ब्रह्माकुमारीज़ नेविगेशन
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बी के सिस्टर मौरीन – अनुभवगाथा

मैंने एक कैथोलिक परिवार में जन्म लिया और पालना भी पायी लेकिन मैं कैथोलिक संस्कार स्वीकार नहीं कर पायी। मुझे उस धर्म के सिद्धान्त उतने समझ में नहीं आये और न ही मेरी उन में रुचि रही। जब मैं 11 साल की थी तब मैंने अपने पिता जी से कहा कि मैं कैथोलिक स्कूल में पढ़ने नहीं जाऊँगी। पिता जी ने पूछा, क्यों? मैंने कहा, मुझे पसन्द नहीं है। मैंने चर्च में जाना भी बन्द कर दिया। मुझे परमात्मा में विश्वास ही नहीं था। यह मुख्य कारण समझो या समस्या समझो कि मुझे न क्रिश्चियन धर्म में रुचि रही और न चर्च आदि धार्मिक स्थानों पर जाने की रुचि रही। 

मुझे परमात्मा पर विश्वास इसलिए नहीं था कि उसने ऐसा दुःखमय संसार क्यों रचा है? अगर परमात्मा होता तो ऐसे संसार को रच ही नहीं सकता। क्रिश्चियन लोग कहते हैं कि परमात्मा ने अच्छी और सम्पूर्ण दुनिया रची थी और मनुष्यों को आज़ादी दी थी कि वे जैसे चाहें रहें। मैं यही कहती थी कि अगर परमात्मा ने ही हमें और इस संसार को रचा है तो उसने ऐसी बड़ी ग़लती क्यों की है कि कोई सुखी है तो कोई दुःखी, कोई अमीर है तो कोई ग़रीब, कोई हंसता है तो कोई रोता है? यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी। मुझे यह दुविधा भी हो रही थी कि परमात्मा ही कैसे सुख और दुःख दोनों दे सकता है! परमात्मा अपने ही बच्चों के साथ ऐसा पक्षपात कैसे कर सकता है! इन बातों ने मुझे नास्तिक बना दिया था। इस तरह से, बचपन से ही मैं किसी धर्म की नहीं थी, न मुझे परमात्मा पर कोई विश्वास था। फिर मैंने मिस्टर टॉम से शादी की, जो मलेशिया से था लेकिन चीनी मूल का था और बौद्ध धर्म का था। वह बुद्ध के मन्दिर जाया करता था। बौद्धभिक्षु अथवा बौद्ध संन्यासी बनने का उसका उद्देश्य था लेकिन बन नहीं पाया। शादी के बाद हम दोनों दो साल के लिए भारत आये। एक साल तक हम भारत में घूमते रहे। हम बौद्धगया गये, धर्मशाला गये। वहाँ जाकर बौद्ध धर्म के बारे में अध्ययन करने की कोशिश की। साथ-साथ हम बुद्ध का अनुसरण करने लगे। हम शाकाहारी भी बन गये, बौद्ध धर्म का मेडिटेशन भी करते रहे। हमारा आपस में बहुत मोह था। बौद्ध धर्म के अनुसार निर्मोही बन रहना पड़ता है। हम दोनों बहुत छोटे अर्थात् युवा होने के कारण हमें आपस में बहुत आसक्ति थी। मैं 19 साल की थी और टॉम 24 साल का था। बौद्धभिक्षु (Monk) बनने के लिए हम बहुत छोटे थे। फिर भी हम बनने का प्रयत्न कर रहे थे। दो साल के बाद हम ऑस्ट्रेलिया लौट आये। हमने सोचा कि वहाँ के बौद्धाश्रम पर जायेंगे और कुछ दिन वहाँ रहकर देखेंगे, अगर ठीक लगा तो रहेंगे, नहीं तो फिर सोचेंगे। हमने बहुत-से बौद्धाश्रमों का संदर्शन किया। बहुत से आश्रम वाले शाकाहार का अनुसरण नहीं करते थे। तो हमें उनका आचरण अच्छा नहीं लगा क्योंकि जब बुद्ध ने अहिंसा, प्रेम, दया को बहुत महत्त्व दिया है तो ये भिक्षु मांसाहार कैसे खा सकते हैं? फिर हम उस बौद्धाश्रम को ढूँढ़ने लगे जिस में शाकाहारी