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5 Apr 1970
“सर्व प्वॉइन्ट का सार प्वाइंट (बिन्दी) बनो”
5 April 1970 · हिंदी
सभी सुनने चाहते हो वा सम्पूर्ण बनने चाहते हो? सम्पूर्ण बनने के बाद सुनना होता होगा? पहले है सुनना फिर है सम्पूर्ण बन जाना। इतनी सभी प्वाइंट सुनी है उन सभी प्वाइंट का स्वरूप क्या है जो बनना है? सर्व सुने हुए प्वाइंट का स्वरूप क्या बनना है? सर्व प्वाइंट का सार वा स्वरूप प्वाइंट (बिन्दी) ही बनना है। सर्व प्वाइंट का सार भी प्वाइंट में आता है तो प्वाइंट रूप बनना है। प्वाइंट अति सूक्ष्म होता है जिसमें सभी समाया हुआ है। इस समय मुख्य पुरुषार्थ कौन-सा चल रहा है? अभी पुरुषार्थ है विस्तार को समाने का। जिसको विस्तार को समाने का तरीका आ जाता है वही बापदादा के समान बन जाते हैं। पहले भी सुनाया था ना कि समाना और समेटना है। जिसको समेटना आता है उनको समाना भी आता है। बीज में कौन सी शक्ति है? वृक्ष के विस्तार को अपने में समाने की। तो अब क्या पुरुषार्थ करना है? बीज स्वरूप स्थिति में स्थित होने का अर्थात् अपने विस्तार को समाने का। तो यह चेक करो। विस्तार करना तो सहज है लेकिन विस्तार को समाना सरल हुआ है? आजकल साइंस वाले भी विस्तार को समेटने का ही पुरुषार्थ कर रहे हैं। साइंस पावर वाले भी तुम सायलेंस की शक्ति वालों से कॉपी करते हैं। जैसे-जैसे साइलेंस की शक्ति सेना पुरुषार्थ करती है वैसा ही वह भी पुरुषार्थ कर रहे हैं। पहले साइलेंस की शक्ति सेना इन्वेन्शन करती है फिर साइंस अपने रूप से इन्वेन्शन करती है। जैसे-जैसे यहाँ रिफाइन होते जाते हैं वैसे ही साइंस भी रिफाइन होती जाती है। जो बातें पहले उन्हों को भी असम्भव लगती थी वह अब सम्भव होती जा रही हैं। वैसे ही यहाँ भी असम्भव बातें सरल और सम्भव होती जाती है। अब मुख्य पुरुषार्थ यही करना है कि अपने को सभी से समीप लाना है। आवाज़ में आना जितना सहज है उतना ही आवाज़ से परे जाना सहज हो। इसको ही सम्पूर्ण स्थिति के समीप की स्थिति कहा जाता है।
यह ग्रुप कौन-सा है? इस ग्रुप के हरेक मूर्त में अपनी-अपनी विशेषता है। विशेषता के कारण ही सृष्टि में विशेष आत्माएं बने हैं। विशेष आत्मायें तो हो ही। अब क्या बनना है? विशेष हो, अब श्रेष्ठ बनना है। श्रेष्ठ बनने के लिए भट्ठी में क्या करेंगे? इस ग्रुप में एक विशेषता है जो कोई में नहीं थी। वह कौन सी एक विशेषता है? अपनी विशेषता को जानते हो? इस ग्रुप की यही विशेषता देख रहे हैं कि पुरुषार्थी की लेवल में एक दो के नज़दीक हैं। हरेक के मन में कुछ करके दिखाने का ही उमंग है। इसलिए इस ग्रुप को बापदादा यही नाम दे रहे हैं - होवनहार और उम्मीदवार ग्रुप और यही ग्रुप है जो सृष्टि के सामने अपना असली रूप प्रत्यक्ष करके दिखा सकता है। मैदान में खड़ी हुई सेना यह है। आप लोग तो बैकबोन हो। तो बापदादा के कर्तव्य को प्रत्यक्ष करने की यह भुजाएं हैं। मालूम है कि भुजाओं में क्या-क्या अलंकार होते हैं? बापदादा की भुजाएं अलंकारधारी हैं। तो अपने आपसे पूछो कि हम भुजाएं अलंकारधारी हैं? कौन-कौन से अलंकार धारण किये हुये मैदान पर उपस्थित हो? सर्व अलंकारों को जानते हो ना? तो अलंकारधारी भुजाएं हो? अलंकारधारी शक्तियां ही बापदादा का शो करती हैं। शक्तियों की भुजाएं कभी भी खाली नहीं दिखाते। अलंकार कायम होंगे तो ललकार होगी। तो बापदादा आज क्या देख रहे है? एक एक भुजा के अलंकार और रफ्तार। इस ग्रुप को भट्ठी में क्या करायेंगे? शक्तियों का मुख्य गुण क्या है?
