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31 Oct 2007
“अपने श्रेष्ठ स्वमान के फ़खुर में रह असम्भव को सम्भव करते बेफिक्र बादशाह बनो”
31 October 2007 · हिंदी
आज बापदादा अपने चारों ओर के श्रेष्ठ स्वमानधारी विशेष बच्चों को देख रहे हैं। हर एक बच्चे का स्वमान इतना विशेष है जो विश्व में कोई भी आत्मा का नहीं है। आप सभी विश्व की आत्माओं के पूर्वज भी हो और पूज्य भी हो। सारे सृष्टि के वृक्ष की जड़ में आप आधारमूर्त हो। सारे विश्व के पूर्वज पहली रचना हो। बापदादा हर एक बच्चे की विशेषता को देख खुश होते हैं। चाहे छोटा बच्चा है, चाहे बुजुर्ग मातायें हैं, चाहे प्रवृत्ति वाले हैं। हर एक की अलग-अलग विशेषतायें हैं। आजकल कितने भी बड़े ते बड़े साइंसदान हैं, दुनिया के हिसाब से विशेष हैं जो प्रकृतिजीत तो बनें, चन्द्रमां तक भी पहुंच गये लेकिन इतनी छोटी सी ज्योति स्वरूप आत्मा को नहीं पहचान सकते! और यहाँ छोटा सा बच्चा भी मैं आत्मा हूँ, ज्योति बिन्दु को जानता है। फ़लक से कहता है “मैं आत्मा हूँ।'' कितने भी बड़े महात्मायें हैं और ब्राह्मण मातायें हैं, मातायें फ़लक से कहती हमने परमात्मा को पा लिया। पा लिया है ना! और महात्मायें क्या कहते? परमात्मा को पाना बहुत मुश्किल है। प्रवृत्ति वाले चैलेन्ज करते हैं कि हम सब प्रवृत्ति में रहते, साथ रहते पवित्र रहते हैं क्योंकि हमारे बीच में बाप है। इसलिए दोनों साथ रहते भी सहज पवित्र रह सकते हैं क्योंकि पवित्रता हमारा स्वधर्म है। पर धर्म मुश्किल होता है, स्व धर्म सहज होता है। और लोग क्या कहते? आग और कपूस साथ में रह नहीं सकते। बड़ा मुश्किल है और आप सब क्या कहते? बहुत सहज है। आप सबका शुरू शुरू का एक गीत था - कितने भी से", स्वामी हैं लेकिन एक अल्फ को नहीं जाना है। छोटी सी बिन्दी आत्मा को नहीं जाना लेकिन आप सभी बच्चों ने जान लिया, पा लिया। इतने निश्चय और फ़खुर से बोलते हो, असम्भव सम्भव है। बापदादा भी हर एक बच्चे को विजयी रत्न देख हर्षित होते हैं क्योंकि हिम्मते बच्चे मददे बाप है। इसलिए दुनिया के लिए जो असम्भव बातें हैं वह आपके लिए सहज और सम्भव हो गई हैं। फ़खुर रहता है कि हम परमात्मा के डायरेक्ट बच्चे हैं! इस नशे के कारण, निश्चय के कारण परमात्म बच्चे होने के कारण माया से भी बचे हुए हो। बच्चा बनना अर्थात् सहज बच जाना। तो बच्चे हो और सब विघ्नों से, समस्याओं से बचे हुए हो।
तो अपने इतने श्रेष्ठ स्वमान को जानते हो ना! क्यों सहज है? क्योंकि आप साइलेन्स की शक्ति द्वारा, परिवर्तन शक्ति को कार्य में लगाते हो। निगेटिव को पॉजिटिव में परिवर्तन कर लेते हो। माया कितने भी समस्या के रूप में आती है लेकिन आप परिवर्तन की शक्ति से, साइलेन्स की शक्ति से समस्या को समाधान स्वरूप बना देते हो। कारण को निवारण रूप में बदल देते हो। है ना इतनी ताकत? कोर्स भी कराते हो ना! निगेटिव को पॉजिटिव करने की विधि सिखाते हो। यह परिवर्तन शक्ति बाप द्वारा वर्से में मिली है। एक ही शक्ति नहीं, सर्वशक्तियां परमात्म वर्सा मिला है, इसीलिए बापदादा हर रोज़ कहते हैं, हर रोज़ मुरली सुनते हो ना! तो हर रोज़ बापदादा यही कहते - बाप को याद करो और वर्से को याद करो। बाप की याद भी सहज क्यों आती है? जब वर्से की प्राप्ति को याद करते तो बाप की