रहते हैं। हमें पता पड़ा कि वहाँ से 500 मील दूर पर एक आश्रम है, तो हमने वहाँ जाने की योजना बनायी। निकलने से एक सप्ताह पहले टॉम (मेरे पति) ने अपनी जॉब (नौकरी) छोड़ी और मैंने अपनी जॉब से छुट्टी ली। उन्हीं दिनों हमें ब्रह्माकुमारियों का परिचय मिला। सन् 1977 जनवरी माह में सिडनी में हमने सात दिनों का कोर्स लिया। कोर्स पूरा करने के अगले दिन ही हम सिडनी से निकले अपने प्लॉन अनुसार उस आश्रम के लिए। हम कार से जा रहे थे। रास्ते में हम ईश्वरीय ज्ञान के बारे में सोचते रहे। फिर हम दोनों ने निश्चय किया कि हम ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे और ब्रह्माकुमारियों के मेडिटेशन का अभ्यास करते रहेंगे। हमें इस बात का अनुभव हुआ था कि अगर हम ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे तो आध्यात्मिक साधना करने में हम एक-दूसरे के बहुत सहयोगी होंगे और समीप रहेंगे। हम दोनों आपस में आध्यात्मिक सम्बन्ध भी चाहते थे और ब्रह्मचर्य जीवन भी हमें अच्छा लगता था। रोज़ अमृतवेले चार बजे उठकर मेडिटेशन भी करते थे। उस आश्रम पहुँचने तक राजयोग और ईश्वरीय ज्ञान के साथ हमारा समायोजन हो चुका था। जब हम उस आश्रम में पहुँचे तो अन्दर जाने का मन नहीं कर रहा था। फिर हम ऐसे ही वहाँ से लौटे और ब्रह्माकुमारी सेन्टर पर आ गये। रोज़ अमृतवेले का और रात्रि का मेडिटेशन करना, मुरली क्लास में जाना आरम्भ किया। जब मैं कोर्स कर रही थी उस समय तो मैं नास्तिक ही थी। लेकिन जब मुझे दूसरा पाठ परमात्मा के बारे में देने लगे, उस में बहनों ने कहा कि परमात्मा इस सृष्टि को नहीं रचता, सृष्टि अनादि और अविनाशी है। परमात्मा किसी को दुःख नहीं देता, वह सुखकर्त्ता और दुःखहर्त्ता है। उसको याद करने से ही आत्मा में सुख, शान्ति पवित्रता की शक्ति भरेगी। जब मैं मेडिटेशन करने लगी तो मुझे शान्ति और आनन्द का अनुभव होने लगा। इस अनुभव ने मुझे सोचने के लिए मज़बूर किया कि ये चीजें मेरे में कहाँ से आ रही हैं? कहीं बाहर से, किसी अन्य से आ रही हैं। तो वे परमात्मा से आ रही हैं। मेडिटेशन में मुझे बहुत मीठे और सुखद अनुभव होने लगे तो मुझे विश्वास होने लगा कि परमात्मा है। जब सुबह सेन्टर पर मुरली सुनती थी तो उसमें आने वाले शब्द, संबोधन, जानकारी इत्यादि सुनकर मुझे परमात्मा की महानता (Greatness of God) के बारे में, मानवता (Humanity) के बारे में आश्चर्य होने लगा। मुरली ने मुझे बहुत ही आकर्षित किया।

मेडिटेशन में पूरे एक साल तक बाबा ने मुझे प्रियतम के प्यार का विशेष अनुभव कराया क्योंकि मेरी युवा अवस्था थी, पति भी था और हम दोनों पवित्रता की पालना भी करते थे। इसलिए बाबा ने मेरे से बहुत प्रसन्न होकर मुझे विशेष प्यार का अनुभव कराया होगा। परमात्मा के साथ मैंने प्रियतम (Beloved) के बहुत गहन प्यार का अनुभव किया। इस परमात्म-प्यार ने, परमात्म-आकर्षण ने मुझे और किसी तरफ़ आकर्षित होने से सुरक्षित रखा। मैंने यह भी अनुभव किया कि परमात्मा का व्यक्तित्व बहुत ही निराला है, विचित्र है और अनोखा है, जो और किसी का नहीं है। 

