ब्रह्माकुमारीज़ नेविगेशन
Dada anandkishore ji

दादा आनन्द किशोर – अनुभवगाथा

आप यज्ञ के आदि रत्नों में से एक थे। आपका लौकिक नाम “लक्ष्मण” था, बाबा की दुकान के साथ ही कोलकाता में आपकी हीरे-जवाहरात की दुकान थी। आप लौकिक में दीदी के देवर थे और बाबा के भाई की पुत्री के युगल थे। आपने भी बाबा को फॉलो किया और परिवार सहित अपना सब कुछ बेहद यज्ञ में समर्पित किया। आपने उस समय लौकिक में बी.ए. पास किया हुआ था। पहले-पहले विदेश सेवा में भी आप दादी जी (दादी प्रकाशमणि) के साथ जापान यात्रा पर गये और चारों ओर सेवा में सदा तत्पर रहे। आपकी अंग्रेजी भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ थी। आपने जो पत्र-व्यवहार किये, उन पत्रों को गवर्मेन्ट के सभी आफिस में आज भी याद किया जाता है। आप 2 सितंबर, 1998 को अपना पुराना शरीर छोड़ अव्यक्त वतनवासी बने।

दादा आनन्द किशोर ने अपने अलौकिक जीवन का अनुभव इस प्रकार सुनाया है-

बाबा ने 14 वर्ष तक करांची में हमसे तपस्या कराई क्योंकि जब तक हम अपना जीवन उच्च नहीं बनायेंगे तब तक दूसरों की सेवा करना मुश्किल होगा। चौदह वर्ष तक योग सिखाकर बाबा ने हमको प्रवीण बना दिया। जब हम भारत आये, पाकिस्तान का विभाजन हो गया था। भारत में माउंट आबू में रहना शुरू किया। यह स्थान बाबा को अच्छा लगा। यहाँ पहले-पहले बृजकोठी में आकर रहने लगे। यहाँ का वायुमण्डल करांची से बहुत भिन्न था। इस कारण यहाँ आने पर कई बहन-भाइयों की तबीयत ठीक नहीं रही। मेरे को बाबा ने अहमदाबाद भेजा था जहाँ रहकर, डॉक्टरों से संपर्क करके, बीमार बहन-भाइयों को वहाँ बुलाकर मैं उनकी दवा करता था। बाबा ने हमको समझा दिया था कि बच्चे, यह ईश्वरीय ज्ञान का यज्ञ है। यहाँ बहुत उच्च पद पाने का है। जहाँ उच्च पद पाना होता है, उच्च इम्तिहान पास करना होता है, वहाँ बीच-बीच में बहुत रुकावटें आती है, उनका फिकर नहीं करना। ये रुकावटें आयेंगी। माउंट आबू आने के बाद पैसे की थोड़ी समस्या आई थी क्योंकि जिन्होंने निमंत्रण देकर इंडिया बुलाया था, उन्होंने बाद में मना कर दिया। उनका बाबा के इस यज्ञ के प्रति फ्रेंडली तरीका नहीं था। भरतपुर के महाराजा की जो कोठी थी, उसका किराया बहुत ऊँचा था। उन दिनों रेन्ट एक्ट था, उसके आधार पर उनका रेन्ट ऊँचा होने के कारण हमने रेन्ट नहीं दिया, तो उसने केस कर दिया। उन दिनों विश्व किशोर दादा, बाबा का राइट हैण्ड था। उन्होंने केस को डील किया। हममें से बहुत-से भाई-बहनों को बाबा ने सेवार्थ दूसरे-दूसरे शहरों में भेजा था जैसे दिल्ली, बॉम्बे, कलकत्ता, लखनऊ, कानपुर आदि में।

