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21 May 1977
“संगमयुगी ब्राह्मण जीवन का विशेष गुण और कर्तव्य”
21 May 1977 · हिंदी
अपने वर्तमान संगमयुगी ब्राह्मण जीवन की विशेषता को जानते हो? अपने विशेष गुण और कर्तव्य को जानते हो? जो गुण और कर्तव्य और कोई भी युग में हो नहीं सकता, वह कौन सा विशेष गुण है? नालेजफुल, मास्टर ज्ञान सागर और कर्तव्य है विश्व सेवाधारी अर्थात् गॉडली सर्विसएबुल। दोनों विशेषताओं को निरन्तर स्मृति में रखते हो? आप लोग कहलाते भी हो कि हम वर्ल्ड सर्वेन्ट हैं। वर्ल्ड सर्वेन्ट की परिभाषा क्या है? किसको वर्ल्ड सर्वेन्ट कहा जाता है? उनके लक्षण क्या होते हैं? लक्ष्य क्या होता है और प्राप्ति क्या होती है? विश्व सेवाधारी अर्थात् सर्विसएबुल का लक्षण सदैव यही रहता है कि विश्व को अपनी सेवा द्वारा सम्पन्न व सुखी बनावें। किससे? जो अप्राप्त वस्तु है, ईश्वरीय सुख, शान्ति और ज्ञान के धन से, सर्व शक्तियों से, सर्व आत्माओं को भिखारी से अधिकारी बनावें क्योंकि विश्व सेवाधारी सदा कल्याण और रहम की दृष्टि से सबको देखते हैं। इसलिए सदा यही लक्ष्य रहता कि विश्व का परिवर्तन करना ही है। यही लगन रात-दिन रहती है।
सेवाधारी के लक्षण क्या दिखाई देंगे? सेवाधारी अपना हर सेकेण्ड, संकल्प, बोल और कर्म, सम्बन्ध, सम्पर्क, सेवा में ही लगाते। सेवाधारी सेवा करने का विशेष समय नहीं निश्चित करते कि चार घण्टे वा छ: घण्टे के सेवाधारी हैं। हर कदम में अथक सेवा ही करते रहते। उनके देखने में, चलने में, खाने-पीने में, सबमें सेवा समाई हुई होती है। मुख्य सेवा के साधन - स्मृति, वृत्ति, दृष्टि और कृति इस सब प्रकार से सेवा में तत्पर होगा। (II) स्मृति द्वारा सर्व आत्माओं को समर्थी स्वरूप बनायेगा। (II) वृत्ति द्वारा वायुमण्डल को पावन और शक्तिशाली बनायेगा (III) दृष्टि द्वारा आत्माओं को स्वयं का और बाप का साक्षात्कार करायेगा (IV) कृति द्वारा श्रेष्ठ कर्म करने के अपने आप को निमित्त बनाकर हिम्मत दिलाने की प्रेरणा दिलायेंगे।
ऐसा सेवाधारी, स्वयं के रात-दिन के आराम को भी त्यागकर सेवा में ही आराम महसूस करेंगे। ऐसे सेवाधारी हो? सेवाधारी के सम्पर्क में रहने वाली वा सम्बन्ध में आने वाली आत्माएं उनकी समीपता वा साथ से ऐसा अनुभव करेंगी जैसे शीतलता वा शक्ति, शान्ति के झरने के नीचे बैठे हैं, वा कोई सहारे वा किनारे की प्राप्ति का अनुभव करेंगे। ऐसे सेवाधारी के संकल्प वा शुभ भावनाएं, शुभ कामनाएं, सूर्य की किरणों मुआफिक चारों ओर फैलेंगी। जैसे सेवाधारियों के जड़ चित्र अल्पकाल के लिए अल्पकाल की कामनाएं पूर्ण करते हैं, ऐसे चैतन्य चरित्रवान सेवाधारी सदाकाल के लिए सर्व कामनाएं पूर्ण करते हैं। इसलिए कामधेनु