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2 Feb 1977
“सदा अलंकारी स्वरूप में स्थित रहने वाला ही स्वयं द्वारा, बाप का साक्षात्कार करा सकता है”
2 February 1977 · हिंदी
बापदादा स्नेही बच्चों के रूहानी स्नेह की महफिल में आए हैं। ऐसे रूहानी स्नेह की महफिल कल्प में अब संगम पर ही होती है और किसी भी युग में रूहानी बाप और बच्चों के स्नेह की महफिल नहीं हो सकती है। इस महफिल में अपने को पदमापदम भाग्यशाली समझते हो? ऐसा श्रेष्ठ भाग्य जो स्वयं ऑलमाइटी अथॉरिटी बाप बच्चों के इस भाग्य का वर्णन करते हैं। ऐसे भाग्यशाली बच्चों को स्वयं बाप देख हर्षित होते हैं। तो सोचो ऐसा भाग्य क्या होगा? भाग्य को सुमिरण करते ही बाप की सिमरणी के मणके बन सकते हो। इतना ऊंचा भाग्य जिसका आज कलियुग के अन्त में भी सिमरण करने वाले भक्त अपने को भाग्यशाली समझते हैं। ऐसे श्रेष्ठ भाग्य के अनुभव के अंचली के लिए भी सभी तड़पते हैं। ऐसे भाग्यशाली हो जिनके नाम से भी अपने जीवन को सफल समझते हैं। तो सोचो वह कितना बड़ा भाग्य है! सदैव अपने को इतना भाग्यशाली आत्मा समझते हो? तो सोचो वह कितना बड़ा भाग्य है!
बड़े से बड़ा ब्राह्मण कुल है, ऐसे ब्राह्मण कुल के भी आप दीपक हो। कुल के दीपक अर्थात् सदा अपनी स्मृति की ज्योति से ब्राह्मण कुल का नाम रोशन करता रहे। ऐसे अपने को कुल के दीपक समझते हो? सदा स्मृति की ज्योति जगी हुई है? बुझ तो नहीं जाती? अखण्ड ज्योति अर्थात् कभी भी बुझने वाली नहीं। आपके जड़ चित्रों के आगे भी अखण्ड ज्योति जगाते हैं। चैतन्य अखण्ड ज्योति का ही वह यादगार है तो चैतन्य दीपक बुझ सकते हैं? क्या बुझी हुई ज्योति अच्छी लगती है? तो स्वयं को भी चेक करो, जब स्मृति की ज्योति बुझ जाती है तो कैसा लगता होगा? क्या वह अखण्ड ज्योति हुई? ज्योति की निशानी है - सदा स्मृति स्वरूप और समर्थी स्वरूप होगा। स्मृति और समर्थी का सम्बन्ध है। अगर कोई कहे स्मृति तो है कि बाबा का बच्चा हूँ, लेकिन समर्थी नहीं है, यह हो ही नहीं सकता क्योंकि स्मृति ही है कि मैं मास्टर सर्वशक्तिमान हूँ। मास्टर सर्वशक्तिमान् अर्थात् समर्थ स्वरूप। समर्थ अर्थात् शक्ति। फिर वह गायब क्यों हो जाती है? कारण? एक शब्द की गलती करते हो। कौन-सी गलती? बाप कहते हैं ‘साकारी सो अलंकारी' बनो। लेकिन बन क्या जाते हो? अंलकारी के बजाए देह-अहंकारी बन जाते हैं। बुद्धि के अहंकारी, नाम और शान के अहंकारी बन जाते हो। सदा सामने अलंकारी स्वरूप का सिम्बल होते हुए भी अपने अलंकारों को धारण नहीं कर पाते। जैसे हद के राजकुमार और राजकुमारियां भी सदा सजे सजाए रॉयल्टी में होते हैं। वैसे ही ब्राह्मण कुल की श्रेष्ठ आत्माएं सदा अलंकारों से सजे-सजाएं होने चाहिए। यह अलंकार ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार है, न कि देवता जीवन का। तो अपने अलंकार के श्रृंगार को सदा कायम रखो। लेकिन करते क्या हो? एक अलंकार को पकड़ते तो दूसरे अलंकार को छोड़ देते हैं। कोई तीन पकड़ सकते हैं तो कोई चार पकड़ सकते हैं। बापदादा भी बच्चों का खेल देखते रहते हैं। भुजा अर्थात् शक्ति, जिस शक्ति के आधार से