जापान से सेवा का निमंत्रण

यज्ञ-वत्सों के संबंधियों ने, विभाजन के बाद भारत में आकर, यज्ञ-वत्सों को लिखा कि हम भारत में आकर दुखी हो गये हैं। विभाजन से पहले तो उनका जीवन बहुत अच्छा था। यहाँ आकर रिफ्यूजी होम में रहने लगे थे, बहुत दुखी हो गये थे। ऐसे संबंधियों के निमंत्रण पर ही यज्ञ-वत्स भिन्न-भिन्न शहरों में सेवा के लिए गये थे। दीदी, गंगे दादी तथा सन्तरी बहन के साथ हमको, एक बार बाबा ने कहा, भारत का चक्कर लगाओ। हम चक्कर लगाने निकले, हमारा लक्ष्य था कि हम महात्माओं के कनेक्शन में आएँ। हम गये ऋषिकेश, हरिद्वार। ऋषिकेश में स्वामी शिवानन्द का बड़ा आश्रम था। वहाँ उन्होंने एक कांफ्रेंस की थी, उसमें गंगा बहन ने बहुत अच्छा भाषण किया और ज्ञान समझाया। वहाँ एक भाई था जो जापान की पहली रिलीजियस कांफ्रेंस से होकर आया था। अब जापान में दूसरी कांफ्रेंस होने वाली थीं। उसने जापान के आयोजकों को लिखकर भेजा कि भारत में ब्रह्माकुमारी संस्था बहुत अच्छी है, इसको आप निमंत्रण भेजो। उन्होंने निमंत्रण भेजा जिसे बाबा ने स्वीकार किया और सन् 1954 में बाबा ने मुझे, दादी प्रकाशमणि तथा दादी रतनमोहिनी को जापान भेजा। हम लोगों ने जापान में बहुत अच्छी सेवा की।

जापान, हांगकांग तथा सिंगापुर में सेवा

हम गये थे केवल 15 दिनों के लिए लेकिन वहाँ के लोगों को यह ज्ञान बहुत अच्छा लगा। फिर भिन्न-भिन्न संस्थाओं ने हमको निमंत्रण दिया कि हमारे पास आओ, आकर ज्ञान दो। कोई 15 दिन के लिए, कोई 10 दिन के लिए बुलाते रहे। हमने बाबा से पूछा, बाबा ने कहा, यह तो बहुत अच्छा है, तुम सर्विस में बिजी हो जाओ। हम बिजी हो गये। हमारे सिन्धी मित्र-संबंधी बड़ी संख्या में वहाँ बिजनेस में हैं। सरदार लोग और गुजराती भी हैं। उन सबके साथ जब संपर्क हुआ तो उन्हें भी बहुत रुचि हुई। उन्होंने समझा था कि यह (ब्रह्माकुमारीज) संस्था खलास हो गई होगी क्योंकि हम लोग विभाजन के बाद भी तीन साल तक पाकिस्तान में रहे थे। उन्होंने समझा, मुसलमानों के राज में ये कैसे रह सकेंगे। जब हम जापान में उनसे मिले तो उनकी आँखें खुल गई कि इनमें इतनी शक्ति है जो इन्होंने पाकिस्तान में, हमारे बाद भी रहकर दिखाया है। उन्हों का हमारे साथ बहुत प्यार रहा। गुजराती तथा सरदार भाइयों का भी बहुत स्नेह रहा। ऐसा करके हम लोग जापान में ही छह मास रह गये क्योंकि इतनी सर्विस फैल गई। लौटते समय हमको हांगकांग से निमंत्रण मिला। हांगकांग में दो मास ठहर गये। वहाँ भी सर्विस फैल गई। फिर हमको सिंगापुर से निमंत्रण मिला। सिंगापुर में मित्र-संबंधी बहुत थे, वहाँ भी थोड़ा समय ठहरे, उनकी सेवा की। इसके बाद हम पानी के जहाज के द्वारा सिंगापुर से मद्रास आये। हमारी इतनी सेवायें देखकर बाबा ने मद्रास में दादी जानकी तथा जगदीश भाई को खास हमको रिसीव करने के लिए भेजा था। इनके आने से वहाँ अखबार वालों तथा दूसरे सिन्धी लोगों की बहुत सेवा हुई। कइयों का कनेक्शन दादी जानकी से था, उनके पास हम रहे और खूब सेवा हुई।

