समय के साथ शांत रहना सीखें भाग 2

समय के साथ शांत रहना सीखें भाग 2

वर्तमान पल में जीना

समय के सूक्ष्म पहलुओं पर महारत हासिल करने के लिए जरूरी है कि हम समय से डरें नहीं, उससे लड़ें नहीं और न ही उसे अपने हिसाब से चलाने की कोशिश करें। इस स्थिति तक पहुँचने के लिए हमें दो बातों का ध्यान रखना होगा – वर्तमान में जीना और समय के साथ तालमेल बनाकर चलना। वर्तमान में जीने के लिए जरूरी है कि हम खुद को और अपनी परिस्थितियों को पूरी तरह स्वीकार करें। अगर हम वर्तमान से बचने की कोशिश करते हैं, बीती बातों पर पछताते हैं, शिकायत करते हैं या हर बात पर सवाल उठाते हैं, तो हम वहीं उलझे रह जाते हैं और जीवन को और मुश्किल बना लेते हैं। जब हम वर्तमान पल को स्वीकार कर लेते हैं, तो उस पर हमारा नियंत्रण रहता है। स्वीकार करने का अर्थ केवल इतना है कि वर्तमान की परिस्थितियाँ हमारी मन की स्थिति और सकारात्मक ऊर्जा को प्रभावित न करें। हम अपनी मनःस्थिति खुद चुनते हैं। इस तरह स्वीकार करने से हमारे मन में सुकून, कृतज्ञता और जो कुछ हमारे पास है, उसके प्रति संतुष्टि का भाव आता है। हमारा सकारात्मक रवैया संतोष और खुशी की तरंगें फैलाता है। हमारा मन और बुद्धि स्वाभाविक रूप से शांत, रचनात्मक और प्रेमपूर्ण ढंग से काम करने लगते हैं। परिणामस्वरूप, वर्तमान में हमारे विचार, बोल और कर्म सही होते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें, तो वर्तमान में सही कर्म करना ही सबसे महत्वपूर्ण है। थोड़े-थोड़े अभ्यास से हमारा मन धीरे-धीरे वर्तमान में जीना सीख जाता है।

समय के साथ शांत रहने का अर्थ है अतीत के साथ सहज रहना, वर्तमान का सम्मान करना और भविष्य के लिए तैयार रहना।

यह तब संभव होता है, जब हम समय को अपना मित्र और एक भरोसेमंद साथी मानते हैं। जब हमें समय पर भरोसा होता है, तो हम भीतर से स्वतंत्र महसूस करते हैं, क्योंकि फिर न तो अतीत का दुख सताता है और न ही भविष्य की चिंता परेशान करती है। मान लीजिए, ऑफिस में हमें कोई जरूरी काम समय पर पूरा करना है। यदि हम समय के साथ तालमेल बनाकर चलते हैं, तो हमारा विचार होगा – “मैं अपना पूरा प्रयास कर रहा हूँ और समय पर काम पूरा कर लूँगा।” हम समय को लेकर तनाव नहीं लेते, बल्कि अपनी सारी ऊर्जा काम में लगाते हैं। इससे सफलता की संभावना बढ़ जाती है। अगर किसी कारण से सफलता नहीं भी मिलती, तो भी हमारे अंदर परिणाम का सामना करने की शक्ति रहती है। इसके विपरीत, यदि हम समय के साथ सहज नहीं हैं, तो हम तनाव लेने लगते हैं। मन में विचार आते हैं – “इतना सारा काम बाकी है! अगर समय पर पूरा नहीं हुआ तो क्या होगा? पिछले महीने भी मेरी समय-सीमा पार हो गई थी। कहीं बॉस इस बात को लेकर मुझे अगली पदोन्नति देने से मना न कर दें! मुझे जल्दी करनी चाहिए…” इस स्थिति में अतीत की बातों को याद करना और भविष्य की चिंता करना हमारे मन को वर्तमान में अपना सर्वश्रेष्ठ देने से रोक देता है। समय के साथ शांत रहना हमें एक बेहतर अनुभव देता है, क्योंकि हम समय के साथ बहते हैं, उससे आगे निकलने की दौड़ में नहीं भागते। हम हर पल का स्वागत प्रेम के साथ करते हैं और मन में पहले से कोई धारणा नहीं बनाते। हम जीवन को अधिक जीते हैं और कम आलोचना करते हैं। इस तरह आंतरिक स्वतंत्रता हमारे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन जाती है।

(कल जारी रहेगा…)

आज का अभ्यास

आज जब परिस्थितियाँ हमारी इच्छा के अनुसार न हों, तो आइए उन्हें स्वीकार करते हुए अपनी मनःस्थिति को शांत रखें और वर्तमान में सही विचार, बोल और कर्म चुनने का अभ्यास करें।

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