दिव्यता के साथ दशहरा मनाएँ

दिव्यता के साथ दशहरा मनाएँ

दशहरे पर आध्यात्मिक संदेश – 20 अक्टूबर

दशहरा मनाते समय हम सत्य की असत्य पर, अच्छाई की बुराई पर, ज्ञान की अज्ञानता पर और आत्मिक चेतना की शारीरिक चेतना पर विजय को याद करते हैं। यह त्योहार हमें परमात्मा की भी याद दिलाता है, जो हमें अपने विकारों पर विजय प्राप्त करना सिखाते हैं। देह भान के प्रभाव में आकर हमने अनेक जन्मों में इन विकारों और बुरी आदतों को अपनाया है। आइए, इस संदेश के माध्यम से समझें कि हम अपनी चेतना में दिव्य ज्ञान धारण करके दिव्य दशहरा कैसे मना सकते हैं।

  1. 1परमात्मा के सात गुणों को अपनाएँ| परमात्मा सर्वोच्च आत्मा हैं, जो सात सुंदर गुणों से भरपूर हैं – शांति, सुख, प्रेम, आनंद, पवित्रता, शक्ति और ज्ञान। जितना अधिक हम ज्ञान और मेडिटेशन के माध्यम से परमात्मा से जुड़ते हैं, उतना ही इन सात गुणों को अपने जीवन में धारण करने लगते हैं। इससे हमारे अंदर सकारात्मक बदलाव आता है और हम अपनी नकारात्मक आदतों को आसानी से छोड़ने लगते हैं। परमात्मा को राम भी कहा जाता है और रावण हमारे विकारों व बुरे संस्कारों का प्रतीक है। जब हमारी चेतना में राम अर्थात् परमात्मा की याद रहती है, तो हम अपने अंदर के दस सिर वाले रावण का अंत कर सकते हैं। रावण के ये दस सिर हैं – काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, नफरत, छल-कपट, ज़िद और आलस्य।
  2. 2विकारों को जड़ से समाप्त करें| रावण का अंत करने के लिए हमें आध्यात्मिकता और दिव्यता से भरा हुआ तीर उसकी नाभि में मारना होगा। इसका अर्थ है कि हमें दैहिक-चेतना को जड़ से समाप्त करना है। जब ये समाप्त हो जाएगी, तो रावण के दसों सिर दोबारा जीवित होकर हमारे जीवन में अशांति और दुख नहीं ला सकेंगे। रावण के दस सिर केवल इस जन्म के नहीं, बल्कि अनेक जन्मों के नकारात्मक कर्मों और संस्कारों के प्रतीक हैं। इसलिए रावण का पूरी तरह अंत करना जरूरी है, ताकि आत्मा में दैहिक-चेतना का कोई अंश न रहे और हम पूरी तरह पवित्र व दिव्य बन जाएँ।
  3. 3परमात्म ज्ञान से जीवन को दिव्य बनाएँ| परमात्मा का शुद्ध ज्ञान हमें समझाता है कि विकार क्या हैं और वे हमारी चेतना में कब व कैसे आए। इसके साथ ही हम मेडिटेशन करना और अपनी चेतना को परमात्मा की चेतना से जोड़ना सीखते हैं। इससे हमें अपने विकारों को पूरी तरह समाप्त करने और दिव्य बनने की शक्ति मिलती है। इस प्रकार हम देवी-देवताओं के समान दिव्य बन सकते हैं, जो परमात्मा के इन सातों गुणों से भरपूर थे और जिन्हें सभी बहुत प्रेम व सम्मान देते थे। यही आध्यात्मिक पुरुषार्थ ही सच्चा दशहरा है – अपने अंदर के रावण अर्थात् विकारों को समाप्त करना। इसके बाद आती है दिवाली, जो आत्मा के परमात्मा के सातों गुणों से भरपूर होकर ज्ञान और दिव्यता की रोशनी से जगमगाने का प्रतीक है।

आज का अभ्यास

आज हम दशहरे के अवसर पर अपने भीतर के रावण को पहचानें। क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या जैसे विकारों पर विजय पाने के लिए परमात्म ज्ञान और दिव्य गुणों को जीवन में अपनाने का संकल्प लें।

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