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25 Dec 1989
“रूहानी फखुर में रह बेफिक्र बादशाह बनो”
25 December 1989 · हिंदी
(क्रिसमिस डे)
आज बड़े-ते-बड़े बाप बच्चों को अलौकिक दिव्य संगमयुग के हर दिन की मुबारक दे रहे हैं। दुनिया वालों के लिए विशेष एक बड़ा दिन होता है और बड़े दिन पर क्या करते हैं? वह समझते हैं बड़े दिल से मना रहे हैं। लेकिन आप जानते हो उन्हों का मनाना क्या है! उन्हों का मनाना और आप बड़े-ते-बड़े बाप के बड़े दिल वाले बच्चों का मनाना - कितना न्यारा और प्यारा है! जैसे दुनिया वालों का बड़ा दिन है। खुशी में नाचते-गाते एक-दो को उस दिन की मुबारक देते हैं। ऐसे आप बच्चों के लिए संगमयुग ही बड़ा युग है। आयु में छोटा है लेकिन विशेषताओं और प्राप्ति दिलाने में सबसे बड़ा युग है। तो संगमयुग का हर दिन आपके लिए बड़ा दिन है। क्योंकि बड़े-ते-बड़ा बाप बड़े युग ''संगमयुग“ में ही मिलता है। साथ-साथ बाप द्वारा बड़े-ते-बड़ी प्राप्ति भी अभी होती है। बापदादा सभी बच्चों को बड़े-ते-बड़ा ''पुरुषोत्तम“ अब बनाते हैं। जैसे आज के दिन की विशेषता है खुशियां मनाना और एक-दो को गिफ्ट देना, मुबारक देना और फादर द्वारा ही गिफ्ट मिलने का दिन मनाते हैं। आप सबको बाप ने संगमयुग पर ही बड़े-ते-बड़ी गिफ्ट क्या दी है? बापदादा सदा कहते हैं कि मैंने आप बच्चों के लिए हथेली पर स्वर्ग का राज्य-भाग्य लाया है। तो सबकी हथेली पर स्वर्ग का राज्य-भाग्य है ना। जिसको कहते हैं - तिरी पर बहिश्त (हथेली पर स्वर्ग)। इससे बड़ी गिफ्ट और कोई दे सकता है? कितने भी बड़े आदमी बड़ी गिफ्ट दें लेकिन बाप की गिफ्ट के आगे वह क्या होगी? जैसे सूर्य के आगे दीपक। तो संगमयुग की यादगार निशानियां अन्य धर्मों में भी रह गई हैं। आपको बड़े युग में बड़े बाप ने बड़े-ते-बड़ी गिफ्ट दी है, इसलिए आज के बड़े दिन पर इस विधि से मनाते हैं। वह क्रिसमस फादर कहते हैं। फादर सदा बच्चों को देने वाला ''दाता“ है। चाहे लौकिक रीति से भी देखो - फादर बच्चों का दाता होता है। यह है बेहद का फादर। बेहद का फादर गिफ्ट भी बेहद की देते हैं। और कोई भी गिफ्ट कितना समय चलेगी? कितने अच्छे-अच्छे मुबारक के कार्ड गिफ्ट में देते हैं। लेकिन आज का दिन बीत गया, फिर उस कार्ड को क्या करेंगे? थोड़ा समय चलता हैं ना। खाने-पीने की मीठी चीजें भी देंगे, वह भी कितना समय चलेंगी! कितना समय खुशी मनायेंगे! नाचेंगे, गायेंगे एक रात। लेकिन आप आत्माओं को बाप ऐसी गिफ्ट देते हैं जो इस जन्म में तो साथ है ही लेकिन जन्म-जन्म साथ रहेगी। दुनिया वाले कहते हैं खाली हाथ आये और खाली हाथ जाना है। लेकिन आप क्या कहेंगे? आप फलक से कहते हो कि हम आत्माएं बाप द्वारा मिले हुए खजानों से भरपूर होकर जायेंगी और अनेक जन्म भरपूर रहेंगी। 