
महिला सशक्तिकरण का अनूठा कार्य
प्रकृति का शाश्वत नियम है रात के बाद दिन और दिन के बाद रात आने का। ठीक उसी तरह जब-जब मानव अपने धर्म-कर्म-मर्यादाओं से गिर जाता है तब-तब कोई न
सन् 1936–37 के दौरान उनके जीवन में गहरा आध्यात्मिक परिवर्तन आया। इसी समय उन्होंने अपने जीवन की दिशा पूरी तरह बदलने का निर्णय लिया और अपना सारा धन व जिम्मेदारी यज्ञ के माताओं-बहनों के हाथों में सौंप दी। इसके बाद उन्होंने स्वयं कभी पैसे को हाथ नहीं लगाया।
उनका एक मुख्य गुण जोकि उनके व्यक्तित्व में सदा झलकता रहता, और लोगों के जीवन को पलट देता रहा, वह था – आत्मिक दृष्टिकोण।
बाबा स्वयं आत्म-स्थिति में रहते हुए, सब देहों में आत्मा ही को देखते। बाबा की क्लास (ज्ञान-सभा) में छोटे बच्चे भी बैठे होते, बूढ़े भी उपस्थित होते, ग्रामीण भी होते और बड़े-बड़े नगरों में ठाठ-बाट से रहने वाले व्यक्ति भी विराजमान होते। परंतु बाबा सबको आत्मिक दृष्टि से देखते।
किसी की कर्मेन्द्रियाँ छपी उपकरण अविकसित हैं किसी के जर्जरीभूत, परंतु इन आत्माओं का भी किसी न किसी तरह, कल्याण करना ही है। अत: वे ऐसे सरल, स्पष्ट, सुबोध और सरस तरीके से अत्यंत उच्च आध्यात्मिक सत्यों को दर्शाते कि बालक, वृद्ध, सभी उनको भली-भाँति समझकर कल्याण के भागी बनें, तभी तो वे सभा के बाद छोटे व बड़े, हरेक से अलग बैठ करके भी उसे ज्ञान-धन से लाभान्वित करते, उसे पितृवत स्नेह देते, उसके मन की उलझनों को दूर करते, उसे आत्मा तथा परमात्मा का बार-बार परिचय देते, सृष्टि के आदि-मध्य- अंत का हाल सुनाते और उसे यथायोग्य ईश्वरीय सेवा में लगाकर आत्मिक स्थिति में स्थित कर देते।
दिखाई देती बाबा की भृकुटी में दिव्य ज्योति
बाबा की आंतरिक स्थिति अत्यंत शांत, स्थिर और प्रेरणादायक थी। उनके पास बैठने वाले लोग अक्सर भीतर एक गहरी शांति और हल्केपन का अनुभव करते। ऐसा लगता जैसे मन का बोझ कम हो रहा हो और व्यर्थ या अशांत विचार अपने आप शांत हो जाते हों।
उस वातावरण में व्यक्ति को अपने जीवन और आचरण को बेहतर बनाने की स्वाभाविक प्रेरणा मिलती और आत्मिक तथा नैतिक मूल्यों की ओर आगे बढ़ने की चाह जागती। यह अनुभव उन्हें इतना प्रिय लगता कि वे उसी शांति और स्थिरता में कुछ समय ठहरना चाहते।
कुछ लोगों को भीतर से अपने प्रश्नों के उत्तर मिलते हुए महसूस होते, मानो मन स्वयं स्पष्ट हो रहा हो। बाबा के सान्निध्य में लोगों को अपनापन, स्नेह और सुरक्षा का भाव मिलता।
जो व्यक्ति दुखी या चिंतित होकर आते, वे हल्के मन और मुस्कान के साथ लौटते।
कई लोगों को ऐसा लगता कि उन्हें जीवन में पहली बार सच्ची शांति और सहारा मिला है—जैसे वे जिस आत्मिक मार्गदर्शन की खोज में थे, उसकी एक झलक उन्हें यहाँ मिल गई हो।
सबके शुभचिन्तक
