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Bhau vishwakishore ji

भाऊ विश्वकिशोर – अनुभवगाथा

भाऊ विश्वकिशोर बाबा के पक्के वारिस, सदा हाँ जी का पाठ पढ़ने वाले, आज्ञाकारी, वफादार, ईमानदार, बाबा के राइट हैण्ड तथा त्याग, तपस्या की प्रैक्टिकल मूरत थे। आप लौकिक में ब्रह्मा बाबा के लौकिक बड़े भाई के सुपुत्र थे लेकिन बाबा ने ही आपको शुरू से पालना देकर बड़ा किया था। जब बाबा ने अपना सर्वस्व माताओं के आगे समर्पित किया तो भाऊ विश्व किशोर भी बाबा के साथ समर्पित हुए और यज्ञ रक्षक के रूप में, मैनेजर के रूप में अपनी सेवायें देने लगे। आप सदा माताओं बहनों को पूरा सम्मान देते हुए हर कार्य में आगे रहे। आप 12 मार्च, 1968 को अपना पुराना शरीर छोड़ अव्यक्तवतनवासी बने।


 

विश्वकिशोर भाऊ के बारे में दादी निर्मलशान्ता जी बताती हैं – –

बाबा प्रति प्रेम और विश्वास

विश्वकिशोर दादा का लौकिक नाम भैरू दादा था, यज्ञ में सभी उनको ‘भाऊ’ के नाम से जानते है, उन्हें तो आदि से अंत तक बाबा का राइट हैण्ड समझकर, सभी यज्ञ निवासी सम्मान देते थे। भावी अनुसार व्यापार करने के लिए बाबा का कोलकाता जाना हुआ। कोलकाता में सबसे नामीग्रामी स्थान और प्रसिद्ध बिजनेस सेन्टर उस समय न्यू मार्केट ही था जिसे चार्ल्स हॉग मार्केट के नाम से जाना जाता है। लेकिन सभी के मुख से ‘न्यू मार्केट’ नाम ही निकलता है। उस मार्केट के ठीक सामने एक सात मंजिल की इमारत थी जिसमें लिफ्ट लगी हुई थी। उसका ठिकाना (पता) ‘7 ए, लिण्डसे स्ट्रीट, सुराना मेन्सन, न्यू मार्केट’ है। पहली मंजिल पर बाबा ने दुकान यानि जिसे हम गद्दी कहते थे उसे हीरे-जवाहरातों के बिजनेस का स्थान बनाया। दूसरी मंजिल में हम सभी रहते थे, इसके साथ-साथ मुख्य न्यू मार्केट के ठीक बीचों- बीच हीरे-जवाहरातों के शोरूम जैसी एक बहुत बड़ी दुकान थी जिसमें सभी प्रकार के गहने थे, वह जवाहरात का जैसेकि म्यूजियम था। बहुत विदेशी भी वहाँ आकर सैम्पल (नमूना) देखकर ऑर्डर दे जाते थे। लेकिन आपको आश्चर्य होगा कि यह दुकान भी जैसे खुदरा (रिटेल) माल बेचने का बाबा का ही केन्द्र (रिटेल शोरूम) था। यह भाऊ की दुकान थी। अतः ऐसे मीठे भाऊ के पास जो भी ग्राहक होलसेल (थोक) में माल लेने आते थे, वे उन्हें बाबा के पास पहली मंज़िल वाली गद्दी में ले आते थे। कोई भी नया डिजाइन, फैशन वा मनपसंद की ज्वैलरी चाहिए तो उसे बाबा ही बनाकर देते थे। भाऊ, बाबा के लौकिक भाई का बेटा था, अतः बाबा पर शुरू से प्रेम और विश्वास होने के कारण वह जैसेकि परिवार का ही सदस्य था। उन्हें आप बाबा का भाई समझो या बेटा समझो, वे दोनों पार्ट एक-साथ बजाते थे।

सब कार्यों में सफलता का वरदान

शुरू से जो बाबा ने कहा, वे हाँ जी, जी हाँ कहकर करते थे। इनका भी श्रेष्ठ चरित्र व दिव्य जीवनकहानी है तथा वे भी बाबा को कॉपी (अनुसरण) करके सारा बिजनेस समेटकर कराची चले गये। विश्वकिशोर भाऊ तथा सन्तरी दादी ने अपना सब कुछ बाबा को समर्पित किया। दोनों ही यज्ञ-सेवा के आधारस्तंभ होकर रहे। मकान की खरीद-बेच, कपड़े की खरीदारी, गाड़ी-बस का प्रबंध आदि-आदि सभी कार्य बाबा भाऊ से ही करवाते थे। पहला नंबर भाई यही था। बाबा का इसमें और इसका बाबा में बहुत विश्वास था। केवल बाबा से नहीं बल्कि मम्मा से भी और जितने भी यज्ञ-वत्स थे, सभी से बहुत-बहुत स्नेह था। बाबा के समान था, कोई इच्छा नहीं रखता था। अंत तक बाबा के अंग-संग रहकर, बाबा के हर आदेश का पालन कर, यज्ञ की हर प्लानिंग (योजना) को कैसे विधिपूर्वक किया जाये, उसे बाबा के आदेश वा श्रीमत प्रमाण एक्यूरेट करते रहे। उन्हें सभी कार्यों में सफलता जैसेकि वरदान के रूप में मिली हुई थी। बारह मार्च, सन् 1968 में वे पार्थिव शरीर छोड़ एडवांस पार्टी में आज भी सेवारत हैं।

