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28 Sept 1969
“पूरे कोर्स का सार - कथनी करनी एक करो”
28 September 1969 · हिंदी
किस रूप में मुलाकात कर रहे हो? अव्यक्त रूप से वा स्नेह रूप से वा शक्ति रूप से? बाप रूप से तो मुलाकात कर ही रहे हो। लेकिन स्नेह रूप में वा शक्ति रूप में वा अव्यक्त रूप में? वर्तमान कौनसा विशेष रूप है? सारे दिन में इन तीनों रूपों में से ज्यादा कौनसा रूप रहता है? इन तीनों में से श्रेष्ठ कौनसा है? (हर एक ने अपना समाचार सुनाया) अब सिर्फ प्रश्न पूछते हैं फिर स्पष्ट करेंगे। अब सबने जो एक्स्ट्रा ट्रेनिंग कोर्स लिया है, इसमें सबसे पावरफुल प्वाइंट कौन सी ली है? जो प्वाइंट आगे विघ्नों को एक सेकेण्ड में खत्म कर दे। हर एक ने भिन्न-भिन्न प्वाइंट तो सुनाई अब जिन्होंने भी प्वाइंट सुनाई है, वो फिर भी अपना अनुभव लिख भेजें कि इस प्वाइंट को यूज़ करने से कितने समय में विघ्न दूर हुआ है। जैसे कोई दवाई एक यूज़ करके देखता है फिर अनेकों को उसका लाभ लेने में सहज होता है। तो यह सब भिन्न-भिन्न प्वॉइन्ट जो निकली हैं उन सब का सार दो शब्दों में याद रखो जिसमें आपकी सब बातें आ जायें। यह जो अब कोर्स किया है उसका मुख्य सार दो अक्षरो में याद रखना है कि जो कहते हैं वो करना है। कहते हैं हम ब्रह्माकुमारी हैं। हम बापदादा के बच्चे आज्ञाकारी हैं। मददगार हैं। जो भी बातें कहते हो वो प्रैक्टिकल करना है। कहना अर्थात् करना। कहने और करने में अन्तर नहीं हो। यही आपके कोर्स का सार है। कहते तो आप कई वर्षों से हो विकार बुरी चीज़ है, औरों को भी सुनाते हो लेकिन खुद घर गृहस्थी से न्यारे होकर नहीं चलते हो। तो अपना ही कहना और करना बदल जाता है। इसलिए आज से यह बात याद रखो। जो कहेंगे सो करेंगे। जो भी सोचते हो अथवा दुनिया को भी जो कहते हो वो करके दिखाना है। सिर्फ कहना ही नहीं, करना है। अब सर्विस जो रही है वो कहने से नहीं होगी। लेकिन अपनी करनी से होगी। कथनी, करनी और रहनी कहते हैं ना। तो कथनी करनी और रहनी तीनों ही एक हो तब कर्मातीत अवस्था में जल्दी से जल्दी पहुंच सकेंगे। हर समय यह चेक करो जो कहती हूँ वो करती हूँ? कहते हो हम सर्वशक्तिमान की सन्तान हैं और करते क्या हो? कमजोरी की बात। आज से यह पक्का करो कि जो कहूँगी सो करुंगी। जो खुद ऐसे बनेंगे उनको देख कर और भी आपे ही करेंगे। आपको मेहनत करने की जरूरत नहीं रहेगी। अब तक तो यही उलाहने मिलते रहते हैं कि कहते एक हैं करते तो दूसरा हो। उलाहनों को खत्म करना है। उलाहना खत्म हो फिर क्या बन जायेंगे? अल्लाह (ऊंच) बन जायेंगे। जितना अल्लाह बनेंगे तो फिर ना चाहते हुए नाम बाला होगा। तो किये हुए कोर्स की यह शिक्षा है मुख्य सार।
