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Dada chandrahas ji

दादा चन्द्रहास – अनुभवगाथा

आपका लौकिक नाम ‘माधौ’ था। चन्द्रहास नाम प्यारे बाबा ने रखा। बाबा लाड़-प्यार से चन्द्रहास बाबू जी कहकर बुलाते थे। साकार मुरलियों की टेपरिकॉर्डिंग में आपकी आवाज, बापदादा से भी पहले सुनाई देती है। आपको ज्ञान-रत्नों को जमा करने का विशेष शौक रहा। आप, यज्ञ के आरंभ से ही, बहुत छोटी आयु में, लौकिक के अनेक सितम सहन कर, बंधनों को पार कर बाबा के पास आए, समर्पित हुए। सृष्टि-चक्र का चित्र बनाने में आपका विशेष योगदान रहा। ईश्वरीय सेवाओं के प्रारंभ में आपने मुम्बई में सेवायें दी और बेगरी पार्ट में विशेष मददगार बने। आपको बावा ने यज्ञ-भवन निर्माण के निमित्त भी बनाया और आपने इस सेवा से बहुतों को सुख दिया। आप बहुत ही निर्माणचित्त, कम खर्च बालानशीन, बापदादा के साथ सर्व सम्वन्धों से सदा लवलीन, सबको आगे बढ़ाने वाले तथा मिलनसार स्वभाव के थे। आप 27 दिसंबर, 2009 को अपना पुराना शरीर छोड़ अव्यक्त वतनवासी बन गये।

मेरा बचपन 

मुझ आत्मा का परम सौभाग्य है जो मेरा जन्म उसी हैदराबाद, सिन्ध में हुआ जहाँ शिव बाबा के भाग्यशाली रथ ब्रह्मा बाबा का हुआ और ऐसे परिवार में हुआ जिनका सम्बन्ध ब्रह्मा बाबा, जगदम्बा सरस्वती, दीदी मनमोहिनी तथा दादी प्रकाशमणि जी के परिवार से बहुत निकट का था। इसलिए छोटेपन से उन्हों के पास बड़े त्यौहारों पर आना-जाना, खेलकूद करना होता रहता था।

बचपन में देखे दुख 

लौकिक फ़ादर जापान, कोबे तथा याकोहामा में बिजनेस करते थे। अचानक ड्रामा ने पलटा खाया। कोबे शहर में भयंकर भूकम्प हुआ, उसमें मेरे लौकिक पिता का देहावसान हो गया। उस समय मेरी आयु लगभग 6 मास की रही होगी। इसके बाद आर्थिक कठिनाई होने लगी; दुकान आदि भी बेचनी पड़ी। इस दुःख के कारण मेरी लौकिक माँ भी चल बसी। तब मेरी लौकिक मौसी जो बड़े धनी परिवार में ब्याही थी, उसने हम दोनों भाइयों को अपने पास बुला लिया (बड़ी बहनों की शादी हो गई थी)। मेरी लौकिक मौसी, जे.टी. चैनराय फर्म के मालिक भाई हासाराम से ब्याही थी। उनका बहुत बड़ा मकान था जिसमें मेरी मौसी के साथ उनके तीन मातेले बच्चे, परिवारों सहित रहते थे। बड़ा बच्चा किसी दुर्घटना में गुज़र गया था। उनके दो बच्चे और दो बच्चियाँ (बड़ी दादी मनमोहिनी तथा शील इन्द्रा) माँ (क्वीन मदर) के साथ रहते थे तथा दूसरा बच्चा मूलचन्द अपने परिवार (लीलावती तथा हरदेवी, बृजशान्ता) के साथ रहता था। तीसरा बच्चा भोजराज भी अपने बच्चों सहित रहता था। फिर एक और दुःख का झटका आया। मेरी लौकिक मौसी का देहान्त हो गया और हम दोनों भाइयों को मौसी का घर छोड़ अपनी नानी जी के पास आना पड़ा। हमारी नानी का घर खातुबद गली में था। जहाँ सब कृपलानी परिवार रहते थे। हमारी नानी, मामा जी भी कृपलानी थे। बाबा का मकान भी हमारे पड़ोस में ही था।

ओम् मंडली का आरम्भ

जब बाबा ने कलकत्ते से आकर एक छोटे-से पुराने मकान में सत्संग चालू किया तो मेरी नानी ने कहा, दादा जी बहुत अच्छा सत्संग करते हैं जो सुनने वालों को भगवान के दर्शन हो जाते हैं, तो मैं भी खुशी से नानी जी के साथ सत्संग में पहुँच गया। वहाँ क्या देखा कि बाबा गीता उठाकर, इसके एक-दो श्लोक पढ़ते, फिर ज्ञान देना, अर्थ समझाना आरम्भ करते और अन्त में ओम् की ध्वनि लगाते। ओम् की ध्वनि लगाते ही बहुत मातायें आदि ध्यान में चली जातीं, कोई बाबा का हाथ पकड़ कर नाचने लगती, कोई चिल्लाती “सखियों! कृष्ण आया है” इत्यादि। ये सब देख मैं चकित रह जाता कि इन सबको कैसे बिगर कोई साधना के श्रीकृष्ण के साक्षात्कार होते हैं। यह बात सारे शहर में फैल गई। कोई कहने लगा, दादा कलकत्ता से जादू सीखकर आये हैं। उसके बल से भोली-भाली माताओं को ध्यान में भेज देते हैं। खैर, मेरी समझ में कुछ नहीं आया इसलिए मैंने कुछ दिन जाना छोड़ दिया। कुछ दिन बाद जब सत्संग बढ़ने लगा तो बाबा ने अपने मकान, जसोदा निवास में सत्संग चालू किया। वहाँ बाबा ने ज्ञान के साथ पवित्र जीवन, पवित्र खान-पान तथा दैवी गुणों पर ज्ञान देना आरम्भ किया। बाबा की वाणी में इतनी शक्ति तथा आकर्षण था जो सुनने वाले फौरन उस पर अमल करने लगे। यह सुन-देख मैं भी रोज़ जाने लगा। हमारे सभी रिश्तेदार भी जाने लगे और सभी के जीवन में एकदम से परिवर्तन आने लगा। मेरे को भी ऐसे पवित्र स्वच्छ जीवन का बहुत आनन्द अनुभव होने लगा। शहर में भी बहुतों पर, बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा।

पवित्रता पर झगड़ा

जब दादी प्रकाशमणि जी की बड़ी बहन सती का पति विदेश से आया तो उनका पत्नी के साथ पवित्रता पर झगड़ा आरम्भ हुआ। उससे शहर में हंगामा आरम्भ हो गया कि जो भी स्त्रियां ओम् मंडली में जाएंगी उसके पति को विष नहीं मिलेगा। जब दादी जी की दूसरी-तीसरी बहन के पति भी विदेश से वापिस पहुँचे तो तीनों मिल गए। उनकी पत्नियाँ कहें, आप पवित्र नहीं रह सकते तो भले ही दूसरी शादी करो, हम खुशी से आपकी दूसरी लड़की से सगाई करवाते हैं लेकिन हमको पवित्र रहने दो। यह सुन सभी शहर वाले मुखी, चौधरी चकित रह जाते। ऐसे तो कोई पतिव्रता नारी पति को नहीं छोड़ती; दादा ने कैसा ज्ञान इनको दिया है जो इतना त्याग करके भी पवित्र रहने की जिद्द करती हैं। भले ही पतियों ने उनसे मारपीट की, घर से निकल जाने को कहा लेकिन वे अपनी बात पर अटल रहीं। ऐसे समाचार अखबारों में भी छपने लगे। ऊपर से हैडिंग लिखते ‘Sindh’s Celibate Wives’ इस रीति से यह हंगामा बढ़ता गया। एक दिन शाम को जब बाबा का सत्संग चल रहा था तो 100-150 लड़कों ने इकट्ठे होकर ओम् मंडली के बाहर हंगामा करना आरम्भ कर दिया। तब दो-तीन भाई सत्संग से उठ, बाहर निकल पुलिस में गये। पुलिस ने आकर उन को हटाया, तब सत्संग के सभी भाई-बहनें अपने-अपने घर गये। उन्होंने तो ओम् मंडली को आग भी लगाने की कोशिश की जिस पर बाबा, लाखा भवन को आग लगाने का मिसाल देते हैं। लेकिन उसको फौरन बुझा दिया गया। ये सब मेरे आंखों देखे दृश्य हैं। मैं भी उस समय सत्संग में था। लेकिन इतने हंगामे में भी बाबा की तथा सभी भाई-बहनों की बहुत शान्त-स्थिर अवस्था थी क्योंकि शिव बाबा का साथ था।