संतरी दादी जी ने एक बार बताया था –

बाबा के भवन के सामने ही विश्वकिशोर जी का घर था। उनके निमंत्रण पर बाबा एक बार वहाँ गीता सुनाने गये। जब बाबा प्रवचन कर रहे थे, तब वहाँ सभा में बैठे बहुत- से व्यक्तियों को बाबा के तन से श्रीकृष्ण का साक्षात्कार हुआ। शान्ति का अनुभव तो सभी को हुआ ही परंतु अनेकानेक को दिव्य साक्षात्कार होने के कारण शहर में धूम मच गई कि बाबा के सत्संग में जाने पर सहज ही साक्षात्कार हो जाता है।


 

ब्रह्माकुमार जगदीश भाई ने ‘भाऊ’ के बारे में इस प्रकार बताया है –

विश्व के मालिक का किशोर बनने जैसा पुरुषार्थ जब शिवबाबा ने सिन्ध अथवा पाकिस्तान से ‘यज्ञ’ को भारत में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया तब आबू में बृज कोठी लेने तथा ब्रह्मामुखवंशावली के आवास-निवास आदि के लिये उचित प्रबंध करने के लिए सबसे पहले एक विशेष अनुभवी ब्रह्माकुमार को भेजा गया था। वह यज्ञ-वत्सों में से एक मुख्य भाई थे जिन्हें शिवबाबा ने ‘विश्वकिशोर’ नाम दिया था। सचमुच जैसा उनका नाम था वैसा उनका पुरुषार्थ भी था। वे भविष्य में विश्व के मालिक (श्री नारायण) का किशोर बनने जैसा ही पुरुषार्थ किया करते थे। जब बाबा को ईश्वरीय साक्षात्कार हुए थे और उन्होंने जवाहरात के धंधे से अवकाश प्राप्त किया था, तब ‘विश्वकिशोर’ जी के मन में भी यह संकल्प था कि ‘मैं भी बाबा का अनुकरण करूँगा।’ उन्होंने बाबा से अपनी हार्दिक इच्छा प्रगट भी की थी। परंतु बाबा ने उन्हें निर्देश दिया था कि अभी थोड़ा ठहरो। कुछ समय के बाद आपको भी पूर्णरूपेण प्रभु-अर्पण होने की राय दे दी जायेगी। विश्वकिशोर जी तो हर हाल में राजी थे, जैसे बाबा उन्हें चलाये वैसे ही चलने में उनको खुशी होती थी। कुछ ही वर्षों के बाद उन्हें इस ईश्वरीय ज्ञान यज्ञ में समर्पण होने की प्रेरणा मिल गई और तब वे सपरिवार इस ईश्वरीय यज्ञ में सर्वस्व समर्पित हो गये थे। उनकी युगल जिनका नाम ब्रह्माकुमारी संतरी था, भी लगन और तन्मयता तथा त्याग से इसी ईश्वरीय विद्या के अध्ययन और सेवाकार्य में लग गई थी। 

मैं मामूली ईश्वरीय सेवक हूँ

विश्वकिशोर जी भी बहुत अनुभवी, विचारवान, निश्चयबुद्धि, त्यागवृत्ति वाले, वफादार और ईमानदार थे। वे जब-कभी लोगों से यज्ञ के किसी कार्य के लिए मिलते तो लोग उनसे पूछते थे, ‘आपका इस संस्था में क्या स्थान है? क्या आप यहाँ के सेक्रेटरी हैं?’ तब विश्वकिशोर जी कहा करते, ‘नहीं, मैं तो माताओं- बहनों का एक छोटा-सा सेवक हूँ अथवा मैं तो एक मामूली ईश्वरीय सेवक हूँ।’ वे पत्र-व्यवहार में भी स्वयं को ‘ईश्वरीय सेवक’ लिखकर हस्ताक्षर करते थे। यों थे तो वे इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के एक प्रबंधक।


 

भ्राता रमेश जी ‘भाऊ’ के बारे में इस प्रकार बताते हैं – –

दादा विश्वकिशोर बहुत ही निष्ठावान और ब्रह्मा बाबा के प्रति असीम श्रद्धा रखने वाले थे। उन्होंने हमारे जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन कराया।

ईश्वरीय सेवा का दरवाजा खोल दिया

एक बार मैं अपने घर में भोजन कर रहा था और दादा विश्वकिशोर बैठे थे। मैं तो बाबा को याद कर भोजन कर रहा था। मैं सोच रहा था कि दादा मेरे घर में खाना नहीं खायेंगे क्योंकि वे खाने के बारे में बहुत धारणामूर्त थे। परन्तु अचानक ही मेरे सामने डाइनिंग टेबल पर आकर दादा ने कहा, रमेश भाई, मुझे खाना ऑफर नहीं करोगे? मैंने कहा, दादा आपको कैसे खाना ऑफर करूँ, हम तो गृहस्थ में रहते हैं और आप सेन्टर पर रहते हैं, आप हम गृहस्थियों के पास कैसे भोजन करेंगे? तब दादा विश्वकिशोर ने कहा, नहीं रमेश, आपके घर में सब पवित्र हैं, आप निमित्त मात्र गृहस्थ व्यवहार संभाल रहे हो, बाकी आपके घर और सेन्टर में कोई फर्क नहीं है इसलिए मैं यहाँ खाना खा सकता हूँ। परिणामरूप, मैंने फौरन अपनी माताजी और ऊषा को कहा कि दादा भी खाना खायेंगे, आप उनके लिए थाली परोस दो। उस दिन हमारे घर में उंधिया की सब्जी बनी थी जिसमें आलू भी थे। मैंने ऊषा को कहा कि सिंधी लोग आलू नहीं खाते इसलिए दादा को आलू नहीं देना तो दादा ने कहा, नहीं रमेश जी, मुझे तो आलू अच्छे लगते हैं, मैं खा सकता हूँ।