बाबा ने उमंग-उत्साह से स्वागत किया

वहाँ से बाबा ने डायरेक्ट आबू नहीं बुलाया। साधुओं का एक सम्मेलन था चित्रकूट में। अक्टूबर महीने में जो शरद पूर्णिमा होती है, वो चित्रकूट की मशहूर है, वहाँ पर मेला लगता है। कानपुर में गुप्ता जी थे, उनको भी निमंत्रण मिला था। वो आये थे हमको मद्रास में लेने के लिए। इस प्रकार चित्रकूट में सेवा हुई। वहाँ से सेवा करते हुए हम बॉम्बे, लखनऊ, कानपुर और फिर दिल्ली में आये। दिल्ली में भी बहुत अच्छी सेवा हुई। फिर हम माउंट आबू में आए। तब तक बृजकोठी से निवास चेंज हो चुका था, बाद में कोटा हाऊस और धौलपुर हाऊस मिला था। वहाँ हम आकर बाबा से मिले थे। बाबा ने बहुत उमंग-उत्साह से हमारी खातिरी की और दादी कुमारका को गिन्नियों का हार पहनाया और बहुत खुशियाँ मनाई।

भारत के विभिन्न शहरों में सेवा

जापान की सेवा के बाद भारत में भी काफी सेवा फैल गई। ब्रह्माकुमारीज़ का नाम ऊँचा हो गया कि ये जापान से होकर आये हैं। उसके बाद बैंगलोर में सेन्टर खुला। इलाहाबाद कुंभ के मेले में हम सेवार्थ गये। वहाँ से कानपुर नजदीक पड़ता है। कानपुर के एक भाई ने निमंत्रण दिया। कानपुर पहुँचने पर वहाँ के एक बड़े व्यापारी ने अपने घर में निमंत्रण दिया और बोला, यहाँ सेन्टर खोलो। उसकी कोठी में एक अलग हिस्सा था, वहाँ सेन्टर खुला और सेवा हुई। लखनऊ में दादा राम और सावित्री रहते थे। उनका बाबा के साथ लौकिक में कनेक्शन था। उन्होंने शुरू-शुरू में अच्छी सेवायें की। फिर राजस्थान में सेवा शुरू हुई। मैं तो अधिकतर टूर पर ही रहा। आखिर एक सेन्टर अहमदाबाद में खुला। फिर सन् 1955 में, भारत में पहला म्यूजियम किशनपोल बाज़ार, जयपुर में खोला। बाबा ने मुझे अहमदाबाद से वहाँ भेजा। जहाँ-जहाँ नई सर्विस शुरू होती थी, बाबा मेरे को वहाँ भेजता था।

कुछ समय बाद हमारा मुख्यालय कोटा हाऊस और धौलपुर हाऊस से बदली होकर पाण्डव भवन में आ गया। बाबा के अव्यक्त होने के बाद, सन् 1970 से हम और निर्वैर भाई पाण्डव भवन में रहने लगे। अव्यक्त होने के पहले बाबा ने माउंट आबू में बड़ा स्पिरिचुअल म्यूजियम खोलने का विचार बनाया था। बॉम्बे वाले रमेश भाई को बुलाकर बाबा ने कहा, म्यूजियम बनाओ। उसी समय वर्ल्ड रिन्युअल स्पिरिचुअल ट्रस्ट बना और उसी के नाम से म्यूजियम बनाने का डायरेक्शन बाबा ने दिया। मकान ले लिया गया। उसमें मुख्य रूप से बनाने का काम निर्वैर भाई ने किया। वह म्यूजियम एक मॉडल के रूप में बना जिससे अभी भी बहुत सेवायें हो रही हैं।