याद प्राप्ति के कारण सहज आ जाती है। हर एक बच्चे को यह रूहानी फ़खुर रहता है, दिल में गीत गाते हैं - पाना था वो पा लिया। सभी के दिल में यह स्वत: ही गीत बजता है ना! फ़खुर है ना! जितना इस फ़खुर में रहेंगे तो फ़खुर की निशानी है, बेफिक्र होंगे। अगर किसी भी प्रकार का संकल्प में, बोल में या सम्बन्ध-सम्पर्क में फिकर रहता है तो फ़खुर नहीं है। बापदादा ने बेफिक्र बादशाह बनाया है। बोलो, बेफिक्र बादशाह हो? हैं तो हाथ उठाओ जो बेफिकर बादशाह हैं? बेफिकर हो या कभी-कभी फिकर आ जाता है? अच्छा है। जब बाप बेफिक्र है, तो बच्चों को क्या फिकर है।
बापदादा ने तो कह दिया है सब फिक्र वा किसी भी प्रकार का बोझ है तो बापदादा को दे दो। बाप सागर है ना। तो बोझ सारा समा जायेगा। कभी बापदादा बच्चों का एक गीत सुनके मुस्कराता है। पता है कौन सा गीत? क्या करें, कैसे करें.... कभी-कभी तो गाते हो ना। बापदादा तो सुनता रहता है। लेकिन बापदादा सभी बच्चों को यही कहते हैं - हे मीठे बच्चे, लाडले बच्चे साक्षी-दृष्टा के स्थिति की सीट पर सेट हो जाओ और सीट पर सेट होके खेल देखो, बहुत मज़ा आयेगा, वाह! त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित हो जाओ। सीट से नीचे आते इसलिए अपसेट होते हो। सेट रहो तो अपसेट नहीं होंगे। कौन सी तीन चीज़ें बच्चों को परेशान करती हैं? 1- चंचल मन, 2- भटकती बुद्धि और 3- पुराने संस्कार। बापदादा को बच्चों की एक बात सुनकर हंसी आती है, पता है कौन सी बात है? कहते हैं बाबा क्या करें, मेरे पुराने संस्कार हैं ना! बापदादा मुस्कराता है। जब कह ही रहे हो, मेरे संस्कार, तो मेरा बनाया है? तो मेरे पर तो अधिकार होता ही है। जब पुराने संस्कार को मेरा बना दिया, तो मेरा तो जगह लेगा ना! क्या यह ब्राह्मण आत्मा कह सकती है मेरे संस्कार? मेरा-मेरा कहा है तो मेरे ने अपनी जगह बना दी है। आप ब्राह्मण मेरा नहीं कह सकते। यह पास्ट जीवन के संस्कार हैं। शूद्र जीवन के संस्कार हैं। ब्राह्मण जीवन के नहीं हैं। तो मेरा-मेरा कहा है तो वह भी मेरे अधिकार से बैठ गये हैं। ब्राह्मण जीवन के श्रेष्ठ संस्कार जानते हो ना! और यह संस्कार जिनको आप पुराने कहते हो, वह भी पुराने नहीं हैं, आप श्रेष्ठ आत्माओं का पुराने ते पुराना संस्कार अनादि और आदि संस्कार है। यह तो द्वापर, मध्य के संस्कार हैं। तो मध्य के संस्कार को बाप की मदद से समाप्त कर देना, कोई मुश्किल नहीं है। परन्तु होता क्या है? बाप जो सदा आपके साथ कम्बाइन्ड है, उसे कम्बाइन्ड जान सहयोग नहीं लेते, कम्बाइन्ड का अर्थ ही है समय पर सहयोगी। लेकिन समय पर सहयोग न लेने के कारण मध्य के संस्कार महान बन जाते हैं।
बापदादा जानते हैं कि सभी बच्चे बाप के प्यार के पात्र हैं, अधिकारी हैं। बाबा जानते हैं कि प्यार के कारण ही सभी पहुंच गये हैं। चाहे विदेश से आये हैं, चाहे देश से आये हैं, लेकिन सभी परमात्म प्यार की आकर्षण से अपने घर में पहुंचे हैं। बापदादा भी जानते हैं - प्यार में मैजॉरिटी पास हैं। विदेश से प्यार के प्लेन में पहुंच गये हो। बोलो, सभी प्यार की डोर में बंधे हुए यहाँ पहुंच गये हो ना! यह परमात्म प्यार दिल को आराम देने वाला है। अच्छा - जो पहली बार यहाँ पहुचे हैं वह हाथ उठाओ। हाथ हिलाओ। भले पधारे।