इस ग्रुप में एक तो शक्तिपन का पहला गुण निर्भयता और दूसरा विस्तार को एक सेकेण्ड में समेटने की युक्ति भी सिखाना। एकता और एकरस। अनेक संस्कारों को एक शुद्ध संस्कार कैसे बनायें - यह भी इस भट्टी में सिखाना है। कम समय और कम बोलना लेकिन सफलता अधिक हो। यह भी तरीका सिखाना है। सुनना और स्वरूप बन जाना है। सुनना अधिक और स्वरूप बनना कम नहीं। सुनते जाना और बनते जाना। अब साक्षात्कार मूर्त बनकर जाना, वाचा मूर्ति नहीं। जो भी आप सभी को देखे तो आकारी और अलंकारी देखे। सेन्स बहुत है लेकिन अब क्या करना है? ज्ञान का जो इसेन्स है उसमें रहना है। सेन्स को इसेन्स में लगा देना है। तब ही जो बापदादा उम्मीद रखते हैं वह प्रत्यक्ष दिखायेंगे। इसेन्स को जानते हो ना। जो इस ज्ञान की आवश्यक बातें हैं वही इसेन्स है। अगर वह आवश्यक बातें धारण कर लो तो सर्व आवश्यकताएं पूरी हो जायेंगी। अभी कोई-न-कोई आवश्यकताएं हैं। लेकिन इन आवश्यकताओं को सदा के लिए पूर्ण करने के लिए दो आवश्यक बातें हैं। जो बताई - आकारी और अलंकारी बनना। आकारी और अलंकारी बनने के लिए सिर्फ एक शब्द धारण करना है। वह कौन-सा शब्द है जिसमें आकारी और अलंकारी दोनों आ जायें? वह एक शब्द है लाइट। लाइट का अर्थ एक तो ज्योति भी है और लाइट का अर्थ हल्का भी है। तो हल्कापन और प्रकाशमय भी। अलंकारी भी और आकारी भी। ज्योति स्वरूप भी, ज्वाला स्वरूप भी और फिर हल्का, आकारी। तो एक ही लाइट शब्द में दोनों बातें आ गई ना। इसमें कर्तव्य भी आ जाता है। कर्तव्य क्या है? लाइट हाउस बनना। लाइट में स्वरूप भी आ जाता है। कर्तव्य भी आ जाता है।
(हरेक टीचर्स को बापदादा द्वारा पर्सनल ज्ञान रत्नों की सौगात मिली)
टीका क्यों लगाया जाता है? जैसे तिलक मस्तक पर ही लगाया जाता है, ऐसे ही बिन्दी स्वरूप यह भी तिलक है जो सदैव लगा ही रहे। दूसरा भविष्य का राजतिलक यह भी तिलक ही है। दोनों की स्मृति रहे। उसकी निशानी यह तिलक है। निशानी को देख नशा रहे। यह निशानी सदा काल के लिए दी जाती है। जैसे सुनाया या प्वाइंट, वैसे यह तिलक भी प्वाइंट है। समेटना और समाना आता है? समेटना और समाना यह जादूगरी का काम है। जादूगर लोग कोई भी चीज़ को समेटकर भी दिखाते, समाकर भी दिखाते। इतनी बड़ी चीज़ छोटी में भी समाकर दिखाते। यही जादूगरी सीखनी है। प्रैक्टिस यह करो। विस्तार में जाते फिर वहाँ ही समाने का पुरुषार्थ करो। जिस समय देखो कि बुद्धि बहुत विस्तार में गई हुई है उस समय यह अभ्यास करो। इतने विस्तार को समा सकते हो? तब आप बाप के समान बनेंगे। बाप को जादूगर कहते हैं ना। तो बच्चे क्या हैं? शीतल स्वरूप और ज्योति स्वरूप, दोनों ही स्वरूप में स्थित होना आता है? अभी-अभी ज्योति स्वरूप, अभी-अभी शीतल स्वरूप। जब दोनों स्वरूप में स्थित होना आता है। तब एकरस स्थिति रह सकती है। दोनों की समानता चाहिए यही वर्तमान पुरुषार्थ है।
