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सदा व निरंतर रहने वाली खुशी का रहस्य

सदा व निरंतर रहने वाली प्रसन्नता का रहस्य – अंतर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस

प्रसन्नता एक ऐसी चीज़ है जिसकी तलाश हम सभी को है। हमारे द्वारा उठाया गया हर कदम, हमारा हर लक्ष्य और हमारे सभी संबंध आखिरकार हमें प्रसन्नता की ओर ले जाने की इच्छा से ही प्रेरित होते हैं। लेकिन क्या हमने कभी भी स्वयं से पूछा है:
🔹 मुझे प्रसन्नता की जरूरत क्यों है?
🔹 प्रसन्नता का वास्तविक स्रोत क्या है?
🔹 क्या मैं हमेशा प्रसन्न रह सकता हूँ?

1. 12-happiness is now

इस अंतर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस पर, आइए हम इन प्रश्नों पर चिंतन करें और आध्यात्मिक ज्ञान तथा अपने अनुभवों से सही उत्तर खोजें

Happiness – more than just a feeling

प्रसन्नताकेवल एक भाव नहीं, बल्कि हमारी वास्तविक स्थिति है 

प्रसन्नता सिर्फ एक क्षणिक भाव नहीं है, बल्कि यह हमारी असली पहचान है। यह आत्मा की प्राकृतिक अवस्था है। जैसे शरीर को जीवित रहने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है, वैसे ही आत्मा को समृद्ध होने के लिए प्रसन्नता की आवश्यकता होती है। अगर प्रसन्नता न हो, तो सबसे बड़ी सफलता भी अधूरी लगती है, लेकिन अगर प्रसन्नता हो, तो छोटेसेछोटे पल भी संपूर्ण और संतोषजनक महसूस होते हैं।

Achievements, possessions, or relationships

हमने लंबे समय तक यह माना कि प्रसन्नता उपलब्धियों, संपत्तियों या रिश्तों में छिपी हुई है। सोचा कि एक सही नौकरी मिल जाए, एक आदर्श जीवनसाथी मिल जाए, हर चीज़ हमारी योजना के अनुसार हो जाए, तो हमें प्रसन्नता मिल जाएगी। और कुछ समय के लिए, हमें ऐसा लगा भी कि हम प्रसन्न हैं। लेकिन फिर मन कुछ और खोजने लगा। कोई भी चीज़ प्राप्त करने के बाद भी, ऐसा लगता था कि कुछ कुछ अधूरा रह गया है

इसका कारण यह है कि प्रसन्नता कभी भी बाहरी चीज़ों में थी ही नहीं। उनसे मिलने वाला सुख अस्थायी था। जबकि सच्ची प्रसन्नता स्थायी होती है और वह हमारे अंदर से आती है।

The nature of true happiness

सच्ची प्रसन्नता का स्वभाव

प्रसन्नता कोई इच्छा नहीं है, बल्कि मेरी प्राकृतिक अवस्था है। जैसे मछली पानी के बिना जीवित नहीं रह सकती, वैसे ही मैं प्रसन्नता के बिना वास्तव में नहीं जी सकता। जब मैं प्रसन्न रहता हूँ, तो मेरा मन हल्का, रचनात्मक और शांत रहता है। मेरे संबंध अधिक प्रेमपूर्ण हो जाते हैं, और परिस्थितियों का सामना करना आसान लगने लगता है

क्या आपने कभी जाना है; हम हमेशा प्रसन्नता को क्यों खोजते रहते हैं? क्योंकि आत्मा के अंदर उस समय की स्मृति है जब प्रसन्नता स्वाभाविक, सरल और अडिग थी। भले ही जीवन में सब कुछ सही लगता हो, फिर भी मन किसी और चीज़ की खोज करता है। लेकिन वह कोई और वस्तु है, कोई और उपलब्धि, बल्कि आत्मा का स्वयं से पुनः जुड़ना है