21 जन्मों तक यह गिफ्ट साथ रहेगी। ऐसी गिफ्ट कभी देखी है? चाहे किसी भी फॉरेन के देश के राजा वा रानी हों, ऐसी गिफ्ट दे सकते हैं? चाहे पूरा तख्त दे देवें, ऑफर करें यह तख्त आप ले लो। आप क्या करेंगे, कोई लेगा? बाप के दिलतख्त के आगे यह तख्त भी क्या है! इसलिए आप सभी फखुर में रहते हो, फखुर अर्थात् रूहानी नशा। इस रूहानी फखुर में रहने वाले किसी भी बात का फिक्र नहीं करते, बेफिक्र बादशाह बन जाते हैं। अभी के भी बादशाह और भविष्य में भी राजाई प्राप्त करते हो इसलिए सबसे बड़ी और सबसे अच्छी यह बेफिक्र बादशाही है। कोई फिक्र है? और प्रवृत्ति में रहने वालों को बाल-बच्चों का फिक्र है? कुमारों को खाना बनाने का फिक्र ज्यादा है, कुमारियों को क्या फिक्र होता है? नौकरी का कि अच्छी नौकरी मिले, फिक्र है क्या? बेफिक्र हो ना! जिसको फिक्र होगा वह बेफिक्र बादशाही का मजा नहीं ले सकेंगे। विश्व की राजाई तो 20 जन्म होगी लेकिन यह बेफिक्र बादशाही और दिलतख्त - यह एक ही इस युग में मिलते हैं एक जन्म के लिए। तो एक का महत्व है ना!
बापदादा सदा बच्चों को यही कहते - ''ब्राह्मण जीवन अर्थात् बेफिक्र बादशाह“। ब्रह्मा बाप बेफिक्र बादशाह बने तो क्या गीत गाया - पाना था सो पा लिया, काम बाकी क्या रहा, आप क्या कहते हो? सेवा का काम बाकी रहा हुआ है, लेकिन वह भी करावनहार बाप करा रहे हैं और कराते रहेंगे। हमको करना है, इससे बोझ हो जाता है। बाप हमारे द्वारा करा रहे हैं तो बेफिक्र हो जायेंगे। निश्चय है यह श्रेष्ठ कार्य होना ही है वा हुआ ही पड़ा है इसलिए निश्चयबुद्धि, निश्चिंत, बेफिक्र रहते हैं। यह तो सिर्फ बच्चों को बिजी रहने लिए सेवा का एक खेल करा रहे हैं। निमित्त बनाए वर्तमान और भविष्य सेवा के फल का अधिकारी बना रहे हैं। काम बाप का, नाम बच्चों का। फल बच्चों को खिलाते, खुद नहीं खाते हैं। तो बेफिक्र हुए ना। सेवा में सफलता का सहज साधन ही यह है, कराने वाला करा रहा है। अगर ''मैं कर रहा हूँ“ तो आत्मा की शक्ति प्रमाण सेवा का फल मिलता है। बाप करा रहा है तो बाप सर्वशक्तिवान है। कर्म का फल भी इतना ही श्रेष्ठ मिलता है। तो सदा बाप द्वारा प्राप्त हुई बेफिक्र बादशाही वा हथेली पर स्वर्ग के राज्य-भाग्य की गॉडली गिफ्ट स्मृति में रखो। बाप और गिफ्ट दोनों की याद से हर दिन तो क्या लेकिन हर घड़ी बड़े-ते-बड़ी घड़ी है, बड़ा दिन है ऐसी अनुभूति करेंगे। दुनिया वाले तो सिर्फ मुबारक देते हैं। क्या कहते हैं? हैप्पी हो, हेल्दी-वेल्दी हो... कह देते हैं। लेकिन बन तो नहीं जाते हैं ना। बाप तो ऐसी मुबारक देते जो सदा के लिए हेल्थ-वेल्थ हैपी वरदानों के रूप में साथ रहती है। सिर्फ मुख से कह करके खुश नहीं करते हैं, लेकिन बनाते हैं और बनना ही मनाना है क्योंकि अविनाशी बाप की मुबारक भी अविनाशी होगी ना। तो मुबारक वरदान बन जाती है।
