होली का आध्यात्मिक रहस्य एवं गाने

Spiritual significance of holi
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आजकल हम होली पर्व के नाम पर एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य पर रंगों के साथ-साथ कीचड़ और गंदा पानी फेंका जाता हुआ देखते हैं। भारत के कुछ गाँवों में, विशेष नातों में (जैसे भाभी-देवर), एक द्वारा दूसरे की मोटी रस्सी या डंडे से पिटाई करने की प्रथा भी इस दिन है। भले ही, पिटने वाला उस समय लोकलाजवश बोलता नहीं है पर इस प्रकार की हिंसा का कुप्रभाव तो सभी पर पड़ता ही है। अन्य त्योहारों पर जहाँ लोग घरों से बाहर निकलकर चहल-पहल देखने को उतावले होते हैं, होली पर लोग दरवाजा बंद कर दुबके रहते हैं। यह देख मन में प्रश्न उठता है कि आखिर भी इस त्योहार का वास्तविक रहस्य क्या है?

प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में परमपिता परमात्मा शिव ने अन्य त्योहारों के साथ-साथ होली के त्योहार के मूल स्वरूप का भी ज्ञान कराया है जिसे जानकर रोम-रोम रोमांचित हो उठता है। सभी प्रश्नों के हल मिल जाते हैं और जीवन को ऊँचा उठाने में बहुत मदद मिलती है। वास्तव में, भारत के जितने भी त्योहार हैं, वे सब भगवान के धरती पर अवतरित होने और मानव कल्याण के लिए किये जाने वाले उनके भिन्‍न-भिन कर्त्तव्यों की यादगारें हैं।

परमात्म संग का रंग
होली भी, भगवान द्वारा आत्माओं को अपने संग के रंग में और ज्ञान के रंग में रंगने के कर्त्तव्य का यादगार है। ज्ञान को सच्ची पूंजी’, अविनाशी खजाना’, परम औषधि’, ‘अमृत’, ‘अंजन’, ‘प्रकाश’ और (प्रभु की मस्ती में रंग देने वाला रंग” भी कहा गया है। प्रभु के संग से आत्मा में जो अलौकिक निखार आता है, उसे ज्ञान का रंग चढ़ना कहा जाता है। कबीर ने कहा,

‘लाली मेरे लाल की

जित देखूँ तित लाल,

लाली देखन मैं गई,

मैं भी हो गई लाल’

अर्थात्‌ प्रभु के संग का रंग ऐसा लगा जो आत्मा उनके समान बन गई। कालान्तर में, परमात्म संग का रंग’ में से ‘परमात्म संग’ शब्द तो निकल गया और होली मात्र रंगों का त्योहार रह गया।

एक छोटी-सी भूल
उपरोक्त कारण से ही बरसों से होली मनाते रहने पर भी भगवान का कोई भी रंग आज तक मानवता पर चढ़ा नहीं। भगवान प्रेम के सागर हैं पर हमारे प्रेम के ख्नोत सूख गए। भगवान शान्ति के सागर हैं पर हम शान्ति की खोज में मारे-मारे फिर रहे हैं। भगवान सुख के सागर हैं पर हमें पल भर चैन नहीं।
भगवान शक्तियों के सागर हैं पर हम निर्बल, अशक्त, कमज़ोर हो गये हैं। भगवान ज्ञान के सागर हैं पर हम अज्ञान अंधकार में ठोकरें खा रहे हैं क्योंकि हमने भी पहले शब्द ‘परमात्म संग” को भुला दिया।

‘होली’ शब्द के अर्थ
परमपिता परमात्मा शिव ने हमें होली शब्द के तीन अर्थ बताये हैं – (1) होली अर्थात्‌ बीती सो बीती, जो हो गया उसकी चिन्ता न करो तथा आगे के लिए जो भी कर्म करो, योगयुक्त होकर करो, (2) होली अर्थात्‌ हो गई। मैं आत्मा अब ईश्वर अर्पण हो गई, अब जो भी कर्म करना है, वह ईश्वर की मत पर ही करना है, (3) होली (Holy) अर्थात्‌ पवित्र। हमें जो भी कर्म करने हैं, वे किसी भी विकार के वश होकर नहीं वरन्‌ पवित्र बुद्धि से करने हैं।

