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4 Mar 1972
“अधिकारी बनने के लिए अधीनता छोड़ो”
4 March 1972 · हिंदी
आज विशेष किसके लिए आये हैं, जानती हो? भविष्य में विशेषता दिखलाने वाली विशेष आत्माओं के प्रति। अपने को विशेष आत्मायें अर्थात् विशेषता दिखलाने वाली समझती हो? ऐसा विशेष कौन सा कार्य करके दिखायेंगी जो अब तक कोई ग्रुप ने न करके दिखाया हो? इसका कोई प्लैन सोचा है? ‘पास विद् ऑनर' बनने का लक्ष्य और बाप का शो दिखलाने का लक्ष्य तो सभी का ही है लेकिन आप लोग विशेष क्या नवीनता दिखायेंगी? नवीनता वा विशेषता यही दिखाना वा दिखाने का निश्चय करना कि कोई भी विघ्न में वा कोई भी कार्य में मेहनत न लेकर और ही अन्य आत्माओं को भी निर्विघ्न और हर कार्य में मददगार बनाते सहज ही सफलता-मूर्त बनेंगे और बनायेंगे। अर्थात् सदा सहजयोग, सदा बाप के स्नेही, बाप के कार्य में सहयोगी, सदा सर्व शक्तियों को धारण करते हुए श्रृंगार-मूर्त, शस्त्रधारी शक्ति बन अपने चित्र से, चलन से बाप के चरित्र और कर्तव्य को प्रत्यक्ष करेंगे। ऐसी प्रतिज्ञा अपने से की है? छोटी-छोटी बातों में मेहनत तो नहीं लेंगे? किसी भी माया के आकर्षित रूप में धोखा तो नहीं खायेंगे? जो स्वयं धोखा खा लेते हैं वह औरों को धोखे से छुड़ा नहीं पाते। सदैव यही स्मृति रखो कि हम दु:ख हर्ता, सुख कर्ता के बच्चे हैं। किसके भी दु:ख को हल्का करने वाले स्वयं कब भी, एक सेकेण्ड के लिए भी, संकल्प वा स्वप्न में भी दु:ख की लहर में नहीं आ सकते हैं। अगर संकल्प में भी दु:ख की लहर आती है तो सुख के सागर बाप की सन्तान कैसे कहला सकते हैं? क्या बाप की महिमा में यह कब वर्णन करते हो कि सुख का सागर हो लेकिन कब-कब दु:ख की लहर भी आ जाती है? तो बाप समान बनना है ना। दु:ख की लहर आती है अर्थात् कहाँ न कहाँ माया ने धोखा दिया। तो ऐसी प्रतिज्ञा करनी है।
शक्ति रूप नहीं हो? शक्ति कैसे मिलेगी? अगर सदा बुद्धि का सम्बन्ध एक ही बाप से लगा हुआ है तो सम्बन्ध से सर्व शक्तियों का वर्सा अधिकार के रूप में अवश्य प्राप्त होता है लेकिन अधिकारी समझकर हर कर्म करते रहें तो कहने वा संकल्प में मांगने की इच्छा नहीं रहेगी। अधिकार प्राप्त न होने कारण, कहाँ न कहाँ, किसी प्रकार की अधीनता है। अधीनता होने के कारण अधिकार प्राप्त नहीं होता है। चाहे अपने देह के भान की अधीनता हो, चाहे पुराने संस्कारों के अधीन हो, चाहे कोई भी गुणों की धारणा की कमी के कारण निर्बलता वा कमजोरी के अधीन हो, इसलिए अधिकार का अनुभव नहीं कर पाते। तो सदैव यह समझो कि हम अधीन