सबसे खौफनाक मनुष्य कौनसा होता है जिनसे सब डर जाते हैं? दुनिया की बात तो दुनिया में रही। लेकिन इस दैवी परिवार के अन्दर सबसे खौफनाक, नुकसान कारक वो है जो अन्दर एक और बाहर से दूसरा रूप रखता है। वो पर-निन्दक से भी जास्ती खौफनाक है। क्योंकि वो कोई के नज़दीक नहीं आ सकता। स्नेही नहीं बन सकता। उनसे सब दूर रहने की कोशिश करेंगे। इसलिए इस भट्ठी में आप लोगों को यह शिक्षा मिली। इसको सच्चाई और सफाई कहा जाता है। सफाई किस बात में? सच्चाई किस बात में? इनका भी बड़ा गुह्य रहस्य है। सच्चाई जो करें वो ही वर्णन करें। जो सोचें वही वर्णन करें। बनावटी रूप नहीं। मन्सा-वाचा-कर्मणा तीनों रूप में चाहिए। अगर मन में कोई संकल्प उत्पन्न होता है तो उसमें भी सच्चाई चाहिए। सफाई, अन्दर में कोई भी विकर्म का किचडा नहीं हो, कोई भी भाव-स्वभाव पुराने संस्कारों का भी किचड़ा नहीं हो। जो ऐसी सफाई वाला होगा वो ही सच्चा होगा और जो सच्चा होता है उसकी परख क्या होती है? जो सच्चा होगा वह सबका प्रिय होगा। उसमें भी सबसे पहले तो वह प्रभुप्रिय होगा। सच्चे पर साहब राजी होता है। तो पहले प्रभुप्रिय होगा, फिर दैवी परिवार का प्रिय होगा। उसको कोई भी ऐसी नज़र से नहीं देखेगा। उनकी नज़र में, वाणी में, उनके कर्म में ऐसी परिपक्वता होगी जो कभी भी ना खुद ही डगमग होगा ना ही दूसरों को करेगा। जो सच्चा होगा वह प्रिय होगा। कई समझते हैं कि हम तो सच्चे हैं लेकिन मुझे समझा नहीं जाता है। सच्चा हीरा कभी छिप थोड़ेही सकता है। इसलिए ही यह समझना मैं ऐसा हूँ परन्तु मुझे ऐसा समझा नहीं जाता है - यह भी सच्चाई नहीं है। सच्चाई कभी छिप नहीं सकती है और सच्चे सबके प्रिय बन जाते हैं। कई यह भी समझते हैं कि हम नज़दीक नहीं हैं इसलिए ही प्रख्यात नहीं हैं। लेकिन जो सच्चे और पक्के होते हैं वो दूर होते हुए भी अपनी परख छिपा नहीं सकते। कोई कितना भी दूर हो लेकिन बापदादा के नज़दीक होगा। जो बाप के नज़दीक हैं वो सबके नज़दीक हैं। तो सच्चा बनना। सफाई का सबूत चलन में दिखता है। सिर्फ समझना ही नहीं हैं लेकिन कर्म में करके दिखाना है। जो कर्म हो वो भी दूसरों के सर्विस के निमित्त हो। अपनी मन्सा, वाचा, कर्मणा को चेक करो। आप अपने को क्या कहलवाते हो? और बापदादा भी आप सभी को क्या टाइटिल देते हैं, वह याद है? सर्विसएबुल बच्चे। तो जो सर्विसएबुल हैं उनका हर संकल्प, हर शब्द, हर कर्म सर्विस ही करेगा। भाषण करना, किसी को समझाना सिर्फ यही सर्विस नहीं है। परन्तु जो सविसएबुल हैं वो हर सेकेण्ड सर्विस ही करते रहते हैं। तो अपने को देखना है कि हमारी हर सेकेण्ड सर्विसएबुल चलन होती है? वा कहाँ डिस-सर्विस वाली चलन तो नहीं है? जब नाम सर्विसएबुल हैं तो कर्म भी ऐसा ही होना चाहिए। इसलिए जो कहना है वो करना भी है। यह याद रखने से पुरुषार्थ में सहज सफलता पायेंगे। कई बहुत खुश होते हैं कि हमने इतने जिज्ञासु समझाये, इतने भाषण किये, बहुत सर्विस की लेकिन वो भी हद की सर्विस है। अब तो बेहद की सर्विस करनी है। मन्सा-वाचा-कर्मणा तीनों रूपों से बेहद की सर्विस हो - उसको कहा जाता है सर्विसएबुल। अब अपने को देखो कि हम सर्विसएबुल बने हैं? ऐसा सर्विसएबुल फिर स्नेही भी बहुत होगा। अब ऐसा सभी ने ठप्पा लगाया है वा कोई साहस भी रख रहे हैं? जब करना ही है तो गोया ठप्पा लग ही गया। अपने में शक क्यूं रखते हो? कि ना मालूम परीक्षा में पास हों वा फेल हो। होशियार स्टूडेन्टस् सदैव निश्चय से कहते हैं कि हम तो नम्बरवन आयेंगे। अगर पहले से ही अपने में संशय रखेंगे तो संशय की रिजल्ट क्या होती है? फिर विजयी बन ना सकें। अगर जरा भी संशय रखा तो विजयी नहीं बनेंगे। जब तक निश्चय नहीं है। आप लोगों ने शुरू से ही दाँव लगाया है कि वर्सा लेके ही छोड़ेंगे या सोचा था कि देखेंगे? दाँव लगाया गोया बन ही गये।
