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14 May 1977
“स्वमान और फ़रमान”
14 May 1977 · हिंदी
सदा भाग्य-विधाता बाप द्वारा प्राप्त हुए अपने भाग्य को सुमिरण करते हुए, हर्षित रहते हो? क्योंकि सारे कल्प के अन्दर सर्व श्रेष्ठ भाग्य इस समय ही प्राप्त करते हो। इस समय ही सदा भाग्यशाली स्थिति का अनुभव कर सकते हो। भविष्य नई दुनिया में भी ऐसा भाग्य प्राप्त नहीं होगा। तो जितना बाप बच्चों को श्रेष्ठ भाग्यशाली समझते हैं, उतना ही हरेक स्वयं को समझते हुए चलते हो? इसी को ही कहा जाता है - स्वमान में स्थित होना। मन-वचन-कर्म तीनों में ध्यान रखो। एक तो सदा स्वमान में रहना; दूसरा, हर कदम बाप के फ़रमान पर चलना है। स्वमान और फ़रमान इन दो बातों का ध्यान रखना है। साथ-साथ सर्व के सम्पर्क में आने में सम्मान देना है।
स्वमान में स्थित होने से सदा विघ्न-विनाशक स्थिति में होंगे। स्वमान क्या है, उसको तो अच्छी तरह से जानते हो? जो बाप की महिमा है, वही आपका स्वमान है। सिर्फ एक महिमा भी स्मृति में रखो, तो स्वमान में स्वत: ही स्थित हो जायेंगे। स्वमान में स्थित होने से, किसी भी प्रकार का अभिमान चाहे देह का वा बुद्धि का अभिमान, नाम का अभिमान, सेवा का अभिमान वा विशेष गुणों का अभिमान, स्वत: समाप्त हो जाते हैं, इसलिए सदा विघ्न-विनाशक होते हैं। ऐसे स्वमान में स्थित होने वाला सदा निर्मान रहता है। अभिमान नहीं लेकिन निर्मान। इससे सर्व द्वारा सदा स्वत: ही सदा मान मिलता है। मान लेने की इच्छा से परे होने के कारण सर्व द्वारा श्रेष्ठ मान मिलने का पात्र बन जाता है - यह अनादि नियम है। सर्व द्वारा मान मांगने से नहीं मिलता, लेकिन सम्मान देने से, स्वमान में स्थित होने से, प्रकृति दासी के समान, स्वमान के अधिकार के रूप में मान प्राप्त होता है। मान के त्याग में सर्व के माननीय बनने का भाग्य प्राप्त होता है। जैसे स्वमान में रहने वालों का सिर्फ इस एक जन्म में मान नहीं होता, लेकिन सारे कल्प में - आधा कल्प अपने रॉयल राजाई फैमिली द्वारा और प्रजा द्वारा मान प्राप्त होता है, और आधाकल्प भक्तों द्वारा मान प्राप्त होता है। इतने तक जो लास्ट जन्म में चैतन्य रूप में अपने प्राप्त हुए मान की प्रारब्ध को स्वयं ही देखते हो। चैतन्य अपने जड़ चित्रों को देखते हो ना। तो सारे कल्प में प्राप्त हुए मान का आधार क्या हुआ? अल्पकाल के विनाशी मान का त्याग अर्थात् स्वमान में स्थित हो, निर्मान बन, सम्मान देना है। यह देना ही लेना बन जाता है। सम्मान देना अर्थात् उस आत्मा को उमंग उल्लास में लाकर आगे करना है। अल्पकाल का पुण्य, अल्पकाल की वस्तु देने से होता है वा अल्पकाल के सहयोग देने से होता है। लेकिन यह सदाकाल का उमंग-उत्साह अर्थात् खुशी का खज़ाना वा स्वयं के सहयोग का, आत्मा को सदा के लिए पुण्यात्मा बना देता है। इसलिए यह बड़े ते बड़ा पुण्य हो जाता है। एक जन्म में किए हुए इस पुण्य का फल सारा कल्प मिलता है। इस कारण कहा कि सम्मान देना, देना नहीं लेकिन लेना है। लौकिक रूप में भी कोई पुण्य का काम करता है तो सबके आगे माननीय होता है। लेकिन इस श्रेष्ठ पुण्य का फल - पूज्यनीय और माननीय दोनों बनते हो। तो अपने आप से पूछो, ऐसे पुण्यात्मा बन, सदैव पुण्य का कार्य करते हैं? सम्मान दो वा सम्मान मिलना चाहिए, वा मेरा सम्मान क्यों नहीं रखा जाता, इसका क्यों रखा जाता? लेने वाले हो या देने वाले हो? यह भी लेने की भावना रॉयल बेगरपन अर्थात् भिखारीपन है। तो स्वमान और सम्मान। स्वमान में रहना है सम्मान देना है।