नहीं, अधिकारी हैं। पुराने संस्कारों पर माया के ऊपर विजय पाने के अधिकारी हैं। अपने देह के भान वा देह के सम्बन्ध वा सम्पर्क जो भी हैं उनके ऊपर विजय पाने के अधिकारी हैं। अगर यह अधिकारीपन सदैव स्मृति में रहे तो स्वत: ही सर्व शक्तियों का, प्राप्ति का अनुभव होता रहेगा। अधिकारीपन भूल जाता है? जो अधीन होता है वह सदैव मांगता रहता है, अधिकारी जो होता है वह सदैव सर्व प्राप्ति स्वरूप रहता है। बाप के पास सर्व शक्तियों का खजाना किसके लिए है? तो जो जिन्हों की चीज है वह प्राप्त न करें तो क्या कहेंगे! यही नशा सदैव रहे कि सर्व शक्तियां तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हैं। तो अधिकारी बनकर के चलो। ऐसा सदैव बुद्धि में श्रेष्ठ संकल्प रहना चाहिए। अगर संकल्प श्रेष्ठ है तो वचन और कर्म में भी नहीं आ सकते। इसलिए संकल्प को श्रेष्ठ बनाओ और सदैव सर्वशक्तिमान बाप के साथ बुद्धि का संग हो। ऐसे सदैव संग के रंग में रंगे हुए हो? अनुभव करते हो वा अभी जाने के बाद अनुभव करेंगे? सदैव यही समझो कि सोचना, बोलना वा करना है तो कमाल का, कॉमन नहीं। अगर कॉमन अर्थात् साधारण संकल्प किये तो प्राप्ति भी साधारण होगी। जैसे संकल्प वैसी सृष्टि बनेगी ना। अगर संकल्प ही श्रेष्ठ नहीं होंगे तो अपनी नई सृष्टि जो रचने वाले हैं उसमें पद भी साधारण ही मिलेगा। इसलिए सदैव यह चेक करो कि हमारा संकल्प जो उठा वह साधारण है वा श्रेष्ठ? साधारण संकल्प वा चलन तो सर्व आत्मायें करती रहती हैं। अगर सर्वशक्तिमान की सन्तान होने के बाद भी साधारण संकल्प वा कर्म हुए तो श्रेष्ठता वा विशेषता क्या हुई? मैं विशेष आत्मा हूँ, इस कारण हमारा सभी कुछ विशेष होना चाहिए। अपने परिवर्तन से आत्माओं को अपनी तरफ वा अपने बाप के तरफ आकर्षित कर सको; अपने देह के तरफ नहीं, अपनी अर्थात् आत्मा की रुहानियत तरफ। तुम्हारा परिवर्तन सृष्टि को परिवर्तन में लायेगा। सृष्टि का परिवर्तन भी श्रेष्ठ आत्माओं के परिवर्तन के लिए रुका हुआ है। परिवर्तन तो लाना है ना कि यह साधारण जीवन ही अच्छी लगती है? यह स्मृति, वृत्ति और दृष्टि अलौकिक हो जाती है तो इस लोक का कोई भी व्यक्ति वा कोई भी वस्तु आकर्षित नहीं कर सकती। अगर आकर्षित करती है तो समझना चाहिए कि स्मृति में वा वृत्ति में वा दृष्टि में अलौकिकता की कमी है। इस कमी को सेकेण्ड में परिवर्तन में लाना है। यह ग्रुप यही विशेषता दिखावे कि सेकेण्ड में अपने संस्कार वा संकल्प को परिवर्तन में लाकर दिखाये। ऐसी हिम्मत है? सोचने में भी जितना समय लगता है, करने में इतना समय न लगे। ऐसी हिम्मत है?