आप तना से निकले हुए हो। यह सब शाखायें हैं, यह सभी धर्म आपकी शाखायें हैं ना! कल्प वृक्ष की शाखायें हैं। इसलिए वृक्ष की निशानी क्रिसमस ट्री दिखाते हैं। क्रिसमस ट्री कभी सजी हुई देखी है? इसमें क्या करते हैं? (स्टेज पर दो क्रिसमस वृक्ष सजे रखे हैं) इसमें क्या दिखाया है? विशेष चमकते हुए जगे हुए बल्ब दिखाते हैं। छोटे-छोटे बल्बों से ही सजाते हैं। इसका अर्थ क्या है? कल्प वृक्ष की आप चमकती हुई आत्मायें हो और जो भी धर्म पितायें आते हैं वह भी अपने हिसाब से सतोप्रधान होते हैं। इसलिए गोल्डन एजेड आत्मा चमकती हुई होती है। इसलिए यह कल्प वृक्ष की निशानी अन्य धर्म की शाखाएं भी हर वर्ष निशानी मनाते रहते हैं। सारे वृक्ष का ग्रेट-ग्रेट ग्रैंड फादर है ना। कौन सा बाप ग्रेट-ग्रेट ग्रैंड फादर है? बाप ने ब्रह्मा को आगे रखा है। साकार सृष्टि की आत्माओं का आदि पिता, आदिनाथ ब्रह्मा है। इसलिए ग्रेट ग्रेट ग्रैन्ड फादर है। आदि देव के साथ आप भी हो ना कि अकेले आदि देव है। आप आदि आत्मायें अभी आदि देव के साथ हो और आगे भी साथ रहेंगी, इतना नशा है? खुशी के गीत सदा गाते रहते हो ना या सिर्फ आज गायेंगे?
आज विशेष डबल फारेनर्स का दिन है। आप के लिए रोज़ बड़ा दिन है या आज है? चारों ओर देश-विदेश के बच्चे कल्प वृक्ष में चमकते हुए सितारे दिखाई दे रहे हैं। सूक्ष्म रूप में तो सब मधुबन में पहुंचे हुए हैं। वह भी सब आकारी रूप में मना रहे हैं। आप साकारी रूप में मना रहे हो। सभी का मन बाप की गॉडली गिफ्ट को देख खुशी में नाच रहा है। बापदादा भी सर्व साकार रूप और आकार रूपधारी बच्चों को सदा हर्षित भव की मुबारक दे रहे हैं। सदा दिलखुश मिठाई खाते रहो और प्राप्ति के गीत गाते रहो। ड्रामा अनुसार भारत वालों को विशेष भाग्य मिला हुआ है। अच्छा।
सभी टीचर्स ने बड़ा दिन मनाया कि रोज़ मनाती हो? बड़ा बाप है और बड़े आप भी हो इसलिए जो दुनिया वालों के बड़े दिन हैं उसको महत्व देते हैं। इसमें भी आप बड़े, छोटे भाईयों को उत्साह दिलाते हो। सभी टीचर्स बेफिक्र बादशाह हो? बादशाह अर्थात् सदा निश्चय और नशे में स्थित रहने वाले क्योंकि निश्चय विजयी बनाता है और नशा खुशी में सदा ऊंचा उड़ाता है। तो बेफिक्र बादशाह ही होंगे ना! कोई फिक्र है क्या? सेवा कैसे बढ़ेगी, अच्छे-अच्छे जिज्ञासु पता नहीं कब आयेंगे, कब तक सेवा करनी पड़ेगी - यह सोचते तो नहीं हो? असोच बनने से ही सेवा बढ़ेगी, सोचने से नहीं बढ़ेगी। असोच बन बुद्धि को फ्री रखेंगे तब बाप की शक्ति मदद के रूप में अनुभव करेंगे। सोचने में ही बुद्धि बिजी रखेंगे तो बाप की टचिंग, बाप की शक्ति ग्रहण नहीं कर सकेंगे। बाबा और हम कम्बाइण्ड हैं, करावनहार और करने के निमित्त मैं आत्मा। इसको कहते हैं असोच अर्थात् एक की याद। शुभचिंतन में रहने वाले को कभी चिंता नहीं होती। जहाँ चिंता है वहाँ शुभचिंतन नहीं और जहाँ शुभचिंतन है वहाँ चिंता नहीं। अच्छा!