विदेश में सेवाकेन्द्र खुला

बाबा ने बताया था, मेरा अव्यक्त होना जरूरी है। अव्यक्त होकर मैं शरीर की हदों से परे रहूँगा। शरीर की हदों के कारण मैं बाहर के लोगों की सेवा नहीं कर सकता हूँ, इसलिए अव्यक्त स्वरूप द्वारा बहुत लोगों को साक्षात्कार कराकर बहुत पहचान दूँगा और पहचान के आधार पर बहुत लोग यहाँ आयेंगे। इसके थोड़े समय बाद आबू में बहुत फॉरेनर्स आने लगे। म्यूजियम देखने भी बहुत आते थे। उनको म्यूजियम देखकर मन में आता था कि इतना ऊँचा ज्ञान और हमको अभी तक पता ही नहीं है! पहले-पहले दो भाई आए, चार्ली और केन, दोनों ऑस्ट्रेलिया के थे, लंदन में नौकरी करते थे। लंदन में उन दिनों सेवाकेन्द्र नहीं था। जयन्ती बहन पहले माउंट आबू में पढ़ती थी। बाबा के संपर्क में आती रहती थी। बाबा ने उसको वरदान दिया था, बच्ची, तुम फॉरेन में बहुत सेवा करेगी। पढ़ाई पढ़ के और ज्ञान लेकर वह लंदन गई। लंदन में ही उनका परिवार रहता था। वहाँ ब्रिटिशर्स का एक स्पिरिचुअल सेन्टर था। वहाँ हर हफ्ते उसे लेक्चर करने का चांस मिलता था जिसे सुनने के लिए कई लोग आते थे। वहीं चार्ली तथा केन भाई ने यह ज्ञान सुना और जयन्ती बहन से छुट्टी लेकर वे आबू में आये। वे पहले विदेशी थे जो मधुबन में आए। फिर उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में सेन्टर खोला।

अमेरिका की एक योग संस्था ने सन् 1972 में आबू में निमंत्रण भेजा। हमने उसे स्वीकार कर रतनमोहिनी दादी का, निर्वैर भाई का, मेरा तथा एक-दो और का बायोडाटा भेज दिया। फिर दादी की राय प्रमाण चार बहनें तथा दो भाई गये। पहले ये लोग लंदन में गये, वहाँ छोटा सेन्टर खुला। जगदीश भाई और रमेश भाई भी उस टूर में थे।

माताओं को आगे रखना है उत्तीर

करांची में हम 300 बहनें-मातायें तथा 75 भाई थे। यहाँ आये तो कम हो गये थे कुछ कारणों से। बाबा ने हमको ट्रेनिंग दी थी कि माताओं को आगे रखना है क्योंकि माता मदालसा है, माताओं का हृदय कोमल होता है। उनका सेवा करने का ढंग लोगों को अच्छा लगता है। हमने बाबा का वह डायरेक्शन आशीर्वाद के रूप में माना। हमने अपना अभिमान कि हम बड़े हैं और मातायें छोटी हैं, यह बदली करके अपना सिद्धांत बनाया कि माताओं को आगे रखना है। भारत में आने के बाद हमने महसूस भी किया कि माताओं के ज्ञान देने पर भाई सुनते थे पर भाइयों द्वारा दिये जाने पर वे बात नहीं मानते थे। माताओं की जल्दी मान लेते थे। हमारा सतगुरु परमात्मा है। उसके बाद कोई गुरु नहीं पर कारोबार के लिए दादी को हैड बनाया गया। यज्ञ के शुरूआत में दीदी कंट्रोलर थी क्योंकि वह माता थी, अनुभवी थी। आबू में भी उन्होंने उसी प्रकार सेवा की। हम यहाँ भी उसे कंट्रोलर कहते थे पर बाबा जानी-जाननहार है। उन्हें पता था, इसके बाद फॉरेन की सर्विस चालू हो जायेगी, उसमें दादी प्रकाशमणि का रोल बेहतर रहेगा, उसमें छोटाई-बड़ाई का सवाल नहीं था। दीदी और दादी का तरीका ऐसा था जैसे दो शरीर एक आत्मा। बाद में दादी जानकी एडिशनल हैड बनी। उनका भी दादी के साथ संबंध वैसा ही रहा जैसा दीदी का था।