बाबा कभी भी किसी का अशुभ या अमंगल नहीं सोचते। दूसरों को भी वे सदा यही शिक्षा देते कि न किसी के अकल्याण की बात सोचो और न कभी मुख से अशुभ बोलो।
वे यह भी कहते कि जिस-किसी भी जिज्ञासु को आप ईश्वरीय ज्ञान सुनाने लगते हैं उसके लिए भी पहले मन-ही-मन शिव बाबा को याद करके कहो – “शिव बाबा! यह भी किसी तरह समझ जाये, इसकी भी अन्तरात्मा के कपाट खुल जायें और इसका भी कल्याण हो जाये, और फिर जब आप योग में बैठें तो उस अवस्था में उस व्यक्ति को भी अपनी अंतर्दृष्टि के सामने लाकर, उसे भी योग का दान दें ताकि उसका मन निर्मल हो जाये और ईश्वरीय ज्ञान का बीज उसमें अंकुरित हो।’”
देखिये तो, साकार ब्रह्मा बाबा किस पराकाष्ठा तक सभी के शुभविन्तक थे! बाबा कहते कि हमें अपकारी पर भी उपकार करना है और जो हमारी निंदा करता है उसे भी अपना मित्र समझना है। वे कहते कि किसी के प्रति शुभचिन्ता का सबसे श्रेष्ठ रूप यह है कि हम उसकी बुरी आदतों को सुधार दें और उसका योग परमपिता परमात्मा से जुटा दें।
अपार उत्साह और अदम्य हिम्मत
बहुत कोशिश करने पर भी यदि कोई कार्य संपन्न न होता तो भी अंतिम क्षण तक बाबा उसके लिये पूरा प्रयत्न करते तथा कराते रहते। पुरुषार्थ की चरम सीमा देखनी हो और हिम्मत तथा उत्साह की पराकाष्ठा जाननी हो तो ये दोनों पिताश्री अर्थात् साकार ब्रह्मा बाबा के जीवन में सदा स्पष्ट मिलते।
कभी भी किसी ने उनमें उत्साह की कमी, पुरुषार्थ के प्रति उदासीनता या हारी हुई हिम्मत या आलस्य को नहीं देखा होगा। उन्हें कोई भी कार्य अधूरा छोड़ना, अपूर्ण रीति से करना अथवा बिना कोई परिणाम निकाले उसे छोड़ देना, अच्छा नहीं लगता था।
वे हरेक कार्य को द्रुत गति से परंतु सोच-समझकर और योगयुक्त होकर करने के लिए कहते और वे स्वयं इस विषय में आदर्श थे। पूरा पुरुषार्थ करने के बाद जैसा भी परिणाम होता उसे वे ‘भावी” या ‘ड्रामा’ कहकर सदा प्रसन्न रहते तथा उसी में कल्याण मानते।
वे गतकाल के वृत्तांत से शिक्षा लेकर, नि:संकल्प होकर आगे बढ़ने को कहते। अतः वे बार-बार किसी कार्य के पीछे वत्सों को लगाकर भी उन्हें हिम्मतवान बनाते हुए सफलता तक लाने में तत्पर रहते।
ऐसे अथक पुरुषार्थ करने के कारण ही तो वे ‘भगीरथ’ अर्थात् परमपिता परमात्मा के भाग्यशाली रथ (माध्यम) बने और ज्ञान-गंगा को लाने के निमित्त बने।
स्वयं मेहनत करके दूसरों को प्रेरणा देना
बाबा यज्ञ के स्थूल कार्य भी पहले स्वयं करने लग पड़ते। दूसरों को कहने की बजाय वे स्वयं करने लग जाते। इतनी वृद्ध आयु में उन्हें स्थूल-से-स्थूल कार्य में लगे देखकर अन्य लोग दौड़ कर उस कार्य को करने लगते।
रात्रि की क्लास में भी बाबा प्राय: पूछा करते – ‘लाडले बच्चो! बताओ और कोई सेवा है बाबा के लिये? यह बाप भले ही ऊँचा बनाने वाला है परंतु फिर भी बच्चों का गुलाम है।”
