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देवी-देवताओं की 5 योग्यताएँ

देवी-देवताओं की 5 योग्यताएँ
Journey

परमात्मा इस समय संगमयुग में हमसे मिल रहे हैं। यह वह समय है जो कलियुग (मानवता की रात) के अंत और सतयुग (मानवता के दिन) की शुरुआत के बीच होता है।

इस संगमयुग में परमात्मा हमें साधारण मनुष्य से देवी-देवता बनने की शिक्षा दे रहे हैं।

देवी-देवताओं में पाँच मुख्य गुण होते हैं। आज के समय में परमात्मा हमें आध्यात्मिक ज्ञान देकर और मेडिटेशन के माध्यम से उन्हें याद करने की विधि सिखा रहे हैं, ताकि हम इन गुणों को अपने जीवन में धारण कर सकें। आइए, इन पाँच गुणों को जानें—

  1. 1सोलह कला संपूर्ण - यह आत्मा की पूर्णता को दर्शाता है और इसकी तुलना पूर्णिमा से की जाती है। यह पूर्णता आत्मा के 7 ओरिजनल गुण - शांति, आनंद, प्रेम, ज्ञान, पवित्रता, शक्ति और सत्यता के अपनी पूर्ण अवस्था में या 100% होने से आती है। जब हम जन्म और पुनर्जन्म के चक्र से गुजरते हैं तो ये कलाएं कम होने लगती हैं, और 7 गुण 100% के परफेक्शन से कम हो जाते हैं और आत्मा की पूर्णता की तुलना पूर्णिमा से थोड़ी कम होती जाती है, जैसा हम आकाश में भी देख सकते हैं। सतयुग में, 16 कला सम्पन्न अवस्था में आत्मा के अन्दर सभी फिजिकल और नॉन फिजिकल स्किल्स अपनी पूर्ण अवस्था में होते हैं। लेकिन, जैसे-जैसे पूर्णता और कलाएँ कम होती जाती हैं, स्किल्स भी कम होती जाती हैं। 16 कला का संबंध 16 आना यानि कि 1 रुपया यानी 100 पैसे से भी हो सकता है।
  2. 2सर्व गुण सम्पन्न - यह 36 दिव्य गुणों को दर्शाता है। सतयुग की शुरुआत में सभी 36 दिव्य गुण अपनी पूर्ण अवस्था में होते हैं, जब आत्मा 100% शुद्ध होती है और जन्म और पुनर्जन्म के दौरान ये कम होते जाते हैं।
  3. 3संपूर्ण निर्विकारी - इसका तात्पर्य हमारे थॉट्स, वर्ड्स और एक्शंस की पूर्ण शुद्धता से है, जो सतयुग की शुरुआत में मौजूद थे जब आत्मा 100% शुद्ध थी और ये भी जन्म और पुनर्जन्म के दौरान कम होते जाते हैं।
  4. 4मर्यादा पुरूषोतम - इसका अर्थ है आदर्श व्यक्ति जो जीवन के सभी महान सिद्धांतों का पालन करता है। सभी देवी-देवता मर्यादा पुरूषोत्तम हैं।
  5. 5अहिंसा परमोधर्म - इसका अर्थ है जो पूर्ण अहिंसा या अहिंसा के आध्यात्मिक धर्म का पालन करता है और काम-क्रोध की दोहरी हिंसा से मुक्त है। सभी देवी देवता डबल अहिंसक हैं।

आज का अभ्यास

परमात्मा कैसे साधारण मनुष्य को देवी देवता बनने की शिक्षा देते हैं। यह लेख पाँच योग्यताओं, दिव्य गुणों और संगमयुग में आत्मा की श्रेष्ठ अवस्था को सरल शब्दों में स्पष्ट करता है आज के जीवन हेतु

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