दादा आनन्द किशोर के बारे में दादी निर्मलशान्ता जी बताती हैं –

दादा आनन्द किशोर का बाबा के साथ घनिष्ठ संबंध था। भावी अनुसार व्यापार करने के लिए बाबा का कोलकाता जाना हुआ। कोलकाता में सबसे नामीग्रामी स्थान और प्रसिद्ध बिजनेस सेन्टर उस समय न्यू मार्केट ही था जिसे चार्ल्स हॉग मार्केट के नाम से जाना जाता है लेकिन सभी के मुख से ‘न्यू मार्केट’ नाम ही निकलता है। उस मार्केट के ठीक सामने एक सात मंजिल की इमारत थी जिसमें लिफ्ट लगी हुई थी। उसका ठिकाना (पता) ‘7 ए, लिण्डसे स्ट्रीट, सुराना मेन्सन, न्यू मार्केट’ है। पहली मंजिल पर बाबा ने दुकान यानि जिसे हम गद्दी कहते थे उसे हीरे-जवाहरातों के बिजनेस का स्थान बनाया। दूसरी मंजिल में हम सभी रहते थे, उसी मार्केट में आज भी वह मकान बहुत ऊँचा है तथा ठीक उसके पास ग्लोब सिनेमा हाल है।

ब्रह्मा बाबा को पूरा फालो किया

ग्लोब सिनेमा हाल से एक मकान छोड़कर उसी फुटपाथ पर राम लक्ष्मण एंड कंपनी थी जो आज भी उसी नाम से सोने व हीरे का व्यापार करती है। दादा आनन्द किशोर का लौकिक नाम लक्ष्मण था तथा उनके साझीदार का नाम राम था। दोनों के नाम से यह राम लक्ष्मण एंड कंपनी थी। दादा आनन्द किशोर ने भी ब्रह्मा बाबा का पूरा अनुसरण किया। जैसे बाबा सारा बिजनेस समेट कर कोलकाता से हैदराबाद (सिन्ध) आये, उन्होंने भी ऐसे ही किया। बाबा ने अपना बिजनेस, पार्टनर सेवकराम को दिया तथा दादा आनन्द किशोर ने अपने पार्टनर राम को सारा बिजनेस दिया और अपने हिस्से का धन लेकर बाबा के पास चले आये। यज्ञ में समर्पित भाइयों में, उस समय सबसे ज्यादा पढ़ाई सिर्फ आनन्द किशोर दादा की ही थी। अंग्रेजी में ज्ञान की सभी बातों को लिखना, अनुवाद करना, मुरली अंग्रेजी में लिखना, अंग्रेजी में देश-विदेश में पत्र-व्यवहार करना – दादा आनन्द किशोर का ही काम था। इसके अलावा, बाबा के ऑफिस का कार्य करांची से लेकर मधुबन (माउंट आबू) में अपने अंतिम समय तक संभाला जिसे अभी निर्वैर भाई निमित्त बन संभाल रहे हैं।

दादा आनन्द किशोर जी के बारे में ब्र.कु.रमेश शाह भाई, मुंबई अपने अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं –

शिवबाबा के दैवी परिवार में अनेक भाई-बहनें अनेक संबंधों से आए जैसे दादा आनंद किशोर, ब्रह्मा बाबा के पारिवारिक दामाद (बड़े भाई के दामाद) थे। यज्ञ में वे पहले-पहले पढ़े-लिखे ग्रेजुएट थे। शुरू-शुरू का अंग्रेजी में ईश्वरीय साहित्य लिखने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। जापान में भी विश्वधर्म सम्मेलन में, दादी प्रकाशमणि तथा दादी रतनमोहिनी के साथ ब्रह्मा बाबा ने उन्हें भेजा। पूर्व एशिया के देशों जैसे हांगकांग, सिंगापुर, मलेशिया आदि में इन्होंने ईश्वरीय सेवायें की और वहाँ से लौटने के बाद मुंबई में रहे। मेरा उनके साथ विशेष परिचय सन् 1957 में हुआ। मेरी लौकिक माताजी की इच्छा थी कि हम ब्रह्मा बाबा और मातेश्वरी जी को मुंबई आने का निमंत्रण दें और हमने हमारी माताजी को कहा कि भले आप निमंत्रण भेजो। ब्रह्मा बाबा ने माता का निमंत्रण स्वीकार नहीं किया और कहा कि बच्चा (रमेश) अगर निमंत्रण देगा तो उसे स्वीकार कर मुंबई में आयेंगे। मेरे लिए मीठी समस्या खड़ी हो गई कि मैं कैसे निमंत्रण भेजूँ।