जब अपने को निश्चय बुद्धि कहते हैं तो कोई भी बात में, ना बाप में, ना बाप की नालेज में, ना बाप के परिवार में संशय वा विकल्प उठना चाहिए। हम शिवबाबा के बच्चे हैं। तो सर्वशक्तिमान के बच्चे निश्चय बुद्धि हैं। यह कौन बोलता है? सर्वशक्तिवान के बच्चे बोलते हैं। निश्चय रखने से ही विजय हो जायेगी। भल करके अन्दर समझो कि ना मालूम क्या होगा? परन्तु फिर भी निश्चय में विजय हो जायेगी। अगर निश्चय नहीं है तो आपका कर्म भी वैसा ही चलेगा। निश्चय रखेंगे कि हमको करना ही है तो कर्म भी वैसा ही होगा। अगर ख्याल करेंगे कि अच्छा देखेंगे, करेंगे, तो कर्म भी ढीला ही चलेगा। कभी भी अपने में कमज़ोरी की, संशय की फीलिंग नहीं आनी चाहिए। कमज़ोरी के संकल्प ही संशय है। अब कहाँ तक यह पुराने संस्कार और संकल्प रहेंगे! पुराने संस्कार भी नहीं। संस्कार तो मोटी चीज़ है। लेकिन पुराने संकल्प खत्म होने चाहिए। तब कहेंगे भट्ठी से पककर निकल रहे हैं। भट्ठी का अर्थ ही क्या है? भट्ठी में सारा जलकर खत्म हो जाते हैं। रूप ही बदल जाता है। कोई भी चीज़ भट्ठी में डालेंगे तो उनका रूप, गुण आदि सब बदल जायेगा। आप भी भट्ठी करते हैं तो रूप, गुण बदलना चाहिए। ईट जब पकती है तो पहले मिट्टी होती है फिर पकने से उनका रूप गुण बदल जाता है। और कर्तव्य भी बदल जाता है। इसी रीति अपना रूप गुण और कर्तव्य तीनों ही बदलते जाना है। यह है भट्ठी की रिजल्ट। अब बताओ कि बदल लिया है? वा बदलेंगे? आपके उमंगों के साथ बापदादा की भी मदद है। जितना आप अपने में निश्चय रखेंगे उतना बापदादा भी अवश्य मददगार बनते हैं। स्नेही को अवश्य सहयोग मिलता है। किससे भी सहयोग लेना है, तो स्नेही बनना है। स्नेही को सहयोग की मांगनी नहीं करनी पड़ती है। बापदादा के स्नेही बनेंगे, परिवार के भी स्नेही बनेंगे। तो सभी का सहयोग स्वत: ही प्राप्त होगा। मुख्य यही दो बातें है निश्चय बुद्धि और नष्टोमोहा, यह तो तिलक माथे पर लगा ही दिया है। स्लोगन भी याद रखना है जो कहेंगे वो करेंगे यह है माताओं की सजावट। माताएं श्रृंगार ज्यादा करती हैं ना। तो इन माताओं का श्रृंगार रत्नों से किया जाता है। सबसे चमकने वाला श्रृंगार होता है रत्नों का। सोने में भी रत्न होता है तो जास्ती चमकता है। तो बापदादा ने इन माताओं को रत्नों से श्रृंगारा है। क्योंकि संगम पर सोने से भी ज्यादा हीरा बनना है। जितना-जितना अपने को रत्नों से सजायेंगे उतना ही ना चाहते हुए भी दुनिया की नज़र आपके तरफ जायेगी। दुनिया को कहने की दरकार नहीं होगी कि हमारी तरफ देखो। यह ज्ञान रत्नों का श्रृंगार दूर वालों का भी ध्यान खिंचवायेगा। इसलिए इन रत्नों के श्रृंगार को सदा के लिए कायम रखेंगे ऐसा निश्चय करना है।