यही वह रहस्य है जो हमें सदा रहने वाली प्रसन्नता की ओर ले जाता है।

Happiness comes from within

प्रसन्नता हमारे अंदर ही है

मूल रूप से, हम केवल ये शरीर, नाम या भूमिकाएँ नहीं हैं बल्कि हम सभी आत्माएँ हैं। और आत्मा के रूप में, हमारी मूल प्रकृति शांति, प्रेम, पवित्रता और आनंद है। जैसे एक फूल की सुगंध उसके अस्तित्व से अलग नहीं की जा सकती, वैसे ही प्रसन्नता आत्मा का अभिन्न अंग है।

लेकिन समय के साथ, लगाव, अपेक्षाएँ और गलत धारणाएं हमारी इस प्रसन्नता को वैसे ही ढक लेते हैं, जैसे एक दीपक पर धूल जम जाती है। दीपक की रोशनी गायब नहीं होती, बस छिप जाती है। जितना अधिक हम प्रसन्नता को बाहरी चीज़ों में खोजते हैं, उतनी ही वह अस्थिर हो जाती है। लेकिन जब हम अपने अंदर जाते हैं, तो हमें स्थायी, दिव्य और अपार प्रसन्नता मिलतीहै।

Carefree laughter of a child

एक छोटे बच्चे की कल्पना करें; हँसता, खेलता हुआ एकदम निश्चिंत। यही आत्मा की स्वाभाविक अवस्था है। लेकिन समय के साथ, तनाव, अपेक्षाएँ और लगाव बढ़ते जाते हैं, और हम अपने शरीर, भूमिकाओं, रिश्तों, पदों और धन संपत्तियों से जुड़कर अपनी पहचान बनाने लगते हैं। बस यहीं से हमारी प्रसन्नता अस्थिर और बाहरी कारकों पर निर्भर होने लगती है।

Lamp covered with dust

कल्पना करें कि एक दीपक धूल से ढक गया है लेकिन उसकी रोशनी अब भी मौजूद है, पर छिप गई है। इसी तरह, आत्मा की प्रसन्नता नकारात्मक भावनाओं और गलत मान्यताओं से ढक जातीहै।

योग ध्यान वह प्रक्रिया है, जो इस धूल को साफ करके हमारे आंतरिक प्रकाश को पुनः चमकाता है।

Meditation – clearing the clouds

जैसे सूर्य हमेशा चमकता रहता है, भले ही बादल उसे कितना भी ढक लें, वैसे ही प्रसन्नता हमेशा हमारे अंदर ही है, भले ही तनाव, चिंता या नकारात्मकता उसे कुछ समय के लिए ढक ही क्यों न दें। योग का अभ्यास; निर्भरता और संदेह रूपी मानसिक बादलों की परतों को धीरेधीरे हटाकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप, प्रकाश को प्रकट करता है।

आत्मा के सात मूलभूत गुण

आत्मा के सात दिव्य गुण निम्नलिखित हैं:

1️⃣ पवित्रता हर आत्मा मूल रूप से शुद्ध है।

2️⃣ शांति हम शांति की तलाश करते हैं, क्योंकि यह हमारी स्वाभाविक प्रकृति है।

3️⃣ शक्ति हम शक्तिशाली प्राणी हैं, भले ही कभीकभी हम स्वयं को कमजोर महसूस करें।

4️⃣ ज्ञान बुद्धि और ज्ञान पहले से ही हमारे अंदर ही है, बस हमें उसे जाग्रत करने की आवश्यकता है।

5️⃣ प्रेम प्रेम ही सभी रिश्तों की नींव है।

6️⃣ खुशी (प्रसन्नता) सच्ची खुशी बाहर से नहीं, बल्कि अंदर से आती है।

7️⃣ आनंद आत्मा स्वाभाविक रूप से आनंदित है, और यही उसका सच्चा स्वरूप है।

ये सात गुण हमें कहीं बाहर से खोजने की आवश्यकता नहीं है, वे पहले से ही हमारे अंदर हैं। बस हमें इन्हें पुनः जाग्रत करने की जरूरत है!