चारों ओर के गॉडली गिफ्ट के अधिकारी, बड़े ते बड़े बाप के बड़े ते बड़े भाग्यवान आत्मायें, आदि पिता के सदा साथी आदि आत्मायें, सदा बड़े ते बड़े बाप द्वारा मुहब्बत की मुबारक, अविनाशी वरदान प्राप्त करने वाले सर्व साकारी रूपधारी और आकारी रूपधारी - सभी बच्चों को दिलखुश मिठाई के साथ यादप्यार और नमस्ते।
पूना-बीदर ग्रुप:- रोज़ अमृतवेले दिलखुश मिठाई खाते हो? जो रोज़ अमृतवेले दिलखुश मिठाई खाते हैं वो स्वयं भी सारा दिन खुश रहते हैं और दूसरे भी उनको देख खुश होते हैं। यह ऐसी खुराक है जो कोई भी परिस्थिति आ जाए लेकिन यह दिलखुश खुराक परिस्थिति को छोटा बना देती है, पहाड़ को रूई बना देती है। इतनी ताकत है इस खुराक में! जैसे शरीर के हिसाब से भी जो तन्दुरूस्त वा शक्तिशाली होगा वह हर परिस्थिति को सहज पार करेगा और जो कमजोर होगा वह छोटी सी बात में भी घबरा जायेगा। कमजोर के आगे परिस्थिति बड़ी हो जाती है और शक्तिशाली के आगे परिस्थिति पहाड़ से रूई बन जाती है। तो रोज दिलखुश मिठाई खाना माना सदा दिलखुश रहें। यह अलौकिक खुशी के दिन कितने थोड़े हैं! देवताई खुशी और ब्राह्मणों की खुशी में भी फर्क है। यह ब्राह्मण जीवन की परमात्म-खुशी, अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति देवताई जीवन में भी नहीं होगी। इसलिए इस खुशी को जितना चाहे मनाओ। रोज़ समझो आज खुशी मनाने का दिन है। यहाँ आने से खुशी बढ़ गई है ना! यहाँ से नीचे उतरेंगे तो कम तो नहीं होगी? उड़ती कला अभी है, फिर तो जितना पाया उतना खाते रहेंगे। तो सदा यह स्मृति में रखो कि हम दिलखुश मिठाई खाने वाले हैं और दूसरों को खिलाने वाले हैं क्योंकि जितना देंगे उतना और बढ़ती जायेगी। देखो, खुशी का चेहरा सबको अच्छा लगता है और कोई दु:ख अशान्ति में घबराया हुआ चेहरा हो तो अच्छा नहीं लगेगा ना! जब दूसरों का अच्छा नहीं लगेगा तो अपना भी नहीं लगना चाहिए। तो सदैव खुशी के चेहरे से सेवा करते रहो। मातायें ऐसी सेवा करती हो? घर वाले आपको देखकर खुश हो जाएं। चाहे कोई ज्ञान को बुरा भी समझते हो फिर भी खुशी की जीवन को देखकर मन से अनुभव जरूर करते हैं कि इनको कुछ मिला है जो खुश रहते हैं। बाहर अभिमान से न भी बोलें लेकिन अन्दर महसूस करते हैं और आखिर तो झुकना ही है। आज गाली देते हैं कल चरणों पर झुकेंगे। कहाँ झुकेंगे? ''अहो प्रभू“ कहकर झुकना जरूर है। तो ऐसी स्थिति होगी तब तो झुकेंगे ना! कोई भी किसी के आगे झुकता है तो उसमें कोई बड़ापन होता है, कोई विशेषता होती है, उस विशेषता पर झुकता है। ऐसे तो कोई नहीं झुकेगा ना। दिखाई दे इन जैसी जीवन कोई की है ही नहीं, सदा खुश रहते हैं। रोने की परिस्थिति में भी खुश रहें, मन खुश रहे। ऐसे नहीं हंसते रहो, लेकिन मन खुश हो। पाण्डव क्या समझते हैं? ऐसा अनुभव दूसरों को होता है या अभी कम होता है?