ही अलंकारी बन सकते हैं, वह शक्तियों रूपी भुजायें हिलती रहती हैं। जब भुजाएं हिलती रहती हैं तो सदा अलंकारी कैसे बन सकते हैं? इसलिए कितनी भी कोशिश करते हैं अलंकारी बनने की, लेकिन बन नहीं सकते। तो एक शब्द कौन-सा याद रखना है? किसी भी प्रकार के ‘अहंकारी' नहीं लेकिन ‘अलंकारी' बनना है। सदा अलंकारी स्वरूप में स्थित न होने के कारण स्वयं का, बाप का साक्षात्कार नहीं करा सकते। इसलिए अपने शक्ति रूपी भुजाओं को मजबूत बनाओ, नहीं तो अलंकारों की धारणा नहीं कर सकेंगे। अलंकारों को तो जानते हो ना? जानते भी हो और वर्णन भी करते हो फिर भी धारण नहीं कर सकते। क्यों? बापदादा बच्चों की कमज़ोरी की लीला बहुत देखते हैं जैसे प्रभु की लीला अपरम्पार है तो बच्चों की भी लीला अपरम्पार है। रोज की नई रंगत होती है। माया के नई रंगत में रंग जाते हैं। स्वदर्शन चक्र के बजाये व्यर्थ दर्शन का चक्र चल जाता है। द्वापर से जो व्यर्थ कथाएं और कहानियां बड़ी रुचि से सुनने और सुनाने की आदत है, वह संस्कार अभी भी अंश रूप में आ जाता है। इसलिए कमल पुष्प समान अर्थात् कमल पुष्प के अलंकारधारी नहीं बन सकते। कमल की बजाय कमज़ोर बन जाते हैं। मायाजीत बनाने का दूसरों को सन्देश देते, लेकिन स्वयं मायाजीत हैं या नहीं, यह सोचते ही नहीं। इसलिए अलंकारी नहीं बन सकते। अलंकारी बनो न कि देह-अहंकारी।
ऐसे सदा अलंकारी, निरहंकारी, निराकारी स्थिति में स्थित होने वाले, सदा के विजयी, सदा जागते हुए दीपक, विश्व को रोशन करने वाले दीपक, बापदादा के नैनों के दीपकों को बापदादा का याद, प्यार और नमस्ते।
दीदी जी के साथ :- नई दुनिया बनाने वालों की, अपने जीवन को नया बनाने की रफ्तार कैसे चल रही है? पहले अपने जीवन में नवीनता लायेंगे तब दुनिया में भी नवीनता आयेगी। तो जितना अपने जीवन रूपी बिल्डिंग को सुन्दर और सम्पन्न बनायेंगे, उतना ही नई दुनिया में भी सुन्दर और सम्पन्न राज्य-भाग्य मिलेगा। कर्म द्वारा अपने तकदीर की लकीर खींच रहे हैं। वह है हद की हस्त रेखाएं, और ये हैं कर्म की रेखाएं। जितना कर्म श्रेष्ठ और स्पष्ट होगा, उतनी भाग्य की रेखाएं श्रेष्ठ और स्पष्ट होगी। तो कर्म की रेखाओं से अपना भविष्य खुद ही देख सकते हो। यमुना के किनारे पर कौन रह सकेंगे? जिन्होंने सदा के लिए पुरानी दुनिया से किनारा किया है और बाप को सदा साथी बनाया है, वही यमुना के किनारे साथ महल वाले होंगे। श्री कृष्ण के साथ पढ़ने वाले कौन होंगे? पढ़ने पढ़ाने वाले साथी भी होंगे ना? जिसका सदैव पढ़ाई पढ़ाने और पढ़ने में विशेष पार्ट है वही वहाँ भी विशेष पढ़ाई के साथी बनेंगे। रास करने वाले कौन होंगे? जिन्होंने संगम पर बाप के साथ समान संस्कार मिलाने की रास मिलाई होगी। तो यहाँ जिनकी बाप समान संस्कारों की रास मिलती है वे वहाँ रास करेंगे। रॉयल फैमिली में कौन आयेंगे? जो सदैव अपनी प्युरिटी की रॉयल्टी में रहते हैं। कहाँ भी हद के आकर्षण में आंख नहीं डूबती। सदा अलंकारों से सजे हुए होते हैं। सदा श्रृंगारी हुई मूर्ति, ऐसी रॉयल्टी वाले रॉयल फैमिली में आयेंगे। वारिस कौन बनेंगे? वारिस अर्थात् अधिकारी। तो जो यहाँ सदा अधिकारी