बाकी क्या करना है? हर कदम फ़रमान पर चलना है। हर कदम फ़रमान पर चलने वाले के आगे सारी विश्व सदा कुर्बान जाती है। साथ-साथ माया भी अपने वंश सहित कुर्बान हो जाती है अर्थात् सरेन्डर हो जाती है। माया बार-बार वार करती है, इससे सिद्ध है कि हर कदम फ़रमान पर नहीं है। सदा फ़रमान पर न चलने कारण, माया भी झाटकू रूप में कुर्बान नहीं होती है। इसलिए बार-बार वार करती है। और बार-बार आप लोगों को चिल्लाने के निमित्त बन जाती है। चिल्लाना हुआ ना - माया आ गयी। आज इस रूप में आ गई। अब क्या करें! माया को अर्थात् विघ्न को कैसे मिटावें। तो झाटकू न होने के कारण, माया भी चिल्लाती - आप भी चिल्लाते हो। इसलिए फ़रमान पर चलो, तो वह कुर्बान हो जाए। आप बाप पर कुर्बान जाओ, माया आप पर कुर्बान जायेगी। कितना सहज साधन है फ़रमान पर चलना। स्वमान और फ़रमान सहज है ना। इसको अपनाने से जन्म-जन्मान्तर की मुश्किल से छूट जायेंगे। अभी सहज योगी और भविष्य में सहज जीवन होगी। ऐसी सहज जीवन बनाओ। समझा, अच्छा।
ऐसे सदा फ़रमान पर चलने वाले फ़रमानबरदार, सदा स्वमान में रहने वाले, अल्पकाल के विनाशी मान का त्याग करने वाले, सदा माननीय, पूज्यनीय का पार्ट प्राप्त करने वाले, ऐसे बाप पर सदा कुर्बान होने वाली आत्माएं, सदा सर्व के प्रति सम्मान दे, स्नेह लेने वाली स्नेही आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
पाण्डव सेना युद्ध के मैदान पर है। पाण्डवों को महावीर कहा जाता है। महावीर अर्थात् सदा मायाजीत। महावीर कभी माया से घबराते नहीं, चैलेंज करते हैं। किसी भी रूप में माया आवे, लेकिन परखने की शक्ति से माया को परखते हुए विजयी होंगे। तो परखने की शक्ति आई है? माया को दूर से आते हुए परख लेते हो वा जब माया वार करने शुरू करती है तब परखते हो? जितनी-जितनी परखने की शक्ति तेज होती जायेगी तो दूर से ही माया को भगा देंगे। अगर आ गई, फिर भगाया, तो उसमें भी टाईम वेस्ट हो जाता। फिर आते-आते कभी बैठ भी जायेगी इसलिए आने ही नहीं देना है। आजकल के जमाने में दूरादेशी बनने का अभ्यास करना होगा। साइन्स के साधन भी दूर से परखने का प्रयत्न करते हैं। पहले का त़ुफान आना और उससे बचाव करना लेकिन अभी ऐसे नहीं है। अभी तो त़ुफान आ रहा है, उसको जान करके भगाने का प्रयत्न करते हैं। जब साइन्स भी आगे बढ़ रही है तो सायलेंस की शक्ति कितनी आगे चाहिए? दूर से भगाने के लिए सदैव त्रिकालदर्शीपन की स्थिति में स्थित रहो। हर बात को तीनों कालों से देखो - क्या बात है? वर्तमान रूप क्या है? और पहले भी इस रूप से आई थी और अब जो आई है उसको समाप्त कैसे करें? तो तीनों को देखने से कभी भी माया का वार आपके ऊपर हार खिलाने के निमित्त नहीं बनेगा। लेकिन त्रिकालदर्शी हो नहीं देखते, वर्तमान को देखते। इसलिए कभी हार कभी जीत होती, सदा विजयी नहीं होते। त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित रहने वाले से कभी भी माया बच नहीं सकती। अगर बार-बार माया का वार होता रहेगा तो अतीन्द्रिय सुख का अनुभव चाहते हुए भी कर नहीं पायेंगे। जो गायन है अतीन्द्रिय सुख संगमयुग का वरदान है - यह और किसी युग में नहीं होता। यह अब का अनुभव है। तो अगर अतीन्द्रिय सुख का अनुभव नहीं किया तो ब्राह्मण बनकर क्या किया? जो ब्राह्मणपन की विशेषता है - अतीन्द्रिय सुख, वह नहीं किया तो कुछ भी नहीं। इसी कारण सदैव यह देखो कि सदा अतीन्द्रिय सुख में रहते हैं।
बापदादा से प्रश्न उत्तर
प्रश्न :- अतीन्द्रिय सुख में रहने वालों की निशानी क्या होगी?