बाबा सदा यही शिक्षा देते कि यथासंभव अपना कार्य स्वयं करो ताकि आप पर कर्मों का बोझ न चढ़े।
खुशी में लाना और हल्का करना
बाबा सदा खुशी में रहते और सदा ऐसी ही बातें सुनाते कि कोई मनुष्य कितना भी अशान्त क्यों न हो, चाहे कितनी भी उलझनों में पड़ा हुआ हो, बाबा की मधुर मुस्कान को देखते ही उसकी उदासी और चिन्ता भाग जाती और उसकी खुशी का पारा चढ़ जाता।
किसी ने भी आज तक बाबा के चेहरे पर चिन्ता या उदासी की रेखा नहीं देखी। इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय की स्थापना के समय से लेकर अंत तक न जाने कितने विघ्न, विरोध, आपदायें और तूफान आये परंतु बाबा सदा कहते – “बच्चे, सत्य की बेड़ी डोलेगी परंतु डूबेगी नहीं। बच्चे, कल्प पहले भी यह हुआ था, यह कोई नई बात नहीं है; सच्चाई की स्थापना करने वालों के सामने ऐसा होता ही है।”
बाबा कहते – “बच्चे, आप पवित्र रहने वाले सच्चे ब्रह्मा कुलभूषण हो। अत: आप पदमापदम भाग्यशाली हो। “’ इस प्रकार, बाबा बच्चों को सदा खुशी और उल्लास में लाते रहते और कहते – “बच्चे! माया के विघ्न तो बहुत ही आयेंगे, परंतु घबराना नहीं और हिम्मत मत हारना।
जबकि आपने शिवबाबा को हाथ दिया है तो आपका अकल्याण नहीं हो सकता। अब आपकी ‘चढ़ती कला’ है, इसलिये सदा यह सोचते हुए चलो कि सर्व-समर्थ शिव बाबा हमारे साथ है। ऐसा निश्चय रखने वाले निश्चयात्मा की विजय होती है।
बस, आप इतना करना कि घबराना नहीं, थकना नहीं और रुकना नहीं, गफ़लत मत करना और आलस्य मत करना, बल्कि जो राह अब शिव बाबा दिखा रहे हैं, उस पर चलते रहना।”
बस, ईश्वर के सदके (प्रेम में) इनको पार करो तो आपके कदम-कदम में पद्मापद्म की कमाई होगी।’ बाबा कहते कि सच्ची खुशी तभी होगी जब आत्मिक स्मृति तथा ईश्वरीय स्मृति में स्थित होवोगे।
इन युक्तियों से बाबा नित्य-प्रति सबको खुशी का प्याला पिलाते हुए उनमें नया दम, नया जोश भरते हुए, उन्हें ऐसे तो ले चलते रहते कि मनुष्य को सब अशुद्ध संकल्प भूल जाते, समस्याएँ हल्की मालूम होतीं ।

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भ्राता जगदीश चन्द्र के रूहानी क्षण ब्रह्मा बाबा के साथ 1953 में माउंट आबू में घटित वह दिव्य अनुभव है, जहाँ बाबा की मुस्कान, स्नेह और योग ने आत्मा को गहन शांति दी। यह अनुभव शब्दों से परे है

Whilst in Karachi, Brahma Baba taught knowledge to the growing family of children, teaching through example as much as through precept. And with the power of meditation (yoga), the souls

हम हृदयंगम करते (दिल से कहते ) हैं कि भगवान हमारा साथी है। भगवान हमारा साथी बना, उसने कब, कैसे साथ दिया यह अनुभव सबको है। एक है सैद्धान्तिक ज्ञान