यह ग्रुप है साहसी ग्रुप। तो जो साहस रखने वाले हैं उन्हों के साथ बाप सदा सहयोगी है, इसलिए कभी भी साहस को छोड़ना नहीं। हिम्मत और उल्लास सदा रहे। हिम्मत से सदा हर्षित रहेंगे। उल्लास से क्या होगा? उल्लास किसको खत्म करता है? आलस्य को। आलस्य भी विशेष विकार है। जो पुरुषार्थी पुरुषार्थ के मार्ग पर चल पड़े हैं उन्हों के सामने वर्तमान समय माया का वार इस आलस्य के रूप में भिन्न-भिन्न तरीके से आता है। तो इस आलस्य को खत्म करने के लिए सदा उल्लास में रहो। कमाई करने का जब किसको उल्लास होता है तो फिर आलस्य खत्म हो जाता है। अब भी कोई कार्य प्रति भी अपना उल्लास नहीं होता तो फिर आलस्य जरूर होगा। इसलिए कभी भी उल्लास को कम नहीं करना है जो आलस्य के वश होकर और श्रेष्ठ कर्म करने से वंचित हो जाओ। आलस्य भी कई प्रकार का होता है। अपने पुरुषार्थ में आगे बढ़ने में आलस्य बहुत विघ्न रूप बन जाता है। यह जो कहने में आता है - अच्छा सोचेंगे, यह कार्य करेंगे, कर ही लेंगे, यह आलस्य की निशानी है। करेंगे, कर ही लेंगे, हो ही जायेगा, लेकिन नहीं, करने लग पड़ना है। जो नॉलेज वा धारणायें मिली हैं वह बुद्धि में धारण तो की हैं ना। लेकिन प्रैक्टिकल में आने में जो विघ्न रूप बनता है वह स्वयं का आलस्य होता है। अच्छा, कल से लेकर करेंगे, फलाना करे तो हम भी करेंगे, आज सोचते हैं कल से करेंगे, यह कार्य पूरा करके फिर यह करेंगे - ऐसे-ऐसे संकल्प ही आलस्य का रूप हैं। जो करना है वह अभी करना है। जितना करना है वह अभी करना है। बाकी करेंगे, सोचेंगे - इन अक्षरों में पिछाड़ी में ‘ग-ग' आता है ना, तो यह शब्द है बचपन की निशानी। छोटा बच्चा ग-ग करता रहता है ना, यह अलबेलेपन की निशानी है। इसलिए कभी भी आलस्य का रूप अपने पास आने नहीं देना और सदा अपने को उल्लास में रखना। क्योंकि निमित्त बनते हो ना। निमित्त बने हुए सदैव पुरुषार्थ के उल्लास में रहते हैं तो उन्हें देख और भी उल्लास में रहते हैं। चलते-चलते पुरुषार्थ में थकावट आना वा चलते-चलते पुरुषार्थ साधारण रफ्तार में हो जाये, यह किसकी निशानी है? विघ्न न हो लेकिन लगन भी श्रेष्ठ न हो तो उसको भी आलस्य कहेंगे। कई ऐसे अनुभव करते हैं - विघ्न भी नहीं हैं, ठीक भी चल रहे हैं लेकिन लगन भी नहीं है अर्थात् उल्लास वा विशेष कोई उमंग नहीं है। तो यह भी निशानी आलस्य की है। आलस्य भी अनेक प्रकार का है। इस आलस्य को कभी भी आने नहीं देना। आलस्य धीरे-धीरे पहले साधारण पुरुषार्थी बनायेगा वा समीपता से दूर करेगा; फिर दूर करते-करते धोखा भी दे देगा, कमजोर बना देगा, निर्बल बना देगा। निर्बल वा कमजोर बनने से कमियों की प्रवेशता शुरू हो जाती है। इसलिए सदैव यह चेक करना - मेरी बुद्धि की लगन बाप वा बाप के कर्तव्य से थोड़ी भी दूर तो नहीं है, बिल्कुल समीप वा साथ-साथ है?