सुन्दर शब्दों में निमंत्रण-पत्र लिखा

दादी पुष्पशान्ता उस समय वाटरलू मेन्शन सेवाकेन्द्र की इंचार्ज थीं। उन्होंने कहा कि आप निमंत्रण भेज दो। मैंने कहा कि मैं कैसे निमंत्रण दूँ, मुझे आपकी भाषा नहीं आती। दादी ने पूछा कि क्या नहीं आता। मैंने कहा कि आपके ज्ञान में कई शब्द नये हैं और ब्रह्मा बाबा जैसे महान प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का निमंत्रण-पत्र भी उतना ही गौरवशाली होना चाहिए। तब दादी पुष्पशांता ने कहा कि आप दादा आनन्द किशोर से मिलो, वह बहुत ही अच्छे शब्दों में ब्रह्मा बाबा और मम्मा के लिए आपको निमंत्रण-पत्र लिखकर देगा। उन्होंने दादा आनन्द किशोर से मेरा परिचय कराया और उन्होंने बहुत ही सुन्दर शब्दों में ब्रह्मा बाबा और मम्मा की प्रतिभा के अनुरूप निमंत्रण-पत्र लिखकर दिया और उसी निमंत्रण को पढ़कर ब्रह्मा बाबा ने फौरन टेलीग्राम भेजा कि ब्रह्मा बाबा और मम्मा निमंत्रण को स्वीकार कर मुंबई आयेंगे। तब मैंने दादा आनन्द किशोर का दिल से धन्यवाद माना कि आपने बहुत सुन्दर निमंत्रण-पत्र लिखकर दिया, फलस्वरूप बाबा-मम्मा चार मास के लिए मुंबई आये। इस प्रकार दादा आनन्द किशोर के साथ हमारा घनिष्ठ संबंध जुटता गया।

जब प्रदर्शनी के चित्र बनाने का कार्य मुंबई में चल रहा था तब भी दादा आनन्द किशोर द्वारा हमें अच्छा मार्गदर्शन मिला। भ्राता निर्वैर, भ्राता आनन्द किशोर, भ्राता अर्जुन तथा अन्य साथियों का एक ग्रुप बना और प्रदर्शनी की सेवायें अच्छी हुई।