चार सालों तक राजयोग मेडिटेशन का अभ्यास करने के बाद सन् 1981 में, मैं हाँगकाँग गयी। मेरा पति टॉम इससे पहले ही मलेशिया चला गया था। क्वालालम्पुर में उसका भाई था। मुझे भी वहाँ जाना था पर मुझे तीन महीने के लिए हाँगकाँग सेवा करने के लिए कहा गया था। हाँगकाँग में सेवा शुरू हुई, बहुत अच्छी तरह से सेवा होने लगी तो मुझे लगा कि दूसरी टीचर आने तक मेरा यहाँ रहना अच्छा रहेगा तो मैं वहीं रुक गयी। बीस सालों तक वहाँ कोई टीचर आयी ही नहीं, मैं ही रह गयी। मैं रह गयी हाँगकाँग और टॉम रह गया मलेशिया। फिर साल में एक-दो बार कभी वह आता था, कभी मैं जाती थी। हाँगकाँग में ईश्वरीय सेवा करना उतना सहज नहीं है क्योंकि वहाँ अति, अति में भी अति विलासी जीवन है, भौतिकवाद है। वहाँ सब-कुछ पैसा ही है। दूसरा कारण यह भी है कि वह एक छोटा-सा टापू है और वहाँ एक-दूसरे के मित्र बनना बहुत ही मुश्किल है। लेकिन मैंने ग्लोबल कोऑपरेशन और मिलियन मिनट्स प्रोग्राम द्वारा सेवा का आरम्भ किया। इसके अलावा वहाँ सिन्धी समुदाय वाले बहुत हैं, लगभग तीस हज़ार सिन्धी हैं। उन लोगों ने राजयोग का बहुत फायदा लिया। वहाँ से मैं फिलीपीन्स भी जाती थी। वहाँ तीन महीने रही भी। वहाँ भी बाबा की सेवा की। 

 

प्रश्नः आप ब्रह्माकुमारियों के सम्पर्क में कैसे आईं? 

उत्तरः मैं सिडनी में इम्प्लाइमेंट ऑफिस में नौकरी करती थी। बेरोज़गारों को रोज़गार के बारे में सूचना और मार्गदर्शन देना मेरा काम था। एक दिन मेरे पास एक व्यक्ति आया कोई जॉब की जानकारी जानने, जो मधुबन होकर गया था। उसने मेरी सहेली को राजयोग मेडिटेशन की पर्ची दी, मुझे नहीं दी क्योंकि मैं बहुत देहाभिमानी और बहुत फैशनेबल दिखायी पड़ती थी। मुझे देखकर उसे लगा होगा कि इसको राजयोग में कोई रुचि नहीं होगी। मेरी सहेली वह पर्ची लेकर मेरे पास आयी क्योंकि वह जानती थी कि मैं बुद्धिस्ट मेडिटेशन करती हूँ इसलिए राजयोग मेडिटेशन के प्रति भी उत्सुक होऊंगी। उन्हीं दिनों मेरा पति टॉम कहता था कि जिस आश्रम पर हम जाने वाले हैं, वह हमें पसन्द नहीं आया तो भारत जायेंगे और कोई गुरु करेंगे। अगले दिन ही हम दोनों उस पर्ची के साथ सिडनी सेन्टर पर कोर्स करने गये। हमने कोई दुनियावी लोगों जैसे जीने के लिए शादी नहीं की थी। उस युवा अवस्था में ही हम दोनों सत्य को ढूँढ़ रहे थे, जीवन के लक्ष्य को जानना चाहते थे। हमने आपस में बात भी की थी कि हम नौकरी छोड़ देंगे, समाज के लिए कुछ सेवा करेंगे और आध्यात्मिक जीवन जीयेंगे। 

 

प्रश्नः बापदादा के साथ आप की पहली मुलाक़ात का क्या अनुभव था? 