खुशमिजाज़ रहने वाले अपने चेहरे से बहुत सेवा करते हैं। मुख से बोलो, नहीं बोलो लेकिन आपकी सूरत, ज्ञान की सीरत को स्वत: प्रत्यक्ष करेगी। तो यही याद रखना कि दिलखुश मिठाई खानी है और औरों को भी खिलानी है। जो स्वयं खाता है वह खिलाने के बिना रह नहीं सकता है। अच्छा!
बेलगाम - सोलापुर ग्रुप :- अपने इस श्रेष्ठ जीवन का देख हर्षित होते हो? क्योंकि यह जीवन हीरे तुल्य जीवन है। हीरे का मूल्य होता है ना! तो इस जीवन को इतना अमूल्य समझकर हर कर्म करो। ब्राह्मण जीवन अर्थात् अलौकिक जीवन। अलौकिक जीवन में साधारण चलन नहीं हो सकती। जो भी कर्म करते हो वह अलौकिक होना चाहिए, साधारण नहीं। अलौकिक कर्म तब होता है जब अलौकिक स्वरूप की स्मृति रहती है। क्योंकि जैसी स्मृति होगी वैसी स्थिति होगी। स्मृति में रहे - एक बाप दूसरा न कोई। तो बाप की स्मृति सदा समर्थ बनाती है, इसलिए कर्म भी श्रेष्ठ अलौकिक होता है। सारा दिन जैसे अज्ञानी जीवन में मेरा-मेरा करते रहे, अब यही मेरा बाप की तरफ लगा दिया ना! अभी और सब मेरा-मेरा खत्म हो गया। ब्राह्मण बनना अर्थात् सब कुछ तेरा कर दिया। यह गलती तो नहीं करते हो - मेरे को तेरा, तेरे को मेरा तो नहीं बना देते हो? जब कोई मतलब होगा तो कहेंगे मेरा, और कोई मतलब नहीं होगा तो कहेंगे तेरा। मेरा भले कहो लेकिन ''मेरा बाबा“ कहो। बाकी सब मेरा-मेरा छोड़कर एक मेरा। एक मेरा कहने से मेहनत से छूट जायेंगे, बोझ उतर जायेगा। नहीं तो गृहस्थी जीवन में कितना बोझ है! अभी हल्के डबल लाइट हो गये इसलिए सदा उड़ती कला वाले हो। उड़ती कला के सिवाए रूकती कला में रूकना नहीं है। सदा ही उड़ते चलो। बाप ने अपना बना लिया - सदा इसी खुशी में रहो।
वैराइटी ग्रुप :- सदा अपने को भगवान के बगीचे के रूहानी गुलाब समझते हैं? सबसे खुशबूदार पुष्प है रूहे गुलाब। तो आप हो रूहानी गुलाब जो चारों ओर रूहानी खुशबू फैलाते हो। खुशबू स्वत: ही अपनी तरफ आकर्षित करती है। अगर कहाँ बदबू होगी तो वहाँ से भागने की कोशिश करेंगे लेकिन खुशबू होगी तो नजदीक आने की कोशिश करेंगे। तो रूहानी खुशबू सभी को आकर्षित करती है। ऐसे रूहानी गुलाब हो ना! गुलाब के साथ कांटा लगा हुआ तो नहीं है? गुलदस्ता बनाते हैं तो पहले कांटे निकालते हैं ना! कांटे वाला गुलदस्ता नहीं बनाते, कांटे निकालकर साफ करके फिर गुलदस्ता बनाते हैं। किसी भी देवता के आगे पुष्प चढ़ायेंगे तो पहले साफ करेंगे, फिर भेंट करेंगे। आप भी रूहानी गुलाब बाप के आगे वैराइटी रूप में, गुलदस्ते के रूप में हो। भक्ति मार्ग में भी यहाँ की रस्म चलती रहती है। आप रूहानी