परिस्थितियों में सिचुएशन प्रूफ बनें (भाग 2)

परिस्थितियों में सिचुएशन प्रूफ बनें (भाग 2)

परिस्थितियों के बिना जीवन जीने की आस रखना माना, वास्तविकता से परे एक काल्पनिक दुनिया में जीने की कोशिश करने जैसा है। इस आधार पर हम लोगों को दो श्रेणियों में बांट सकते हैं; एक हैं पोजिटीव सोच रखने वाले, जो परिस्थिति को छोटा बना देते हैं, दूसरी श्रेणी के लोग नेगेटिव सोच रखकर परिस्थिती को और बड़ा बना देते हैं। एक आसान स्थिति को कठिन या कठिन स्थिति को बहुत कठिन लगने का पहला कारण हमारी नेगेटिव धारणाएँ हैं, और

ये चार पिलर पर टिकी होती हैं जोकि हैं चार प्रश्न - कैसे? क्यों? कब? क्या?

याद करें कि, पिछली बार जब आपने एक कठिन परिस्थिति का सामना किया था, तो इन चार प्रश्नों में से कोई एक था या फिर इनमें से एक से अधिक प्रश्न उस स्थिति में मौजूद थे, जिनके अनुसार आपने धारणाएँ बनाई थीं। यदि यह चारों मौजूद थे, तो नेगेटिव धारणाएं सबसे मजबूत और बडी दिखती हैं। और निश्चित रूप से अन्य दो विस्मयबोधक चिन्ह (नेगेटिव रूप से आश्चर्यचकित होना) – अगर! और लेकिन!; ये दोनों नेगेटिव धारणाओं को और भी अधिक बढ़ा देते हैं, और इससे पहले कि आप जान पाएं, परिस्थिति उससे भी बड़ी दिखती है। दूसरी ओर, यदि हम पोजिटीव धारणाओं की सोच रखते हैं, तो हम इन प्रश्नों से ऊपर उठेंगे और इन दो विस्मयबोध शब्दों का निर्माण नहीं करेंगे। इसको ही यह सिचुएशन - प्रूफिंग कहा जाता है। माना कि एक सिचुएशन है, लेकिन मैंने खुद को सिचुएशन-प्रूफ कर लिया है। इसका मतलब है कि, मैं ऊपर बताये गये प्रश्नों और विस्मयबोध शब्दों से दूर रहकर, किसी भी तरह की नेगेटिव धारणा को मन में न रखते हुए, स्थिति के प्रभाव से परे जाता हूं।

जैसा कि हम जानते हैं, हमारी अवेयरनेस या स्मृति का प्रभाव हमारे दृष्टिकोण और वृत्ति पर पड़ता है और उन्हें वैसा ही रूप देता है। फिर हमारे दृष्टिकोण का प्रभाव हमारी धारणाओं पर पड़ता है। इन्हीं धारणाओं के आधार पर हम अपने आसपास की परिस्थितियों को देखते और समझते हैं। इसके बाद हमारी धारणाओं का असर हमारे शब्दों और कर्मों पर पड़ता है और वे भी उसी के अनुसार होते हैं। यह पूरी प्रक्रिया हमारे मन में चलती है। इसलिए सिचुएशन-प्रूफ बनने को समझने से पहले इस पूरी प्रक्रिया को समझना जरूरी है। इसे हम कल के संदेश में विस्तार से समझेंगे।

(कल जारी रहेगा...)

आज का अभ्यास

आज हम हर परिस्थिति को अपनी नकारात्मक धारणाओं से बड़ा बनाने के बजाय उसे समझकर शांत और सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने का अभ्यास करेंगे।

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