उत्तरः जब मैं पहली बार बाबा से मिलने आयी थी, उस समय बहुत कम ही डबल विदेशी भाई-बहनें थे। यह सन् 1977 का दिसम्बर महीना था। मैं उस समय बापदादा को मेडिटेशन हॉल में मिली। मैं बाबा के सामने दाहिने तरफ बैठी थी। बाबा ने मुझे वरदान दिया कि आप हीरो एक्टर हो। बाबा से मिलने मधुबन आते समय मैं प्लेन में तथा ट्रेन में सो नहीं पायी। बाबा से मिलने की बहुत उत्सुकता और कोतूहल था। जब मधुबन पहुँची और जितने भी दिन मधुबन में रही, मैं बहुत ही खुश थी। उस खुशी का वर्णन मैं नहीं कर सकती। दादियाँ, दीदी और मधुबन के भाई-बहनों ने मुझे बहुत प्यार दिया। जब मेरे आस्ट्रेलिया जाने का समय आ गया तो मुझे मुम्बई जाना था। मुझे संकल्प आने लगा कि क्यों मुझे वापिस जाना चाहिए? मैं तो पिता परमात्मा के घर आयी हूँ, मैं वापिस नरक में क्यों जाऊँ? परन्तु अपने देशवासियों की सेवा करने मुझे जाना था। मधुबन छोड़कर जाते समय मुझे बहुत रोना आया और मैं रोयी भी बहुत। 

 

प्रश्नः आप तो नास्तिक थीं परन्तु परमात्मा के अवतरण के बारे में आपको निश्चय कैसे हुआ? 

उत्तरः इस ज्ञान में आने से पहले मैं संसार की हालत से बहुत चिन्तित थी। किसी को मानसिक कष्ट है तो वह मनोचिकित्सक के पास जाता है, फिर भी उसकी समस्या का निवारण नहीं होता। अगर कोई नशीली चीज़ों के आदती हैं, कितना भी इलाज कराओ, उस से वो छूटती नहीं। अगर किसी के सम्बन्धों में समस्यायें हैं, वे भी ठीक नहीं हो रही हैं। वे हर तरह की कोशिश करते हैं, उन से बाहर आने के लिए लेकिन वे आ नहीं पाते। इसलिए मेरे मन में आता था कि इन सब से मुक्त होने के लिए कोई और तरीक़ा होगा। उस तरीके को मैं ढूँढ़ रही थी। इसलिए उस छोटी आयु में ही मैं चैरिटेबल संस्थाओं से जुड़कर सेवा करती थी। मैं पेड़ काटने के खिलाफ तथा जंगली जानवरों को बचाने के आन्दोलन में, खान से यूरेनियम निकालने के विरोध में सक्रिय भाग लेती थी। मैं समझती थी कि सब समस्याओं का उद्गम मनुष्य की सोच पर आधारित है। इसलिए मनुष्य के सोचने की विधि को ठीक कर दें तो अनेक समस्याओं का अन्त सहज ही होगा। मुझे विश्वास था कि अगर व्यक्ति ठीक सोचने लगेगा तो है। वह ठीक बन जायेगा। इसलिए मैं सही सोचने की विधि की खोज में थी। जब मैंने राजयोग मेडिटेशन का कोर्स पूरा किया तो सेन्टर पर आने वाले अनेक व्यक्तियों से मुलाक़ात की जो अनेक बड़ी-बड़ी समस्याओं से गुज़र रहे थे और उन्होंने राजयोग से बहुत-सी मदद पायी थी। मुझे तो कोई ऐसी समस्या नहीं थी लेकिन दूसरों की समस्याओं को देख मुझे आता था कि उनके लिए कुछ करें। जब मैंने राजयोग सीखा और मन को खुशी और शान्ति के अनुभव होने लगे तथा बाबा की मुरली सुनती रही तो निश्चय हुआ कि यह कार्य और यह ज्ञान, परमात्मा के सिवाय और किसी का हो नहीं सकता। यह कार्य करना है तो उसको यहाँ आना ही पड़ेगा। दूसरों की मदद से हमें शाश्वत निवारण नहीं मिल सकता लेकिन खुद की मदद से, ख़ुद के पुरुषार्थ से, अपने श्रेष्ठ कर्मों से, सकारात्मक सोच से किसी भी समस्या का निवारण हो सकता है। इस बात को मैंने राजयोग मेडिटेशन से समझा और अनुभव किया। 

 

प्रश्नः आपको यह निश्चय कैसे हुआ कि ब्रह्मा के तन में ही शिव बाबा प्रवेश करते हैं? 

