
महिला सशक्तिकरण का अनूठा कार्य
प्रकृति का शाश्वत नियम है रात के बाद दिन और दिन के बाद रात आने का। ठीक उसी तरह जब-जब मानव अपने धर्म-कर्म-मर्यादाओं से गिर जाता है तब-तब कोई न
कहा जाता है कि ईश्वर ने मानव को अपने समान गुणों से संपन्न बनाया—पवित्र, प्रेममय और संतुलित। परंतु समय की अविराम धारा के साथ परिवर्तन भी स्वाभाविक रूप से होता चला गया। न समय को रोका जा सकता है और न ही परिवर्तन को। इस निरंतर परिवर्तन की प्रक्रिया में, मानव भी धीरे-धीरे अपनी मूल पूर्णता से कुछ दूरी पर आती चली गई।
समय के प्रवाह के साथ आत्मिक गुणों की स्वच्छता में मिश्रण होने लगा।
द्वापर युग तक आते-आते, आत्मा की स्वाभाविक चमक धीरे-धीरे मद्धम होती चली गई—मानो पूर्ण चंद्रमा अपनी कलाओं को खोता हुआ आंशिक प्रकाश में सिमट जाए।
इस आंतरिक परिवर्तन का प्रभाव मानवीय संबंधों पर भी पड़ा। जो संबंध कभी आपसी सम्मान, समानता और सौहार्द पर आधारित थे, उनमें धीरे-धीरे असंतुलन आने लगा। शारीरिक बल को प्राथमिकता मिलने लगी और उसी के आधार पर सामाजिक भूमिकाएँ निर्धारित होने लगीं। परिणामस्वरूप, नारी—जो अपने मानसिक, भावनात्मक और आत्मिक गुणों में सदैव समृद्ध रही—को अपेक्षित सम्मान और समानता से वंचित होना पड़ा।
नारी के प्रति बनी धारणाएँ और उनके प्रभाव
समाज के विभिन्न चरणों में नारी के विषय में अनेक धारणाएँ बनती चली गईं। दुर्भाग्यवश, इनमें से कुछ धारणाएँ ऐसी भी रहीं जिन्होंने नारी की गरिमा, उसकी आत्मिक शक्ति और उसके मौलिक सम्मान को सही रूप में पहचान नहीं दिया।
‘भोग्या’, ‘दासी’, ‘निर्भर’ जैसी संकीर्ण अवधारणाएँ—जो समय-समय पर परंपराओं, रूढ़ मान्यताओं या अपूर्ण समझ के कारण फैलती रहीं—नारी के जीवन में पीड़ा और असमानता का कारण बनीं।
इन धारणाओं को कई बार धार्मिक या सामाजिक मान्यताओं का स्वरूप दे दिया गया, जिससे वे और अधिक गहराई तक समाज में पैठती चली गईं। परिणामस्वरूप, आपसी सम्मान और संतुलन पर आधारित संबंधों में असहजता आने लगी। यह स्थिति किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज की चेतना में आए असंतुलन का प्रतिबिंब थी।
नर-नारी को पवित्र बनाने की प्रभावशाली जागृति
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के साकार संस्थापक प्यारे ब्रह्मा बाबा ने नारी स्वर्ग का द्वार है! और ‘वन्दे मातरम्’ के नारे द्वारा नारी को दुर्बल नहीं, बल्कि कल्याणी और शक्तिरूपा के रूप में देखने का संदेश दिया। आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखने वाले सभी लोग मानते हैं कि शरीर तो प्रकृति का है, नाशवान है, पाँच तत्वों से बना चोला अथवा पुतला है। तब फिर इसके आधार पर कया झगड़ा करना?
इस प्रकार के विचारों से सुसज्जित दादा लेखराज, जो प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की स्थापना के निमित्त बने, कोलकाता के एक सुप्रसिद्ध जौहरी थे। वे श्री नारायण के अटूट भक्त और नियमित रूप से श्रीमद्धशवद् गीता का पठन करते थे। उन्हें सन् 1936 में कुछ दिव्य साक्षात्कार हुए जिनमें उन्हें आदेश मिला कि नर-नारी का संबंध आत्मिक दृष्टि, पवित्र स्नेह और समान सम्मान पर आधारित होना चाहिए। इसके लिए सभी को राजयोग की शिक्षा दी जाए ताकि एक नए सतयुगी, दैवी समाज की नींव पड़े। दादा लेखराज, इस ईश्वरीय आदेश को शिरोधार्य मानकर, अपने ही निवास स्थान पर, नर-नारियों को पवित्र बनने की प्रभावशाली जागृति देने लगे।