अभी बापदादा ने जो होमवर्क दिया था, याद है होम वर्क? याद है? बापदादा के पास कई तरफ से रिजल्ट आई है। सभी की रिजल्ट नहीं आई है। कोई की कितने परसेन्ट में भी आई है। लेकिन अभी क्या करना है? बापदादा क्या चाहते हैं? बापदादा यही चाहते हैं कि सब पूज्यनीय आत्मायें हैं, तो पूज्यनीय आत्माओं का विशेष लक्षण दुआ देना ही है। तो आप सभी जानते हो कि आप सभी पूज्यनीय आत्मायें हो? तो यह दुआ देना अर्थात् दुआ लेना अण्डरस्टुड हो जाता है। जो दुआ देता है, जिसको देते हैं उसकी दिल से बार-बार देने वाले के लिए दुआ निकलती है। तो हे पूज्य आत्मायें आपका तो निजी संस्कार है - दुआ देना। अनादि संस्कार है दुआ देना। जब आपके जड़ चित्र भी दुआ दे रहे हैं तो आप चैतन्य पूज्य आत्माओं का तो दुआ देना यह नेचुरल संस्कार है। इसको कहो मेरा संस्कार। मध्य, द्वापर के संस्कार नेचुरल और नेचर हो गये हैं। वास्तव में यह संस्कार दुआ देने के नेचुरल नेचर है। जब किसी को दुआ देते हैं, तो वह आत्मा कितनी खुश होती है, वह खुशी का वायुमण्डल कितना सुखदाई होता है! तो जिन्होंने भी होमवर्क किया है उन सबको, चाहे आये हैं, चाहे नहीं आये हैं, लेकिन बापदादा के सामने हैं। तो उन्हों को बापदादा मुबारक दे रहे हैं। होमवर्क किया है तो उसे अपनी नेचुरल नेचर बनाते हुए आगे भी करते, कराते रहना। और जिन्होंने थोड़ा बहुत किया है, नहीं भी किया है तो वह सभी अपने को सदा मैं पूज्य आत्मा हूँ, मैं बाप की श्रीमत पर चलने वाली विशेष आत्मा हूँ, इस स्मृति को बार-बार अपनी स्मृति और स्वरूप में लाना क्योंकि हर एक से जब पूछते हैं कि आप क्या बनने वाले हो? तो सब कहते हैं हम लक्ष्मी-नारायण बनने वाले हैं। राम-सीता में कोई नहीं हाथ उठाता। जब लक्ष्य है, 16 कला बनने का। तो 16 कला अर्थात् परमपूज्य, पूज्य आतमा का कर्तव्य ही है - दुआ देना। यह संस्कार चलते-फिरते सहज और सदा के लिए बनाओ। हो ही पूज्य। हो ही 16 कला। लक्ष्य तो यही है ना!
बापदादा खुश है कि जिन्होंने भी किया है, उन्होंने अपने मस्तक में विजय का तिलक बाप द्वारा लगा दिया। साथ में सेवा के समाचार भी बापदादा के पास सबकी तरफ से, वर्गो की तरफ से, सेन्टर्स की तरफ से बहुत अच्छी रिजल्ट सहित पहुंच गये हैं। तो एक होमवर्क करने की मुबारक और साथ में सेवा की भी मुबारक, पदम-पदमगुणा है। बाप ने देखा कि गांव-गांव में सन्देश देने की सेवा बहुत अच्छे तरीके से मैजॉरिटी एरिया में की है। तो यह सेवा भी रहमदिल बनकर की इसलिए सेवा के उमंग-उत्साह में रिजल्ट भी अच्छी दिखाई दी है। यह मेहनत नहीं की, लेकिन बाप से प्यार अर्थात् सन्देश देने से प्यार, तो प्यार के मुहब्बत में सेवा की है, तो प्यार का रिटर्न सब सेवाधारियों को स्वत: ही बाप का पदम-पदमगुणा प्यार प्राप्त है और होता रहेगा। साथ में सभी अपनी प्यारी दादी को बहुत स्नेह से याद करते हुए, दादी को प्यार का रिटर्न दे रहे हैं, यह प्यार की खुशबू बापदादा के पास बहुत अच्छी तरह से पहुंच गई है।