उत्तरः मुझे ब्रह्मा के बारे में कोई आपत्ति नहीं थी। अगर परमात्मा उनके तन में आये हैं तो ठीक है। मुझे तो परमात्मा का परिचय मिल गया। मेडिटेशन, मैं डाइरेक्ट शिव बाबा से करती थी, मुझे शिव बाबा से शान्ति और शक्ति का अनुभव होता था। कभी कभी मेडिटेशन में ब्रह्मा बाबा आ जाते थे। उनको देखते ऐसा अनुभव होता था कि इन से मेरा कोई अनोखा सम्बन्ध है। धीरे-धीरे ज्ञान में आगे बढ़ते चली, ज्ञान की गहराई में जाती रही तो पता पड़ा कि ब्रह्मा क्या है, उनका क्या पार्ट है, उनके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है।

 

प्रश्नः क्या आपको लगता है कि इन ब्रह्माकुमारियों द्वारा विश्व का परिवर्तन होगा यानि स्वर्ग बनेगा? 

उत्तरः शत प्रतिशत। क्योंकि दुनिया के हर धर्म वालों में, हर देश वालों में स्वर्ग की स्मृति है, उसका रूप भले ही एक-दूसरे से भिन्न है। हमें स्मृति किसी वस्तु की तब ही आती है, अगर हमने उसको देखा हो या अनुभव किया हो। दूसरी बात, कोई भी स्थिति हमेशा के लिए नहीं रहती। आज दुनिया में इतना दुःख, अशान्ति, अधर्म, अनीति बढ़ रही है, क्या यह सदाकाल के लिए रहेगी? नहीं, इसका भी अन्त एक दिन होगा ना! अन्त होगा माना फिर आरम्भ भी होगा। आरम्भ किस से होगा? अच्छाई से। क्योंकि सृष्टि का नियम ही है कि अच्छाई से बुराई और बुराई से अच्छाई, सतो से तमो और तमो से सतो। इसलिए निश्चित रूप से धरती पर स्वर्ग आयेगा। 

तीसरी बात, इस ब्रह्माकुमारी संस्था के कार्य के बारे में आप ने पूछा कि क्या ये विश्व का परिवर्तन करेंगे? निश्चित रूप से। क्योंकि इस संस्था की जो शिक्षा प्रणाली है, जीवन पद्धति और नीति-नियम हैं, आचार संहिता और जीवन-सिद्धान्त हैं वे अति उत्कृष्ट हैं। सुबह चार बजे के मेडिटेशन से लेकर रात्रि सोने तक की इनकी जो दिनचर्या है, वह मानव मन के अन्दर दबे हुए, छिपे हुए विकारों पर विजय प्राप्त कराती है। विकारों ने ही मनुष्य को शैतान बनाया है और शैतान मनुष्य ने ही संसार को नरक बनाया है। जब मनुष्य निर्विकारी और सदाचारी बनेगा तो विश्व स्वतः ही स्वर्ग बनेगा। ब्रह्माकुमारियाँ जो राजयोग मेडिटेशन सिखाती हैं उस से नर और नारी के आपसी सम्बन्धों में दिव्यता, पवित्रता और मधुरता स्थापित होती हैं। मैं यह कह सकती हूँ कि मुझे जितना परमात्मा से प्यार है, सम्मान है, उतना ही प्यार और सम्मान इस संस्था से है क्योंकि सर्वोच्च परमात्मा विचित्र रीति से, विचित्र रूप से इस संस्था से जुड़ा हुआ है। यहाँ स्वच्छता, पारदर्शिता, आत्मीयता अपने उच्च स्तर पर हैं क्योंकि मैं यह मानती हूँ कि इस संस्था की प्रथम मान्यता कहो या फाउण्डेशन कहो, वह है पवित्रता। यहाँ पवित्रता की प्रधानता है। इस संस्था के जो वरिष्ठ हैं, उनकी दिव्यता, पवित्रता, कार्यकुशलता ही इसकी साक्षी है कि इस संस्था द्वारा निश्चय ही विश्व परिवर्तन होगा। विश्व में दादी प्रकाशमणि जी, भारत में दादी गुलजार जी और विदेश में दादी जानकी जी इस बात के श्रेष्ठ उदाहरण हैं, साधना के आदर्श हैं। ये विश्व के लिए महान् टीचर्स हैं, महान् नेता हैं। 