गुलाब बाप के आगे अर्पण हुए हो, इसलिए देवताओं को भी पुष्प ही अर्पण करते हैं। रूहानी गुलाब अर्थात् कभी भी रूहानियत से दूर होने वाला नहीं। जैसे फूलों में खुशबू समाई हुई होती है ना, अलग तो नहीं होती है ना। ऐसे आप लोगों में रूहानियत की खुशबू समाई हुई है। आर्टीफिशियल बाहर की नहीं है। समाई हुई है या कभी-कभी खुशबू डाल देते हो? आप खुशबूदार बनते हो, इसलिए मन्दिरों में आपके जड़ चित्रों के आगे भी सदैव खुशबू जलायेंगे। कोई भी मन्दिर में अगरबत्ती कितने प्यार से जलाते हैं! अगर मन्दिर में खुशबू नहीं हो तो कहेंगे - यहाँ पुजारी अच्छा नहीं है, मन्दिर का वातावरण नहीं है। तो यह खुशबू क्यों रखते हैं? अगरबत्ती क्यों जलाते हैं? क्योंकि आप खुशबूदार बनते हो। तो यह नशा है कि यह हमारे ही चित्र हैं? हर एक समझता है कि यह मेरे चित्र हैं। एक नहीं, सभी चित्र आपके हैं! पाण्डव क्या समझते हैं? हनुमान, गणेश यह आपके चित्र हैं? आपमें हनुमान वा गणेश कौन है? सभी गणेश हो? गणेश अर्थात विद्यापति। जो नॉलोजफुल हैं वो विद्यापति अर्थात् गणेश हैं और हनुमान अर्थात् जिसके हृदय में सिवाए बाप के और कोई नहीं। सेवाधारी भी हैं और हृदय में बाप समाया हुआ है। तो ऐसे हो या दिल में कभी-कभी और कोई आ जाता है? माताओं के दिल में क्या है? और कोई पोत्रा-धोत्रा है? पोत्रे-धोत्रे प्यारे लगते हैं ना या पोत्रा भी बाप है तो धोत्रा भी बाप है? सब कुछ बाप को बना दिया तो कोई याद नहीं आयेगा और अगर नहीं बनाया तो याद आयेगा इसलिए बाप कहते हैं - सर्व सम्बन्ध से याद करो। अच्छा।
डॉक्टर्स प्रति अव्यक्त महावाक्य:- सभी डॉक्टर्स के दिल में क्या है? हॉस्पिटल तो नहीं है? बाप को दिल में बिठाना अर्थात् सदा के लिए अनेकों को शफा देना। आजकल तो डॉक्टर्स भी कहते हैं कि दवाई इतना काम नहीं करेगी जितना दुआ करेगी। वो भी दवाईयों से दिलशिकस्त हो गये हैं क्योंकि जानते हैं ना कि इसकी रिजल्ट क्या है और क्या निकलेगी! इसलिए अभी सबकी नज़र दुआओं तरफ जा रही है। अभी योग एक्सरसाइज़ के रूप में चारों ओर बढ़ता जा रहा है। अभी योग तक आये हैं, सहजयोग तक आ जायेंगे। दवाईयों के बजाए दूसरी तरफ अभी बुद्धि तो गई है ना। आखिर ठिकाने पर आ जायेंगे तो डॉक्टर्स यही काम करते हो ना। सबकी बुद्धि को ठिकाने पर लगाने वाले हो ना? अच्छा है, हिम्मत रखने से बाप की मदद स्वत: मिल रही है, मिलती रहेगी। जहाँ हिम्मत है वहाँ असम्भव भी सम्भव हो जायेगा। सभी असम्भव को सम्भव करने वाले हो। जो दुनिया वाले कहते हैं मन को एकाग्र करना बहुत मुश्किल है, असम्भव भी कह देते हैं