इस प्रकार दादा विश्वकिशोर ने हमारे घर भोजन स्वीकार कर, हमारे लिए ईश्वरीय सेवा का दरवाजा खोल दिया और तब से हमारे घर में बहन-भाई खाना खाने लगे। दादा विश्वकिशोर के इस अनुभवयुक्त बोल से नैतिक प्रेरणा पाकर ही मैं मातेश्वरी जी को मुंबई में आने और हमारे घर ठहरने का निमंत्रण दे सका और मातेश्वरी जी हमारे घर 18 मास तक रहे।

ड्राइविंग की परीक्षा

सन् 1957 में हमने ब्रह्मा बाबा और मातेश्वरी जी को मुंबई आने का निमंत्रण दिया। आने से पहले दादा विश्वकिशोर मुंबई आये और मुझे सुबह फोन किया कि रमेश भाई, मुझे ईश्वरीय सेवार्थ कहीं जाना है, इसलिए आप अपनी कार लेकर मेरे पास आ जाओ। मेरे साथ कार में बैठकर दादा कुछ मील दूर तक चले, फिर कहा, रमेश जी, मैं कागज तो सेन्टर पर ही भूल आया हूँ, आप कल आना, हम कल जायेंगे। फिर मैं दादा को वापस सेन्टर छोड़कर आया। दूसरे दिन भी ऐसा ही ड्रामा हुआ। दादा विश्वकिशोर गाड़ी  में बैठे, फिर कहा कि मुझे दूसरी जगह जाना है। फिर मैंने उन्हें सेन्टर पर वापस छोड़ा। इस प्रकार तीन-चार दिन लगातार ऐसा ही चलता रहा। पाँचवें दिन दादा ने मुझे कहा, रमेश, आप समझ गये होंगे कि मैं क्या कर रहा हूँ। मैंने कहा, मुझे कुछ समझ नहीं आया, मैं तो आपके कहने पर आता रहा। तो दादा ने कहा, रमेश, मैं आपकी ड्राइविंग की परीक्षा ले रहा था कि आपकी गाड़ी में ब्रह्मा बाबा और मातेश्वरी जी बैठेंगे तो कहाँ तक वे सेफ रहेंगे, आप हमारी परीक्षा में पास हुए, अब मैं बाबा को लिखूँगा कि जब आप मुंबई में ट्रेन से उतरें तो रमेश भाई की कार में बैठकर जा सकते हैं। परिणामरूप, बाबा-मम्मा हमारी कार में बैठे। बाबा-मम्मा को मैं पूना तक कार चलाकर लेकर गया। इस प्रकार बाबा-मम्मा के नजदीक आने का सौभाग्य मुझे दादा विश्वकिशोर की ड्राइविंग की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के कारण मिला।