 

प्रश्नः भारतवासियों से आप कुछ कहना चाहेंगी? 

उत्तरः भारत प्राचीन भूमि है। भारत, विश्व में एक सुप्रसिद्ध स्थान है। समस्त विश्व के आध्यात्मिक क्षेत्र में भारत का अपना विशेष स्थान है। भले ही, नागरिक प्रगति में, आधुनिकता में उतना विकसित देश न हो लेकिन सत्य, धर्म, दर्शन में भारत ने बहुत कुछ सोचा है, खोज किया है। सच में, मैं भारत को बहुत प्यार करती हूँ। बौद्ध धर्म की होने के कारण मेरे लिए तो भारत महान् है क्योंकि बौद्ध धर्म के मूल उपदेश भारत से मिले हैं। इसलिए भारतवासियों को यह समझना चाहिए कि भारत के पास बड़ी भारी आध्यात्मिक सम्पत्ति है। लेकिन मैंने देखा, बहुत-से भारतीय आध्यात्मिकता में रुचि नहीं दिखाते, आँखें बन्द करके पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण कर रहे हैं। भारतीय सभ्यता, पारिवारिक मूल्यों में इतनी सुन्दरता और श्रेष्ठता है जो हम और किसी देश या धर्म की सभ्यता तथा संस्कृति में नहीं पा सकते। आज संसार में हम देखते हैं कि कितना स्वार्थ और हिंसा है! लेकिन भारतीय जीवन-प्रणाली में प्रेम, दया, सद्भावना, सहयोग, सहजीवन, आध्यात्मिकता को पाते हैं। मैं विश्वास करती हूँ कि भविष्य में भारत आध्यात्मिक क्षेत्र में विश्व का पथ प्रदर्शक तथा प्रधान बनेगा। भारत ने सूचना प्रौद्योगिकी में महत्तर प्रगति की है लेकिन भारतवासी सब भाई-बहनों से मेरा नम्र निवेदन है कि वैज्ञानिक प्रगति के साथ आध्यात्मिक प्रगति भी अपने अन्दर करें तो यह न सिर्फ़ भारत के लिए बल्कि समस्त संसार के लिए लाभदायक और कल्याणप्रद होगा। भारत से ही विश्व का उद्धार होगा। 

मुख्यालय एवं नज़दीकी सेवाकेंद्र

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Dadi bholi ji

दादी भोली, जिनका लौकिक नाम ‘देवी’ था, ने अपनी छोटी बच्ची मीरा के साथ यज्ञ में समर्पण किया। बाबा ने उन्हें ‘भोली भण्डारी’ कहा और भण्डारे की जिम्मेदारी दी, जिसे उन्होंने अपनी अंतिम सांस तक निभाया। वे भण्डारे में सबसे

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Dadi sheelindra ji

आपका जैसा नाम वैसा ही गुण था। आप बाबा की फेवरेट सन्देशी थी। बाबा आपमें श्री लक्ष्मी, श्री नारायण की आत्मा का आह्वान करते थे। आपके द्वारा सतयुगी सृष्टि के अनेक राज खुले। आप बड़ी दीदी मनमोहिनी की लौकिक में

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Dada vishwaratan anubhavgatha

आपका जैसा नाम वैसे ही आप यज्ञ के एक अनमोल रत्न थे। आप ऐसे पक्के ब्रह्मचारी, शीतल काया वाले योगी, आलराउण्ड सेवाधारी कुमार थे जिनका उदाहरण बाबा भी देते कि बाबा को ऐसे सपूत, सच्चे, पक्के पवित्र कुमार चाहिए। दादा