ओम मंडली शिफ्ट हो गई ओम निवास में 

ऐसे हंगामे देख बाबा ने ओम् मंडली को जो कि शहर के बीच में थी, वहाँ से शिफ्ट कर ओम् निवास में, जो बाबा ने शहर के एक किनारे में बनवाया था, वहाँ प्रारम्भ किया। यह ओम् निवास बहुत बड़ा, डबल स्टोरी मकान था। वहाँ बाबा ने सत्संग में आने वाले परिवारों के बच्चों के लिए बोर्डिंग बनवाया था। जहाँ बच्चों की ज्ञान की, पवित्र सात्विक जीवन की तथा स्थूल पढ़ाई भी होने लगी। बच्चों की सम्भाल तथा शिक्षा के लिए बाबा ने पांच दादियां (दादी जी, दादी चन्द्रमणि, दादी मिट्टू, दादी कला और दादी शान्तामणि) को रखा। इनके ऊपर मम्मा थी। अब तो बाबा ने वहाँ सत्संग आरम्भ किया। हम घरों में रहने वाले, टाइम पर सत्संग में आते थे। मैं भी साइकिल पर पहले सत्संग में आता था फिर स्कूल में जाता। उस समय मैं एकेडमी हाईस्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ता था।

पिकेटिंग हुई

एन्टी ओम् मंडली वालों को यह पसन्द नहीं आया, उनको तो सत्संग बन्द कराना था। उन्होंने प्रोग्राम बनाया, ओम् निवास के बाहर पिकेटिंग करने का। हम शक्ति सेना को भी बाबा ने ऐलान किया और सभी पिकेटिंग में आकर बाहर खड़े हो गये। ओम् निवास में रहने वाले बच्चे-बच्चियां तथा घरों में रहने वाली मातायें भो आ गईं। आखिर अपने ही बच्चों को कहाँ तक भूखा-प्यासा खड़ा रखते, उनको हारना ही पड़ा। एक-दो दिन यह धर्म युद्ध चला, आखिर कलेक्टर को हस्तक्षेप करना पड़ा। इस रीति से सारे शहर में आन्दोलन देख, बाबा ने ओम् निवास के बच्चों को करांची में शिफ्ट कर दिया।

मुझ पर वारंट निकला

जब सारा ओम् निवास करांची में शिफ्ट हो गया तो पक्के ज्ञान में चलने वाले परिवार भी करांची आ गये। उनके लिए बाबा ने दो-तीन बंगले किराये पर लिये जिनमें वे रहने लगे। जैसे ईशू बहन के दादा-दादी, माँ-बाप, भाई-बहन तथा दादी चन्द्रमणि के पिता रतनचन्द का परिवार, हरदेवी भंडारी का परिवार, ऐसे आठ-दस परिवार आ गये। बाकी हैदराबाद में हम जो अकेले ज्ञान में चलते थे, वे रह गये। हम बाबा से मिलने कैसे पहुँचें? क्योकि ज्ञान अमृत के बिगर तो रहा नहीं जाता। तो कुछ कन्यायें-मातायें, छोटा-छोटा ग्रुप बनाये, छिपकर करांची जाने लगे। ऐसे ही एक दिन मैं भी करांची पहुँच गया। जो करांची आते, बाबा उनके परिवार वालों को तार भेज देते थे कि आपका बच्चा उनके पास पहुँच गया है। बाबा बड़े कायदे से चलते थे, जिससे किसी को ढूँढना न पड़े। खैर, इस रीति से मैं भी यज्ञ में उसी दिन समर्पित होकर बहुत समय की प्यास बुझाने लगा। उधर एन्टी ओम् मंडली वालों ने मेरे पर भी वारंट निकाल दिया। उसी दिन गुलजार बहन पर भी वारंट आया और दोनों को चीफ मिनिस्टर खुद कार में लेकर करांची में हमारे सम्बन्धी जीजा जी के पास छोड़ गये।

मैं फिर से बांधेला बन गया

आ तो गया मैं, लेकिन हम बच्चों को बाबा ने जो पाठ पढ़ाया था कि बच्चे ये लोग आपको अशुद्ध भोजन खिलायेंगे इसलिए भोजन मत खाना। वैसे भी तुम पर अशुद्ध अन्न का असर पड़ेगा। इसमें मैं पक्का था इसलिए मैंने भोजन लेने से इन्कार कर दिया। उन्होंने बहुत ज़ोर-ज़बरदस्ती की लेकिन मैं अपनी बात पर स्थिर रहा। जब सात-आठ दिन कुछ नहीं खाया तो शरीर कमज़ोर होता गया। उनको डर लगा कि बच्चा कहीं शरीर न छोड़ दे, लोग क्या कहेंगे? मोह भी तो रहता है ना। सो उन्होंने छुट्टी दी कि भले ही अपने हाथ का बनाकर खाओ। मैंने कहा-आपका पैसा भी प्रयोग नहीं कर सकता। इसलिए मैं कुछ काम कर, उस पैसे से अनाज लेकर, रोटी पकाकर खाऊंगा। अब ऐसे ही उन्हों को मानना पड़ा। मैने दीदी जी से कुछ सिलाई का काम सीखा था सो घर के ही कुछ कपड़े सिलाई कर, उनके 6-8 आने (आधा रुपया) लेकर अनाज ले, रोटी पकाकर दूध के साथ खा लेता था। कभी-कभी मौका पाकर, हैदराबाद में बाबा के ओम् निवास में जाता और शाम को घण्टा भर मुरली-समाचार आदि सुनकर वापस आ जाता था। इस पर मेरे जीजा जी बहुत बिगड़ते, पिटाई भी करते।

बाबा की बताई युक्ति से बंधन मुक्त हुआ

एक दिन मैंने सपने में बाबा को देखा और रोते हुए, बाबा के गले से जा चिपका। बाबा ने बोला-बच्चे, तुमको पिटाई करते हैं। अच्छा, मैं एक तरकीब बताता हूँ, ऐसे करो तो तेरे को हाथ भी नहीं लगायेंगे और तेरे बन्धन भी छूट जायेंगे। फिर मैंने वैसे ही किया। क्या किया कि दूसरे दिन छिपकर, एक पत्र लिखने लगा और उसे वस्त्रों के बीच में इस तरह रखा जो वे भले ही देखें। उन्होंने वह पत्र दूसरे दिन पढ़ा। उसमें मैंने कलेक्टर को लिखा था कि यहाँ मेरे को रोज़ पिटाई करते हैं, मेरा शरीर छूट गया तो आप ज़िम्मेदार हैं। यह पढ़कर वे डर गये कि अगर यह पत्र कलेक्टर को मिल जाता तो पुलिस पकड़ कर ले जाती। बस, तब से उन्होंने हाथ लगाना छोड़ दिया और मैं रोज़ ओम् निवास जाने लगा। आखिर एक दिन मौका पाकर करांची आ गया। उन्होंने फिर कोई बाधा नहीं डाली। समझा कि बच्चा जहाँ खुश रहे। ऐसे ही बाबा की सूक्ष्म मदद से बन्धन मुक्त हो, ज्ञान सागर शिव बाबा की गोदी में सदा के लिये समा गया। करांची शहर में आने से बहुत पढ़े-लिखे लोग बाबा के पास आने लगे। जिनको बहनें भाई बगीचे में अलग-अलग बिठा कर, ज्ञान समझाते, सेवा करते। इससे अच्छे पढ़े-लिखे कुछ लोग समर्पित भी होने लगे। इनमें एक मद्रासी मुसलमान भाई था, उसका नाम बाबा ने ऋषि रखा। यह इंग्लिश में अनुवाद करता था तथा हम भाई-बहनों को इंग्लिश सिखाता था। एक आत्माराम आडवानी भाई ज्ञान में आया, वह भी हमको इंग्लिश पढ़ाता था। तीन-चार और भी पढ़े-लिखे भाई, उनमें दादा विश्वरतन भी था, वे इंग्लिश आदि टाइप करते थे। बाबा ने विश्वकिशोर दादा तथा आनन्दकिशोर दादा को भी कलकत्ता से बुला लिया। रतनचन्द दादा परिवार सहित, रीझूमल दादा परिवार सहित, ईशु बहन के दादा-दादी, माँ-बाप, भाई-बहन सारा परिवार, जानकी दादी के माँ-बाप परिवार सहित इत्यादि बहुत बड़ा आश्रम हो गया।

ज्ञान के गुह्य राज़ (चन्द्रहास का नाम)