यह पुष्प क्यों दे रहे हैं? अनेक जन्मों में जो बाप की पूजा की है वह रिटर्न एक जन्म में बापदादा देता है। जो न्यारा होता है वही अति प्यारा होता है। अगर सर्व का अति प्यारा बनना है, तो सर्व बातों से जितना न्यारा बनेंगे उतना सर्व का प्यारा। जितना न्यारापन उतना ही प्यारापन। और ऐसे जो न्यारे प्यारे होते हैं उनको बापदादा का सहारा मिलता है। न्यारे बनते जाना अर्थात् प्यारे बनते जाना। अगर मानो कोई आत्मा के प्यारे नहीं बन सकते हैं उसका कारण यही होता है कि उस आत्मा के संस्कार और स्वभाव से न्यारे नहीं बनते। जितना जिसका न्यारापन का अनुभव होगा उतना स्वत: प्यारा बनता जायेगा। प्यारे बनने का पुरुषार्थ नहीं, न्यारे बनने का पुरुषार्थ करना है। न्यारे बनने की प्रालब्ध है प्यारा बनना। यह अभी की प्रालब्ध है। जैसे बाप सभी को प्यारा है वैसे बच्चों को सारे जगत की आत्माओं का प्यारा बनना है। उसका पुरुषार्थ सुनाया कि उसकी चलन में न्यारापन। तो यह पुष्प है जग से न्यारे और जग से प्यारे बनने का। इस ग्रुप में हर्ष-पन भी है, अभी हर्ष में क्या एड करना है? आकर्षण-मूर्त कैसे बनेंगे? जब अपनी बुद्धि सर्व आकर्षणों से परे होगी तो आकर्षण मूर्त बनेंगे। जब तक कोई भी आकर्षण बुद्धि में है तो वह आकर्षित नहीं होते। जो आकर्षण-मूर्त बनते हैं वही आकारी मूर्त बनते हैं। बाप आकारी होते हुए भी आकर्षण मूर्त थे ना। जितना-जितना आकारी उतना-उतना आकर्षण। जैसे वह लोग पृथ्वी से परे स्पेस में जाते हैं तब पृथ्वी की आकर्षण से परे जाते हैं। तुम पुरानी दुनिया के आकर्षण से परे जायेंगे। फिर न चाहते हुए भी आकर्षण मूर्त बन जायेंगे। साकार में होते हुए भी सभी को आकारी देखना है। सर्विस का भी बहुत बल मिलता है। एक है अपने पुरुषार्थ का बल। एक औरों की सर्विस करने से भी बल मिलता है। तो दोनों ही बल प्राप्त होते हैं। बापदादा का स्नेह कैसे प्राप्त होता है, मालूम है? जितना-जितना बाप के कर्तव्य में सहयोगी बनते हैं उतना-उतना स्नेह। कर्तव्य के सहयोग से स्नेह मिलता है। ऐसा अनुभव है? जिस दिन कर्तव्य के अधिक सहयोगी होते हैं, उस दिन स्नेह का विशेष अधिक अनुभव होता है? सदा सहयोगी सदा स्नेही। स्वमान कैसे प्राप्त होता है? जितना निर्माण उतना स्वमान। और जितना-जितना बापदादा के समान उतना ही स्वमान। निर्माण भी बनना है समान भी बनना है। ऐसा ही पुरुषार्थ करना हे। निर्माणता में भी कमी नहीं तो समानता में भी कमी नहीं। फिर स्वमान में भी कमी नहीं। अपनी स्वमान की परख समानता से देखनी है।
