ब्रह्माकुमारीज़ के धार्मिक प्रभाग द्वारा ज्ञान सरोवर परिसर में आयोजित पांच दिवसीय सम्मेलन एवं शिविर का समापन “विश्व शांति का मार्ग—स्व परिवर्तन से समाज परिवर्तन” विषय के साथ हुआ। “आध्यात्म एवं राजयोग के बल से वैश्विक शांति” विषय पर आयोजित इस सम्मेलन में संत-महात्माओं एवं आध्यात्मिक विभूतियों ने विश्व शांति के लिए आत्म परिवर्तन, राजयोग, श्रेष्ठ संकल्प और सकारात्मक चिंतन को आवश्यक बताया।
समापन सत्र में धार्मिक प्रभाग के जोनल कोऑर्डिनेटर बीके नारायण भाई ने कहा कि
आत्मचिंतन, राजयोग और श्रेष्ठ संकल्पों के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। कार्यक्रम में फरीदाबाद के संत स्वामी दिव्यानंद पुरी जी महाराज, धर्माचार्य श्री कुंवरपाल मोदी विल जी महाराज, दिव्य शक्ति अखाड़ा महाराष्ट्र के आचार्य महामंडलेश्वर संत कमल किशोर जी महाराज, सतना के महामंडलेश्वर आचार्य परमानंद जी महाराज तथा श्री निरंजनी पंचायती अखाड़ा प्रयागराज के महामंडलेश्वर रमापुरी जी महाराज सहित अनेक संत-महात्माओं ने अपने विचार साझा किए।
संतों ने कहा कि
विश्व परिवर्तन की शुरुआत विचार परिवर्तन से होती है। विचारों से ही हमारे शब्द और कर्म बनते हैं। इसलिए सबसे पहले चेतना को सकारात्मक और पवित्र बनाना आवश्यक है। राजयोग के माध्यम से मन को शांत, विचारों को पवित्र और आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराया जा सकता है। इससे परिवार में शांति, समाज में सद्भाव और विश्व में शांति की स्थापना का मार्ग प्रशस्त होता है।
वक्ताओं ने कहा कि
आज विश्व को बाहरी साधनों से अधिक आंतरिक शांति, आत्मिक संगति और सकारात्मक चिंतन की आवश्यकता है। स्वयं पर कार्य करना, स्वदर्शन, स्वचिंतन और आत्म-अवलोकन ही वास्तविक परिवर्तन की आधारशिला है। जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, छल, कपट, ईर्ष्या और द्वेष जैसे विकारों को दूर कर दैवी गुणों को धारण करने का आह्वान किया गया।
समापन सत्र की अध्यक्षता सोलापुर की सबजोन प्रभारी बीके सोमप्रभा दीदी ने की।
मथुरा के संत श्री पूर्णानंद गिरी जी महाराज तथा स्पिरिचुअल एंड वेलनेस यूनिवर्सिटी, इंदौर की कुलपति महामंडलेश्वर श्री 108 स्वामी विजय कुमार जी महाराज विशिष्ट अतिथि रहे। राजयोग शिक्षिका बीके पार्वती ने सभी को राजयोग का अभ्यास कराया। कार्यक्रम में प्रश्नोत्तर, आध्यात्मिक चिंतन एवं विभिन्न गतिविधियां भी आयोजित की गईं।
सम्मेलन में सभी के गुणों को ग्रहण कर उन्हें जीवन में अपनाने तथा श्रेष्ठ संस्कारों और दैवी गुणों को धारण करने का संदेश दिया गया।






