होली मनाने का समय
होली का त्योहार वर्ष के अंतिम मास फाल्गुन की पूर्णिमा को मनाया जाता है। सृष्टि चक्र के दो भाग हैं, ब्रह्मा का दिन और ब्रह्मा की रात्रि। ब्रह्मा का दिन है सतयुग-त्रेतायुग। उस समय सभी देवात्मायें ईश्वरीय रंग में रंगी होती हैं परंतु जब द्वापरयुग आता है और ब्रह्मा की रात्रि का प्रारंभ होता है तो मानवात्मायें माया (विकारों) से बदरंग होने लगती हैं। कलियुग के अंत तक तो इतनी बदरंग हो जाती हैं कि अपनी असली पहचान से पूरी तरह दूर चली जाती हैं, तब निराकार परमात्मा शिव धरती पर अवतरित होकर विकारों से बदरंग बनी आत्माओं को अपने संग का रंग लगाते हैं। उन्हें उजला बनाए उनमें ज्ञान, शान्ति, प्रेम, सुख, आनन्द, पवित्रता, शक्ति आदि गुण भरकर देवतुल्य बना देते हैं। चूँकि यह घटना कल्प के अंत में घटती है इसलिए यादगार रूप में यह त्योहार भी वर्ष के अंतिम मास के अंतिम दिन मनाया जाता है। भगवान जब आते हैं तो स्वयं तो ज्ञान-गुणों का रंग आत्माओं पर लगाते ही हैं पर जिन पर ज्ञान-गुणों का रंग लग जाता है, उन्हें यह आदेश भी देते हैं कि अब तुम अन्य आत्माओं पर भी यह रंग लगाओ। इसी की याद में इस त्योहार पर मनुष्य एक-दो को गुलाल आदि लगाते हैं।

वास्तविक ईश्वरीय कर्त्तव्य चलता है कई वर्ष

हम यह भी जानते हैं कि बच्चे का जन्म, नामकरण संस्कार और अन्य रस्म अदायगी में लगभग सवा महीना लग जाता है लेकिन जन्मदिन का उत्सव घंटे, दो घंटे में पूरा हो जाता है। भारत की आज़ादी की लड़ाई में भी लगभग सौ साल का अति सक्रिय आंदोलन चला। लेकिन उसके यादगार उत्सव को घंटे, दो घंटे या बारह घंटे तक मनाकर पूरा कर लेते हैं। इसी प्रकार परमात्मा शिव द्वारा ज्ञान के रंग में मनुष्यों को रंगने का कर्त्तव्य केवल एक या दो दिन नहीं, वर्ष भर नहीं लेकिन लगातार कई वर्षों तक चलता है। ईश्वरीय कर्त्तव्य का यह संपूर्ण काल ही सच्ची होली है। लेकिन भक्तों द्वारा, कई वर्ष चलने वाले ईश्वरीय कर्त्तव्य की यादगार के रूप में केवल एक या दो दिन गुलाल आदि डालकर, लकड़ियाँ और उपले जलाकर होली मना ली जाती है।

होली के संबंध में प्रचलित कथा का रहस्य
हिरण्यकश्यप, होलिका तथा प्रह्माद की कथा का वास्तव में आध्यात्मिक रहस्य है। जो लोग प्रह्लाद की तरह स्वयं को परमात्मा का एक वत्स (पुत्र) निश्चय करते हैं, उन्हीं से परमात्मा की प्रीति होती है और जो लोग हिरण्यकश्यप की तरह मिथ्या ज्ञान के अभिमानी हैं, स्वयं को भगवान मानते हैं, वे विनाश को प्राप्त होते हैं और होलिका की तरह जो आसुरियता का साथ देते हैं, वे भी विनाश को पाते हैं। यह जो कहा गया है कि हिरण्यकश्यप ने वर प्राप्त किया था कि “न मैं दिन में मरूँ, न रात में’, “न अंदर मरूँ, न बाहर’, “न किसी मनुष्य द्वारा मरूँ, न देवता द्वारा’ यह भी संगमयुग की ही बात है। यह संगमयुग अतुलनीय युग है। यह न ब्रह्मा का दिन है और न ब्रह्मा की रात्रि, यह दोनों का संगम है। यहाँ न मानव हैं, न देव वरन्‌ तपस्वी ब्राह्मण हैं। अत: तपस्या के बल द्वारा मिथ्या ज्ञान के अभिमान और आसुरी वृत्तियों का अंत इसी समय होता है।

होली मनाने की विधि

होली के त्योहार को मनुष्य चार प्रकार से मनाते हैं – 1. एक-दूसरे पर रंग डालना, 2. होलिका जलाना, 3. मंगल मिलन मनाना, 4. श्रीकृष्ण की झांकी सजाना

1. एक-दूसरे पर रंग डालना:- भगवान आत्मा पर ज्ञान, गुण और शक्तियों का रंग लगाते हैं परंतु मनुष्य महंगे रंगों द्वारा मानव के कपड़ों और कई बार तो चेहरे, आँखों और गले को भी नुकसान पहुँचा देते हैं। इस प्रकार, इस निर्धन देश के करोड़ों रुपये रंगों और रंगे हुए कपड़ों की भेंट चढ़ जाते हैं। क्या ही अच्छा हो, यदि हम होली को विकृत रूप में न मनाकर, इसके शुद्ध स्वरूप में जैसे भगवान ने सिखाई थी, वैसे ही मनाएँ।
मीरा के एक सुन्दर भजन से भी हमें ऐसी ही प्रेरणा मिलती है। भजन इस प्रकार है –