मेरे द्वारा कानूनी कागजात बनवाए

आबू का पांडव भवन जब खरीदा गया तब वह दादा विश्वकिशोर के लौकिक नाम पर लिया गया। दादा विश्वकिशोर चाहते थे कि पांडव भवन व्यक्तिगत नाम के बदले संस्था के नाम पर हो जाये। इसलिए उन्होंने मुंबई और दिल्ली के नामीगिरामी वकीलों से, पांडव भवन को यज्ञ के नाम पर ट्रांसफर कराने के लिए कानूनी कागज़ बनवाये परंतु ब्रह्मा बाबा ने इन सब कागज़ों को स्वीकार नहीं किया। फिर जब दादा विश्वकिशोर का प्रोस्टेट का ऑपरेशन नक्की हुआ तब दादा ने सब बातें फाइनल की। मेरे द्वारा पांडव भवन के कानूनी कागजात बनवाये और फिर ऑपरेशन से पहले ब्रह्मा बाबा की स्वीकृति लेने के लिए मेरे साथ आबू जाने का कार्यक्रम बनाया। मुझे कहा कि ये कागज़ ले लो, हम ब्रह्मा बाबा को दिखायेंगे, अगर ब्रह्मा बाबा स्वीकृति देंगे तो फिर पांडव भवन को मेरे नाम से संस्था के नाम पर ट्रांसफर करा देंगे। जैसे ही हम आबू रोड उतरे, तो देखा, भोली दादी स्टेशन पर ब्रह्मा बाबा की चिट्ठी लेकर आई थी। चिट्ठी में ब्रह्मा बाबा ने मुझे तथा विश्वकिशोर को लिखा था कि हमें स्टेशन पर ही स्नान-पानी कर लेना है तथा जो कानूनी कागज मैने बनवाए हैं, उन्हें रजिस्टर्ड कराकर ही ऊपर आना है। दादा को ब्रह्मा बाबा की इस बात की गहराई समझ नहीं आई परंतु बाबा की यह श्रीमत थी इसलिए हम लोगों ने स्टेशन पर ही स्नान किया फिर कागजों को रजिस्टर्ड कराने के लिए स्टेम्प पेपर आदि खरीदे, स्टेम्प वेन्डर ने कहा कि 1 घंटे बाद आना, मैं स्टेम्प पेपर पर टाइप करके रखूँगा। वहाँ से दादा विश्वकिशोर मुझे पोस्ट ऑफिस लेकर गये। वहाँ से दादा ने ब्रह्मा बाबा को फोन किया कि बाबा, रमेश ने जो कागज़ बनाये हैं, उन्हें देखो तो सही फिर रजिस्ट्री करा देंगे। ब्रह्मा बाबा ने साफ कह दिया कि आपको रजिस्टर्ड कराके ही आना है, ऊपर आने के बाद मैं उसका रहस्य बताऊँगा। परिणामरूप, कानूनी कागजातों को हमने आबू रोड में रजिस्ट्रार के ऑफिस में रजिस्टर्ड कराया और फिर बस में बैठकर ऊपर पांडव भवन गये। वहाँ भोजन तथा आराम कर शाम को ब्रह्मा बाबा से मिले। दादा विश्वकिशोर ने फिर से अपने दिल की बात बताई और कहा कि बाबा, हमने बड़े-बड़े वकीलों से कागज बनवाये, उन्हें आपने स्वीकार नहीं किया और रमेश भाई ने जो कागज बनाये, उन्हें देखा भी नहीं और रजिस्टर्ड कराने की स्वीकृति दे दी, ऐसा क्यों? तब ब्रह्मा बाबा ने कहा, त्रिकालदर्शी तुम नहीं, मैं हूँ। मैं जानता हूँ कि रमेश बच्चा इन्कम टैक्स का वकील है, उसे ऐसे कागज बनाने का अभ्यास नहीं है परंतु उनसे पूछो कि उनके द्वारा किसने लिखवाया। रमेश ने लिखा या रमेश के द्वारा मैंने लिखवाया? जब मैंने ही लिखवाया है तो मुझे उसे दुबारा पढ़ने की क्या जरूरत है? इसलिए मैने डायरेक्शन भेजा कि कागजों को रजिस्टर्ड कराकर ही ऊपर आओ। दादा विश्वकिशोर के इस कार्य के आधार पर ईश्वरीय कारोबार के डॉक्यूमेन्टस बनाने का वरदान मुझे मिल गया और बाद में अनेक प्रकार की संपत्ति, यज्ञ के नाम पर या ट्रस्ट के नाम पर देश-विदेश में खरीद करने और कागज आदि बनाने का सौभाग्य मुझे मिला। त्रिकालदर्शी बाप से वरदान रूप में जो यह कला प्राप्त हुई, उसका पूर्ण यश दादा विश्वकिशोर को जाता है। 

पाँच दिन का एक्सट्रा जीवन दिया बाबा ने

दूसरे दिन ब्रह्मा बाबा से जब हम विदाई ले रहे थे तब एक और अनोखी बात हुई। ब्रह्मा बाबा ऐसे तो फोटो के बारे में स्वीकृति नहीं देते थे परंतु उस दिन विदाई के समय ब्रह्मा बाबा ने भ्राता चन्द्रहास को बुलाया और फोटो लेने को कहा। ब्रह्मा बाबा खुद टैक्सी के सामने खड़े हो गये और एक तरफ दादा विश्वकिशोर तो दूसरी तरफ मैं रहा। वह फोटो यादगार फोटो बन गया। जब हम ट्रेन से मुंबई आ रहे थे तब दादा विश्वकिशोर और संतरी दादी साथ में थे तो मैंने दादा से सवाल पूछा कि बाबा तो हमेशा अपना फोटो निकालने के लिए मना करते हैं, आज कैसे बाबा ने खुद चंद्रहास को नींद से उठाकर फोटो निकलवाया? तब दादा विश्वकिशोर ने मुझे एक गूढ़ रहस्य बताया कि मेरी यह ब्रह्मा बाबा से अंतिम मुलाकात थी। मैंने बाबा को अर्जी दी थी कि अभी ईश्वरीय सेवा में बहुत पढ़े-लिखे भाई जैसे दिल्ली में बृजमोहन, जगदीश तथा मुंबई में निर्वैर, रमेश आदि आ गये हैं तो मैं समझता हूँ कि अब मेरा कार्य समाप्त हो गया है, इसलिए मैं एडवांस पार्टी में जाकर बाबा के भविष्य के कारोबार को संभालना चाहता हूँ। बाबा ने तथास्तु कहकर मेरी इस अर्जी को स्वीकार किया। इस ऑपरेशन के बाद मैं उदूँगा नहीं इसलिए मेरी इस अंतिम विदाई का फोटो स्मरण चिह्न के रूप में रखने के लिए बाबा ने अपना नियम तोड़ा। उस समय मुझे दादा विश्वकिशोर के यज्ञ के प्रति असीम प्यार और एडवांस पार्टी में जाकर यज्ञ सेवा अच्छे से अच्छे करने के दृढ़ मनोबल का साक्षात्कार हुआ। बाद में ऑपरेशन हुआ और दादा ने देह-त्याग किया। उनकी पार्थिव देह को जब गामदेवी सेन्टर पर लेकर आये, तब अव्यक्त बापदादा की पधरामणि हुई और अव्यक्त बापदादा ने एकऔर रहस्य बताया कि बच्चे की इच्छा तो ऑपरेशन टेबल पर ही शरीर छोड़ने की थी परंतु यदि ऑपरेशन टेबल पर बच्चा शरीर छोड़ता तो डॉक्टर बदनाम हो जाता इसलिए बाप ने पाँच दिन की लाइफबच्चे को एक्स्ट्रा दी, पाँचवें दिन यज्ञ के प्रति असीम प्यार और एडवांस पार्टी में जाकर यज्ञ सेवा अच्छे से अच्छे करने के दृढ़ मनोबल का साक्षात्कार हुआ। बाद में ऑपरेशन हुआ और दादा ने देह-त्याग किया। उनकी पार्थिव देह को जब गामदेवी सेन्टर पर लेकर आये, तब अव्यक्त बापदादा की पधरामणि हुई और अव्यक्त बापदादा ने एक और रहस्य बताया कि बच्चे की इच्छा तो ऑपरेशन टेबल पर ही शरीर छोड़ने की थी परंतु यदि ऑपरेशन टेबल पर बच्चा शरीरछोड़ता तो डॉक्टर बदनाम हो जाता इसलिए बाप ने पाँच दिन की लाइफ बच्चे को एक्स्ट्रा दी, पाँचवें दिन उनके शरीर को मुक्त किया और अपनी गोद में विश्राम दिया। इस प्रकार इच्छा-मृत्यु का अनुभव हमें दादा विश्वकिशोर से प्राप्त हुआ। बाद में हमने मधुबन फोन किया और ब्रह्मा बाबा से दादा विश्वकिशोर के पार्थिव शरीर को मुंबई से अहमदाबाद और फिर आबू लाने की आज्ञा मांगी तब मोहजीत ब्रह्मा बाबा ने कहा कि बच्चे, अभी उस आत्मा का शरीर के साथ जो संबंध था, वह तो खत्म हो गया है, अभी एडवांस पार्टी में नया कारोबार शुरू होगा, इसलिए शरीर को आबू लाने की जरूरत नहीं है, मुंबई में ही अंतिम संस्कार कर दो। कुमारका बच्ची और संतरी (युगल) दोनों मिलकर अग्नि संस्कार करें। इस प्रकार से दादा विश्वकिशोर के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार मुंबई में किया गया।