का गायन है। जैसे कोई खान सम्पन्न होती है तो जितना चाहे, उतना सम्पन्न हो सकता है। और ही हद की खान में विशेषता होगी। हद की खान से एक वस्तु मिलती। लेकिन यह विचित्र खान है जिसको जो चाहिए वह मिल सकता है। ऐसे सेवाधारी तड़पती हुई आत्माओं को सहज ही मंजिल का अनुभव कराते हैं। सदा हर्षित, सदा सन्तुष्ट इस प्राप्ति का वरदान, सेवाधारी को स्वत: ही प्राप्त होता है क्योंकि वह जानते हैं कि हर आत्मा का भिन्न पार्ट है। पार्टधारी के किसी भी प्रकार के पार्ट को देख, असन्तुष्ट न हो। ऐसे सेवाधारी के मन से सदैव हर्षित और सन्तुष्ट रहने के गीत कौन से निकलते? वाह बाबा! वाह मेरा पार्ट! और वाह मीठा ड्रामा! जब स्वयं सदा यह मन के गीत गाते तब ही सर्व आत्माएं भी अब भी और सारे कल्प में भी उनकी वाह-वाह करती हैं।
ऐसे सेवाधारी सदा विजय के मालाधारी होते हैं। सफलता स्वत: अधिकार है - इसी निश्चय और नशे में रहते हैं। सदा सम्पन्न और बाप के समीप अनुभव करते हैं। यह है सेवाधारियों की प्राप्ति। तो ऐसे लक्ष्य और लक्षण और प्राप्ति अनुभव करते हो? जब ब्राह्मणों के जीवन का विशेष कर्तव्य ही यह है तो अपने कर्तव्य को यथार्थ रीति से निभा रहे हो? एक है - बाप से प्रीत की रीति निभाना, दूसरा है - कर्तव्य निभाना। तो दोनों निभाने वाले हो या सिर्फ कहने वाले हो? सिर्फ कहने वाले तो नहीं हो ना? कहने वाले नहीं, करने वाले बनो! समझा! सेवाधारियों का महत्व क्या है? अच्छा।
ऐसे दिन रात सेवा में तत्पर रहने वाले, सम्पन्न बन सर्व को सम्पन्न बनाने वाले, सर्व स्वरूप से आलराउण्ड सेवा करने वाले, सदा सर्व प्रति कल्याण और रहम की भावना रखने वाले, ऐसे सर्व प्रति कल्याण और रहम की भावना रखने वाले, ऐसे विशेष सेवाधारियों को बापदादा का याद,प्यार और नमस्ते।
पार्टियों के साथ :- सदैव एक मन्त्र याद रखो - बाप को दिल का सच्चा साथी बनाकर रखेंगे तो सदा अनुभव करेंगे खुशियों की खान मेरे साथ है। सदा इस संग का रूहानी रंग लगा रहेगा क्योंकि बड़े से बड़ा संग सर्वशक्तिमान् का है। सत्संग की महिमा है तो सदा बुद्धि द्वारा सत् बाप, सत शिक्षक, सतगुरू का संग करना - यही सतसंग है। इस सतसंग में रहने से सदा हर्षित और हल्के रहेंगे। किसी भी प्रकार का बोझ अनुभव नहीं होगा। निश्चय बुद्धि हो - यह तो ठीक है। लेकिन निश्चय का रिटर्न है बाप को सदा का साथी बनाकर रखना। पल-पल बाप का साथ हो। तो सदा साथ के अनुभव से सम्पन्न का अनुभव करेंगे। ऐसे लगेगा जैसे भरपूर हैं। जब बाप को अपना बनाया तो बाप का जो भी है, सब अपना हो गया।