एक बार सन्देशपुत्री को बाबा ने झाड़ का साक्षात्कार करवाया, जिसमें मनुष्य के शीश (चेहरे) लटक रहे थे। उस पर बाबा ने वाणियों द्वारा समझाया कि यह मनुष्य सृष्टि भी झाड़ मिसल है जिसमें कैसे पहले देवी-देवताओं का एक धर्म है, फिर उससे द्वापरयुग के बाद अलग-अलग धर्म निकलते हैं। पहले पश्चिम में, इब्राहिम का इस्लाम धर्म फिर पूर्व में, बुद्ध धर्म फिर पश्चिम में, क्रिश्चियन धर्म आदि। दादा विश्वरतन को काम दिया कि ऐसा झाड़ का चित्र बनाओ। वह डिज़ाइन निकालने में होशियार था तो उसने झाड़ का चित्र बनाया। उसको बाबा ने करेक्ट कर फाइनल किया, हमसे पूछा-ठीक है? हमने कहा-वैसे तो बहुत अच्छा स्पष्ट है लेकिन एक कमी है जो इससे रिपीटिशन का राज़ नहीं खुलता। बाबा ने कहा-वह कैसे हो सकता है? तब मैंने गोले का चित्र रफ-डफ बनाकर दिखाया। बाबा देख बहुत-बहुत खुश हुए कि बच्चे की बुद्धि अच्छी चलती है। यह बहुत अच्छा पद पायेगा। उस पर बाबा ने मेरे को चन्द्रहास का नाम दिया। शास्त्रों में चन्द्रहास के भाग्य की बात आती है। बाबा ने कहा- भृगु ऋषि बाप भी बच्चों के भाग्य को देख खुश होते है। इस रीति से झाड़, गोला, त्रिमूर्ति के चित्र बाबा ने, पहले हम बच्चों से हाथ से पेंट करवाए फिर वहाँ विश्वकिशोर दादा ने प्रेस में भी छपवाये जो हम यहाँ भारत में ले आये। एक बार बाबा ने कहा-जो बांधेली कन्यायें, लौकिक सम्बन्धियों को 5-6 वर्ष से छोड़ आई हैं अब उन्हें लौकिक माँ-बाप, सम्बन्धियों की भी सेवा करनी चाहिए। इसलिये सात कन्याओं को और मुझे बाबा ने तैयार किया कि तुम ज्ञान गंगायें हैदराबाद अपने लौकिक घर, सप्ताह भर के लिए जाकर, उनको ज्ञान अमृत पिला आओ। मैं और सात बहनें, जिनमें मनोहर बहन, गंगे बहन, जमुना बहन आदि थे, इतने वर्षों बाद हैदराबाद गये। उन्हों की मातायें आदि तो अचानक उनको देख हैरान हो गईं। बड़ी खुश हो उनसे मिली।

बाबा ने अव्यक्त नाम दिए

भट्टी के दिनों में रात-दिन ज्ञान की गुह्यता, योग के अभ्यास तथा साक्षात्कारों द्वारा अनेक राज़ों से बाबा हम बच्चों को तैयार करते। एक दिन तो एक सन्देशपुत्री (गुलजार बहन) ध्यान में जाकर सभी यज्ञ निवासी भाई-बहनों के, ध्यान में ही अव्यक्त नाम लिखने लगी, जिससे सभी को अपने-अपने अव्यक्त नाम मिल गये। बाबा ने समझाया, सन्यासी भी सन्यास करते हैं तो अपने नाम बदलते हैं। तुम भी सच्चे राजयोगी सन्यासी हो। पुरानी दुनिया का सन्यास किया है तो अव्यक्त बाप ने तुम बच्चों के नाम बदले हैं।

बचपन की कमी पूरी हुई

भट्ठी के ये 14 वर्ष जैसे स्वर्ग समान थे। यहाँ बच्चों को बाबा शहजादों की तरह से पालते थे। इतने तक कि एक बार बाबा की दिल हुई कि कलकत्ते में बहुत अच्छी मिठाइयां; रसगुल्ले, रसमलाई, सन्देश आदि बनते हैं। वह बच्चों को कैसे खिलायें? सो विश्वकिशोर दादा को कलकत्ते भेजकर वहाँ से एक मिठाई बनाने वाला बुलवाया, उसको बोला-हमारी माताओं को ये मिठाइयां बनाना सिखाओ। उसने माताओं को सिखाया, दूध की तो कमी नहीं थी, अपनी गऊशाला थी। 8-10 गायें थीं। सो मातायें जब सीख गईं तो कभी कोई, कभी कोई मिठाई बनाकर सभी को खिलाती थीं। ऐसे थे मेरे प्यारे बाबा और उनका हम बच्चों से स्नेह। मेरे को तो ऐसी भासना आती जैसे यही मेरे माँ-बाप, बन्धु-सखा हैं। बचपन में जो माँ-बाप का प्यार-पालना नहीं मिली वह अब पूरी हो रही है। बाबा का भी मेरे ऊपर खास प्यार था क्योंकि गोपों में मैं एक ही ऐसा बालक था जो इतने सितम सहन कर, बन्धन तोड़ बापदादा की गोद में समर्पण हुआ। बाबा की खास छुट्टी से रोज़ साइकिल पर, क्लिफ्टन जाकर बाबा की मुरली सुनता और फिर लौटकर कुंज भवन में, बहनों की क्लास में सुनाता। कभी बाबा आकर क्लास कराते, कभी बाबा मुरली लिख भेजते, मम्मा क्लास कराती। कभी देशी घी खरीदने मेरे को बाबा हैदराबाद भेजते, कभी सिन्धी सेठ लोगों को लिटरेचर देने भेजते। ऐसे अनेक प्रकार से बाबा सेवा करना सिखाते।

पाकिस्तान की स्थापना

जब सेकेण्ड वर्ल्ड वार लगी तो बाबा की उसके ऊपर भी मुरलियाँ चलती थीं। सब तरफ फसादों के समाचार थे लेकिन हम तो सब जैसे अपनी ही दुनिया में, शिव बाबा के किले में सुरक्षित थे। मुस्लिम गवर्मेन्ट ने हमारा बहुत ख्याल रखा। पुलिस, हमारे बंगलों पर पहरा देती थी। कुछ भाइ अपनी जान-पहचान के थे, आस-पास के जो थे वे अपना फर्नीचर आदि हमारे को देकर जाते। साथ तो ले नहीं जा सकते थे। अपने पास 8-10 गायों की गऊशाला भी थी। बड़ी शान्ति से, बाहर की दुनिया से दूर, अपनी दैवी दुनिया में परमात्मा की छत्रछाया में, रूहानी मस्ती में हम मस्त थे। बाहर शहर में रक्त की नदियाँ बह रही हैं। पाकिस्तान बनने से हमारे सम्बन्धी, जो पाकिस्तान छोड़ भारत में आ गये, उनके पत्र आने लगे कि आपको टिकट भेजते हैं, आप हमारे पास आ जाओ। उनमें भी दीदी के चाचा मूलचन्द का बहुत ज़ोर था। उनको पैसे की तो परवाह नहीं थी। जे.टी.चैनराय के नाम से बहुत बड़ा बिजनेस चलता था। उसने दीदी को लिखा, फोन किया, आप सारी ओम् मंडली यहाँ आ जाओ। मैं सारा खर्चा दूंगा। जब उनका बहुत ज़ोर पड़ा तो बाबा ने भी कहा- चलो भारत चलते हैं।

यज्ञ का भारत आगमन

ड्रामा प्लैन अनुसार माउंट आबू में, भरतपुर कोठी किराये पर लेकर विश्वकिशोर दादा ने सारा प्लैन बनाया कि यज्ञ, करांची से आबू में किस रास्ते से पहुंचेगा। करांची से स्टीमर द्वारा ओखा बन्दरगाह, ओखा बन्दरगाह से ट्रेन द्वारा मेहसाना, मेहसाना से ट्रेन बदल कर आबू रोड, आबू रोड से बस द्वारा माउंट आबू पहुँचने की योजना बनी। रास्ते के लिए स्टीमर, ट्रेन में दो-तीन बोगियां, फिर बस द्वारा सफर आदि का प्रबन्ध किया। यहाँ करांची में, हम भाई-बहनों ने सफर की तैयारी की। सामान, फर्नीचर आदि बहुत था। बाबा ने कहा- इतने फर्नीचर, अलमारियों आदि की दरकार नहीं है इसलिए बहुत सारा फर्नीचर हम भाई-बहनों ने पॉलिस कर नया बना दिया जो विश्वकिशोर दादा ने फर्नीचर वालों को बेच दिया। बाकी आधा फर्नीचर, बिस्तरे आदि सब पैक करने में 15 दिन लग गये। साइकिलें, बसें, कारें आदि सब बेच दिये। सिर्फ एक बस और एक कार भारत में लाये। वो भी यहाँ आकर बेच दीं। क्योंकि यहाँ आते ही बेगरी पार्ट आरम्भ हो गया। बहुत सारे पैसे, सारे यज्ञ के यहाँ शिफ्ट होने में खर्च हो गये। यूँ तो दादा मूलचन्द ने वायदा किया था कि मैं सारा खर्चा दूँगा लेकिन जब यहाँ हम लोग आ गये तो सभी सिन्धी, दादा मूलचन्द को कहने लगे कि आप पैसे देंगे तो यह यज्ञ ऐसे ही चलता रहेगा। आप पैसे नहीं देगे तो यज्ञ नहीं चल सकेगा और हमारी मातायें, कन्यायें हमारे पास वापिस आ जायेंगी। इस कारण वह खर्चा देने से मुकर गया। उनकी जो इच्छा थी कि मातायें, कन्यायें यहाँ आ जाएं यह तो पूरी हो गयी। अब वह इन्तज़ार करने लगे कि कब इनके पैसे खत्म होते हैं और सभी वापिस अपने घरों को लौटती हैं। लेकिन ड्रामा तो कुछ और ही बना था। बाबा ने वाणियां चलानी आरम्भ की कि तुम बच्चे स्वर्ग के राजा बनेंगे तो राज्य किस पर करेंगे? आप बच्चों ने प्रजा कहाँ बनाई है? अब समय आ गया है जब तुमको देश-विदेश में जाकर अविनाशी ज्ञान अमृत औरों को पिलाना है। सभी को ईश्वरीय सन्देश देना है। यज्ञ के घोड़े भी निकले थे राजाओं को जीतने के लिए। तुम बच्चों को भी सभी को ईश्वरीय सन्देश पहुँचाना है। स्वर्ग की 9 लाख प्रजा बनानी है। प्रजा बिना क्या पशु-पंछियों पर राज्य करेंगे? कितने भोले बच्चे हो!