विराट प्रतिभा के धनी

बाद में दादा आनन्द किशोर मधुबन में रहने लगे। सन् 1968 में जब ब्रह्मा बाबा ने दादी प्रकाशमणि तथा मुझे ट्रस्ट के निर्माण के लिए मधुबन में बुलाया तो हम दोनों के साथ दीदी मनमोहिनी तथा दादा आनन्द किशोर भी ट्रस्ट के निर्माण कार्य में बहुत मददगार बने। ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने के बाद निर्वैर जी को मधुबन की ईश्वरीय सेवा पर बुलाया गया और तब से दादा आनन्द किशोर और निर्वैर जी की युगल जोड़ी ने ईश्वरीय सेवा में अनेक प्रकार के कार्य किये। दोनों ने मिलकर ऑफिस का कार्य संभाला। पांडव भवन में भ्राता निर्वैर जी की ऑफिस हमें दादा आनन्द किशोर की याद दिलाती है कि कैसे दादा कुर्सी पर बैठकर ईश्वरीय सेवा का कारोबार करते थे और अनेक भाई-बहनों को ज्ञान, योग और सेवा के संबंध में मार्गदर्शन देते थे। ऐसे विराट प्रतिभा के धनी हमारे दादा आनन्द किशोर ने बाद में बीमारी के कारण माउंट आबू में ही शरीर छोड़ दिया। अन्तिम दिनों में बीमारी के दौरान दादा कुछ समय के लिए हॉस्पिटल में रहे, उस समय की उनकी स्थिति बहुत प्रेरणादायी थी; आई एम ओके (I am OK, मैं अच्छा हूँ) या फिर आई एम बेटर देन यू (I am better than you, मैं आपसे अच्छा हूँ) जब-जब किसी ने दादा से उनकी तबीयत के बारे पूछा तब-तब उसे यही जवाब सुनने को मिले। हर समय अपने मुखमंडल पर एक अलौकिक मुस्कान छलकाते दादा (दादा आनन्द किशोर जी) कभी किसी को यह एहसास ही नहीं होने देते थे कि उनकी तबीयत खराब है। और तो और स्वयं डॉक्टर भी हैरान हो जाते थे जब उनके पूछने से पहले ही दादा उनसे पूछ बैठते थे- हैलो डॉक्टर, हाऊ आर यू? जिस किसी ने भी दादा के साथ एक पल भी गुजारा हो वे उनके जिंदादिली, खुशनुमा मिजाज और बेफिक्र बादशाह वाले अंदाज को कभी भी नहीं भुला सकता। दादा 89 साल की उम्र में भी कहते थे-आई एम वेरी यंग। अस्पताल में सभी दादा के लिए फिक्रमंद होते थे और दादा अपनी वही चिरपरिचित मुस्कान लिये सबका स्वागत करते थे और कहते थे, मैं तो यहाँ एकांत में बाबा (परमात्मा) को याद करने के लिये आया हूँ। अपने हर कर्म में “फॉलो फादर, सी फादर” करने वाले आदि रत्न, त्यागी, तपस्वी, अथक सेवाधारी, संपूर्ण निश्चयबुद्धि, बाबा के हर इशारे को अमल में लाने वाले, मधुबन बगिया के श्रृंगार, हम सबके स्नेही, मिलनसार दादा आनन्द किशोर जी 2 सितंबर, 1998, बुधवार को बाबा के साथ मीठी बातें करते, रात्रि 8.20 पर बाबा की गोद में चले गये।

ऐसी महान आत्मा, जिन्होंने यज्ञ के स्थापना से लेकर अथक और दिल व जान से यज्ञ की सेवा की तथा हम सबके लिए एक मिसाल बने, हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

मुख्यालय एवं नज़दीकी सेवाकेंद्र

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अनुभवगाथा

Dadi rukmani ji anubhavgatha 2

रुकमणी दादी, वडाला की ब्रह्माकुमारी, 1937 में साकार बाबा से मिलीं। करांची से हैदराबाद जाकर अलौकिक ज्ञान पाया और सुबह दो बजे उठकर योग तपस्या शुरू की। बाबा के गीत और मुरली से परम आनंद मिला। उन्होंने त्याग और तपस्या

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Bk sudarshan didi gudgaon - anubhavgatha

ब्रह्माकुमारी सुदर्शन बहन जी, गुड़गाँव से, 1960 में पहली बार साकार बाबा से मिलीं। बाबा के दिव्य व्यक्तित्व ने उन्हें प्रभावित किया, बाद उनके जीवन में स्थायी परिवर्तन आया। बाबा ने उन्हें गोपी के रूप में श्रीकृष्ण के साथ झूला

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Dadi sheelindra ji

आपका जैसा नाम वैसा ही गुण था। आप बाबा की फेवरेट सन्देशी थी। बाबा आपमें श्री लक्ष्मी, श्री नारायण की आत्मा का आह्वान करते थे। आपके द्वारा सतयुगी सृष्टि के अनेक राज खुले। आप बड़ी दीदी मनमोहिनी की लौकिक में

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Bhau vishwakishore ji

बाबा के पक्के वारिस, सदा हाँ जी का पाठ पढ़ने वाले, आज्ञाकारी, वफादार, ईमानदार, बाबा के राइट हैण्ड तथा त्याग, तपस्या की प्रैक्टिकल मूरत थे। आप लौकिक में ब्रह्मा बाबा के लौकिक बड़े भाई के सुपुत्र थे लेकिन बाबा ने

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Bk janak didi sonipat anubhavgatha