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Dadi gange ji

आपका अलौकिक नाम आत्मइन्द्रा दादी था। यज्ञ स्थापना के समय जब आप ज्ञान में आई तो बहुत कड़े बंधनों का सामना किया। लौकिक वालों ने आपको तालों में बंद रखा लेकिन एक प्रभु प्रीत में सब बंधनों को काटकर आप

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Bk vijaya didi haryana anubhavgatha

विजया बहन, जींद, हरियाणा से, श्रीकृष्ण की भक्ति करती थीं और उनसे मिलने की तीव्र इच्छा रखती थीं। उन्हें ब्रह्माकुमारी ज्ञान की जानकारी मिली, जिससे उनके जीवन में बदलाव आया। ब्रह्मा बाबा से पहली मुलाकात में, उन्हें अलौकिक और पारलौकिक

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Dadi mithoo ji

दादी मिट्ठू 14 वर्ष की आयु में यज्ञ में समर्पित हुईं और ‘गुलजार मोहिनी’ नाम मिला। हारमोनियम पर गाना और कपड़ों की सिलाई में निपुण थीं। यज्ञ में स्टाफ नर्स रहीं और बाबा ने उन्हें विशेष स्नेह से ‘मिट्ठू बहन’

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Experience with dadi prakashmani ji

आपका प्रकाश तो विश्व के चारों कोनों में फैला हुआ है। बाबा के अव्यक्त होने के पश्चात् 1969 से आपने जिस प्रकार यज्ञ की वृद्धि की, मातृ स्नेह से सबकी पालना की, यज्ञ का प्रशासन जिस कुशलता के साथ संभाला,

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Bk rajkrushna bhai

बरेली के ब्रह्माकुमार राजकृष्ण भाई ने ब्रह्माकुमारी आश्रम में आकर आत्मा के ज्ञान और योग का गहरा अनुभव किया। गीता और सत्संग से शुरू होकर, उन्होंने शिव परमात्मा से मिलकर जीवन में बदलाव देखा। बाबा ने उन्हें ‘स्वराज्य कृष्ण’ नाम

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Bk hemlata didi hyderabad anubhavgatha

ब्रह्माकुमारी हेमलता बहन ने 1968 में ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त किया और तब से अपने जीवन के दो मुख्य लक्ष्यों को पूरा होते देखा—अच्छी शिक्षा प्राप्त करना और जीवन को सच्चरित्र बनाए रखना। मेडिकल की पढ़ाई के दौरान उन्हें ज्ञान और

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Dada chandrahas ji

चन्द्रहास, जिन्हें माधौ के नाम से भी जाना जाता था, का नाम प्यारे बाबा ने रखा। साकार मुरलियों में उनकी आवाज़ बापदादा से पहले सुनाई देती थी। ज्ञान-रत्नों को जमा करने का उन्हें विशेष शौक था। बचपन में कई कठिनाइयों

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Bk aatmaprakash bhai ji anubhavgatha

मैं अपने को पद्मापद्म भाग्यशाली समझता हूँ कि विश्व की कोटों में कोऊ आत्माओं में मुझे भी सृष्टि के आदि पिता, साकार रचयिता, आदि देव, प्रजापिता ब्रह्मा के सानिध्य में रहने का परम श्रेष्ठ सुअवसर मिला।
सेवाओं में सब

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Bk sundari didi pune

सुन्दरी बहन, पूना, मीरा सोसाइटी से, 1960 में पाण्डव भवन पहुंचीं और बाबा से पहली मुलाकात में आत्मिक अनुभव किया। बाबा के सान्निध्य में उन्हें अशरीरी स्थिति और शीतलता का अनुभव हुआ। बाबा ने उनसे स्वर्ग के वर्सा की बात

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Dadi hridaypushpa ji

एक बार मैं बड़े हॉल में सो रही थी परंतु प्रातः नींद नहीं खुली। मैं सपने में देख रही हूँ कि बाबा से लाइट की किरणें बड़े जोर से मेरी तरफ आ रही हैं, मैं इसी में मग्न थी। अचानक

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