अभी जो भी मधुबन में कार्य चल रहे हैं, चाहे विदेशियों के, चाहे भारत के वह सब कार्य भी एक दो के सहयोग, सम्मान के आधार से बहुत अच्छे सफल हुए हैं और आगे भी होने वाले कार्य सफल हुए पड़े हैं क्योंकि सफलता तो आपके गले का हार है। बाप के गले के भी हार हो, बाप ने याद दिलाया था कि कभी भी हार नहीं खाना क्योंकि आप बाप के गले के हार हो। तो गले का हार कभी हार नहीं खा सकता। तो हार बनना है या हार खानी है? नहीं ना! हार बनना अच्छा है ना! तो हार कभी नहीं खाना। हार खाने वाले तो अनेक करोड़ों आत्मायें हैं, आप हार बनके गले में पिरोये गये हो। ऐसे है ना! तो संकल्प करो, बाप के प्यार में माया कितने भी तूफान सामने लाये लेकिन मास्टर सर्वशक्तिवान आत्माओं के आगे तूफान भी तोह़फा बन जायेगा। ऐसा वरदान सदा याद करो। कितना भी ऊंचा पहाड़ हो, पहाड़ बदल के रूई बन जायेगा। अभी समय की समीपता प्रमाण वरदानों को हर समय अनुभव में लाओ। अनुभव की अथॉरिटी बनो।
जब चाहो तब अपने अशरीरी बनने की, फरिश्ता स्वरूप बनने की एक्सरसाइज़ करते रहो। अभी-अभी ब्राह्मण, अभी-अभी फरिश्ता, अभी-अभी अशरीरी, चलते फिरते, कामकाज करते हुए भी एक मिनट, दो मिनट निकाल अभ्यास करो। चेक करो जो संकल्प किया, वही स्वरूप अनुभव किया? अच्छा।
चारों ओर के सदा श्रेष्ठ स्वमानधारी, सदा स्वयं को परमपूज्य और पूर्वज अनुभव करने वाले, सदा अपने को हर सबजेक्ट में अनुभवी स्वरूप बनाने वाले, सदा बाप के दिलतख्त नशीन, भ्रकुटी के तख्त नशीन, सदा श्रेष्ठ स्थिति के अनुभवों में स्थित रहने वाले, चारों ओर के सभी बच्चों को यादप्यार और नमस्ते।
सभी तरफ से सभी के पत्र, ईमेल, समाचार सभी बापदादा के पास पहुंच गये हैं, तो सेवा का फल और बल, सभी सेवाधारियों को प्राप्त है और होता रहेगा। प्यार के पत्र भी बहुत आते हैं, परिवर्तन के पत्र भी बहुत आते हैं। परिवर्तन की शक्ति वालों को बापदादा अमर भव का वरदान दे रहे हैं। जिन सेवाधारियों ने श्रीमत को पूरा फालो किया है, ऐसे फालो करने वाले बच्चों को बापदादा कहते “सदा फरमानबरदार बच्चे वाह!'' बापदादा यह वरदान दे रहे हैं और प्यार वालों को बहुत-बहुत प्यार से दिल में समाने वाले अति प्यारे और अति माया के विघ्नों से न्यारे, ऐसा वरदान दे रहे हैं। अच्छा।
सेवा कर्नाटक ज़ोन की है, सभी ने अपने हाथों में झण्डियां ली हुई हैं:- सभी झण्डियाँ तो बहुत अच्छी हिला रहे हैं, अच्छा है। कर्नाटक वालों ने प्रोग्राम भी बहुत अच्छा स्वर्णिम कर्नाटक, ऐसा किया है ना। तो यह प्रोग्राम भी बापदादा ने भिन्न-भिन्न स्थानों का देखा भी है, सुना भी है और मैजारिटी ने अच्छे उमंग-उत्साह से गांव-गांव में बापदादा का सन्देश पहुंचाया है। इसीलिए बापदादा कर्नाटक के सेवाधारियों को बहुत-बहुत सेवा की और श्रीमत के पालन करने की मुबारक दे रहे हैं। मुबारक हो, मुबारक हो। अच्छा है, सेवा का जो चांस लिया है, वह भी सभी सन्तुष्ट हैं और सन्तुष्ट किया है, इससे अपने जमा का खाता बहुत अच्छा जमा किया है। कर्नाटक की संख्या भी कम नहीं है, संख्या अच्छी है और जैसे अभी संगठित रूप में मिलकर निर्विघ्न सेवा का रिकार्ड दिखाया है, ऐसे ही आगे भी कर्नाटक संगठित रूप में बहुत कुछ कमाल कर सकते हैं। बापदादा के पास नक्शा है, कमाल कर सकते हैं। इसलिए संगठित रूप का जलवा दिखाना। अभी अच्छा किया है। सारा परिवार कर्नाटक पर खुश है। अच्छा - बापदादा ने कर्नाटक वालों को काम दिया था, याद है, क्या दिया था? वारिस क्वालिटी निकालने के लिए कहा था, याद है? सेवा में तो अच्छा नम्बर लिया, अभी इतने वारिस निकालो जो नम्बरवन आ जाओ। जो निमित्त हैं वह तो हैं, नये