आजकल के जमाने में कोई किसका खून करता है वा कोई भ्रष्टाचार का कार्य करता है तो पहले उसको दूर भगाकर ले जायेगा, उसको अकेला, कमजोर बनाकर फिर उस पर वार करेगा। तो माया भी चतुर है। पहले सर्वशक्तिमान बाप से बुद्धि को दूर करती है, फिर जब कमजोर बन जाते हैं तब वार करती है। कोई भी साथ नहीं रहता है। क्या भी हो जाये, अपनी बुद्धि को कभी बाप के साथ से दूर नहीं करना। जब किसी पर वार होता है तो अपने को बचाने के लिए चिल्लाते हैं, घमसान करते हैं जिससे कोई दूर न ले जा सके। यहाँ फिर जब देखो कि माया हमारी बुद्धि की लगन को बाप से दूर करने की कोशिश करती है, तो अपने अन्दर बाप के गुण गाने हैं, महिमा करनी है। महान! कर्तव्य करने में लग जाओ, चिल्लाओ नहीं। भक्ति में भी गुणगान करते हैं ना। यह यादगार भी कब से बना? यह मन्सा का गुणगान करना वाचा में ला दिया है। यथार्थ रीति से गुणगान तो आप ही कर सकते हो ना? अब यथार्थ रूप में मन्सा संकल्प से, स्मृति-स्वरूप में गुणगान करते हो और भक्ति में स्थूलता में आते हैं तो मुख से गाने लग पड़ते है। सभी रीति-रस्म शुरू तो यहाँ से होती हैं ना। तो गुणगान करने लग जाओ। अपने को अधिकारी समझ सर्व शक्तियों को काम में लाओ। फिर कभी भी माया आपकी बुद्धि की लगन को दूर नहीं कर सकेगी। न दूर होंगे, न कमजोर होंगे, न हार खायेंगे। फिर सदा विजयी होंगे। तो यह स्लोगन याद रखना कि “हम अनेक बार के विजयी हैं, अब भी विजयी बनकर ही दिखायेंगे।” जो अनेक बार के विजयी हैं वह अभी फिर हार खा सकते हैं क्या? कभी नहीं। हार खाना असम्भव अनुभव होना चाहिए। तो जैसे अज्ञानी को विजयी बनना असम्भव है, इस प्रकार ज्ञानी आत्मा को हार खाना असम्भव अनुभव होना चाहिए। ऐसी विल-पॉवर अपने में भरी है? अपने को सर्व समर्पण किया? सर्व समर्पण उसको कहा जाता है जिसके संकल्प में भी बॉडी-कॉन्सेस न हो, देह-अभिमान न हो। तो अपने देह का भान भी अर्पण करना है। मैं फलानी हूँ - यह संकल्प भी अर्पण हो। उसको कहते हैं सर्व समर्पण, सर्व गुणों से सम्पन्न। सर्व गुणों से सम्पन्न को ही सम्पूर्ण कहा जाता है। कोई भी गुण की कमी नहीं। अभी तो वर्णन करते हो ना कि यह कमी है। इससे सिद्ध है कि सम्पूर्ण स्टेज नहीं है। तो सर्व गुण सम्पन्न हैं? तो लक्ष्य यही रखना है कि सर्व समर्पण बनकर, सर्व गुण सम्पन्न बन सम्पूर्ण स्टेज को प्राप्त करेंगे ही। ऐसे पुरुषार्थियों को बाप भी वरदान देते हैं कि “सदा विजयी भव।” हर संकल्प में कमाल दिखाओ, यही विशेषता दिखाओ - जीवन का फैसला कर आई हो ना? अपने आपसे फैसला करके आई हो। कोई भी संस्कार के वश नहीं हो ना। जो हैं ही जगतजीत, विश्व के विजयी वह किसके भी वश हो नहीं सकते। जो स्वयं सर्व आत्माओं को नज़र से निहाल करने वाली हैं, उनकी नज़र और कहाँ भी नहीं जा सकती। ऐसे दृढ़ निश्चयबुद्धि हो? अपनी सभी कमजोरियों को भट्ठी में स्वाहा किया वा करना है? फिर ऐसे तो नहीं कहेंगी कि बाकी यह थोड़ी रह गई है? अपनी मन्सा की जेब को अच्छी तरह से जांच करना - कहाँ कोई कोने में कुछ रहा तो नहीं? वा जान बूझकर जेब खर्च रखा है? यह अच्छी तरह से देखना। उम्मीदवार ग्रुप हो वा