हनुमान मिसल सेवा

दादा हमें यज्ञ का आगे का कारोबार करने का सौभाग्य देकर गये और मैं आज तक यह कारोबार, दादा विश्वकिशोर का आज्ञाकारी छोटा भाई समझ कर कर रहा हूँ। मैं दादा विश्वकिशोर को हमेशा ही हनुमान रूप में देखता हूँ क्योंकि हनुमान जी राम- लक्ष्मण की सुरक्षा के लिए हमेशा चिंतित रहते थे। उसी प्रकार से दादा विश्वकिशोर भी मम्मा-बाबा के स्वास्थ्य के लिए हमेशा चिंतित रहते थे। ट्रेन से जब बाबा-मम्मा मुंबई आते तो गुजरात वेस्टर्न रेलवे के जनरल मैनेजर से मिलकर दादा ट्रेन में पुराने जमाने का फर्स्ट क्लास डिब्बा अलग से लगवाते। इस बात का भी ध्यान रखते कि बाबा की सीट के नीचे ट्रेन के पहिये ना आएँ ताकि बाबा गहन नींद का अनुभव कर सकें। दादा विश्वकिशोर को वेस्टर्न रेलवे के सभी ऑफिसर्स जानने लगे थे और इसलिए वे इस प्रकार की व्यवस्था ब्रह्मा बाबा के लिए दे देते।

यज्ञ रक्षक के रूप में सदा सेवारत

मातेश्वरी जी भी जब कैंसर के इलाज के लिए कानपुर से मुंबई आए तो ब्रह्मा बाबा ने दादा विश्वकिशोर को आबू से मातेश्वरी की तंदुरुस्ती के लिए सब प्रकार का प्रबंध करने के लिए मुंबई भेजा। दादा ने ही आकर मातेश्वरी जी के ऑपरेशन आदि का सब प्रकार का प्रबंध मुंबई में किया। मातेश्वरी जी को जब स्ट्रेचर पर लिटाकर ऑपरेशन थियेटर में ले जा रहे थे, तब दादा ने खुद आगे-आगे हनुमान बन स्ट्रेचर को पकड़ लिया और मुझे भी कहा कि आप पीछे से धक्का लगाओ, हम मातेश्वरी को थियेटर तक पहुँचाते हैं। दादा की प्रतिभा इतनी सौम्य और सुन्दर थी कि हॉस्पिटल का कोई भी स्टाफ मेम्बर मना नहीं करता था। दादा खुद स्ट्रेचर पर मातेश्वरी जी को थियेटर तक लेकर गये। इस प्रकार बाबा-मम्मा की तंदुरुस्ती के बारे में दादा सदा तत्पर रहते थे, ऐसे हमारे दादा ने यज्ञ रक्षक के रूप में सदा ही ईश्वरीय सेवायें की।


 

एक बार दादी मनोहर इन्द्रा ने विश्वकिशोर भाऊ के मुंबई हॉस्पिटल में जाने और उसके बाद के घटनाक्रम का इस प्रकार वर्णन किया –