स्टेज पर रहते, कभी भी माया के अधीन नहीं होते, अधिकारीपन के शुभ नशे में रहते, ऐसे अधिकारी स्टेज वाले ही वहाँ भी अधिकारी बनेंगे। अब हर एक को अपने आप को देखना पड़े कि मैं कौन हूँ? यह पहेली है। किसी-किसी का सारे जीवन में साथ-साथ पार्ट भी है - साथ पढ़ने का, साथ रास करने का, साथ महल में रहने का, रॉयल फैमिली में भी साथ होंगे। कुछेक आत्माओं का सर्व अधिकार भी है। यह है नई दुनिया की रूप-रेखा। अच्छा।
टीचर्स के साथ :- टीचर्स को देख बापदादा को विशेष खुशी होती है क्यों, जानते हो? आप समान शिक्षक हैं ना। जैसे बाप विश्व का शिक्षक, सेवक है वैसे टीचर भी शिक्षक और सेवक हैं। तो समानता वालों को देखकर खुशी होती है। शिक्षक की स्थिति में तो समान हो। बिना सेवा के और कोई बात आकर्षित न करे। दिन-रात सेवा में लगी रहो। अगर सेवा से फ्री रहेंगे तो फिर और बातें भी आ जायेंगी। खाली घर में ही बिच्छू, टिंडन आते हैं। खाली घर हो या पुराना घर हो। यहाँ भी ऐसे होता है। बुद्धि या तो खाली होती है या तो पुराने संस्कारों वाली होती है, तो व्यर्थ संकल्प रूपी बिच्छू, टिंडन पैदा हो जाते हैं।
(I) टीचर अर्थात् सदा बिजी रहने वाली। कभी फुर्सत में रहने वाली नहीं। संकल्प, बोल, कर्म से भी फ्री रहने वाली नहीं।
(II) टीचर का अर्थ ही है बाप समान अथवा बाप के समीप विजयी माला के मणके। टीचर का यही लक्ष्य है ना विजयी माला के मणके बनना।
(III) टीचर अर्थात् कभी हार, कभी जीत में आने वाले नहीं, लेकिन सदा विजयी।
(IV) टीचर अर्थात सदा तिलकधारी, सदा सौभाग्यवती, सुहागवती। तिलक सुहाग की निशानी है ना। तो सदा सुहागवती अर्थात् बाप को सदा साथी बनाने वाली। सुहागवती अर्थात् तिलक वाली।
टीचर का स्थान है - दिल-तख्त। स्थान छोड़ेंगे तो दूसरे ले लेंगे। टीचर का आसन बाप का दिल-तख्त है। आसन छोड़ दिया तो त्याग, तपस्या खत्म। तो यह आसन कभी नहीं छोड़ना। जगह लेने वाले बहुत हैं। सभी को यही उमंग-उत्साह होता है कि हम टीचर से आगे जायें। टीचर फिर उनसे भी आगे जाएं तब तो दिल तख्तनशीन होंगी। टीचर का छोटा-सा संसार है ना। टीचर का संसार एक बाप ही है। मात-पिता, बन्धु-सखा...। तो संसार में क्या होता है? सर्व संबन्ध होते हैं, वैभव होते है। यहाँ सर्व संबन्ध की प्राप्ति बाप से है। है छोटा-सा संसार लेकिन सम्पन्न और शक्तिशाली है। इस छोटे से संसार में कोई अप्राप्त वस्तु नहीं। सर्व संबन्ध बाप से। ऐसे नहीं पिता का संबन्ध है तो माता का नहीं, माता का है तो बन्धु का नहीं। अगर एक भी सबंन्ध की प्राप्ति बाप से नहीं होगी तो बुद्धि दूसरे तऱफ जरूर जायेगी। बाप से सर्व सम्बन्धों का अनुभव होना चाहिए। नहीं तो दूसरा सम्बन्ध अपनी तऱफ खींच लेगा। सारा संसार ही एक बाप हो गया तो सब रूप हो गया ना। इसको कहा जाता है नम्बर वन टीचर, फ्लोलेस टीचर, योग्य टीचर, नामीग्रामी टीचर। बाप तो सदा ऊंची नज़र से देखते हैं। अगर बाप कमी को देखें तो सदा के लिए उस कमी को अन्डरलाइन लग जाती है। बाप भाग्य-विधाता है ना, इसलिए बाप सदा श्रेष्ठ नज़र से देखते हैं। श्रेष्ठता के आगे कमज़ोरी आपे ही मन को खाती है। श्रेष्ठ बातें सुनने से कमज़ोरी स्पष्ट हो ही जाती है। इसलिए बाप सदैव श्रेष्ठता का वर्णन करते हैं जिससे कमज़ोरी स्वत: ही दिखाई दे। अगर कमज़ोरी को देखें तो लम्बी-चौड़ी वेद-शास्त्रों की खानियां बन जाएं।