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परमात्माआनंद का अनंत स्रोत

हमारी आंतरिक प्रसन्नता से परे एक ऐसा असीम स्रोत है जो कभी भी खत्म नहीं होता, वह है परमात्मा। यदि आत्मा आनंद का झरना है, तो परमात्मा आनंद का सागर है।

एक छोटा तालाब गर्मी में सूख सकता है, लेकिन सागर सदा ही असीम और अथाह बना रहता है। ऐसे ही दुनियावी प्रसन्नता क्षणिक हो सकती है, लेकिन परमात्मा से प्राप्त आनंद शुद्ध और अडिग होता है।

सच्ची प्रसन्नता पाने का अर्थ इसे प्राप्त करना नहीं, बल्कि इसे देना है। जितना अधिक हम प्रेम, सम्मान और करुणा दूसरों को देते हैं, उतनी ही अधिक प्रसन्नता हमारे जीवन में लौटकर आती है।

जैसे एक दीपक अपनी रोशनी किसी अन्य दीपक को देकर कभी कम नहीं करता, वैसे ही प्रसन्नता तब बढ़ती है जब हम इसे खुले दिल से हर एक को बाँटते हैं। कल्पना करें; एक ऐसी दुनिया जहाँ हर कोई प्रसन्न है, लेकिन संसाधनों से नहीं, बल्कि अपनी आत्मा के अंदर की प्रसन्नता से।

1. 7. 1 happiness is now

प्रसन्नता चुनना माना सोच में बदलाव लाना

क्या हम हमेशा प्रसन्न रह सकते हैं? हाँ! लेकिन इसके लिए हमें अपनी सोच में बदलाव लाना होगा:

1️⃣ बाहरी चीज़ों पर निर्भर रहना छोड़ें अगर यह होगा, तो मैं प्रसन्नता रहूँगा।इसके बजाय: “मैं निर्णय लेता हूँ कि मैं हर परिस्थिति में प्रसन्नता रहूँगा।

2️⃣ अपने सच्चे स्वरूप से जुड़ेंयोग और आत्मजागरूकता के माध्यम से मैं याद रख सकता हूँ कि मैं स्वाभाविक रूप से प्रसन्नता से भरपूर एक आत्मा हूं।

3️⃣ माँगने के बजाय देना सीखेंजब मैं प्रेम, सम्मान और करुणा देता हूँ, तो प्रसन्नता स्वतः ही मेरे जीवन में प्रवाहित होने लगती है।

प्रसन्नता एक दीपक के समान है। यदि इसे अपने अंदर जलाए रखा जाए, तो कोई भी बाहरी तूफान इसे बुझा नहीं सकता।

आइए आज से स्वर्णिम भविष्य की शुरुआत करें

वैश्विक प्रसन्नता एक वास्तविकता बन सकती है, यदि हम अपनी अवेयरनेस, मूल्यों और दैनिक कार्य कलापों को बदल दें।

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1️⃣ व्यक्तिगत स्तर पर परिवर्तन : प्रसन्नता मुझसे ही शुरू होती है

  • योग द्वारा आंतरिक स्थिरता जब मैं आत्मा, परमात्मा से जुड़ता हूँ, तो मुझे कभी न मिटने वाले आनंद की अनुभूति होती है।
  • अतीत के दर्द को छोड़ दें क्षमा करें, अपेक्षाएँ छोड़ें, और कृतज्ञता अपनाएँ।
  • आत्मा की चेतना में जिएँ जब मैं स्वयं को और दूसरों को आत्मा के रूप में देखता हूँ, तो प्रेम और शांति स्वाभाविक हो जाते हैं।
Candle can ignite thousands