ड्रामा कह सेकण्ड में बात समाप्त कर दी

भ्राता विश्वकिशोर सन् 1938 से परिवार सहित संपूर्ण समर्पित थे और आदि से अन्त तक उसने सारे यज्ञ का कारोबार संभाला था। बहुत ही निश्चयबुद्धि, समर्पित बुद्धि, हर कदम में फालो फादर करने वाले थे। पूरी तरह आज्ञाकारी और वफादार थे। वह बाबा की आज्ञा प्रमाण मुंबई हॉस्पिटल में ऑपरेशन कराने गये और ऑपरेशन ठीक होने के बाद पाँच दिन तक खुश-खैराफत का समाचार मिलता रहा। छठे दिन अचानक उसके शरीर छोड़ने का समाचार मिला। बाबा को जब यह समाचार सुनाया गया, तो बाबा के चेहरे से ऐसा लगा जैसे कुछ हुआ ही नहीं। बाबा ने कहा, बच्चा अच्छा था, आज दिन तक बाबा के पास ऐसा बच्चा नहीं है, आगे चलकर बाबा का कोई न कोई ऐसा बच्चा निकलेगा जो उसकी सीट संभाल लेगा, बच्चा आज्ञाकारी, वफादार, फरमाँबरदार था। बाबा ने ड्रामा कहकर सेकंड में बात समाप्त कर दी और एकदम नष्टोमोहा बन गये।

मुम्बई में ही शरीर रूपी कलेवर का त्याग कर दिया

उनके शरीर छोड़ने के बाद एक संदेश पुत्री हर रोज उस आत्मा को यज्ञ का भोग खिलाने ट्रांस में जाती थी। बापदादा उनको अनेक प्रकार के दृश्य दिखाते थे। वह उन दृश्यों का विवरण हर रोज मधुबन में भेज देती थी। एक दिन बाबा से किसी बच्चे ने पूछा, बाबा, भ्राता विश्वकिशोर प्रति वतन के जो दृश्य आये हैं, उन्हें क्लास में सुनायें, सब उनके बारे में पूछ रहे हैं? इस पर बाबा बोले, बच्चे, दृश्य सुनाने की दरकार ही नहीं है, दृश्य सुनायेंगे तो कुछ न कुछ पाप चढ़ जायेगा क्योंकि जो बच्चे विश्वकिशोर को याद करते रहते हैं, उन्हें बाबा भूल जायेगा। उनका बुद्धियोग बाप से टूटकर बच्चे में लग जायेगा। इसलिए बच्चों को किसी भी देहधारी की याद नहीं दिलानी चाहिए। इस प्रकार बाबा, अनन्य से अनन्य बच्चे की तरफ भी किसी का मोह रूप बुद्धियोग नहीं लगवाना चाहते थे। बाबा का पुरुषार्थ था कि कुछ भी हो जाये पर बच्चों का बुद्धियोग शिवबाबा से दूर न जाए।                              

 भ्राता विश्वकिशोर के शरीर छोड़ने के 13 दिन बाद जब उनकी युगल सन्तरी दादी और शीलइन्द्रा दादी मुम्बई से मधुबन आईं तो वे बहुत प्यार से भाऊ के शरीर के अंतिम समय के (शव के) अनेक प्रकार के फोटो ले आईं और बाबा को दिखाना चाहती थी परंतु बाबा की ऐसी न्यारी-प्यारी स्टेज का अनुभव हो रहा था जो उनकी हिम्मत ही नहीं हुई बाबा को फोटो दिखाने की। फिर भी बाबा के महावाक्य सुनने की इच्छा से, जान बूझकर एक बहन ने उनसे कहा, आप फोटो लाये हो, तो बाबा को क्यों नहीं दिखाते हो? बाबा तो बड़े न्यारे-प्यारे दिव्य रूप में स्थित थे। फिर बाबा ने ही उनसे पूछा, बच्ची, ये फोटो क्यों निकाले ? क्या करोगी? क्या मधुबन के बच्चों ने विश्वकिशोर को नहीं देखा? फिर उनके शव को देखकर क्या करेंगे? अब इन फोटो को यहीं समाप्त कर दो। जितना पैसा इनमें खर्च किया, व्यर्थ गया। बच्ची, तुम जानती हो, बाबा देह से प्यार नहीं करते। आत्मा से बाबा का प्यार है। बाबा जानता है कि वह बच्चा कैसा था, वह क्या कमाई करके गया और भविष्य में क्या पद पायेगा। इसलिए ये फोटो आदि देखना सब छोटे बच्चों का काम है। बाबा के इस प्रकार के बोल सुनकर अंदर में एक प्रेरणा आई कि बाबा कितना नष्टोमोहा है! बाबा का कितना लाडला बच्चा! पर बाबा का न लौकिक में मोह, न अलौकिक में मोह।

उस समय संतरी दादी और शील दादी के मन में यह भी संकल्प था कि हम बाबा को भाऊ की अंतिम स्थिति के बारे में बहुत कुछ समाचार सुनायें। जब वे दोनों बहनें बाबा के सम्मुख बैठी तो बाबा ने उनका सूक्ष्म संकल्प पहले ही कैच कर लिया। वे बाबा को भाऊ के बारे में कुछ सुनाना चाहती थी लेकिन बाबा का रूप ऐसा दिव्य था कि पास्ट की बात को सुनना ही नहीं चाहते थे। उस समय अव्यक्त अवस्था में बैठे बाबा ने दोनों को दृष्टि देकर अशरीरी अवस्था का अनुभव कराया, चारों ओर शान्ति फैल गई।


 