इससे भी ऊपर? इससे ऊपर क्या होता है? उम्मीदवार भी हैं और विजयी भी हैं। तो यह अनेक बार का विजयी ग्रुप हैं। विजयी हैं ही। उम्मीद की बात नहीं। ऐसे विजयी ही विजय माला के मणके बनते हैं। उम्मीद नहीं लेकिन 100 प्रतिशत निश्चय है कि हम विजयी हैं ही। देखना, माया कम नहीं हैं। माया की छम-छम, रिमझिम कम नहीं। माया भी बड़ी रौनकदार है। सभी तरफ से, सभी रूप से माया की नॉलेज को भी समझ गये हो कि माया क्या चीज होती है और किस रूप से, किस रीति से आती है? इसकी भी पूरी नॉलेज ली है? ऐसे तो नहीं कहेंगे कि इस बात की तो हमें नॉलेज नहीं थी? ऐसे अनजान बनकर अपने को छुड़ाना नहीं। कई कहते हैं हमको तो पता नहीं था कि ऐसे भी कोई होता है, क्या-क्या करते रहते हैं! अनजान होने कारण भी धोखे में आ जाते हैं। लेकिन जब मास्टर नॉलेजफुल हो तो अनजानपना नहीं रह सकता। यह जो शब्द निकलता है कि मुझे इस बात का ज्ञान नहीं था; यह भी कमजोरी है। ज्ञानी अर्थात् ज्ञानी। कोई भी बात का अज्ञान रहा तो ज्ञानी कहेंगे क्या? ज्ञान स्वरूप को कोई भी बात का अज्ञान नहीं रहेगा। जो योगयुक्त होंगे उनको न अनुभव होते भी ऐसा ही अनुभव होगा जैसे कि पहले से सभी कुछ जानते हैं। त्रिकालदर्शी फिर अनजान कैसे हो सकते हैं! तो मास्टर नॉलेजफुल भी बने और विजयी भी बने; तो हार असम्भव ही अनुभव होगी ना। अब देखेंगे - यह ग्रुप कैसी झलक दिखाता है? आपकी झलक से सभी को बाप की झलक दिखाई दे। बेचारी आत्मायें तड़पती हैं, बाप की जरा झलक दिखाई दे तो सर्व प्राप्ति हो। तो अब बाप की झलक अपनी झलक से दिखाओ। समझा? तो यह विजयी ग्रुप है। उल्लास से आलस्य को भगाने वाले हो। अभी प्रैक्टिकल देखेंगे। प्रैक्टिस को प्रैक्टिकल में कहाँ तक लाती हो, यह भी मालूम पड़ जायेगा। यह कमाल दिखाओ। जो जिस-जिस भी स्थान पर जाओ, जिस साथी के साथ सर्विस में मददगार बनो उनके तरफ से कमाल के सिवाए और कोई बात ही न आये। एक-एक लाइन में कमाल लिखें, तब कहेंगे वियजी ग्रुप है। बाप समान बनकर दिखाओ। ऐसे कमाल कर दिखाओ जो बड़े भी बाप के गुणगान करें कि सचमुच यह ग्रुप निर्विघ्न, सदा बाप की लगन में मगन रहने वाला है। एक के सिवाए और कुछ सूझता ही नहीं। चाहे एक बाप की लगन, चाहे बाप के कर्तव्य की लगन - इसके सिवाए और कुछ सूझेगा ही नहीं। संसार में और कोई वस्तु या व्यक्ति है भी - यह अनुभव ही न हो। ऐसी एक लगन, एक भरोसे से एकरस अवस्था में, चढ़ती कला में रहने वाले बनकर दिखाओ, तब कहेंगे कमाल। ‘क्यों' को तो एकदम भस्म करके जाना, इतने तक जो कोई कारण सामने बने तो उस कारण को भी परिवर्तन कर निवारण रूप बना दो। फिर यह नहीं कहना कि यह कारण था। कितने भी कारण हों - मैं निवारण करने वाली हूँ; न कि कारण को देख कमजोर बनना है। कारण को निवारण में परिवर्तन करने वाले ग्रुप हो। इसको विजयी कहा जाता है। ऐसे श्रेष्ठ लक्षणधारी भविष्य में लक्ष्मी रूप बनते हैं। लक्ष्मी अर्थात् लक्षण वाली। तो अभी भी चेहरे में, चलन में वह चमक दिखाई देनी चाहिए। ऐसे नहीं कि अभी तो यहाँ सीख रहे हैं, वहाँ जाकर दिखायेंगी। जब यहाँ अपना सबूत देकर जायेंगी तब वहाँ भी सबूत दे सकेंगी, समझा?