बापदादा का अपने से साक्षात्कार कराने लिये क्या बनना पड़ेगा? कोई भी चीज़ का साक्षात्कार किस में होता है? दर्पण में। तो अपने को दर्पण बनाना पड़ेगा। दर्पण तब बनेंगे जब सम्पूर्ण अर्पण होंगे। सम्पूर्ण अर्पण तो श्रेष्ठ दर्पण, जिस दर्पण में स्पष्ट साक्षात्कार होता है। अगर यथायोग्य यथाशक्ति अर्पण है तो दर्पण भी यथायोग्य यथाशक्ति है। सम्पूर्ण अर्पण अर्थात् स्वयं के भान से भी अर्पण। अपने को क्या समझना है? विशेष कुमारी का कर्तव्य यही है जो सभी बापदादा का साक्षात्कार करायें। सिर्फ वाणी से नहीं लेकिन अपनी सूरत से। जो बाप में विशेषताएं थीं साकार में, वे अपने में लानी हैं। यह है विशेष ग्रुप। इस ग्रुप को जैसे साकार में कहते थे जो ओटे सो अर्जुन समान अल्ला। तो इस ग्रुप को भी समान अल्ला बनना है। ऐसे करके दिखाना जैसे मस्तक में यह तिलक चमकता है ऐसे सृष्टि में स्वयं को चमकाना है। ऐसा लक्ष्य रखना है। सर्विस में सहयोगी होने के कारण बापदादा का विशेष स्नेह भी है। सहयोग और स्नेह के साथ अभी शक्ति भरनी है। अभी शक्तिरूप बनना है। शक्तियों में विशेष कौन सी शक्ति भरनी है? सहनशक्ति। जिसमें सहन शक्ति कम उसमें सम्पूर्णता भी कम। विशेष इस शक्ति को धारण करके शक्ति स्वरूप बन जाना है। तृप्त आत्मा जो होती है उनका विशेष गुण है निर्भयता और सन्तुष्ट रहना। जो स्वयं संतुष्ट रहता है और दूसरों को सन्तुष्ट रखता है उसमें सर्वगुण आ जाते हैं। जितना-जितना शक्तिस्वरूप होंगे तो कमजोरी सामने रह नहीं सकती। तो शक्तिरूप बनकर जाना। ब्रह्माकुमारी भी नहीं, कुमारी रूप में कहाँ-कहाँ कमजोरी आ जाती है। शक्ति-रूप में संघार की शक्ति है। शक्ति सदैव विजयी है। शक्तियों के गले में सदैव विजय की माला होती है। शक्ति-रूप की विस्मृति से विजय भी दूर हो जाती है इसलिये सदा अपने को शक्ति समझना।
बच्चे बाप से बड़े जादूगर हैं। बाप से बड़े जादूगर इसलिये हैं, जो बाप को जो बनाने चाहते वह बना सकते हैं। बाप के लिये तो गायन है कि जो चाहे सो बना सकते लेकिन भगवान को जो चाहे सो बना सकते, वह कौन? बच्चे। अव्यक्त होते भी व्यक्त में लाते यह जादूगरी कहें? अव्यक्त होने के दिन नज़दीक हैं तब तो अव्यक्त की लिफ्ट मिली है। ज्ञानमूर्त और यादमूर्त दोनों में समान बनना है। जब चाहें तब ज्ञान मूर्त जब चाहे तब याद