आज अमृतवेले कोई बच्चे विशेष याद आए जो साकार रूप में ज्यादा साथ रहे हैं, आज विशेष उनकी याद आई क्योंकि आजकल साथ रहने वालों का पुरुषार्थ पहले से बहुत अच्छा है इसलिए पुरुषार्थ के स्नेह में उनकी याद आई। वर्तमान समय मधुबन वालों में परिवर्तन विशेष देखने में आ रहा है। हर स्थान में एक-एक रत्न चमक कर जा रहे हैं। अब एक-एक चमका हुआ रत्न फिर जाकर आप समान कैसे बनाते हैं वह अब देखेंगे। कभी भी हिम्मतहीन बोल नहीं बोलने चाहिए। पुरुषार्थहीन व हिम्मतहीन बनना - वह अब जमाना गया। अब तो मददगार बनना है और बनकर दिखाना है। अभी सबके दिल के अन्दर यह रहता है कि हम भी जल्दी ही जायें। आगे तो कहते थे कि संगमयुग में जितना जास्ती रहें उतना ही जास्ती अच्छा है। क्योंकि साकार के साथ में ही संगम के सुहेज़ थे। अभी तो चाहते हैं कि जहाँ अपना रहबर वहीं हम राही भी चलें। तुम लोगों की चलन, वाणी से भी ज्यादा सर्विस करेगी। डबल सर्विस में सफलता होगी तभी डबल ताज मिलेगा। बोलो सिंगल ताजधारी बनना है या डबल? कि बने ही हुए हैं? शक्तिरूप बनने का साधन क्या है? शक्तिरूप तभी बन सकेंगे जब कि अव्यक्त स्थिति होगी। अव्यक्त स्थिति में रहकर भल व्यक्त में आते भी हैं तो सिर्फ सर्विस अर्थ। सर्विस समाप्त हुई तो फिर अव्यक्त स्थिति में रहना ऐसा अभ्यास रखना है।
जो बली चढ़ जाता है उनको रिटर्न में क्या मिलता है? बलि चढ़ने वालों को ईश्वरीय बल बहुत मिलता है। जो सम्पूर्ण स्वाहा होते हैं वही सदा सुहागिन बनते हैं। उनका सुहाग खत्म नहीं होता है। जो सदा सुहागिन होते हैं उनकी अविनाशी बिन्दी सदैव होती है। आत्म-स्थिति में स्थित रहने की बिन्दी सदा सुहागिन को हर समय मस्तिष्क में याद रहती है। सदा सुहागिन की और कौनसी निशानी होती है? एक तो बिन्दी दूसरा कंगन होता है, वो है संगम रूपी कंगन। दोनों कभी भी नहीं उतारेंगे। संगम के कंगन उतार देने से सुहाग खत्म हो जाता है। अभी विशेष कमाल की सर्विस करनी है। अपने संग से सबको ऐसा रंग लगाओ जो कि कभी उतर नहीं सके। म्युज़ियम में तो सिर्फ संदेश लेकर चले जाते हैं। लेकिन अब यह ध्यान रखना है कि हमारे संग का रंग इतना तो अविनाशी रहे जो कि कभी भी वह उतर नहीं सके। अभी जम्प देकर आगे जाना है। पहले था सिर्फ चलने का समय। फिर दौड़ने का समय भी आया। अभी तो है जम्प का समय अगर दौड़ कर पहुँचने की कोशिश करेंगे तो टू लेट हो जायेंगे। जम्प देने में तो समय नहीं लगता। एकरस अवस्था में रहने लिए एक ही शुद्ध संकल्प रखना है। वो कौनसा एक? एक तो स्नेही बनना, दूसरा सर्विसएबुल हूँ। बस। इनके बिना और कोई संकल्प नहीं। सर्विसएबुल को सर्विस का ही संकल्प चलेगा। भट्ठी का जो लक्ष्य है कि खुद बदलकर औरों को बदलना है। यह लक्ष्य सदैव याद रखना है। यह है निश्चय की छाप। आप पर कौन सा छाप लगा है? निश्चय बुद्धि, नष्टोमोहा और सर्विसएबुल का। यह त्रिमूर्ति छाप की निशानी लगी हुई है। यह अपनी निशानी कायम रखनी है। आप समान औरों को अपने से भी ऊंच बनाना है। कम नहीं। हम से ऊंचा कोई बने, यह भी तो अपनी ऊंचाई है ना। ओम् शान्ति।