कटक की कमलेश बहन सुनाती हैं – 

सन् 1965 में पहली बार भाऊ से मिली थी, उस समय यज्ञ में तीन मास रही थी। बाबा ने मुझे सुबह और शाम को भाऊ का भोजन बनाने और खिलाने की ड्यूटी दी थी। वे देसी घी नहीं खाते थे, डालडा घी खाते थे। बहुत ही शान्त स्वरूप, नम्रचित्त और सौ प्रतिशत धारणामूर्त थे। कभी किसी को आँखें ऊँची करके नहीं देखते थे। यदि भोजन में किसी भी प्रकार की भूल हो भी जाती थी तो कभी कुछ कहते नहीं थे, हमेशा अच्छा ही कहते थे। भोजन बाबा की याद में करते थे। जब वे भोजन करते थे तो महसूस होता था कि बाबा उनके साथ है। कुछ कहना होता था तो इशारे से कहते थे, आवाज में नहीं आते थे। मैंने उनको बाबा के साथ टहलते देखा बहुत ही निर्मानता से जैसे छोटा बच्चा अपने बाप के साथ टहलता है। हमें जितना बाबा से स्नेह था, उतना ही भाऊ से भी था। जब इनका भोजन बनाने की ड्यूटी मिली तो बहुत खुशी मिली कि हमारा भाग्य खुल गया जो ऐसी आत्मा की सेवा का चांस मिला। जीवन बहुत सात्विक था उनका। संतरी दादी और वे न्यारे-प्यारे नजर आते थे। उन दिनों सेवाकेन्द्र बहुत कम थे पर भाऊ को कई स्थानों पर यज्ञ के विभिन्न कार्यों अर्थ जाना होता था तो बाबा ने उनके लिए एक किट बनाकर दे रखी थी जिसमें भोजन बनाने के बर्तन और भोजन बनाने के पदार्थ होते थे। जहाँ जाते थे, स्वयं बनाकर खाते थे। यज्ञ की मर्यादा का पूरा-पूरा पालन करते थे।


 

पिछले 56 साल से मधुबन में रह रही ब्र.कु. वीनू बहन, विश्वकिशोर भाऊ के बारे में इस प्रकार सुनाती हैं –

विश्वकिशोर भाई का व्यक्तित्व बहुत ऊँचा था। जैसे ब्रह्मा बाबा कहीं भी जाते थे तो दूर से ही अलग लगते थे और आकर्षित करते थे, ऐसे ही भाऊ भी कहीं भी जाते, किधर से भी गुजरते तो ब्रह्मावत्स प्यार से कहते थे, भाऊ आ रहे हैं, शान्ति रखो। सब लोग उन्हें देख अलर्ट हो जाते थे। कई बार कारोबार अर्थ 8 दिन बाद भी बाहर से आते थे। भोली दादी खाना बनाती थी, हम उनको खिलाती थी, तब कहते थे, खाना तो आज ही खाया है। राखी के दिन हम उसको राखी बाँधती थी। एक बार बाबा ने हँसी-हँसी में कहा, बच्ची, तुमने उसको राखी बाँधी, वह तो अपवित्र है ही नहीं, तुमने उसको राखी क्यों बाँधी? मैं उस समय 7 साल की थी। मैंने कहा, बाबा खर्ची मिलेगी। फिर बाबा मुसकरा दिए।

सन् 1968 में भाऊ को ऑपरेशन के लिए मुम्बई ले गए। डॉक्टर ने बोला, आठ दिन बाद ऑप्रेशन होगा तो भाऊ पुनः आबू आ गये। रमेश भाई भी साथ में थे। इन आठ दिनों के दौरान बाबा ने रमेश भाई और भाऊ को अपने साथ ही खाना खिलाया। ड्रामानुसार मानो बाबा ने उसी समय भाऊ पर जी भर स्नेह और पालना लुटा दी। आठ दिन बाद जब जाने का समय आया तब बाबा अपने कमरे में गद्दी पर बैठे थे। बाबा ने कहा, बच्चे, आप जा रहे हो, भले जाओ, बाबा को कोई फिकर नहीं, आपने बाबा को बेफिकर किया है। ऑप्रेशन के समय बाबा उनके प्रति खास योग भी करते रहे। रोज रात को मुम्बई से फोन आता था। बाबा हिस्ट्री हॉल से ऑफिस में जाते थे फोन अटैण्ड करने। आबू से जाने के बाद आठवें दिन सुबह भाऊ ने शरीर छोड़ा। दादी प्रकाशमणि ने मुंबई से फोन पर सूचना दी और पूछा, बॉडी को यहाँ ले आएँ? बाबा ने कहा, नहीं, मुम्बई में ही संस्कार कर दो, केवल बाबा को इतना बताना कि संस्कार करके किस – समय लौटे।

शाम को चार बजे फोन आया दादी का कि संस्कार हो गया है। उस दिन भाऊ का समाचार सुनकर बाबा ने ना नाश्ता किया, ना भोजन किया, सुबह केवल दूध पिया था। इस बीच भारत की प्रथा के अनुसार सारा भण्डारा धोया गया और संस्कार की सूचना के बाद, शाम को ही स्नान आदि करके बाबा ने भोजन किया।

बाद में शील दादी के तन में भोग के समय तीन दिनों तक उनकी आत्मा आती रही हिस्ट्री हॉल में। बाबा ने पूछा, बच्चे, कहाँ जन्म लिया है? भाऊ की आत्मा ने ‘ना’ में सिर हिला दिया। बाबा ने पूछा, क्या बाबा ने मना किया है, फिर ‘हाँ’ में सिर हिला दिया। बाबा ने रिपीट किया कि बच्चे, आप अपना कार्य संपन्न करके गये हो, बाबा को बेफिकर करके गये हो।

मुख्यालय एवं नज़दीकी सेवाकेंद्र

अनुभवगाथा

Bk brijmohan bhai ji anubhavgatha

भारत में प्रथा है कि पहली तनख्वाह लोग अपने गुरु को भेजते हैं। मैंने भी पहली तनख्वाह का ड्राफ्ट बनाकर रजिस्ट्री करवाकर बाबा को भेज दिया। बाबा ने वह ड्राफ्ट वापस भेज दिया और मुझे कहा, किसके कहने से भेजा?