मूर्त बनें। जितना जो खुद यादमूर्त हो रहता है उतना ही वह औरों को बाप की याद दिला सकते हैं। यादमूर्त बन सभी को याद दिलाना है। समय का इंतजार करती हो या समय तुम्हारा इंतजार करता है? समय के लिए अपने को इंतजार नहीं करना है। अपने को सदैव ऐसे ही एवररेडी रखना है जो कभी भी समय आ जाये। इंतजार को खत्म करके इंतजाम रखना है। जब अपना इंतजाम पूरा होता है फिर इंतजार करने की आवश्यकता नहीं रहती। उसको ही कहा जाता है एवररेडी। सब में एवररेडी। सिर्फ सर्विस में नहीं, पुरुषार्थ में भी एवररेडी। संस्कारों को समीप करने में भी एवररेडी। विशेष स्नेह है इसलिए विशेष बनाने की बातें चल रही हैं। वृक्ष में जो पीछे-पीछे फूल और पत्ते लगते हैं वे कैसे होते हैं? पहले वाले पुराने होते हैं और पीछे वाले बड़े सुन्दर होते हैं। तो यह भी पीछे आये हैं लेकिन प्यारे बहुत हैं। पीछे वाले नर्म बहुत हैं। यहाँ नर्म में क्या है? जितना नर्म उतना गर्म। अगर सिर्फ नर्म होंगे तो कोई छीन भी लेगा। कोमल बनने के साथ कमाल करनी है। कोमलता और कमाल दोनों ही संग होने से कमाल कर दिखाते हैं। यह सारा ग्रुप कमाल करके दिखाने वाले हैं। ऐसा लक्ष्य रखना है जो कोई कमाल करके दिखाये। तब कहेंगे बड़े, बड़े हैं लेकिन छोटे समान अल्ला। जैसा-जैसा कर्म करेंगे वैसा नाम पड़ेगा। अगर श्रेष्ठ काम करेंगे तो नाम पड़ेगा श्रेष्ठमणी। श्रेष्ठमणी को सर्व कार्य श्रेष्ठ करने पड़ते हैं। मन, वाणी, कर्म से सरलता और सहनशीलता यह दोनों आवश्यक हैं। अगर सरलता है सहनशीलता नहीं तो भी श्रेष्ठ नहीं। इसलिए सरलता और सहनशीलता दोनों साथ-साथ चाहिए। अगर सहनशीलता के बिना सरलता आ जाती है तो भोलापन कहा जाता है। सरलता के साथ सहनशीलता है तो शक्ति स्वरूप कहा जाता है। शक्तियों में सरलता और सहनशीलता दोनों ही गुण चाहिए। अभी की रिजल्ट में यही देखते हैं कि कहाँ सहनशीलता अधिक है कहाँ सरलता अधिक है। अब इन दोनों को समान बनाना है। मधुरता भी चाहिए। शक्तिरूप भी चाहिए। देवियों के चित्र बहुत देखते हैं तो उनमें क्या देखा है? जितना ज्वाला उतनी शीतलता। कर्तव्य ज्वाला का है। सूरत शीतलता की है। यह है अन्तिम स्वरूप।
जैसे बुद्धि से छोटा बिन्दु खिसक जाता है। ऐसे यह छोटा बिन्दु भी हाथ से खिसक जाता है। जितना-जितना अपने देह से न्यारे रहेंगे उतना समय बात से भी न्यारे। जैसे वस्त्र उतारना और पहनना सहज है कि मुश्किल? इस रीति से न्यारे होंगे तो शरीर के भान में आना, शरीर के भान से निकलना यह भी ऐसे लगेगा। अभी-अभी शरीर का वस्त्र धारण किया, अभी-अभी उतारा। मुख्य पुरुषार्थ आज इस विशेष बात पर करना है। जब यह मुख्य पुरुषार्थ करेंगे तब मुख्य रत्नों में आयेंगे। यह बिन्दी लगाना कितना सहज है। ऐसे ही बिन्दी रूप हो जाना सहज है।
