते हैं - सोचा तो था लेकिन कर नहीं पाया। प्लैन और प्रैक्टिकल में अन्तर दिखाई देता है। लेकिन मास्टर सर्व शक्तिमान वा सदा सफलता मूर्त जो होगा, उनका जो प्लैन होगा वही प्रैक्टिकल होगा। सफलता मूर्त होना तो सभी चाहते हैं ना। जब चाहना वा लक्ष्य श्रेष्ठ है तो लक्ष्य के साथ वाणी और कर्म भी श्रेष्ठ हो। लेकिन प्रैक्टिकल आने में कोई भी कमजोरी होने कारण जो प्लैन है वैसा रूप दे नहीं सकते। क्योंकि संग्राम करने की वा उन बातों में लोक संग्रह रखने की शक्ति कम हो जाती है। जैसे पहले युद्ध के मैदान में जब सामने दुश्मन आता था तो एक हाथ में तलवार भी पकड़ते थे, साथ-साथ दूसरे हाथ में ढाल भी होती थी। तो तलवार और ढाल दोनों अपना-अपना कार्य करे, यह प्रैक्टिस चाहिए। दोनों ही साथ-साथ यूज़ करने का अभ्यास चाहिए।
अपने को मास्टर समझते हो? तो सभी बातों में मास्टर हो? जैसे बाप का नाम त्रिमूर्ति शिव बताते हो ना, वैसे ही आप सभी भी मास्टर त्रिमूर्ति शिव हो ना। आपके भी तीन कर्तव्य है ना, जिसके आधार पर सारा कर्तव्य वा सर्विस करते हो। आपके तीन रूप कौनसे हैं? एक है ब्राह्मण रूप, जिससे स्थापना का कार्य करते हो। और दूसरा शक्ति रूप, जिससे विनाश का कर्तव्य करते हो और जगत माता वा ज्ञान गंगा वा अपने को महादानी, वरदानी रूप समझने से पालना करते हो। वरदानी रूप में जगत पिता का रूप आ ही जाता है। तो यह तीनों रूप सदैव स्मृति में रहे, तो आपके कर्तव्य में भी वही गुण दिखाई देंगे। जैसे बाप को अपने तीनों रूपों की स्मृति रहती है, ऐसे चलते-फिरते अपने तीनों रूप की स्मृति रहे कि हम मास्टर त्रिमूर्ति हैं। तीनों कर्तव्य इकट्ठे साथ-साथ चाहिए। ऐसे नहीं - स्थापना के कर्तव्य करने का समय अलग है, विनाश के कर्तव्य का समय और आना है। नहीं। नई रचना रचते जाओ, और पुराने का विनाश करते जाओ। आसुरी संस्कार वा जो भी कमजोरियाँ हैं, उनका विनाश भी साथ-साथ करते जाना है। नये संस्कार ला रहे हैं, पुराने संस्कार खत्म कर रहे हैं। कइयों में रचना रचने का गुण होता है लेकिन शक्ति रूप, विनाश कार्य रूप न होने कारण सफलता नहीं हो पाती। इसलिये दोनों साथ-साथ चाहिए। यह प्रैक्टिस तब हो सकेगी जब एक सेकेण्ड में देही अभिमानी बनने का अभ्यास होगा। ऐसे अभ्यासी सब कार्य में सफल होते हैं। अपने महादानी वा वरदानी, जगत माता वा जगत पिता वा पतित-पावनी के रूप में स्थित होकर किसी भी आत्मा को अगर आप दृष्टि देंगी तो दृष्टि से भी उनको वरदान की प्राप्ति करा सकते हो। वृत्ति से भी प्राप्ति करा सकते हो अर्थात् पालना करा सकते हो। लेकिन इस रूप की सदा स्मृति रहे। ब्राह्मण कथा वा ज्ञान सुना कर स्थापना तो बहुत जल्दी कर लेते हो। लेकिन विनाश और पालना का जो कर्तव्य है उसमें और अटेन्शन चाहिए। पालना करने के समय कल्याणकारी भावना वा वृत्ति रखकर कोई भी आत्मा की पालना करो तो कैसी भी अपकारी आत्मा पर अपनी पालना से उनको उपकारी बना सकते हो। कैसी भी पतित आत्मा, पतित-पावन की वृत्ति से पावन हो सकते हैं। अगर उनका पतित-पना देखेंगे तो नहीं हो सकेगा। जैसे माँ कब बच्चे की कमजोरियों को वा कमियों को नहीं देखती है। उनको ठीक करने का ही रहता है। तो यह पालना करने का कर्तव्य इस रूप में सदा स्थित रहने से यथार्थ चल सकता है। जैसे माँ में दो विशेष शक्तियाँ - सहन करने की और समाने की होती हैं, वैसे ही हर आत्मा की पालना करने के समय भी यह दोनों शक्तियाँ यूज़ करे तो सफलता जरूर हो। लेकिन अपने को जगत माता वा