सेवार्थ भारत के विभिन्न शहरों में जाना हुआ

हम बच्चे भी देखते थे यज्ञ में बहुत बेगरी पार्ट बल रहा है, तो सोचते थे जाकर ईश्वरीय सेवा कर यज्ञ को कुछ मदद करें। कई जवान बच्चे-बच्चियों को माया खींचने लगी कि जाकर धन्धा आदि करें। यहां तो रोज दाल भात खाने पड़ते हैं। मेरे को भी कहने लगे तुम भी चलो। यज्ञ को पैसे की दरकार है, धन्धा आदि कर यज्ञ को मदद करो। एक बार मैं बाबा की मालिश कर रहा था तो बचपने में, बाबा से पूछ बैठा-बाबा, आप छुट्टी दें तो कुछ धन्धा आदि कर यज्ञ को मदद करें। बाबा एकदम गम्भीर हो गये। बोले- बच्चे, बाबा ने तुमको कौन-सा धन्धा सिखाया है? क्या यह कौड़ियों का धन्धा करने का संकल्प आता है, जिससे काले हो जायेंगे? मैंने तो तुम बच्चों को ज्ञान-रत्नों का धन्धा सिखाया है तो यह धन्धा करने का उमंग नहीं आता? मैंने कहा बाबा, आई एम सॉरी। ऐसे ही यज्ञ की छंटनी होने लगी। इधर बाबा ईश्वरीय सर्विस के लिए उमंग दिलाने लगे। आखिर कुछ बहनें, मनोहर बहन आदि दिल्ली की सेवा पर निकलीं। जमुना किनारे जाकर सेवा आरम्भ की। दूसरी तरफ हमारे सम्बन्धी हमको निमन्त्रण देने लगे। बाबा कहते जाओ, सेवा कर, सेन्टर जमाओ। मेरी लौकिक बहन मुम्बई में रहती थी, उसने मेरे को निमन्त्रण दिया। बाबा ने कहा-वहाँ जाकर लिटरेचर छपाओ, इसी प्लैन से मैं मुम्बई गया, कुछ बहनें भी मुम्बई में अपने सम्बन्धियों के पास आईं। मैंने लिटरेचर आदि भी छपाया। हम आपस में मिल सेवा के प्लैन बनाते। उसमें दीदी की भाभी कमला भी बहुत सहयोग देती। उनके पास ही हम मिलते क्योंकि मेरा भी तो मासात का रिश्ता था। भल हम वहाँ सेवा करते लेकिन बुद्धि मधुबन में थी कि वहाँ बेगरी पार्ट चल रहा है, कैसे यज्ञ को मदद करें?

शिवबाबा द्वारा गुप्त पालना

एक दिन जब मैं मुम्बई में था तो मेरे को सपने में आया, मधुबन में पैसे की बहुत खींचतान है। इतवार का दिन था; मैं बहनों से मिला, मिलकर कुछ पैसे (करीब 5-6 सौ रूपये) इकट्ठे कर मैंने तीव्र डाक से मधुबन भेज दिये जो ठीक सोमवार के दिन पहुँच गये। बाद में सुना कि उन दिनों आबू में 15-15 दिन का राशन मिलता था सो दिन पूरे हुए थे, लेकिन यज्ञ में पैसे नहीं थे जो राशन खरीद करें। भूरी दादी बाबा से पूछतीं तो बाबा बोलते-बच्ची, धैर्य धरो, बाबा बैठा है, आप ही कुछ-न-कुछ प्रबन्ध कर देगा। सोमवार के दिन ये पैसे ठीक समय पर पहुँच गये और राशन आ गया। ऐसे ही शिव बाबा हम बच्चों को सूक्ष्म रूप से टच कर यज्ञ की पालना कराते और ब्रह्मा बाप अपने निश्चय में अडोल-निश्चित ऐसे रहते जैसे कोई बात है ही नहीं। शिव बाबा बैठा है, उसके बच्चे हैं। उसने रचना रची है, वही पालना करेगा। ऐसी परीक्षायें पास करते, धीरे-धीरे पहले देहली घंटाघर में सेन्टर खुला। जहाँ दीदी, क्वीन मदर, कमल सुन्दरी बहन आदि रहती थी, हम भी आकर मदद करते, लिटरेचर छपाते, बांटते थे। वहाँ से फिर मेरे को लौकिक भाई ने कलकत्ते में निमन्त्रण दिया, वहाँ भी गया। वहाँ तीन-चार बहनें लौकिक सम्बन्धियों के पास गईं। वहाँ भी ऐसे मिल-जुलकर सेवा करते। इस बीच कुम्भ का मेला इलाहाबाद में लगा, वहाँ दीदी जी, दादी प्रकाशमणि, दादी रतनमोहिनी आदि आठ बहनें, मैं और दादा आनन्दकिशोर गये। वहाँ से कानपुर का निमन्त्रण मिला, वहाँ सेन्टर खुला। लखनऊ में दादाराम के घर में सेन्टर खुला। ऐसे ही सेन्टर्स खुलते गये। यज्ञ भी बृजकोठी से शिफ्ट हो, कोटा हाउस में आया। अब तो बाबा बहनों को मधुबन में अधिक ठहरने नहीं देते। सबको सेवा पर भेज देते। आने पर, 4-5 दिन में रिफ्रेश कर बाबा कहते-जाओ, सेवा करो। मधुबन में बहुत थोड़े भाई-बहनें रहते। एक समय ऐसा भी आया कि ईशू बहन, पोस्ट और कैश सम्भालती थी, उनकी भी देहली में डिमान्ड हुई और उस समय प्रकाशमणि दादी आबू में थी तो उनको यह चार्ज दे, बाबा ने ईशू बहन को भी देहली भेज दिया। क्योंकि बाबा को पहले ईश्वरीय सेवा का फुरना रहता, बाद में मधुबन का। बाबा कहते-मैं बैठा हूँ। कोई भी यज्ञ सेवा चला लूँगा। पहले ईश्वरीय सेवा होनी चाहिए। दादी प्रकाशमणि को मैं पोस्ट आदि लिखने में मदद करता क्योंकि पोस्ट भी दिनों-दिन बढ़ती जाती थी। आखिर दादी प्रकाशमणि को भी बुलावा हुआ तो मेरे को बाबा ने पोस्ट सम्भालने के लिए कहा। मैं बाबा की भी सेवा करता और पोस्ट और कैश भी सम्भालता।

बाबा-मम्मा को पहनाये हार

एक बार मैं दिल्ली में था तो कलकत्ता से मेरे लौकिक भाई का पत्र आया कि भारत सरकार, जो सिन्धी अपनी प्रॉपर्टी पाकिस्तान में छोड़ आये हैं उनको कंपनसेशन (हर्जाना) दे रही है। मेरे को भी मिला है; आप भी आकर एप्लाई करो तो आपको भी मिल जायेगा। मैं कलकत्ता गया और मिनिस्टर से मिल कर लिखा-पढ़ी कर दी। हैदराबाद में मेरे लौकिक बाप के मकान जो थे उनके एवज में गवर्नमेन्ट ने हर्जाना दिया। मेरा दिल हुआ कि प्यारे बाबा-मम्मा के लिए, गिन्नियों (अशर्फियों) के दो हार बनायें और लाकर बाबा-मम्मा को पहनायें। बाबा, बच्चे का प्यार देख पानी हो गये और गोद में लेकर बहुत प्यार किया। ऐसा प्यार तो स्वर्ग में भी नहीं मिलेगा। बाबा ने वह हार रख लिये और जब दादी प्रकाशमणि और दादी रतनमोहिनी जापान से सेवा कर कोटा हाउस, मधुबन में लौटी तो बाबा ने स्वागत में, अशर्फियों के दोनों हार उनको पहनाये। ऐसे दुलार करते थे मेरे बाबा। इस बीच कुछ भारी परीक्षायें भी मेरे ऊपर आईं और आनी भी चाहिएँ जिससे अपनी लगन और निश्चय का पता चले। लेकिन जब इतने सितम सहन कर, ऐसे प्राणेश्वर बापदादा को पाया तो उनका साथ कैसे छूट सकता है? ईश्वरीय मर्यादायें भी कवच का काम करती हैं, इनके सहारे सीता की तरह अग्नि परीक्षायें पास कर लीं।