उन्होंने यह समझाया कि वे अपने जीवन में सादगी और आत्म-सम्मान को महत्व दें। बाहरी दिखावे के अंधानुकरण के स्थान पर, उन्होंने नियमित रूप से सत्संग करने, सात्त्विक भोजन अपनाने और अपने विचारों व दृष्टि को शुद्ध रखने पर जोर दिया। उनका संदेश था कि नारी अपने भीतर ज्ञान, शक्ति, कला और वैराग्य जैसे गुणों को विकसित करे—जैसे सरस्वती और दुर्गा के आदर्शों में दिखाई देता है—ताकि समाज और देश का कल्याण हो सके।
इस उद्देश्य से उन्होंने कन्याओं के लिए अलग भवन, छात्रावास और पाठशाला की व्यवस्था करवाई।
वहाँ उनके चरित्र निर्माण और दिव्य स्वभाव पर विशेष ध्यान दिया जाता था। बड़ी कन्याओं को सिलाई, कढ़ाई, संगीत जैसे कार्यों की शिक्षा देकर आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया गया। विद्यालय का वातावरण अत्यंत स्वच्छ, प्रेमपूर्ण और अनुशासित था, जिसकी सराहना शिक्षा विभाग के अधिकारी भी खुले मन से करते थे।
सर्वस्व कुर्बान
आज के समय में, जहाँ कई लोग अपनी ही संतान को अधिकार देने में संकोच करते हैं, वहाँ ब्रह्मा बाबा ने अपनी संपूर्ण चल-अचल संपत्ति एक ट्रस्ट के माध्यम से माताओं और कन्याओं को समर्पित कर दी।
इस ट्रस्ट की नेतृत्व-भूमिका एक अल्पवयस्क, परंतु आध्यात्मिक रूप से परिपक्व कन्या — ओम राधे, जिसे आज हम माँ जगदम्बा सरस्वती के नाम से जानते हैं।
उन्होंने न केवल धन, बल्कि तन और मन से भी स्वयं को इस सेवा में समर्पित किया और यह घोषणा की कि वे स्वयं सेवक हैं। यह कदम नारी के प्रति विश्वास, सम्मान और समानता का एक जीवंत उदाहरण बना।
दादा लेखराज, जिन्हें पिताश्री के सम्मानजनक संबोधन से जाना जाने लगा था, ने संयम-नियम को अपनाकर सुखी जीवन जीने की शिक्षा नर और नारी दोनों को दी। कई युगल नर-नारी गृहस्थ जीवन में रहते हुए तो इसमें ढल गए। भगवान सर्वसमर्थ हैं और उनकी शिक्षाएँ भी मनोबल बढ़ाने वाली हैं।
आज इस संस्थान में कई हज़ार कन्याओं-माताओं ने जीवनदान दिया हुआ है।
इस कार्य में पुरुष वर्ग भी इनका पूरा सहयोगी है। कितने ही पुरुषों ने भी पवित्रता की स्थापना के इस कार्य में अपना तन-मन-धन समर्पित किया हुआ है। व्यवसायिक जीवन और गृहस्थ आश्रम में कर्त्तव्यों को निभाने वाले अन्य लाखों पुरुष और महिलाएँ भी समर्पित बहनों के निर्देशानुसार चलते हैं। संपूर्ण कार्य को महिलाएँ, पुरुषों के सहयोग से चलाती हैं। यहाँ दोनों एक-दो के सहयोगी है जिससे दोनों ही दिव्य मर्यादा का पालन सहज कर सकते है।

प्रकृति का शाश्वत नियम है रात के बाद दिन और दिन के बाद रात आने का। ठीक उसी तरह जब-जब मानव अपने धर्म-कर्म-मर्यादाओं से गिर जाता है तब-तब कोई न

भ्राता जगदीश चन्द्र के रूहानी क्षण ब्रह्मा बाबा के साथ 1953 में माउंट आबू में घटित वह दिव्य अनुभव है, जहाँ बाबा की मुस्कान, स्नेह और योग ने आत्मा को गहन शांति दी। यह अनुभव शब्दों से परे है

Whilst in Karachi, Brahma Baba taught knowledge to the growing family of children, teaching through example as much as through precept. And with the power of meditation (yoga), the souls

हम हृदयंगम करते (दिल से कहते ) हैं कि भगवान हमारा साथी है। भगवान हमारा साथी बना, उसने कब, कैसे साथ दिया यह अनुभव सबको है। एक है सैद्धान्तिक ज्ञान