और आप क्या कहते हो? आपके लिए तो सेकेण्ड की बात है ना। बस बाबा कहा और मन ठिकाने पर पहुंचा। तो आपके लिए सेकेण्ड का काम है और उन्हों के लिए असम्भव है। कितना अन्तर आ गया! टाइम तो नहीं लगता है? ऐसे तो नहीं गीत बजे, लाल बत्ती जले तब ही मन टिकेगा? मेहनत तो नहीं करनी पड़ती? अपना बाप है ना। कोई दूसरे का बाप तो नहीं है। अपना बाप नहीं हो और कोई कहे - यह आपका बाप है, इसे याद करो तो याद नहीं कर सकेंगे ना! लेकिन यह तो अपना है। अपनी चीज़ को याद करना कभी मुश्किल नहीं होता। पराये को याद करना मुश्किल होता है। आप तो अधिकार से याद करते हो या भगवान है, बहुत बड़ा है, सूर्य समान है - ऐसे याद करते हो? सब कुछ मेरा है - इस अधिकार से याद करो।
रूहानी गुलाब बन सारा दिन खुशबु फैलाते रहो। खुशबू ऐसी चीज़ होती है जो दूर वालों को भी आकर्षित करती है। दूर से ही सोचेंगे - यह खुशबू कहाँ से आ रही है। तो आपकी रूहानियत विश्व को आकर्षित करेगी। देखो, रूहानियत की खुशबू ने देश से विदेश को भी आकर्षित किया ना! विदेश तक खुशबू पहुँची! कोई भी काम करते शुभ संकल्प से यह खुशबू फैलाते रहो। कोई भी काम करते चेक करो कि बुद्धि कितने तरफ जा रही है? न चाहते भी अनेक तरफ जाती है, एक तरफ नहीं होती। तो जब और तरफ जा सकती है तो सेवा भी तो कर सकते हो ना, याद भी कर सकते हो। बहुत थोड़ा समय होता है जो फुल बुद्धि उस काम में रहती है। जो ऐसा कोई काम होगा - जैसे डॉक्टर्स ऑपरेशन करते हैं, जरूरी ऑपरेशन है तो फुल बुद्धि होगी। बाकी दवाई दे रहे हैं, देख रहे हैं तो बुद्धि और काम भी करती है। जब वह कर सकती है तो यह क्यों नहीं कर सकती। मन और बुद्धि की आदत है चक्र लगाने की। चाहे ज्ञान का चक्र चलाओ और चाहे व्यर्थ चलाओ लेकिन चक्कर चलता जरूर है। आप स्वदर्शन चक्र चलाओ तो और चक्कर खत्म हो जायेंगे।
तो सभी सेवा में सहयोगी हो? जिसे समय नहीं मिलता, सरकमस्टांस हैं वह हाथ उठाओ। मन्सा सेवा तो सब कर सकते हो ना? बिजी रहने के लिए सेवा बहुत अच्छा साधन है। जितना अपने को बिजी रखेंगे उतना सेफ रहेंगे। चाहे मन्सा करो, चाहे वाचा करो, चाहे कर्मणा करो लेकिन बुद्धि से बिजी जरूर रहो। हाथ-पांव से तो रहते हो लेकिन बुद्धि से बिजी रहो। अपना टाइम-टेबल बनाओ। जितना बड़ा आदमी उतना टाइम-टेबल फिक्स होता है। तो आप बड़े-ते-बड़े आदमी हो ना! सारे कल्प में ढूंढकर के आओ ब्राह्मणों से बड़ा कोई है? देवतायें भी नहीं हैं। चाहे आप ही देवता बनेंगे लेकिन इस जीवन के आगे वह भी कुछ नहीं है। जीवन है तो ब्राह्मण जीवन अति श्रेष्ठ है। अच्छा।