बाबा ने मुझे इंजीनियरिंग सिखाई

तीन वर्ष कोटा हाउस में रहे फिर राजस्थान सरकार ने मकान खाली करने को कहा। फिर सन् 1958 में हम पोखरन हाउस में आये। यह पुराना मकान तो छोटा था लेकिन इसमें जमीन बहुत थी। बाबा और कुछ बहनें पक्के मकान में रहने लगे, बाकी हम भाई, टीन शेड में रहे। फिर तो धीरे-धीरे मकान बनाने आरम्भ किए। पहले तो बाबा को क्लास के लिए हॉल की दरकार थी। बाबा ने रविदत्त भाई, जो उत्तर प्रदेश में ठेकेदारी का काम करता था, उनको अपने पास बुलाया। उनके साथ मेरे को मदद में रखा। कुछ समय बाद, रविदत्त भाई को भी अपने काम पर जाना पड़ा तो बाबा ने यह कार्य सम्भालने के लिए मेरे को निमित्त बनाया। मैं इंजीनियरिंग तो नहीं जानता था लेकिन बाबा आकर मेरे को डायरेक्शन देते थे। ऐसे अनुभवों से सीखता गया और मकान बनने लगे। पहले छोटा हिस्ट्री हॉल और साथ के दो कमरे बनाये। मैंने तो वे स्नानघर सहित, इस लक्ष्य से बनवाये थे कि एक में बाबा, एक में मम्मा, आमने-सामने रहेंगे लेकिन जब तैयार हुए तो बाबा ने वहाँ रहने से इन्कार कर दिया और कहा कि बाबा तो पुराने मकान में ही रहेगा। जब शिव बाबा भी पुराने रथ में आते हैं तो ब्रह्मा बाबा कैसे नये मकान में रहेगा? ऐसे थे हमारे सर्व त्यागी बाबा। पुराने मकान में भी स्नानघर तो कमरे के साथ था लेकिन लैट्रीन दूर, पेड़ के नीचे, टीन के पत्रे की बनाई थी, बाबा वहाँ जाते थे। इस तरह बाबा के अंग-संग रहकर बाबा से बहुत कुछ सीखने को मिलता था। बाबा कहते-बच्चे जो कमरा बनाओ उसमें खुद दो-तीन दिन रहकर देखो। पार्टी में आने वाले बच्चे ऐसे आराम से रहें जो उनको अपना घर भूल जाए। ऐसे प्रैक्टिकल में इंजीनियरिंग सिखाते थे बाबा।

मामले तो बाबा के ऊपर हैं

एक बार की बात बताता हूँ- कैसे बाबा खुद भी सब-कुछ करते उपराम रहते, हमको भी उपराम बनाते। एक दिन दोपहर को मिस्त्री, छुट्टी पर, भोजन खाने के लिए गये थे, मैं भी भोजन कर के लेटा था। बाबा भी भोजन कर, मेरी खिड़की के बाहर चक्कर लगा रहे थे। मेरे को लेटा हुआ देखकर हंसी में बोले- बच्चे, आराम कर रहे हो? मैंने उठकर कहा-बाबा! जिनके माथे मामले वो कैसे नींद करें? बाबा मुस्करा कर बोले-बच्चे! तेरे ऊपर मामले हैं? मैं बाबा का इशारा समझ गया, बोला-बाबा, आई एम सॉरी। मामले तो, बाबा के ऊपर हैं; हम तो निमित्त हैं। जवाबदारी तो बाबा पर है। हम जब भी करनकरावनहार बाबा को भूल जाते, अहम् भाव में आते तो बाबा ऐसे-ऐसे इशारे में शिक्षा देते थे और यह शिक्षा मेरी दिल में सदा के लिये छप गई। जैसे बाबा अब भी मेरी अँगुली पकड़, मेरे को डायरेक्शन दे रहे हैं। यह मैं निजी अनुभवों से बताता हूँ कि प्यारे बाबा के अव्यक्त होने के बाद भी मैं मधुबन में जो मकान बनाता था, सूक्ष्म में बाबा से श्रीमत लेता कि बाबा आप प्रेरणा दें कि कल्प पहले यह भवन कैसे बनाया था। शान्ति स्तम्भ भी बनाया तो बाबा से निवेदन किया कि बाबा आप हमको गाइड करें, जो प्यारे बाबा का यादगार ऐसा बने जो आने वाली अनेकानेक आत्मायें इससे प्राणेश्वर बापदादा का साक्षात्कार करें। जैसे साकार में बाबा डायरेक्शन देते थे, वैसे ही आज तक अव्यक्त रूप में देते रहे हैं। आप देख रहे हैं प्यारे बाबा के अव्यक्त होने के बाद कैसे देश-विदेश में ब्राह्मण बच्चों की वृद्धि होती जा रही है। बाबा के होते हुए जब हिस्ट्री हॉल बना तो बच्चों के रहने का मकान कम पड़ने लगा तब बाबा ने ट्रेनिंग रूमस् के ऊपर दूसरी मंजिल बनवाई। वो बनी तो हॉल छोटा पड़ने लगा, तब मेडीटेशन हॉल बनाया। वो बना तो अकमोडेशन कम पड़ने लगा। तब लाइट हाउस, विशाल भवन, ज्ञान विज्ञान भवन, योग भवन बनाये। ये बने तो मेडीटेशन हॉल छोटा हो गया। तब ओमशान्ति भवन का विशाल हॉल बनाया। साथ में सुखधाम तथा स्वदर्शन भवन बने। ऐसे ही बाप और दादा दोनों की सूक्ष्म देख-रेख में प्यारा मधुबन कितना वृद्धि को पाता गया वो आज आपके सामने है। ऐसे हैं करन-करावनहार हमारे प्यारे बापदादा जो स्वयं हम बच्चों से करवा के, हम बच्चों का नाम बाला कर रहे हैं और स्वयं गुप्त हैं….!

बाबा और बच्चे के रमणीक संवाद

इसके बाद तो बापदादा अनेक प्रकार की वा जवाबदारी देते गये। मकान का काम करता, बिजली का काम भी करता। फिर टेप मशीन आयी तो प्राण प्यारे बापदादा की मुरलियां रिकोर्डिंग करता, फिर उनकी वा प्रतियाँ निकाल, अनेक सेन्टर्स को भेजता। बापदादा मुम्बई-देहली जाते तो मैं भी टेप मशीन लेकर साथ जाता। फिर प्यारे बाबा के अमूल्य तन की मालिश में करने का भी भाग्य मिला हुआ था। मालिश के समय बाबा और मैं बहुत चिटचैट करते। बाबा के इतना नज़दीक रहकर हम देखते थे कि कैसे बाबा दिनों-दिन उपराम होते, अव्यक्त अवस्था को धारण करते, कर्मातीत अवस्था के नज़दीक आते जा रहे हैं। मालिश के समय कभी-कभी तो ऐसे महसूस होता जैसे कि बाबा अपने तन में है ही नहीं। फिर अचानक तन में आकर कहते-बच्चे! अब तक मालिश कर रहे हो? जल्दी करो, बच्चों को पत्र लिखने हैं। मैं हंस कर कहता-बाबा! आप अशरीरी रहिए ना, यह रथ तो आपने शिव बाबा को दे दिया है। कितना भाग्यशाली रथ है जो दो सर्वोत्तम सवारियां इस पर सवारी करती हैं। इस रथ की तो जितनी मालिश करें, कम है। तो बाबा भी हंस पड़ते कि बच्चा, बाप को ज्ञान दे रहा है। ऐसे बहुत प्रकार की चिटचैट होती, वह तो क्या बताऊँ, क्या न बताऊं? कभी नहलाते समय मैं बाबा से पूछता- बाबा! सबसे बड़ा भगत सारे ड्रामा में कौन है? बाबा कहते-मैं। मैंने ही तो भक्ति आरम्भ की। मैं कहता-आपने क्या किया? सोने का मन्दिर बनाया, उसमें हीरों की शिव की जड़ मूर्ति रख, उस पर दूध की लोटी चढ़ाई। लेकिन स्वयं शिव बाबा चैतन्य में यहाँ बैठे हैं और साथ-साथ ग्रेट-ग्रेट ग्रैण्ड फादर दोनों पूज्य आत्माओं के ऊपर मैं गर्म पानी की बाल्टी चढ़ा रहा हूँ। बाबा कहते शिव बाबा को देखते हो? मैं कहता था कि हाँ, शिव बाबा इस रथ की भृकुटी में बैठा है। तो बाबा हंस पड़ते। बाबा का मस्तक भी शिव बाबा की पिंडी की भांति लगता था। ऐसा भाग्य इस आत्मा को मिला। कभी बाबा हंसी में कहते-बच्चे! स्नान तो उनको करना पड़ता है जो शौचालय में जाते हैं। शिव बाबा तो इनसे न्यारा है। मैं कहता-बाबा! शिव बाबा तो आपके अंग-संग है। इसलिए हम बापदादा कहते हैं। आप जब शौचालय में जाते हैं तो शिव बाबा, वहाँ भी आपके साथ है, स्नान भी साथ में करेंगे ना। बाबा ऐसा चतुराई का उत्तर सुन हंस पड़ते। आहा! उन दिनों को याद कर आंखों में प्रेम के आंसू नहीं आयेंगे? ऐसे प्यारे बाबा का सखा रूप भी देखा, पिता का प्यार भी पाया, तो टीचर के शिक्षाओं भरे रूप का भी अनुभव किया। वो प्यार भरी शिक्षाएं और डांट, जिनमें अति प्यार और अपनापन समाया रहता था, उसका एक उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ: 