ब्रह्माकुमारी जनक बहन जी, सोनीपत, हरियाणा से, जब पहली बार ब्रह्मा बाबा से मिलीं, तो बाबा के मस्तक पर चमकती लाइट और श्रीकृष्ण के साक्षात्कार ने उनके जीवन में एक नया मोड़ लाया। बाबा की शक्ति ने उन्हें परीक्षाओं के

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Bk brijmohan bhai ji anubhavgatha

भारत में प्रथा है कि पहली तनख्वाह लोग अपने गुरु को भेजते हैं। मैंने भी पहली तनख्वाह का ड्राफ्ट बनाकर रजिस्ट्री करवाकर बाबा को भेज दिया। बाबा ने वह ड्राफ्ट वापस भेज दिया और मुझे कहा, किसके कहने से भेजा?

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Bk vijaya didi haryana anubhavgatha

विजया बहन, जींद, हरियाणा से, श्रीकृष्ण की भक्ति करती थीं और उनसे मिलने की तीव्र इच्छा रखती थीं। उन्हें ब्रह्माकुमारी ज्ञान की जानकारी मिली, जिससे उनके जीवन में बदलाव आया। ब्रह्मा बाबा से पहली मुलाकात में, उन्हें अलौकिक और पारलौकिक

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Bk avdhesh nandan bhai rishikesh anubhavgatha

ऋषिकेश के ब्रह्माकुमार अवधेश नन्दन कुलश्रेष्ठ जी ने 1962 में ब्रह्माकुमारी संस्था से जुड़ने के बाद, सन् 1964 में मधुबन में बाबा से पहली मुलाकात की। इस अनुभव में उन्होंने बाबा के तन में प्रवेश करते हुए निराकार, सर्वशक्तिमान शिव

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Bk elizabeth didi africa anubhavgatha

ब्र.कु. एलिज़ाबेथ बहन का जीवन एक प्रेरणादायक सफर है। अफ्रीका में जन्म, नन बनने का अनुभव और फिर ब्रह्माकुमारी मार्ग पर चलते हुए नैरोबी और नाकरू सेवाकेन्द्र पर ईश्वरीय सेवा का विस्तार किया।

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तिनसुकिया, असम से ब्रह्माकुमारी ‘सत्यवती बहन जी’ लिखती हैं कि 1961 में मधुबन में पहली बार बाबा से मिलते ही उनका जीवन बदल गया। बाबा के शब्द “आ गयी मेरी मीठी, प्यारी बच्ची” ने सबकुछ बदल दिया। एक चोर का

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ब्रह्माकुमार विद्यासागर भाई जी, दिल्ली से, अपने प्रथम मिलन का अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि 1964 में माउण्ट आबू में साकार बाबा से मिलना उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। बाबा की गोद में जाते ही उन्होंने

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Bk mohindi didi madhuban anubhavgatha

मोहिनी बहन बताती हैं कि बाबा का व्यक्तित्व अत्यंत असाधारण और आकर्षणमय था। जब वे पहली बार बाबा से मिलने गईं, तो उन्होंने बाबा को एक असाधारण और ऊँचे व्यक्तित्व के रूप में देखा, जिनके चेहरे से ज्योति की आभा

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Dada chandrahas ji

चन्द्रहास, जिन्हें माधौ के नाम से भी जाना जाता था, का नाम प्यारे बाबा ने रखा। साकार मुरलियों में उनकी आवाज़ बापदादा से पहले सुनाई देती थी। ज्ञान-रत्नों को जमा करने का उन्हें विशेष शौक था। बचपन में कई कठिनाइयों

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शीला बहन जी, गुवाहाटी, असम से, मीठे मधुबन में बाबा से मिलकर गहरी स्नेह और अपनत्व का अनुभव करती हैं। बाबा ने उन्हें उनके नाम से पुकारा और गद्दी पर बिठाकर गोद में लिया, जिससे शीला बहन को अनूठी आत्मीयता

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Bk sister batul anubhavgatha

सिस्टर बतूल, एक भौतिकवादी सोच से आध्यात्म की ओर बढ़ीं। तेहरान की राजयोग शिक्षिका की प्रेरणादायक कहानी पढ़ें और जानें उनका ईश्वरीय अनुभव।

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