उत्तर :- अतीन्द्रिय सुख में रहने वाला कभी अल्पकाल के इन्द्रियों के सुख की तऱफ आकर्षित नहीं होगा। जैसे कोई साहूकार रास्ते चलते हुए कोई चीज़ पर आकर्षित नहीं होगा - क्योंकि वह सम्पन्न है, भरपूर है। इसी रीति से अतीन्द्रिय सुख में रहने वाला इन्द्रियों के सुख को ऐसे मानेगा जैसे ज़हर के समान है। तो ज़हर की तऱफ आकर्षित होते हैं क्या? ऐसे इन्द्रियों के सुख से सदा परे रहेंगे। मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, लेकिन नालेजफुल होने के कारण उसके सामने वह तुच्छ दिखाई देगा। अगर चलते-चलते इन्द्रियों के सुख तऱफ आकर्षित होते, इससे सिद्ध है कि अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति में कोई कमी है। इच्छा है लेकिन प्राप्ति नहीं। जिज्ञासु है, बच्चा नहीं। बच्चा अर्थात् अधिकारी, जिज्ञासु अर्थात् इच्छा रखने वाले। प्राप्त हो - यह इच्छा नहीं, लेकिन प्राप्त है - इस अधिकार की खुशी में रहने वाले। सदा इस अतीन्द्रिय सुख में रहो। इन्द्रियों के सुख का अनुभव कितने जन्म से कर रहे हो? उससे प्राप्ति का भी ज्ञान है ना? क्या प्राप्त हुआ? कमाया और गंवाया। जब गंवाना ही है तो फिर अभी भी उस तऱफ आकर्षित क्यों होते? अतीन्द्रिय सुख की प्राप्ति का समय अभी भी थोड़ा समय है। यह अब नहीं तो कब नहीं मिलेगा। इसका सौदा अभी नहीं किया तो कभी नहीं कर सकेंगे। फिर भी सोचते रहते - छोड़े, नहीं छोड़े। बाप कहते हैं छोड़ो तो छूटे। कहते हैं छूटता नहीं है। पकड़ा खुद है और कहते हैं छूटता नहीं है। रचता तो आप हो ना। बार-बार ठोकर मत खाओ।
प्रश्न :- सदा अचल, अडोल रहने के लिए विशेष किस गुण को धारण करना है?
उत्तर :- सदा गुण ग्राहक बनो। अब हर बात में गुणग्राही होंगे तो हलचल में नहीं आयेंगे। गुणग्राही अर्थात् कल्याणकारी भावना। अवगुण देखने से अकल्याण की भावना और हलचल में रहेंगे। अवगुण में गुण देखना, इसको कहते हैं गुणग्राही। अवगुण देखते भी अपने को गुण उठाना चाहिए। अवगुण वाले से गुण उठाओ कि जैसे यह अवगुण में दृढ़ है वैसे हम गुण में दृढ़ रहें। गुण का ग्राहक बनो अवगुण का नहीं।
प्रश्न:- कौन सा भोजन आत्मा को सदा शक्तिशाली बना देगा?
उत्तर:- खुशी का। कहते हैं ना कि खुशी जैसी खुराक नहीं। खुशी में रहने वाला शक्तिशाली होगा। ड्रामा की ढाल को अच्छी तरह से कार्य में लाने से सदा खुश रहेंगे, मुरझायेंगे नहीं। अगर सदा ड्रामा ही स्मृति रहे तो कभी भी मुरझा नहीं सकते। सदा खुशी बुद्धि तक, नालेज के रूप में नहीं। कोई भी दृश्य हो अपना कल्याण निकाल लेना चाहिए। तो सदा खुश रहेंगे।
ऐसी श्रेष्ठ भूमि पर आना अर्थात् भाग्यशाली बनना। इसी भाग्य को सदा कायम रखने के लिए सदा अटेन्शन - स्थिति सदा एकरस रहे। एकरस स्थिति अर्थात् एक के ही रस में रहना और कोई भी रस अपनी तऱफ खींचे नहीं। अगर किसी अन्य रस में बुद्धि जाती है तो एकरस नहीं रह सकते।
बाप के समान स्वयं को नालेजफुल अर्थात् ज्ञान का सागर अनुभव करते हो? नालेजफुल अर्थात् सदा सत्य कर्म करने वाले, व्यर्थ नहीं करेंगे। जब सत्य बाप के बच्चे हैं, सतयुग स्थापन करते हैं तो कर्म भी सत्य होने चाहिए। बोल, कर्म, संकल्प सब सत्य होने चाहिए। इसको कहते बाप के समान मास्टर नालेजफुल अर्थात् ज्ञान स्वरूप। अच्छा।