बाबा का प्यार देख पानी-पानी हो गया 

यह उन दिनों की बात है जब मैं मकान का काम भी देखता था और बाबा की वाणियों की टेप की कापियां निकाल, सभी सेन्टर्स पर पार्सल भी करता था। सारा दिन इस भाग-दौड़ में जाता था। एक दिन बाबा ने बहुत अच्छी वाणी चलाई। उस दिन निर्मलशान्ता दादी अपने सेन्टर पर जा रही थी। उसने बाबा को कहा- बाबा! चन्द्रहास भाई को कहो कि आज की वाणी की टेप की कॉपी हमको दे। बाबा ने मेरे को बुलाकर कहा बच्चे। आज की वाणी की टेप, बच्ची को बनाकर दे दो। मैंने कहा आज तो बहुत काम है; मैं दो दिन बाद पोस्ट में भेज दूँगा। बाबा गम्भीर होकर बोले- बच्चे! तुम बड़े सुस्त हो, नींद करते हो, खाने की फुर्सत है बाकी वाणी की कापी निकालने की फुर्सत नहीं है। मेरा दिल भर आया। मैंने कहा-बाबा, सारा दिन इतनी भाग-दौड़ करता हूँ, फिर आप सुस्त कहते हो, डांटते हो। दूसरे तो सिर्फ थोड़ी सेवा करते फिर भी उनकी महिमा करते हो। उस समय पता नहीं कैसे बचपने में आकर, यह कह बैठा। बाबा ने प्यार से भाकी पहन कहा-बच्चे! यह मेरा डांटना नहीं, अपने बच्चे प्रति प्यार है। दूसरों की तो महिमा कर उनको उमंग में लाना पड़ता है। उनको डाँट दूँ तो वे दिलशिकस्त हो जाएँ, लेकिन अपने बच्चे पर तो मेरी हुज्जत है। तुमको फील होता है तो आगे से मैं नहीं डांटा करूंगा। महिमा करूंगा। मैं बाबा का प्यार देख पानी-पानी हो गया। मैं बोला, नहीं बाबा, भले डांटो, उसमें भी आपका प्यार समाया है। बाबा ने कहा-हाँ बच्चे! बाबा अपने बच्चों में कोई भी कमी देखना नहीं चाहता; इसलिए डांट-प्यार से बच्चे को सर्व गुण सम्पन्न बनाना चाहता है। ऐसे थे हमारे प्राणेश्वर बाबा जिनकी अपने बच्चों पर इतनी हुज्जत तथा कल्याण की भावना रहती थी।

नौकरों से बाबा का प्यार

ऐसे ही ज्ञानेश्वर बाबा के अनेक रूप देखे। इतनी बड़ी हस्ती, ग्रेट-ग्रेट ग्रैण्ड फादर और कितने नम्रचित्त। हम बच्चों से सखा बन चिटचैट भी करते, बैडमिन्टन आदि खेल भी करते, बाप रूप में शिक्षा भी देते और प्यार भी देते। न सिर्फ हम बच्चों को बल्कि जो नौकर-मिस्त्री आदि काम करते, उनको भी बच्चे-बच्चे कह प्यार देते। एक बार का उदाहरण है राखी का त्यौहार था। उस दिन मकान का काम बन्द था। दोपहर के समय मैं बाबा को धूप में मालिश कर रहा था। तभी एक मजदूर माता थोड़ी दूर आकर खड़ी हो गई। बाबा ने बोला-देखो, बच्ची को क्या चाहिए? मैं उठकर उसके पास गया तो उसने कहा-मैं बाबा को राखी बांधना चाहती हूँ। मैंने बाबा को बताया तो बाबा फौरन उठ गया, बोला-हाँ, बच्ची आओ, राखी बांधो। मैं थोड़ा हिचका तो बाबा बोले-अरे! बच्ची का बाबा के प्रति स्नेह नहीं देखते! आने दो बच्ची को। मैंने उसको बुलाया तो बड़ी खुशी में आकर उसने बाबा को राखी बांधी। बाबा ने मेरे को कहा-बच्ची को खर्ची और टोली देकर आओ। मैं उसको खर्ची-टोली देकर आया तो बाबा ने पूछा-कितनी खर्ची दी? मैंने बोला-बाबा! दो रूपये दिए (उन दिनों दो रूपये बहुत होते थे)। बाबा बोले-अरे बच्चे! इतने बड़े बाप को, इतने प्यार से राखी बांधी, उसको सिर्फ दो रुपये दिये! मैं शरमा गया, सॉरी कह, फिर जाकर उसको बीस रुपये देकर आया। ऐसे प्यार से मेरे बाबा नौकरों के साथ चलते जो नौकर भी बाबा का प्यार देखकर पानी हो जाते। अब भी उस प्यार को याद करते हैं।

नम्रता की मूर्ति प्यारे बाबा

मिस्त्री मजदूर मेरे को बाबूजी कहते तो बाबा भी बाबूजी कह बुलाने लगे। मेरे को शर्म आ जाती। इतनी बड़ी हस्ती, मेरे बुजुर्ग बाबा, मेरे को बाबूजी कहें, कितनी नम्रता। मकान की कोई ऐसी सेवा होती, कहीं मिट्टी की भराई करनी होती, कहीं रोड-रोलर चलाना होता तो बाबा सभी पार्टी में आये हुए बच्चों को बुलाते और खुद भी तगारी उठाने लगते। सब बच्चे, ऐसे बुज़ुर्ग बाबा को देख दंग रह जाते। आहा! ऐसे सर्वगुण मूर्त बाबा के गुणों का कितना वर्णन करें? एक बार बाबा ने वाणी चलाई कि तुम बच्चों को एक ज्ञान सागर शिव बाबा को ही याद करना है, उनसे ही वर्सा मिलता है। मेरी जेब तो खाली है। ब्रह्मा ने तो सब कुछ शिव बाबा को समर्पण कर दिया… इत्यादि। जब मैं बाबा की मालिश करने बैठा तो मैने मुस्करा कर कहा- बाबा! आप हम बच्चों को बहुत ठगते हो। बाबा ने आश्चर्य से कहा-मैं कैसे ठगता हूँ! मैने हंस कर कहा-बाबा! आप कहते हो कि आपकी जेब खाली है, आपसे कुछ नहीं मिलना है लेकिन बाबा आपने जो इतनी कमाई की है; प्रैक्टिकल में सर्वगुण सम्पन्न, सोलह कला सम्पूर्ण बने हो, वह वर्सा तो आपको फालो करके, आपसे ही लेना है। आपके पदचिन्हों पर चल कर ही तो हम कर्मातीत बनेंगे। तब तो सतयुग में भी आपको फालो कर तख्त, ताजधारी बनेंगे। आप ही तो हमारे कल्प-कल्पान्तर के रहनुमा हो। तो बाबा हंस कर कहते-तुम भगत हो, भगत। यह भगतपना भी कितना प्यारा है। है ना?

गाय बनी उदाहरणमूर्त

जब पोखरन हाउस (पाण्डव भवन) आए तो उन दिनों बाबा को ताजे दूध की जरूरत होती थी। दूध वाला ग्वाला ओरिया गाँव से दूध लाता था। उसमें प्रातः के 9 बज जाते थे। दादा विश्वकिशोर ने सोचा कि एक गाय अपने घर में हो तो बाबा को सवेरे ताज़ा दूध मिल सकेगा। इसलिए दादा विश्वकिशोर सिरोही गया और वहाँ एक अच्छी गाय खरीद ली। जब उसे लाने लगे तो वह ट्रक में चढ़े नहीं। बहुत उधम मचाने लगी क्योंकि वह बचपन से ही मालिक के पास पली थी। दादा ने मालिक से कहा कि तुम भी साथ चलो। माउंट आबू में गाय को बांधकर वापस आ जाना। गाय, ग्वाले के साथ आ गई। लेकिन पाण्डव भवन में उसे बांध कर जब ग्वाला चला गया तो गाय फिर उधम मचाने लगी। रात को अपनी रस्सी तोड़कर भाग गई। प्रातः दूध निकालने गए तो गाय वहाँ थी नहीं। एक-दो दिन उसको बहुत ढूँढ़ा। उन दिनों आसपास जंगल ही था। चीते आदि जानवर भी आते थे। हमने समझा कि शायद किसी जानवर ने मार दिया या क्या हुआ पता नहीं चला। तीन दिन बाद गाय का मालिक उसे लेकर पाण्डव भवन में आया और बताया कि गाय यहाँ से भागकर मेरे पास पहुँच गई, उसको लेकर आया हूँ। तब बाबा ने दूसरे दिन क्लास में वाणी चलाई कि बच्चे, देखो, तुम से तो यह गाय ज़्यादा समझदार है जो अपने मालिक और अपने घर को नहीं भूली। यहाँ से कितना दूर सिरोही में मालिक के पास पहुँच गई। बाबा इतना ज्ञानयुक्त लालन-पालन करते, घर की याद दिलाते और तुम बच्चे फिर भी बाप को भूल जाते हो। ऐसे-ऐसे उलाहने देकर बाबा ने खूब हँसाया।