जगत पिता के रूप में स्थित रह करेंगे तो। अगर भाई-बहन का रूप देखेंगे तो उसमें संकल्प आ सकता है। लेकिन माँ-बाप के समान समझो। माँ-बाप बच्चे का कितना सहन करते हैं, अन्दर समाते हैं तब उनकी पालना कर उसको योग्य बना सकते हैं। तो सदैव हर कर्तव्य करते समय अपने यह तीनों रूप भी स्मृति में रखने चाहिए। जैसी स्मृति, वैसा स्वरूप और जैसा स्वरूप वैसी सफलता। तीनों रूप की स्मृति से स्वत: ही समर्थी आ जाती है। यह भी पोजीशन है ना। तो पोजीशन में ठहरने से शक्ति वा समर्थी आ जाती है। बाप का नाम याद आये तो अपने को मास्टर जरूर समझो। नाम तो सभी को याद कराते हो। कितनी बार बाप का नाम मन से वा मुख से उच्चारण करते होंगे। तो बाप के नाम जैसा मैं भी मास्टर त्रिमूर्ति शिव हूँ - यह स्मृति में रहे तो सफलता होगी। तो सदा सफलता मूर्त बनो। अभी असफलता पाने का समय नहीं। अगर 10 बार सफलता हुई, एक बार भी असफल हुए तो उसको असफलता कहेंगे।
तो कर्तव्य और स्वरूप दोनों साथ-साथ स्मृति में रहें तो फिर कमाल हो। नहीं तो होता क्या है - मेहनत जास्ती हो जाती है, प्राप्ति बहुत कम होती है। और प्राप्ति कम होने के कारण ही कमजोरी आती है, उत्साह कम होता है, हिम्मत-उल्लास कम हो जाता है। कारण अपना ही है। अपने पाँव पर स्वयं कटारी चलाते हैं। इसलिए जबकि अपने आप जिम्मेवार हैं तो सदैव अटेन्शन रहना चाहिए। तो आज से बीती को बीती करके, स्मृति से अपने में समर्थी लाकर सदा सफलता मूर्त बनो। फिर जो यह अन्तर होता है - आज उमंग-उल्लास बहुत है, कल फिर कम हो जाता है, यह अन्तर भी खत्म हो जायेगा। सदा उमंग-उल्लास और सदा अपने में प्राप्ति का अनुभव करेंगे। माया को, प्रकृति को दासी बनाना है। सतयुग में प्रकृति को दासी बनाते हैं तो उदासी नहीं आती है। उदासी का कारण है प्रकृति का, माया का दास बनना। अगर उनके दास बने ही नहीं तो उदासी आ सकती है? तो कभी भी माया के दास वा दासी नहीं बनना। यहाँ जास्ती माया वा प्रकृति का दास बनेंगे तो उनको वहाँ भी दास-दासी बनना पड़ेगा। क्योंकि संस्कार ही दास-दासी का हो गया। यहाँ दास भी रहा, उदास भी रहा और वहाँ भी दास बनना - फायदा क्या! इसलिये चेक करना है - उदासी आई तो जरूर कहाँ माया का दास बना हूँ। बिगर दास बने उदास नहीं हो सकते। तो पहले चाहिए परख, फिर परिवर्तन की भी शक्ति चाहिए। तो कभी भी असफलता मूर्त नहीं बनना। वह बनेंगे आपके पिछली प्रजा और भक्त। अगर विश्व के राज्य चलाने वाले भी असफल रहे तो सफलता मूर्त बाकी कौन बनेंगे। अच्छा!
दिन-प्रतिदिन अपने में परिवर्तन लाना है। कोई के भी स्वभाव, संस्कार देखते हुए, जानते हुए उस तरफ बुद्धि योग न जाये। और ही उस आत्मा के प्रति शुभ भावना हो। एक तरफ से सुना, दूसरे तरफ से निकाल दिया। उसको बुद्धि में स्थान नहीं देना है। तब ही एक तरफ बुद्धि स्थित हो सकती है। कमजोर आत्मा की कमजोरी को न देखो। यह स्मृति में रहे कि वैराइटी आत्माएं हैं। आत्मिक दृष्टि रहे। आत्मा के रूप में उनको स्मृति में लाने से पॉवर दे सकेंगे। आत्मा बोल रही है, आत्मा के यह संस्कार हैं - यह पाठ पक्का करना है। ‘आत्मा' शब्द स्मृति में आने से ही रुहानियत, शुभ भावना आ जाती है, पवित्र दृष्टि हो जाती है। चाहे भले कोई गाली भी दे रहा है लेकिन यह स्मृति रहे कि यह आत्मा तमोगुणी पार्ट बजा रही है। अपने आप का स्वयं टीचर बन ऐसी प्रैक्टिस करनी है। यह पाठ पक्का करने लिये दूसरों से मदद नहीं मिल सकती। अपने पुरुषार्थ की ही मदद है। अच्छा!