नये निकालो। तो बापदादा सभी बच्चों को देख खुश है। आप भी खुश है, बाप भी खुश है। जितना आप बाप को देखकर खुश होते हो, उससे ज्यादा बच्चों को देख बाप खुश होते हैं। (दादी जानकी ने कहा कि कर्नाटक में, दादी हृदयपुष्पा ने शुरू से अच्छे अच्छे वारिस निकाले हैं) अभी और भी निकालेंगे। हृदयपुष्पा को रिटर्न तो देंगे ना। एडवांस पार्टी में वह भी वतन में इमर्ज होती है ना, तो सब समाचार सुनती है। उसने अच्छे-अच्छे वारिस निकाले हैं। लेकिन नम्बरवन वारिस निकालने में अभी नम्बरवन। पहले के तो हैं ही, हिम्मत है ना! टीचर्स हिम्मत है? हाथ उठाओ, हिम्मत है? सभी में हिम्मत है, बहुत हिम्मत है। तो बाप की भी बहुत-बहुत मदद है। अच्छा है। सेवा भी अच्छी की है, फर्स्ट टर्न मिला है। फर्स्ट टर्न में सब बात में फास्ट, तीव्र पुरुषार्थ। अच्छा - सबने बहुत दिल से सेवा की ना। थकावट तो नहीं हुई? थके नहीं ना! अथक बनके सेवा की। अच्छा।
डबल विदेशी, 60 देशों से 600 आये हैं:- अभी बापदादा ने देखा है कि विदेश में भी सेवा का उमंग अच्छा बढ़ रहा है। पहले कहते थे विदेश में स्टूडेन्ट बनना बड़ा मुश्किल है और अभी क्या है? अभी मुश्किल है या सहज है? सहज है? और बापदादा को बहुत अच्छा लगा कि आपस में मिलकर निर्विघ्न बनाने का प्लैन बनाया है और निर्विघ्न बनाने का प्लैन बहुत विधि पूर्वक निर्विघ्न बनाया है। इसकी बहुत-बहुत मुबारक हो, पदमगुणा मुबारक हो। जो भी प्रोग्राम किये हैं वह बहुत सफल रहे हैं। तो सदा सफलता की मुबारक है और सदा मुबारक पात्र रहेंगे। बापदादा को सेवा का प्रत्यक्ष फल देख करके भी खुशी है। यह काल आफ टाइम के आये हैं ना! जो काल आफ टाइम में आये हैं वह हाथ उठाओ। अच्छा। बहुत अच्छा किया। बहुत चतुर हैं, पहले ही आ गये हैं। अच्छा किया, बाप को भी बहुत प्यारे हो और आपका भी बाप से प्यार है इसीलिए पहुंच गये हो। तो सभी ब्राह्मण परिवार की तरफ से, बाप की तरफ से भी आप एक एक को पदमगुणा मुबारक है, मुबारक है, मुबारक है। अच्छा है, यह सभी बहुत अच्छे फॉरेन सेवा के लिए माइक और बच्चे दोनों पार्ट बजायेंगे। बच्चों का भी पार्ट बजायेंगे और माइक और लाइट बनके सेवा में और वृद्धि को प्राप्त करायेंगे। तो सभी ब्राह्मणों की तरफ से, बाप की तरफ से आप सबको मुबारक हो। अच्छा है। इस ईश्वरीय नॉलेज की प्रोपोगण्डा अब विदेश में भी निमित्त बनके कर रहे हो। अभी वहाँ भी आवाज अच्छी तरह से फैल रहा है और ड्रामानुसार आप सबकी और बाप की प्यारी दादी के निमित्त भी चारों ओर ब्राह्मण परिवार का, बाप का नाम अच्छा प्रत्यक्ष हो गया है। दादी ने नाम प्रत्यक्ष किया, नाम और काम दो चीज़ें होती हैं। तो दादी ने नाम बहुत अच्छा फैलाया, अभी उन आत्माओं को अपना बनाना, यह काम आपका है। बापदादा ने देखा कि जैसे अभी हर साल वृद्धि करके बाप के सामने ला रहे हो, ऐसे आगे भी ज्यादा से ज्यादा वृद्धि करते रहेंगे। बाप और अपनी प्रत्यक्षता करते रहेंगे। अच्छा ग्रुप है। सभी निश्चयबुद्धि और ईश्वरीय नशे में रहने वाले, उड़ने वाले हैं। चलने वाले नहीं बनना, उड़ने वाले। चलने वाले समय पर नहीं पहुंच सकेंगे, उड़ने वाले बनना, डबल लाइट। बाकी बापदादा खुश है। जो किया वह सफल हो गया। तो आप सब कौन हुए? सफलता के सितारे। अच्छा है। बहुत अच्छा।