मेरी तो बाजू में है, तुम्हारे सामने है

जब मालिश करने बैठा तो मैने हँसकर बाबा को कहा कि बाबा आप हमें उलाहना देते हो परन्तु बाबा हमें घर में रहने कहाँ देते हैं? हम बाबा के साथ घर पहुंचते हैं और बाबा तुरन्त हमको स्वर्ग में भेज देते हैं। फिर सारा कल्प बाबा और घर से दूर इसी सृष्टि मंच पर चक्कर लगाते-लगाते बीत जाता है। फिर बाबा और घर कैसे याद रहेगा? तब बाबा ने कहा कि बच्चे ड्रामा ही ऐसा बना हुआ है। बाबा बच्चों को साथ रखना चाहें तो भी नहीं रख सकते। तुम बच्चों को तो यहाँ आकर अपने पुरुषार्थ की प्रालब्ध भोगनी ही है। लेकिन तुम अकेले तो नहीं आते मैं भी तो तुम बच्चों के साथ-साथ सारा कल्प पार्ट बजाता हूँ। जब यह बूढ़ा बाबा इतने बड़े यज्ञ की देख-भाल करते हुए, इतने बच्चों को सम्भालते हुए, बाबा की याद का पुरुषार्थ करते हुए पहला नम्बर ले सकता है तो तुम बच्चों पर तो कोई जवाबदारी नहीं है। तुम जवान बच्चे तो मेरे से भी आगे जा सकते हो। मैंने कहा- बाबा, आपको शिव बाबा की मदद है, आपके बाजू में तो शिवबाबा बैठे हैं तो आप कैसे उन्हें भूल सकते हैं? बाबा ने मीठा मुस्कराकर कहा-अरे बुद्धू मेरे तो बाजू में बैठे हैं लेकिन तुम बच्चों के तो सामने बैठे हैं। इन नेत्रों द्वारा तुम बच्चों को देख रहे हैं, इस मुख द्वारा तुम बच्चों को इतने रत्न दे रहे हैं। बाबा मुरली तो तुम बच्चों को सुनाते हैं। मैं तो बीच में दलाल बन सुन लेता हूँ, तुम बच्चे तो शिव बाबा से इस तन द्वारा मिल लेते हो, गले लगते हो, मैं तो बाबा को भाकी भी नहीं पहन सकता। हाँ, रथ दिया है, उसका थोड़ा-बहुत किराया बाबा दे देता है। बाकी मेरे से तो तुम बच्चे प‌द्मगुणा भाग्यशाली हो जो बाबा एक-एक बच्चे को देखते रहते हैं चाहे वह देश-विदेश में कहाँ भी हो। जैसे मेरे को स्मृति है कि बाबा मेरे बाजू में बैठे हैं वैसे तुम बच्चों को भी स्मृति रहे कि बाबा हमारे सामने है। याद है जब तुम बच्चों और माताओं पर मार-पीट और अत्याचार होता था, तब तुम बच्चों को संवेदना देने के लिये बाबा ने एक गीत बनाया था- 

   “क्यों हो अधीर बच्चे, मधुबन में आ गया 

    हूँ। 

   संताप सख्त भारी, अबलाओं पे देख   

   रहा हूँ। 

   आँखों के सामने हूँ, जो चाहे मुझको 

   देखे। 

  अव्यक्त रूप अपना, हर दम दिखा रहा  

   हूँ।”

बाप तो बच्चों के अंग-संग हैं। सिर्फ हर समय बच्चों को यह याद रहे कि बाबा हम को दृष्टि दे रहे हैं, हमारे अंग-संग है तो कितनी खुशी, कितना नशा रहेगा! यही तो गोप-गोपियों का अतीन्द्रिय सुख गाया हुआ है। लौकिक बाप को भी बच्चे प्यारे लगते हैं तो उनको अपने कंधे पर, सिर पर बैठाते हैं। यह बड़ी माँ भी तुम बच्चों को अपने से भी ऊँचा उठाते हैं। ओहो! बताइये, इतना प्यार करेगा कौन, बड़ी माँ करती जितना ?

बाबा कर्मातीत हुए

ऐसे प्यारे बाबा के एक-एक चरित्र का क्या वर्णन करूँ…? मैं देखता, दिनों-दिन प्यारे बाबा स्थूल बातों से उपराम होते जा रहे थे। सन् 1967 से बाबा की वाणियाँ विशेष दैवीगुण धारण करने और अशरीरी-अव्यक्त अवस्था बनाने पर ही चलने लगी और प्रैक्टिकल में भी कई बार अनुभव होता जैसे बाबा इस शरीर में है नहीं। भले ही यज्ञ का चक्कर लगाते, सेन्टर्स के पत्र सुनते, उत्तर लिखते, लेकिन सब-कुछ करते, सबसे न्यारे होते जाते। बाबा का ऐसी अवस्था का अभ्यास तथा ऐसी वाणियां सुनते हुए हम भी जैसे मूलवतन में पहुँच जाते। चलते-फिरते जैसे साकार दुनिया में नहीं लेकिन सूक्ष्म वतन में अव्यक्त बापदादा के साथ चल रहे हैं। एक बार रात को बाबा क्लास में आए, सन्दली पर बैठते ही सामने बैठी दादी को कहा, ‘कुमारका बच्ची! चप्पल बाहर उतार कर आओ।’ दादी जी हैरान होकर देखने लगी। चप्पल पहनकर तो कोई क्लास में नहीं बैठता। तब बाबा मुस्करा कर बोले, ‘मुठी, पैरों का चप्पल नहीं, शरीर रूपी चप्पल-जूते बाहर उतार कर यहाँ आत्मा हो बैठो। बाप तुम आत्माओं से बात करते हैं,’… और हमको लगा, सचमुच, हम आत्माएं मूलवतन में बापदादा के सामने बैठे हैं। क्लास का हॉल भी सामने से गायब हो गया। बाबा के कर्मातीत योग बल का ऐसा असर हम बच्चों पर पड़ता था। ऐसे ही बाबा की कर्मातीत अवस्था को अनुभव करते-करते अचानक वह महान दिन भी आ ही गया जब बाबा ने प्रैक्टिकल में कर्मातीत अवस्था को पाया और अचानक इस पुरानी देह को त्याग दिया। यह सब ऐसा अचानक हुआ जो हम सभी आश्चर्यचकित रह गये। मुझे याद है, वह दिन 18 जनवरी आँखों के आगे अब भी घूम रही है। प्रातः बाबा की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं थी। थोड़ी खाँसी-ज़ुकाम आदि का असर था। फिर भी बाबा नियम अनुसार क्लास में आये लेकिन मुरली नहीं चलाई। एकदम अव्यक्त रूप से बीस मिनट योग कराया और अव्यक्ति दृष्टि देते हुए याद-प्यार देकर उठ गये। शाम को दादी प्रकाशमणि जी ने बाबा को क्लास में नहीं आने को कहा जिससे बाबा जल्दी आराम कर सकें। लेकिन बाबा को ख्याल चला कि सुबह वाणी नहीं चलाई है। बच्चों को फ़िक्र होगा कि बाबा की तबीयत ठीक नहीं है। इसलिये बाबा ने क्लास में आकर बहुत अच्छी शिक्षा भरी वाणी बच्चों प्रति चलाई। बच्चों से विदाई भी ली। और कमरे में आकर सचमुच हम बच्चों से अचानक विदाई ले गये। थोड़े ही दिन पहले बाबा ने एक-दो बार वाणियों में कहा था-बच्चे, सबसे अच्छा शरीर त्यागने का तरीका है, हार्टफेल होना। एक सेकण्ड में बगैर कोई कर्मभोग के शरीर छूट जाए। क्योंकि कर्मातीत बनने पर कर्मभोग तो कोई रहता नहीं और कर्मातीत आत्मा पुराने शरीर से उड़ जाती है। कर्मेन्द्रियाँ तथा हृदय आदि स्वतः काम करना बंद कर देते हैं। ऐसे ही बगैर कोई भोगना के, प्यारी दादी जी का हाथ पकड़, हम सामने खड़े बच्चों को दृष्टि देते-देते, देह त्यागकर बाबा की कर्मातीत आत्मा उड़ चली। यह सब ऐसा अचानक हुआ जो हमको अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। लेकिन डॉक्टर ने आकर शरीर की चेकिंग कर बताया कि बाबा की आत्मा तो है नहीं। फिर तो क्या था। दादी जी में हिम्मत आ गई। फौरन सभी सेन्टर्स पर फोन करने लगी और विचित्र ड्रामा की भावी बताते हुए सभी को मधुबन आने के लिए कहने लगी। दीदी जी उस समय इलाहाबाद में थी। वहाँ भी फोन कर दीदी को समाचार सुनाया। कइयों को तो विश्वास ही न हो कि ऐसे कैसे बाबा हम बच्चों को छोड़कर चला जायेगा! खैर, ड्रामा में जो होना था उसको तो भगवान भी नहीं रोक सकते थे। दूसरे दिन से, सब तरफ से अनेक भाई-बहनें आने लगे, इस प्रकार सभी भाई-बहनें, दूर-दूर से तीन दिन तक आते रहे। तब तक प्यारे बाबा के रथ को सजाकर, छोटे हाल में रख दिया और अखण्ड योग चलता रहा। तीसरे दिन, 21 जनवरी को बाबा के अमूल्य तन को सारे शहर की परिक्रमा दिलाई। शाम को 5 बजे वहीं मधुबन बाबा की तपोभूमि के अन्दर ही, देह का अन्तिम संस्कार किया गया। विचार चला कि प्यारे बाबा का कैसा यादगार बनाया जाए जो बाद में आने वाले अनेकानेक बच्चे यादगार को देख, बाबा के अनमोल जीवन से प्रेरणा लें। बाबा के शरीर का स्टैच्यू तो नहीं बना सकते थे, दुनिया वाले तो अपने गुरुओं के चित्र बनाकर रखते हैं लेकिन हमारे प्यारे बाबा तो प्रैक्टिकल में हमारे सामने स्तम्भ की भांति खड़े हो, हमें वही प्यारी शिक्षायें दे रहे हैं। वे भिन्न-भिन्न महावाक्य, मार्बल पर लिखवा करके लगाए और उसी प्यारे रथ रूपी स्तम्भ के ऊपर शिव बाबा का यादगार रखा और उसके ऊपर छत भी ऐसी बनाई जो सभी तरफ से यह शान्ति का स्तम्भ, पवित्रता का स्तम्भ, ज्ञान का स्तम्भ, शक्ति का स्तम्भ देखने में आये। यह महानतम याद‌गार अब भी शक्ति, ज्ञान, पवित्रता, शान्ति की प्रेरणा दे रहा है। अनेकानेक नये-नये बच्चे आकर, अपने में इन गुणों की माला पहनकर जाते है। आप प्रैक्टिकल में देख रहे हैं कि प्राणेश्वर बापदादा अव्यक्त रूप में, दिन-प्रति-दिन देश-विदेश या सारे विश्व से, अपने बिखरे हुए बच्चों को आकर्षित कर, अपने दैवी परिवार में नया पावन जन्म दे, ब्राह्मण परिवार की वृद्धि करते जा रहे हैं। यह सब बापदादा की ही तो शक्ति है। बापदादा अपने बच्चों का नाम बाला कर रहे हैं और खुद गुप्त हैं। अब हम बच्चों का ही कार्य रहा हुआ है जो बाप को प्रत्यक्ष करें ताकि दुनिया गाये कि जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर, सर्व गुणों की, शक्ति-शान्ति की खान है। कहिए, वो दिन कब आएगा वा आया कि आया?