अपने को बड़े ते बड़ा खुशनसीब अनुभव करते हो? आप जैसा खुशनसीब और कोई है? जिसका नसीब अर्थात् भाग्य इतना श्रेष्ठ है उसकी निशानी क्या होगी? सदा खुश रहेंगे। नसीब वाला सदा सम्पन्न होता है। कोई विद्या में, पढ़ाई में होशियार होता है तो कहते हैं इसका नसीब बहुत अच्छा है। अच्छे नसीब की निशानी - वह हर बात में सम्पन्न होगा, कमजोर नहीं होगा, बहादुर होगा। तो आप सभी खुशनसीब हो ना! सदा खुशी के गीत बजते रहते हैं। जैसे भक्ति मार्ग में कहते हैं - अनहद शब्द चलता रहे तो अनहद शब्द सुनने के लिए, चलाने के लिए कितनी मेहनत करते हैं, आप लोगों ने क्या मेहनत की? सदा खुशी के गीत स्वत: बजते रहते हैं, यह कभी खत्म नहीं होते। वह कितना भी बड़ा गीत बनाओ तो भी बंद हो जायेगा। आटोमेटिक भी होगा तो भी बैटरी खत्म हो जायेगी। ज्यादा टाइम चलायेंगे तो बैटरी खत्म हो जायेगी या गर्म हो जायेगी और आपकी बैटरी कभी खत्म होती है? अविनाशी गीत है, इसीलिए अनहद है अर्थात् हद नहीं है। तो अनहद गीत बजता है या बजाना पड़ता है? और काम ही क्या है! गाओ और नाचो। योग लगाना भी क्या है! खुशी में नाचना ही तो है ना। बाप की महिमा गाते हो, खुशी में नाचते हो और क्या करते हो! इसी में ही सेवा है, इसी में ही योग है, इसी में ही ज्ञान वा धारणा है। नाचो और गाओ, ब्रह्मा भोजन खाओ। जब भोग लगाया तो ब्रह्मा भोजन हो गया ना। अगर भोग लगाकर, याद करके नहीं खाया तो साधारण खाना हो गया, उससे ताकत नहीं आयेगी, उससे सिर्फ पेट भरेगा लेकिन आत्मा में शक्ति नहीं आयेगी। तो क्या करना है? खाओ, नाचो और गाओ। मेहनत से छुड़ा दिया है ना! नहीं तो कितनी मेहनत करते - प्राणायाम् चढ़ाओ, एक ही मूर्ति को देखते रहो, मन को अमन करो। कितनी मेहनत कराते हैं, आप लोगों ने मन को बाप की तरफ लगा दिया, बस, बिजी कर दिया। मन को सुमन बना दिया, दमन नहीं किया। अभी आपका मन श्रेष्ठ संकल्प करता है, इसीलिए सुमन है। मन का भटकना बन्द हो गया। जब तक ठिकाना नहीं होता है तो भटकना होता है। ठिकाने का मालूम हो फिर कौन भटकेगा! अगर फिर भी भटके तो कहेंगे - इसका दिमाग ठीक नहीं है। आपका दिमाग तो विशाल हो गया। दूरांदेशी, विशाल हो गये। इतनी विशाल बुद्धि है जो आदि-मध्य-अन्त, पास्ट, प्रेजेन्ट, फ्युचर - तीनों कालों को जानते हो। तो सदा यही याद रखना कि खुशनसीब हैं, कभी कमजोर नहीं बनना है, कमाल करने वाला बनना है। आधाकल्प तो कमजोर रहे। अभी कमजोर क्यों रहें। तो जो भी संकल्प चलें, बोल निकले या कोई भी कर्म हो तो चेक करो - कमाल का है, कमजोरी का तो नहीं? हर संकल्प, बोल में कमाल अनुभव हो। अच्छा।