पोलीटिशियन, महिला और सिक्युरिटी विंग:- देखो कितने उमंग-उत्साह से सभी विंग सेवा कर रहे हैं। तीनों की रिजल्ट अच्छी है। गवर्मेन्ट में भी आवाज अच्छा फैल रहा है। तो सेवा की है तभी आवाज फैल रहा है। तो आपका राजनीतिक वर्ग अच्छे प्लैन बनाके बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा अच्छा फैला रहे हैं। पहले तो कोई मुश्किल से आता था और अभी खुद कहते हैं हम भी आने चाहते हैं। फ़र्क हो गया ना। अभी खुद ही कहते हैं कि आपके यहाँ कार्य बहुत अच्छा सफल होता है। तो अभी आंख खुलने शुरू हो गई है। धीरे-धीरे आंख खुल जायेगी। वैसे सभी वर्ग अपने-अपने वर्ग में सेवा अच्छी कर रहे हैं। महिला वर्ग भी कर रहा है, सिक्युरिटी वर्ग भी कर रहा है, पोलीटिशियन भी कर रहा है। लेकिन बापदादा ने देखा है कि दिन प्रतिदिन वर्गो के प्रमाण सेवा करने का उमंग अच्छा बढ़ रहा है। अभी लोगों को रोकना पड़ता है, नहीं आओ। पहले आने के लिए मेहनत करनी पड़ती थी, अभी संख्या से ज्यादा आ जाते हैं। क्वान्टिटी और क्वालिटी दोनों ही आ रहे हैं। लेकिन क्वालिटी भी आने शुरू हो गई है इसीलिए तीनों ही वर्गो के सेवाधारियों को बापदादा की तरफ से और ब्राह्मण परिवार की तरफ से मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। और आपकी दादी ने तो सभी वर्गो में सेवा की वृद्धि का कलम लगा दिया है। दादी भी आप सभी को बहुत याद देती है। उसका भी मन संगम पर है और तन एडवांस पार्टी की तरफ है। अच्छा है।
ट्रेनिंग की टीचर्स और इन्दौर, नड़ियाद होस्टल की कुमारियां:- (बाबा ही हमारा संसार है, यह बैनर दिखा रहे हैं) अच्छा है, स्लोगन तो बहुत अच्छा लिखा है, ऐसा ही रोज़ अमृतवेले यह स्लोगन याद करना, सभी कुमारियां चाहे इन्दौर की हैं, चाहे मधुबन के ट्रेनिंग की हैं, चाहे नड़ियाद की हैं लेकिन सभी कुमारियां अमृतवेले से यह स्लोगन याद करना है क्योंकि बाबा ही हमारा संसार है। तो सारी आकर्षण, सारा दिल का प्यार कहाँ जायेगा? बाबा में। नयनों में सदा कौन दिखाई देगा? बाबा। मुख में सदा क्या निकलेगा? बाबा। और चेहरे में सदा बाप का नशा दिखाई देगा। सम्बन्ध-सम्पर्क में सदा ही बाप से सर्व सम्बन्ध जुटे रहेंगे। तो क्या हो जायेंगे? नो प्रॉब्लम। दादी के दो अक्षर याद हैं। दादी बार-बार कहती है - “निर्विघ्न और निर्विकल्प''। तो दादी से प्यार है ना, सभी कुमारियों का दादी से प्यार है। बहुत प्यार है। तो जो प्यारा होता है ना, उनके बोल, उनके शब्द सदा कानों में गूंजते रहते हैं। तो सदा यह बुद्धि में कानों में आवाज आता रहे निर्विघ्न और निर्विकल्प बनना ही है। बनेंगी ना! बनेंगी, बनेंगी, जरूर बनेंगी। क्योंकि बापदादा का कुमारियों के तरफ बहुत अटेन्शन है और कुमारियां लक्की भी हैं। भाई, पाण्डव सेना जो हैं ना, वह हंसती है, कहते हैं कुमारियां तो जल्दी दादी बन जाती हैं और पाण्डवों को दादा नहीं कहते हैं। भाई कहते हैं। तो देखो, आपका लक कितना बढ़िया है। आते ही लक प्राप्त हो जाता है। बापदादा का, गुरू का तख्त मिल जाता है। यह मुरली का तख्त गुरू का तख्त है। इसीलिए बापदादा टीचर्स को गुरुभाई कहता है। तो याद रखना गुरूभाई हैं। गुरू का तख्त मिला है। अच्छा है। यह ट्रेनिंग की जो विधि रखी है उससे अच्छी रिजल्ट निकलेगी। लेकिन आप सभी आपेही अपना चार्ट मधुबन में भेजते रहना। सिर्फ ओ.