सदा ईश्वरीय नशे में और भविष्य देव पद के नशे में रहते हो? संगमयुग की प्रारब्ध क्या है? बाप को पाना और भविष्य की प्रारब्ध देव पद पाना। तो दोनों प्रारब्ध की स्मृति रहती है? जिसको बाप मिल गया उसको नशा कितना होगा, बाप से ऊपर और कुछ नहीं! बाप मिला सब कुछ मिला। सदा याद में रहने से जो भी प्राप्ति है, उसका अनुभव कर सकते हो। याद नहीं तो प्राप्ति का अनुभव नहीं। सदा प्राप्ति के नशे में रहो मैं मास्टर सर्वशक्तिमान् हूँ। शक्तियां बाप की प्रॉपर्टी हैं, तो बच्चे का उस पर अधिकार है। अधिकारी बच्चों के मन से सदैव यही गीत निकलेंगे जो पाना था वह पा लिया।
किसी भी प्रकार का विघ्न रास्ते चलते आवे तो निर्विघ्न रहने का तरीका आ गया है? विघ्न को हटाना सहज है वा मुश्किल? जब बाप का हाथ छोड़ते तो मुश्किल लगता। अगर बाप सदा साथ रहे तो कोई मुश्किल नहीं। बाप का साथ छोड़ने से कमज़ोर हो जाते। कमज़ोर को छोटी बात भी बड़ी लगती। बहादुर को बड़ी बात भी छोटी लगती। जब बाप साथ देने के लिए तैयार हैं, लेने वाले न लें तो बाप क्या करे। किनारा नहीं करो तो सदा सहज लगेगा।
पाण्डव अर्थात् बाप के साथ की स्मृति में रहने वाले। कल्प पहले भी पाण्डवों की स्मृति की विशेषता क्या गाई हुई है? पाण्डवों को नशा था - बाप हमारे साथ है। बाप के साथ का नशा होने के कारण चैलेन्ज करने वाले बने। चैलेन्ज की ना कि हम विजयी बनेंगे। चैलेन्ज का आधार था - बाप का साथ। तो जब पाण्डवों के साथ की यह विशेषता गाई हुई है तो प्रैक्टिकल में कितना नशा होगा? माया के बड़े-बड़े महावीरों की भी पाण्डवों के आगे क्या रिजल्ट हुई? विनाश को प्राप्त हुए। ऐसे माया के विघ्नों को पार करने वाले अनुभव करते हो कि माया से घबराते हो? किसी भी प्रकार के माया के विघ्न आवें लेकिन त्रिकालदर्शी हो अर्थात् माया क्यों आती है और उसको भगाने का तरीका क्या है - यह सब जानने वाले हो। माया आ गई, क्या करें, ऐसे घबराने वाले नहीं। पाण्डवों का चित्र भी ग्वालों के रूप में दिखाते हैं। सदा ग्वाल-बाल साथ रहते थे। चैतन्य अपना जड़ यादगार देख रहे हैं, यह वन्डरफुल बात है ना।
शक्तियों का या गोपिकाओं का यादगार है, खुशी में नाचना। पांव में घुंघरू डालकर नाचते हुए दिखाते हैं। जो सदा खुशी में रहते उनके लिए कहते - खुशी में नाच रहा है। नाचते हैं तो पांव ऊपर रखते हैं। ऐसे ही जो खुशी में नाचने वाले होंगे उनकी बुद्धि ऊपर रहेगी। देह की दुनिया व देहधारियों में नहीं, लेकिन आत्माओं की दुनिया में, आत्मिक स्थिति में होंगे। ऐसे खुशी में नाचते रहो। सदा खुशी किसको रहेगी? जो अपने को गोपिका समझेंगे। गोपिका का अर्थ है - जिसकी लगन सदा गोपी वल्लभ के साथ हो। अपने को गृहस्थी माता नहीं लेकिन गोपिका समझो, गृहस्थी शब्द ही अच्छा नहीं लगता। गोपिकाओं का नाम लेते ही सब खुश हो जाते हैं। जब नाम लेने से दूसरे खुश हो जाते तो स्वयं गोपिकाएं कितना खुश होंगी! अच्छा।