मुख्यालय एवं नज़दीकी सेवाकेंद्र

अनुभवगाथा

Dada anandkishore ji

दादा आनन्द किशोर, यज्ञ के आदि रत्नों में से एक, ने अपने अलौकिक जीवन में बाबा के निर्देशन में तपस्या और सेवा की। कोलकाता में हीरे-जवाहरात का व्यापार करने वाले दादा लक्ष्मण ने अपने परिवार सहित यज्ञ में समर्पण किया।

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Dadi gulzar ji anubhav

आमतौर पर बड़े को छोटे के ऊपर अधिकार रखने की भावना होती है लेकिन ब्रह्मा बाबा की विशेषता यह देखी कि उनमें यह भावना बिल्कुल नहीं थी कि मैं बाप हूँ और यह बच्चा है, मैं बड़ा हूँ और यह

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Bk jayanti didi anubhavgatha

लन्दन से ब्रह्माकुमारी ‘जयन्ती बहन जी’ बताती हैं कि सन् 1957 में पहली बार बाबा से मिलीं, तब उनकी आयु 8 वर्ष थी। बाबा ने मीठी दृष्टि से देखा। 1966 में दादी जानकी के साथ मधुबन आयीं, बाबा ने कहा,

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Bk pushpal didi

भारत विभाजन के बाद ब्रह्माकुमारी ‘पुष्पाल बहनजी’ दिल्ली आ गईं। उन्होंने बताया कि हर दीपावली को बीमार हो जाती थीं। एक दिन उन्होंने भगवान को पत्र लिखा और इसके बाद आश्रम जाकर बाबा के दिव्य ज्ञान से प्रभावित हुईं। बाबा

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Dadi atmamohini ji

दादी आत्ममोहिनी जी, जो दादी पुष्पशांता की लौकिक में छोटी बहन थी, भारत के विभिन्न स्थानों पर सेवायें करने के पश्चात् कुछ समय कानपुर में रहीं। जब दादी पुष्पशांता को उनके लौकिक रिश्तेदारों द्वारा कोलाबा का सेवाकेन्द्र दिया गया तब

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Bk raj didi nepal anubhavgatha

काठमाण्डु, नेपाल से ब्रह्माकुमारी “राज बहन” जी लिखती हैं कि उनका जन्म 1937 में एक धार्मिक परिवार में हुआ था। भौतिक सुख-सुविधाओं के बावजूद, उन्हें हमेशा प्रभु प्राप्ति की इच्छा रहती थी। 1960 में पंजाब के फगवाड़ा में, उन्हें ब्रह्माकुमारी

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Bk vedanti didi

नैरोबी, अफ्रीका से ब्रह्माकुमारी ‘वेदान्ती बहन जी’ लिखती हैं कि 1965 में पहली बार मधुबन आयीं और बाबा से मिलीं। बाबा ने उन्हें पावन बनकर विश्व की सेवा करने का वरदान दिया। बाबा ने वेदान्ती बहन को सफेद पोशाक पहनने

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Dadi sheelindra ji

आपका जैसा नाम वैसा ही गुण था। आप बाबा की फेवरेट सन्देशी थी। बाबा आपमें श्री लक्ष्मी, श्री नारायण की आत्मा का आह्वान करते थे। आपके द्वारा सतयुगी सृष्टि के अनेक राज खुले। आप बड़ी दीदी मनमोहिनी की लौकिक में

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Bk brijmohan bhai ji anubhavgatha

भारत में प्रथा है कि पहली तनख्वाह लोग अपने गुरु को भेजते हैं। मैंने भी पहली तनख्वाह का ड्राफ्ट बनाकर रजिस्ट्री करवाकर बाबा को भेज दिया। बाबा ने वह ड्राफ्ट वापस भेज दिया और मुझे कहा, किसके कहने से भेजा?

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Dadi brijindra ji

आप बाबा की लौकिक पुत्रवधू थी। आपका लौकिक नाम राधिका था। पहले-पहले जब बाबा को साक्षात्कार हुए, शिवबाबा की प्रवेशता हुई तो वह सब दृश्य आपने अपनी आँखों से देखा। आप बड़ी रमणीकता से आँखों देखे वे सब दृश्य सुनाती

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Dadi dhyani anubhavgatha

दादी ध्यानी, जिनका लौकिक नाम लक्ष्मी देवी था, ने अपने आध्यात्मिक जीवन में गहरा प्रभाव छोड़ा। मम्मा की सगी मौसी होने के कारण प्यारे बाबा ने उनका नाम मिश्री रख दिया। उनकी सरलता, नम्रता और निःस्वार्थ सेवाभाव ने अनेक आत्माओं

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Bk satyavati didi anubhavgatha

तिनसुकिया, असम से ब्रह्माकुमारी ‘सत्यवती बहन जी’ लिखती हैं कि 1961 में मधुबन में पहली बार बाबा से मिलते ही उनका जीवन बदल गया। बाबा के शब्द “आ गयी मेरी मीठी, प्यारी बच्ची” ने सबकुछ बदल दिया। एक चोर का

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Dadi pushpshanta ji

आपका लौकिक नाम गुड्डी मेहतानी था, बाबा से अलौकिक नाम मिला ‘पुष्पशान्ता’। बाबा आपको प्यार से गुड्डू कहते थे। आप सिन्ध के नामीगिरामी परिवार से थीं। आपने अनेक बंधनों का सामना कर, एक धक से सब कुछ त्याग कर स्वयं

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Bhau vishwakishore ji

बाबा के पक्के वारिस, सदा हाँ जी का पाठ पढ़ने वाले, आज्ञाकारी, वफादार, ईमानदार, बाबा के राइट हैण्ड तथा त्याग, तपस्या की प्रैक्टिकल मूरत थे। आप लौकिक में ब्रह्मा बाबा के लौकिक बड़े भाई के सुपुत्र थे लेकिन बाबा ने

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Bk aatmaprakash bhai ji anubhavgatha

मैं अपने को पद्मापद्म भाग्यशाली समझता हूँ कि विश्व की कोटों में कोऊ आत्माओं में मुझे भी सृष्टि के आदि पिता, साकार रचयिता, आदि देव, प्रजापिता ब्रह्मा के सानिध्य में रहने का परम श्रेष्ठ सुअवसर मिला।
सेवाओं में सब

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