के. लिखना ज्यादा नहीं लिखना। अगर और कोई कारण हो या कुछ न कुछ कमजोरी हो तो ओ.के. के बीच में लाइन लगा देना। बाकी ज्यादा नहीं पत्र लिखना, बस। अच्छा है। टीचर्स भी अच्छी मेहनत कर रही हैं। बापदादा तो देखते हैं कि हर डिपार्टमेंट वाले बहुत मेहनत कर रहे हैं। स्थूल सेवा वाले भी मेहनत कर रहे हैं। अभी एक बात चाहिए, सुनाये क्या? एक बात जैसे सेवा में, हर कार्य में हर डिपार्टमेंट, हर वर्ग, हर सेन्टर, हर ज़ोन, सेवा बढ़ा रहा है। लेकिन अभी आवश्यकता है - एकता और एकानामी की। यह दो चीज़ें, सम्मान देना और सम्मान लेना। तो एकता, हर एक के सहयोग की अंगुली है ही है। चाहे महारथी हैं, चाहे थोड़ा कम पुरुषार्थी हैं, लेकिन हर एक का सहयोग तो है। अगर कर्मणा करने वाले का सहयोग नहीं मिलता तो आप सेवा कैसे करते, टाइम पर कैसे निकलते, टाइम पर सेवा कैसे करते। ठीक है ना, इसलिए हर एक विशेष है, सम्मान के अधिकारी हैं इसीलिए हरेक छोटे बड़े को सम्मान दो और सम्मान लो। दो अक्षर याद रखना - एकता और एकॉनामी। बाकी सब अच्छा है। (ट्रेनिंग कराने वाली टीचर्स से) बहुत अच्छा, उमंग-उल्हास में लाया, इसकी मुबारक हो। अच्छा। बापदादा तो एक-एक को देखकर, एक-एक की विशेषता को देखकर बहुत खुश होते हैं।
कर्नाटक की माताओं से:- मातायें ठीक हैं? मातायें हाथ उठाओ। बहुत हैं। कर्नाटक की मातायें उठो। अच्छा है, माताओं की संख्या तो अच्छी है। अभी कर्नाटक की मातायें क्या कमाल दिखायेंगी? कोई नई कमाल दिखाना। सेवा तो करती हो लेकिन अभी मातायें कोई अपनी नई चलन दिखाना और बापदादा का माताओं को वरदान है कि जहाँ सेन्टर पर मातायें ज्यादा होती हैं, सेन्टर पर सेवा करती हैं, वहाँ भण्डारा और भण्डारी दोनों बहुत भरपूर रहती हैं। चाहे कमाती नहीं हैं लेकिन दिल बड़ी है। तो माताओं की महिमा बापदादा भी करते हैं, आदि से शुरूआत से, जब सेवाकेन्द्र खुले तो जहाँ मातायें रही हैं वहाँ कभी भी न भण्डारा खाली रहा है, न भण्डारी खाली रही है। इसीलिए मातायें पालन करने वाली हैं ना! तो नई-नई आत्माओं की पालना बहुत अच्छी होती है। अच्छा।
कर्नाटक के पाण्डव:- अच्छा, हर सेन्टर पर पाण्डवों की भी आवश्यकता है क्योंकि पाण्डव आलराउण्ड सेवा में मददगार बनते हैं। चाहे हार्ड वर्क में, चाहे बाहर अन्दर सन्देश फैलाने में पाण्डव अच्छे मददगार बनते हैं और पाण्डव सेन्टर को चलाने और आगे बढ़ाने के लिए भी निमित्त बनते हैं। पाण्डव भी कम नहीं हैं, इसीलिए आपको याद है, पाण्डव और शक्तियां दोनों की आवश्यकता है, इसका चतुर्भुज रूप दिखाया गया है। चतुर्भुज रूप में एक नहीं है, दोनों साथ हैं। मातायें, पाण्डवों से आगे हैं और पाण्डव माताओं से आगे हैं। तो अच्छा है कर्नाटक में पाण्डवों की भी कमी नहीं हैं, माताओं की भी कमी नहीं हैं और अच्छे-अच्छे हैं, जैसे जनक बच्ची ने कहा ना, तो कर्नाटक में बहुत वारिस पहले-पहले निकले हैं, यह राइट है। अभी उन्हों को ऐसे वारिस तैयार करने हैं, ठीक है ना। उमंग है ना! तो दूसरे वर्ष रिजल्ट तो बतायेंगे ना, कितने वारिस निकले। रिजल्ट बताना फिर बापदादा बुलायेगा। पहले रिजल्ट देखेगा। वर्ग वाले भी पहले लिस्ट निकालो, फॉरेन वाले भी ऐसे नये नये वारिस निकालो, उसकी लिस्ट अगले वर्ष में ले आना फिर बापदादा बुलायेगा। ठीक है, टीचर्स!