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Didi manmohini anubhav gatha

दीदी, बाबा की ज्ञान-मुरली की मस्तानी थीं। ज्ञान सुनते-सुनते वे मस्त हो जाती थीं। बाबा ने जो भी कहा, उसको तुरन्त धारण कर अमल में लाती थीं। पवित्रता के कारण उनको बहुत सितम सहन करने पड़े।

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Dadi brijindra ji

आप बाबा की लौकिक पुत्रवधू थी। आपका लौकिक नाम राधिका था। पहले-पहले जब बाबा को साक्षात्कार हुए, शिवबाबा की प्रवेशता हुई तो वह सब दृश्य आपने अपनी आँखों से देखा। आप बड़ी रमणीकता से आँखों देखे वे सब दृश्य सुनाती

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Bk ramesh bhai ji anubhavgatha

हमने पिताश्री जी के जीवन में आलस्य या अन्य कोई भी विकार कभी नहीं देखे। उम्र में छोटा हो या बड़ा, सबके साथ वे ईश्वरीय प्रेम के आधार पर व्यवहार करते थे।इस विश्व विद्यालय के संचालन की बहुत भारी ज़िम्मेवारी

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Dadi hridaypushpa ji

एक बार मैं बड़े हॉल में सो रही थी परंतु प्रातः नींद नहीं खुली। मैं सपने में देख रही हूँ कि बाबा से लाइट की किरणें बड़े जोर से मेरी तरफ आ रही हैं, मैं इसी में मग्न थी। अचानक

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Mamma anubhavgatha

मम्मा की कितनी महिमा करें, वो तो है ही सरस्वती माँ। मम्मा में सतयुगी संस्कार इमर्ज रूप में देखे। बाबा की मुरली और मम्मा का सितार बजाता हुआ चित्र आप सबने भी देखा है। बाबा के गीत बड़े प्यार से

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Dadi situ ji anubhav gatha

हमारी पालना ब्रह्मा बाबा ने बचपन से ऐसी की जो मैं फलक से कह सकती हूँ कि ऐसी किसी राजकुमारी की भी पालना नहीं हुई होगी। एक बार बाबा ने हमको कहा, आप लोगों को अपने हाथ से नये जूते

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Bk aatmaprakash bhai ji anubhavgatha

मैं अपने को पद्मापद्म भाग्यशाली समझता हूँ कि विश्व की कोटों में कोऊ आत्माओं में मुझे भी सृष्टि के आदि पिता, साकार रचयिता, आदि देव, प्रजापिता ब्रह्मा के सानिध्य में रहने का परम श्रेष्ठ सुअवसर मिला।
सेवाओं में सब

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Experience with dadi prakashmani ji

आपका प्रकाश तो विश्व के चारों कोनों में फैला हुआ है। बाबा के अव्यक्त होने के पश्चात् 1969 से आपने जिस प्रकार यज्ञ की वृद्धि की, मातृ स्नेह से सबकी पालना की, यज्ञ का प्रशासन जिस कुशलता के साथ संभाला,

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Bk jagdish bhai anubhavgatha

प्रेम का दर्द होता है। प्रभु-प्रेम की यह आग बुझाये न बुझे। यह प्रेम की आग सताने वाली याद होती है। जिसको यह प्रेम की आग लग जाती है, फिर यह नहीं बुझती। प्रभु-प्रेम की आग सारी दुनियावी इच्छाओं को

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Bk kamlesh didi ji anubhav gatha

प्यारे बाबा ने कहा, “लौकिक दुनिया में बड़े आदमी से उनके समान पोजिशन (स्थिति) बनाकर मिलना होता है। इसी प्रकार, भगवान से मिलने के लिए भी उन जैसा पवित्र बनना होगा। जहाँ काम है वहाँ राम नहीं, जहाँ राम है

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Dadi gulzar ji anubhav

आमतौर पर बड़े को छोटे के ऊपर अधिकार रखने की भावना होती है लेकिन ब्रह्मा बाबा की विशेषता यह देखी कि उनमें यह भावना बिल्कुल नहीं थी कि मैं बाप हूँ और यह बच्चा है, मैं बड़ा हूँ और यह

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Dadi gange ji

आपका अलौकिक नाम आत्मइन्द्रा दादी था। यज्ञ स्थापना के समय जब आप ज्ञान में आई तो बहुत कड़े बंधनों का सामना किया। लौकिक वालों ने आपको तालों में बंद रखा लेकिन एक प्रभु प्रीत में सब बंधनों को काटकर आप

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Bk nirwair bhai ji anubhavgatha

मैंने मम्मा के साथ छह साल व बाबा के साथ दस साल व्यतीत किये। उस समय मैं भारतीय नौसेना में रेडियो इंजीनियर यानी इलेक्ट्रोनिक इंजीनियर था। मेरे नौसेना के मित्रों ने मुझे आश्रम पर जाने के लिए राजी किया था।

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Dadi chandramani ji

आपको बाबा पंजाब की शेर कहते थे, आपकी भावनायें बहुत निश्छल थी। आप सदा गुणग्राही, निर्दोष वृत्ति वाली, सच्चे साफ दिल वाली निर्भय शेरनी थी। आपने पंजाब में सेवाओं की नींव डाली। आपकी पालना से अनेकानेक कुमारियाँ निकली जो पंजाब

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