सभी टीचर्स को विशेष एक बात का ध्यान रखना है - कभी भी, किसी में भी रॉयल रूप में भी झुकाव न हो, किसी भी आत्मा के गुणों की तऱफ, सेवा, सहयोग की तऱफ, बुद्धि की तऱफ, प्लैनिंग की तऱफ झुकाव नहीं हो। उसी को अपना आधार बनाने से झुकाव होता है। जब किसी आत्मा का आधार हो जाता है तो बाप का आधार स्वत: ही निकल जाता है; और जब आगे चलकर अल्पकाल का आधार हिल जाता है तो भटक जाते हैं। इसलिए कभी भी किसी आत्मा के किसी विशेष प्रभाव के कारण प्रभावित होना, यह महान भूल है। भूल नहीं महान भूल है। इसमें खुश नहीं हो जाना कि सर्विस वृद्धि को पा रही है। यह अल्पकाल का जलवा होता है। फाउण्डेशन हिला तो सर्विस हिली। इसलिए कभी भी कोई आत्मा को आधार नहीं बनाओ। ऐसे नहीं कि इसके कारण सर्विस वृद्धि को नहीं पायेगी, उन्नति नहीं होगी। यह कारण नहीं कालापन है, जो स्वच्छ आत्मा को काला कर देता है। यह बड़े से बड़ा दाग़ है। किसी आत्मा को आधार बनाना - यह बड़े ते बड़ा फ्लो है। तो फ्लालेस नहीं बन सकेंगे। बाकी मेहनत बहुत करती हो। मेहनत की बापदादा मुबारक देते हैं। सुनाया है न कि शास्त्रों की कहानियां भी बहुत होती हैं जिनका कोई फाउण्डेशन नहीं होता। इसलिए पहले सुनाया कि टीचर अर्थात् सदा सेवा में बिजी। संकल्प में भी बाप के साथ बिज़ी रहो तो किसी आत्मा में बिज़ी नहीं होंगे। जो बिजी होता है वह कहाँ झुकेगा नहीं। फ्री होने के बाद ही मनोरंजन के साधन, स्नेह, सहयोग की तऱफ झुकाव होता है। जो बिजी होगा, उनको इन बातों के लिए फुर्सत ही नहीं। बापदादा टीचर्स को देख खुश होते हैं। हिम्मत, उमंग, उल्लास तो बहुत अच्छा है। कदम आगे बढ़ा रही हो लेकिन अपने कार्यों की कहानी का शास्त्र नहीं बनाना। कर्म की रेखा से श्रेष्ठ तकदीर बनानी है। ऐसी कहानी नहीं बनाना जिसका जन्म भी उल्टा तो कहानी भी उल्टी। स्टूडेण्ट को पढ़ाना भी खुद को पढ़ाना है।
टीचर्स से रूह-रुहान करना बापदादा को भी अच्छा लगता है। फ़ालो करने वाले तथा समान वालों से ज्यादा स्नेह होता है। जिससे स्नेह होता है उसकी छोटी कमज़ोरी भी बड़ी लगती है। इसलिए इशारा देते हैं। हम कितने समीप हैं देखना है तो अमृतवेले दर्पण स्पष्ट होता है। टीचर्स सैलवेशन देने वाली बन गई ना, लेने वाली नहीं। टीचर्स से पूछने की आवश्यकता नहीं कि खुश-राज़ी हो। सदा खुश रहो और सेवा में वृद्धि करती रहो। परन्तु जब बाहें लड़खड़ाती हैं तो यह सीन भी अच्छा लगता है। एक अलंकार उठाती तो दूसरा छूटता है। कभी स्वदर्शन चक्र को ठीक करती तो शंख छूट जाता है, शंख पकड़ती तो कमल छूट जाता है। अब टीचर्स को शास्त्रों की कथा बन्द करनी है। हर संकल्प, हर सेकेण्ड में तकदीर बनाओ। कोई कथा सुनने वाली, सुनाने वाली और बनाने वाली भी होती हैं। जैसे व्यास की कमाल है, वैसे यहाँ भी कमाल करते हैं। जन्म देते, पालना करते परन्तु विनाश नहीं कर पाते। तो फिर पश्चाताप करते हैं और कहते हैं मदद करो। अच्छा।