टीचर्स सभी उठो:- टीचर्स भी कम नहीं हैं। बापदादा तो सभी टीचर्स को गुरूभाई देखते हैं। गुरूभाई का अर्थ है बाप समान। तो टीचर्स को विशेष हर कर्म बाप समान करना ही है। करेंगे नहीं, करना ही है क्योंकि टीचर्स बाप की तरफ से स्टूडेन्ट के आगे एक निमित्त साकार रूप में बाप समान हैं। टीचर का हर कर्म स्टूडेन्ट के आगे बाप समान दिखाई दे। सबके मुख से निकले यह तो बाप को फॉलो कर बाप समान बने हुए हैं। तो ऐसा लक्ष्य है ना। यही लक्ष्य है ना। कांध हिलाओ। टीचर निमित्त हैं। तो निमित्त के ऊपर जिम्मेवारी भी है ना। तो फालो कर रही हो लेकिन और भी आगे करना है। लक्ष्य बहुत अच्छा है। और बाप तो यही हर टीचर में शुभ भावना रखते हैं कि बाप समान बनना ही है और क्या करेंगी? और कोई रास्ता है क्या! समान बाप बनने के सिवाए और कोई रास्ता नहीं है इसीलिए देखो इन्होंने यह स्लोगन बनाया है - बाप ही संसार है। अच्छा बनाया है। लेकिन कपड़े पर नहीं रह जाये, दिल में रह जाए। अच्छी हैं टीचर्स। संगठन तो बहुत बढ़िया है। अभी कमाल करेंगी। जैसे अभी कमाल करके दिखाई ना। स्वर्णिम कर्नाटक का अच्छा जलवा दिखाया। ऐसे आगे भी कमाल दिखायेंगी। बाप की शुभ भावना है। ठीक है। अच्छा।
अभी सबके दिल में क्या उमंग आ रहा है? एक ही उमंग बाप समान बनना ही है। है यह उमंग? पाण्डव, हाथ उठाओ। बनना ही है। देखेंगे, बनेंगे, गे गे नहीं करना... लेकिन बनना ही है। पक्का। पक्का? अच्छा। हर एक अपना ओ.के. का कार्ड अपने टीचर के पास चार्ट के रूप में देते रहना। ज्यादा नहीं लिखो, बस एक कार्ड ले लो उसमें ओ.के. लिखो या लाइन डालो, बस। यह तो कर सकते हो ना। लम्बा पत्र नहीं। अच्छा।
दादियों से:- (जानकी दादी ने बापदादा को गले लगाया) सभी आपस में हाथ मिलाओ। बहुत अच्छा। (परदादी कलकत्ता जा रही है) कलकत्ते में चक्कर लगाने जा रही है। चक्कर लगाने जाना चाहिए।
आप सभी भी सभी को हिम्मत, उमंग-उत्साह दिलाने के निमित्त बन यही सेवा करते रहते हो ना! क्योंकि आज हिम्मत और उमंग-उत्साह सदा कायम रहे, इसी की आवश्यकता है। तो सभी को जो भी सामने आये, उसको हिम्मत, उमंग-उत्साह सेकेण्ड की दृष्टि से भी प्राप्त हो क्योंकि आप सभी मास्टर दाता हो। जो भी आवे, कुछ ले जावे। चाहे स्नेह ले जाये, चाहे सहयोग ले जाये, चाहे हिम्मत ले जाये, चाहे उमंग ले जाये, कुछ न कुछ ले जावे क्योंकि दाता के बच्चे हैं। वैसे तो सभी का काम यह है, कभी भी किससे मिलते हो, कोई मिलने आता है, खाली हाथ नहीं जाये। चलो दृष्टि का स्नेह ले जाये, टाइम नहीं है, बात करने की आवश्यकता भी नहीं रहती है, लेकिन जो आया वह गया कैसे? कुछ ले गया। सेकण्ड की दृष्टि से भी बहुत कुछ ले सकते हैं। दृष्टि की रूहानियत वा दृष्टि से दिल का स्नेह तो सेकण्ड में भी ले सकते हैं। अभी ब्राह्मणों का आपस में मिलना, यह होना चाहिए, तभी आपका वायुमण्डल विश्व में स्नेह, सहयोग, हिम्मत फैलायेगा। सभी ब्राह्मण जो अपने को ब्रह्माकुमार कुमारी समझते हैं, उनको ऐसे ही सेवा में बिजी रहना है। ऐसे नहीं टाइम नहीं मिला, सेकण्ड तो मिला ना। मिनट भी मिला ना। गाया हुआ है नज़र से निहाल। तो ऐसे संगठन में लहर फैलाओ फिर टाइम देने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। अच्छा।
डबल विदेशी टीचर्स बहनों से:- आप सबने आपस में मिलकर अच्छा पार्ट बजाया। सब प्रोग्राम अच्छे ते अच्छे रहे। ऐसे ही सदा एक दो को सम्मान देते हुए, सहयोग देते हुए कार्य को सफल कर सकते हो। सफलता का तो वरदान है ही। निमित्त बनने वालों को तो विशेष बापदादा की तरफ से एकस्ट्रा सहयोग मिलता है। तो हर एक ने अपना-अपना अच्छा पार्ट बजाया। बापदादा खुश है। अपना कार्य पूरा किया तो अभी रहो या जाओ आपके ऊपर है। जिसकी ड्यूटी होगी वह तो रूकेंगे। बाकी अच्छी हिम्मत की और ड्रामानुसार आप लोग ही निमित्त बने हुए हो क्योंकि कन्ट्रोलिंग पावर है आपमें, चला सकती हो। अच्छा है, बापदादा खुश है। ओम् शान्ति।