ब्राह्मणों की लेन देन कौनसी होती है? स्नेह लेना और स्नेह देना। स्नेह देने से ही स्नेह मिलता है। स्नेह के देने लेने से बाप का स्नेह भी लेते और ऐसे ही स्नेही समीप होते हैं। स्नेह वाले दूर होते भी समीप हैं। बापदादा के समीप आने लिये स्नेह की लेन-देन करके समीप आना है। इस लेन-देन में रात दिन बिताना है। यही ब्राह्मणों का कर्तव्य है, तो ब्राह्मणों का लक्षण भी है। स्नेही बनने लिये क्या करना पड़ेगा? जितना जो विदेही होगा उतना वो स्नेही होगा। तो विदेही बनना अर्थात् स्नेही बनना क्योंकि बाप विदेही है ना। ऐसे ही देह में रहते विदेही रहने वाले सर्व के स्नेही रहते हैं। यही नोट करना है कितना विदेही रहते हैं। ऐसा श्रेष्ठ सौभाग्य कब स्वप्न में भी था? तो जैसे यह स्वप्न में भी संकल्प नहीं था ऐसे ही जो भी कमजोरियां हैं उन्हों का भी स्वप्न में संकल्प नहीं रहना चाहिए। ऐसा पुरुषार्थ करना है। लक्ष्य भी रखो कि यह कमजोरियाँ पूर्व जन्म के बहुत जन्मों की हैं। वर्तमान जन्म के लिए ऐसी कमजोरियों का प्राय: लोप करो। मास्टर सर्वशक्तिमान हो? सर्वशक्तिमान के बच्चे अर्थात् सर्वशक्तिमान। ऐसे कभी नहीं कहें कि मैं यह नहीं कर सकती। सब कुछ कर सकती हूँ। कोई भी असम्भव बात नहीं। कोई मुश्किल बात भी सहज। उनके लिए कुछ मुश्किल होता है? नहीं। मास्टर सर्वशक्तिमान बनना है। एक शक्ति की भी कमी न रहे। जहाँ भी अकेला बनो वहाँ साथ समझो। कहाँ अकेला भेजें तो साथ समझेंगे ना। अगर शिवबाबा साथ है तो फिर कहाँ अकेली हो तो अकेलापन लगेगा नहीं। अकेले रहते भी साथ का अनुभव हो। यह अभ्यास जरूर करना चाहिए। और साथ रहते भी अकेला समझे, यह भी अभ्यास चाहिए। दोनों अभ्यास चाहिए। साथ भी रह सकें और अकेला भी रह सकें। अकेला अर्थात् न्यारा। संगठन अर्थात् प्यारा। न्यारे भी हों तो प्यारे भी हों। अभ्यास दोनों चाहिए। बाप अकेला रहता है या साथ में रहता है? अकेला रहना ही साथ है। बाहर का अकेलापन और अन्दर का साथ। बाहर के साथ से अकेलापन भूल जाते हैं। लेकिन बाहर से अकेले अन्दर से अकेले नहीं।
सभी से श्रेष्ठ मणी कौन होते हैं? मस्तकमणी कौन बनता है? जो मस्तक में विराजमान हुई आत्मा में ज्यादा समय उपस्थित रहता है। वह थोड़े होते हैं। मस्तक में थोड़े, हृदय में बहुत होते हैं। सभी से पहले नज़र कहाँ जाती है? ऐसे मस्तकमणी बनना है। मस्तकमणी वह बनते हैं जो सदैव आस्तिक रहते हैं। वह सदैव हां करते हैं। जो आस्तिक हैं, वही मस्तकमणी हैं। कोई भी बात में ना शब्द संकल्प में भी न हो। ऐसे गुण वाले मस्तक में आ जाते हैं।