2️⃣ सामूहिक बदलाव: प्रसन्नता की संस्कृति बनाना

  • यह एक सपना लग सकता है, लेकिन यह पूरी तरह संभव है। जैसे एक जलता दीपक हज़ारों अन्य दीपकों को रोशन कर सकता है, वैसे ही एक संतुष्ट आत्मा अनगिनत अन्य आत्माओं को भी ऊपर उठा सकती है। क्योंकि जब हम बदलते हैं तो दुनिया बदलती है, और जब हम प्रसन्नता को चुनते हैं तो बाकी सभी भी ऐसा करने के लिए प्रेरित होते हैं।
  • जब व्यक्ति प्रसन्नता को अपनी आंतरिक स्थिति के रूप में अपनाते हैं, तो यह सकारात्मक ऊर्जा रिश्तों, परिवारों और समाज में स्वतः फैलती जाती है।
Happy world happiness is now

3️⃣ वैश्विक सद्भाव: एक नया स्वर्ण युग

  • परमात्मा से जुड़ाव परमात्मा आनंद का असीम स्रोत हैं।
  • पवित्रता और सत्यता पर आधारित दुनियाजब हमारे विचार, शब्द और कर्म पवित्र होते हैं, तो दुख और संघर्ष स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
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इसकी शुरुआत अभी ही होनी है! 

प्रसन्न रहना कोई लक्ष्य आवश्यकता नहीं है। बल्कि ये मेरा नेचुरल संस्कार है, इसलिए जीवन के हर पल को जिएं, आइए प्रसन्न रहें और खुशियां मनाएं।

हैप्पी इंटरनेशनल हैप्पीनेस डे!

Meditation commentary

मेडिटेशन कमेंट्री: आंतरिक प्रसन्नता का अनुभव करें

शांति में बैठेंगहरी सांस लेंऔर धीरेधीरे बाहर की ओर छोड़ेंअपने शरीर को रिलैक्स करेंकिसी भी तनाव को मन से जाने देंऔर इस क्षण में पूरी तरह उपस्थित रहें

अब अपना ध्यान भीतर की ओर लाएँबाहरी शोर से दूरएक शांत और स्थिर स्थान के बारे में कल्पना करें

मैं एक प्रकाशमान आत्मा हूँ

इस शरीर से अलगसभी भूमिकाओं और नामों से परेमेरी मूल प्रकृति शांति, प्रेम और गहरी प्रसन्नता है

मुझे बाहर प्रसन्नता खोजने की जरूरत नहीं…. यह पहले से ही मेरे अंदर मौजूद है।

जैसे सूर्य बादलों के पीछे भी चमकता रहता है, वैसे ही मेरी प्रसन्नता हमेशा ही मेरे अंदर है…. बस उसे महसूस किए जाने की आवश्यकता है।

मैं स्वयं को बाहरी चीज़ों के लगाव से मुक्त करता हूँमैं इस आवश्यकता को भी छोड़ता हूँ कि लोग या परिस्थितियाँ मुझे प्रसन्न करें

सच्ची प्रसन्नता कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसे मैं प्राप्त करूँ, बल्कि यह कुछ ऐसा है जिसे मैं स्वयं क्रिएट करता हूँ।

मैं असीम प्रेम और प्रकाश के स्रोत परमप्रिय परमात्मा से जुड़ता हूँ। इस जुड़ाव में, मैं संपूर्णसंतुष्टऔर आनंदित महसूस करता हूँ।

मैं प्रसन्नता का एक झरना हूँजो अपने चारों ओर सभी आत्माओं को आनंद से भरपूर कर रहा है।

जितना अधिक मैं प्रसन्नता बाँटता हूँउतनाही अधिक मैं इस से भरता जाता हूँ।

मेरी प्रसन्नता असीम है…. मैं इस भावना को सदा अपने साथ रखता हूँऔर जानता हूँ कि हमेशा प्रसन्नता रहना मेरी अपनी पसंद है।

ओम शांति।

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