फागुन के दिन चार,

होली खेल मना रे।

बिन करताल पखावज बाजै, अनहद की झणकार रे।

बिन सुर राग छत्तीसूँ गावै,

रोम रोम रणकार रे।।

सील संतोष की केसर घोली

प्रेम प्रीति पिचकार रे।

उड़त गुलाल लाल भयो

अम्बर बरसत रंग अपार रे।।

घट के सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर,

चरण कंवल बलिहार रे।।

मीरा कहती है, होली मनाना अर्थात्‌ निरंतर अनहद नाद सुनना। शील, संतोष की केसर घोलकर प्रेम की पिचकारी छोड़ना, लोकलाज छोड़कर आत्मदर्शन करना और परमात्मा पर बलिहार हो जाना।

 

2. होलिका जलाना:– इस दिन लोग, अनेक घरों से इकट्ठी की हुई लकड़ियों और गोबर को जलाते हैं और सोचते हैं, इससे दुख, दरिद्रता, अपवित्रता जल जायेगी परन्तु सोचने की बात है, भारत के देहातों में तो सदियों से प्रतदिन लोग गोबर और लकड़ियाँ जलाते आ रहे हैं परंतु दरिद्रता और अपवित्रता तो जली नहीं, और ही बढ़ती जा रही है। वास्तव में लकड़ियों और कण्डों को अग्नि में नहीं बल्कि योगामिन में पुराने संस्कार, स्वभाव, पुरानी कट स्मृतियाँ जला देने से हमारे दुख दूर हो सकते हैं। कहीं- कहीं उपलों में धागे डालकर भी होलिका जलाने की प्रथा है, वह इस रहस्य का परिचय देती है कि यह शरीर उपलों की तरह विनाशी है। एक दिन राख में बदल जाना है परंतु आत्मा अविनाशी है, उसे अग्नि जला नहीं सकी। कई लोग इसे राक्षस विनाशक त्योहार भी मानते हैं क्योंकि यह माया रूपी राक्षसी को ज्ञान रूपी हो-हल्ले से भगाने का त्योहार है।

3. मंगल मिलन मनाना:- मंगल का अर्थ है कल्याण। कल्याण करने वाला मिलन तो परमात्म- मिलन ही है। दूसरा, मंगल मिलन तो तभी हो सकता है जब आपस में स्वभाव, संस्कार का मेल हो, एक- दूसरे के विचारों का सम्मान हो। यह भी तभी हो सकता है जब हम देहभान के स्वभाव, संस्कार को भूलकर आत्मस्थिति में टिकें। आत्मस्थिति में टिककर हम स्वयं से, अन्य आत्माओं से और परमात्मा से भी सच्चा मंगल मिलन मना सकते हैं।

4. श्रीकृष्ण की झांकी सजाना:- पंडित लोग कहते हैं कि ब्रह्मपुराण में लिखा है कि फाल्गुन पूर्णिमा के दिन जो मनुष्य चित्त को एकाग्र करके हिंडोले में झूलते हुए श्रीगोविन्द पुरुषोत्तम का दर्शन करता है वह निश्चय ही वैकुंठ को जाता है। वास्तव में दर्शन का अर्थ है पहचान। जो श्रीकृष्ण की सच्ची जीवन-कहानी को पहचान जाता है, वह संसार के आकर्षणों से परे हो जाता है और वैकुंठ का अमरपद तो उसे अवश्य मिलता ही है। अतः केवल दर्शन (देखना) न करें बल्कि श्रीकृष्ण को पहचानें, जानें, उन जैसे कर्मों का अनुकरण करें।

‘होलिका’ शब्द का अर्थ
कई लोगों का कहना है कि ‘होलिका’ शब्द का अर्थ है ‘भुना हुआ अन्न! | होलिका के अवसर पर लोग गेहूँ और जौ की बालों को भूनते हैं। वास्तव में यह भी एक आध्यात्मिक रहस्य को उजागर करता है। जैसे भुना हुआ अन्न आगे उत्पत्ति नहीं करता, ऐसे ही ज्ञान-योग की अग्नि में तपकर किया गया कर्म भी अकर्म हो जाता है। भगवान द्वारा बताई गई उपरोक्त विधि से होली मनाने से अवश्य ही आत्मा का कल्याण होगा और इस भारत देश में फिर से भ्रातृप्रेम भरपूर होगा। गाय-शेर इकट्ठे जल पियेंगे और सभी रिश्तों-नातों में पारस्परिक प्रेम की सुगंध होगी।

Photo by Nandhu Kumar from Pexels

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