अभी तुम सभी हो ही सेवाधारी। सेवाधारी कब भी सुहेजों के संकल्प में नहीं आते। सर्व सम्बन्धों से सर्व अनुभव करना, वह दूसरी बात है लेकिन सदा स्मृति में अपना सेवाधारी स्वरूप रखना है। सुहेजों में लगेंगे तो सेवा भूल जायेगी। सेवाधारी हूँ, विश्व-परिवर्तन करने वाली पतित-पावनी हूँ - यह अपना स्वरूप स्मृति में रखो। पतित-पावनी के ऊपर कोई पतित आत्मा की नज़र की परछाई भी नहीं पड़ सकती। पतित-पावनी के सामने आने से ही पतित बदलकर पावन बन जावे, इतनी पॉवर चाहिए। पतित आत्माओं के पतित संकल्प भी न चल सकें, ऐसी अपनी ब्रेक पॉवरफुल होनी चाहिए। जब उसका ही पतित संकल्प नहीं चल सकता तो पतित-पन का प्रभाव कैसे पड़ सकता? यह भी नहीं सोचना - मैं तो पावन हूँ लेकिन इस पतित आत्मा का प्रभाव पड़ गया। यह भी कमजोरी है। प्रभाव पड़ने का अर्थ ही है प्रभावशाली नहीं हो, तब उनका प्रभाव आपको प्रभावित करता है। पतित-पावनी पतित संकल्पों के भी प्रभाव में नहीं आ सकती। पतित-पावनी के स्वप्न में भी पतित-पन के संकल्प वा सीन नहीं आ सकती। अगर स्वप्न में भी पतित-पन के दृश्य आते हैं तो समझना चाहिए कि पतित संस्कारों के प्रभाव का असर है। उसको भी हल्का नहीं छोड़ना चाहिए। स्वप्न में भी क्यों आये? इतनी कड़ी दृष्टि, कड़ी वृत्ति, कड़ी स्मृति स्वरूप बनना चाहिए। पतित आत्मा मुझ शस्त्रधारी शक्ति के आगे एक सेकेण्ड में भस्म हो जाए। कोई व्यक्ति भस्म नहीं होगा लेकिन उनके पतित संस्कार नाश हो जायेंगे। आसुरी संस्कारों को नाश करने की आवश्यकता है। मैं पतित-पावनी, आसुरी-पतित संस्कार संहारी हूँ। जो स्वयं संहारी है वह कब किसका शिकार नहीं बन सकते। इतना प्रैक्टिकल प्रभाव होना चाहिए जो कोई भी आपके सामने संकल्प करे और उनका संकल्प मूर्छित हो जाए। ऐसा काली रूप बनना है। एक सेकेण्ड में पतित संकल्प की बलि ले लेवें। ऐसी बलवान बनी हो जो कोई की परछाई भी न पड़ सके? कोमल नहीं बनना है। कोमल जो होते हैं वह निर्बल होते हैं। शक्तियां कोमल नहीं होती। माया पर तरस कभी नहीं करना। तुम माया का तिरस्कार करने वाली हो। जितना माया का तिरस्कार करेंगी उतना भक्तों द्वारा या दैवी परिवार द्वारा सत्कार प्राप्त करेंगी। माया पर रोब दिखाना है, न कि रहम। कोई के पुरुषार्थ में मददगार बनने में तरस करना है, माया से नही। अच्छा!