गायन योग्य कौन बनते हैं और पूजन योग्य कौन बनते हैं? एक ही बात से दोनों के योग्य बनते हैं या दोनों के लिये दो विशेष बातें हैं? कई ऐसी भी देवियां हैं जिनका गायन बहुत है पूजन कम है। और कोई देवियों का दोनों होता है। तो जो कब कैसे, कब कैसे रहते हैं उनका पूजन एकरस नहीं रहता और जो सदा अपनी स्थिति में रहते तो उनका पूजन भी सदा रहता है। एकरस रहने वाले का पूजन एकरस होता है। पुरुषार्थ में कब शब्द नहीं रहना चाहिए। तीव्र पुरुषार्थी की निशानी है जो कब न कह अब कहते हैं। जो पुरुषार्थ में कब कहेंगे तो उनकी पूजा भी कम। इसलिए कोई भी बात में कब देखेंगे, नहीं। लेकिन अब दिखाऊंगा इसको कहा जाता है तीव्र पुरुषार्थी। सम्पूर्ण स्थिति जो होती है उसमें सर्व शक्तियां सम्पन्न होती हैं। सर्व शक्ति सम्पन्न बनने से सर्वगुण सम्पन्न बनेंगे। भविष्य में बनना है सर्वगुण सम्पन्न, अब बनना है सर्वशक्ति सम्पन्न। जितना सर्व शक्ति सम्पन्न उतना सर्वगुण सम्पन्न बनेंगे।
कितनी शक्तियां होती हैं? मालूम हैं? कौन सी शक्तियां सुनाई थी। एक है स्नेह शक्ति, सम्बन्ध शक्ति, सहयोग शक्ति, सहनशक्ति। यह चार शक्ति हैं तो सम्बन्ध भी समीप है। चारों समान हों। ज्यादा साहस है वा सहनशक्ति है? साहस अर्थात् हिम्मत। जो हिम्मत वाले होते हैं उनको मदद मिलती है। मदद मांगने से नहीं मिलती। हिम्मत रखनी पड़ती है। हिम्मत पूरी रखते हैं मदद बहुत मिलती है। हिम्मत है तो सर्व बातों में मदद है। सदैव हिम्मतवान बनना है फिर बापदादा, दैवी परिवार की मदद आपे ही मिलेगी। स्नेहमूर्त हो? शक्तिमूर्त हो? स्नेह और शक्ति दोनों की आवश्यकता है। शक्तिरूप से विजयी और स्नेह रूप से सम्बन्ध में आते हो। अगर शक्ति नहीं होती तो माया पर विजय नहीं पाते हो। इसलिए शक्ति रूप से विजयी और स्नेह रूप से सम्बन्ध भी चाहिए। दोनों चाहिए। बाप को सर्वशक्तिमान और प्यार का सागर भी कहते हैं। तो स्नेह और शक्ति दोनों चाहिए।
सितारे कितने होते हैं? आप अपने को क्या समझती हो? बापदादा ने कौन से नाम रखे हैं? लक्की सितारे हो। अपने को लक्की समझते हो? लकी तो सभी हैं जब से बाप के बने हो। लेकिन लक्की में भी सदैव सफलता के सितारे। कोई समीप के सितारे, कोई उम्मीद के सितारे। वह हरेक का अपना है। अब सोचना है कि मैं कौन हूँ? अपने को सफलता का सितारा समझना है। प्रत्यक्षफल की कामना नहीं रखने वाले सफलता पाते हैं। ओम् शान्ति।