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Bk pushpal didi

बी के पुष्पाल दीदी – अनुभवगाथा

ब्रह्माकुमारी ‘पुष्पाल बहनजी’ अपने अलौकिक अनुभव ऐसे सुनाती हैं कि भारत विभाजन के बाद हम पाकिस्तान से दिल्ली आ गये। दिल्ली में आने के बाद मैं हर दीपावली को बीमार हो जाती थी। इस कारण दुःखी रहती थी और भगवान को कहती थी कि हे भगवान, मैंने कौनसा पाप किया है जो दीपावाली पर बीमार हो जाती हूँ। एक दिन मैंने भगवान के नाम पर पाँच पेज का पत्र लिखा और पोस्ट में डाल दिया। तीन दिन के बाद लौकिक चाची ने मुझे अपने घर पर बुलाया, पर जब मैं उनके घर गयी तो चाची जी घर पर नहीं थीं। मैंने पूछा, कहाँ गयी है? तो कहा गया कि वो सत्संग में गयी है। मैं उसके इन्तजार में बैठी रही। वह दोपहर दो बजे आयी तो मैंने आते ही सुना दिया कि मैं कब से बैठी हूँ। वह इतनी ख़ुशी में थी कि मेरे बोलने का उस पर कोई असर नहीं हो रहा था। मुझे महसूस हुआ कि इसको अजीब-सा सुख मिला है जो अपनी मस्ती में है। चाची ने मुझे कहा कि एक दिन तुम मेरे साथ आश्रम चलकर देखो। तुमने तो बहुत साधु-महात्माओं को देखा है, शास्त्र भी पढ़े हैं। लेकिन आबू से देवियाँ आयीं हैं उनको भी चलकर देखो। उन देवियों ने 14 साल तपस्या की है। चाची के इतना कहने के बाद मेरे मन में उत्सुकता हुई कि जाकर देखें।

पहले ही प्रश्न में फेल हो गयी

दूसरे दिन उनके साथ दिल्ली, कमला नगर आश्रम पर गयी। देखा कि एक छोटा-सा कमरा, उसमें तीन बहनें योग में बैठीं थीं। उनको देखते ही मन में बहुत खुशी हुई। क्योंकि उनके चेहरे की अलौकिक आभा से और वहाँ के शुद्ध तथा शान्त वातावरण से मन प्रफुल्लित हो गया। वहाँ जाने से पहले मन में था कि मैंने तो बहुत शास्त्र आदि पढ़े हैं, संस्कृत भी सीखी है, वे लोग मुझे क्या बतायेंगी। उनमें से एक बहन ने मेरे से प्रश्न पूछा कि क्या आप जानती हो कि आप कौन हो? मैंने कहा, हाँ, मैं जानती हूँ, मैं परमात्मा का अंश हूँ। बहन ने कहा, परमात्मा तो अजर, अमर, अविनाशी है। वह टुकड़ा हो नहीं सकता। आप परमात्मा का अंश नहीं हो परन्तु परमात्मा का वंश हो। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं पहले प्रश्न में ही फेल हो गयी। इसका अर्थ हुआ कि बहनें मेरे से ज़्यादा जानती हैं। फिर मैंने पूछा कि यह ज्ञान आपको किसने सुनाया? बहन ने कहा, यह ज्ञान हमें बाबा ने दिया। ‘बाबा’ शब्द सुनते ही ऐसा लगा कि यह मेरा ही बाबा है। बाबा शब्द मुझे बहुत ‘प्यारा और मीठा’ लगने लगा। क्योंकि मैं परमात्मा को बाप के रूप में याद करती थी। मैंने उनसे पूछा कि बाबा कहाँ रहते हैं? बहन ने कहा, आबू में। ‘बाबा’ और ‘आबू’ शब्दों ने ही मुझे बहुत आकर्षित किया। मैंने उनको बार-बार कहा, आप मुझे बाबा के पास ले चलोगी? लेकिन बहनों ने जवाब नहीं दिया। मैंने उनसे कहा कि आप वायदा करो। लेकिन तीनों बहनें मुस्कराने लगीं। मैं फिर दोहराने लगी तो मेरी चाची घबराने लगी कि पहले तो आश्रम पर आने को तैयार नहीं थी और अभी यहाँ से जाने को तैयार नहीं है। बार-बार बहनों से कह रही है कि मुझे आबू ले जाने के लिए वायदा करो। चाची ने मेरे से कहा, चलो घर चलते हैं। लेकिन मैंने फिर बहनों से पूछा, वहाँ जाने के लिए खास शर्तें हैं तो बताइये। तब बहनों ने कहा कि बाबा से मिलना है तो पवित्र जीवन बिताना पड़ेगा। मुझे यह बड़ी बात नहीं लगी क्योंकि भगवान के लिए सिर भी कट जाये तो कोई बड़ी बात नहीं। अगर सिर्फ पवित्र जीवन बिताने से भगवान मिलता है तो यह बहुत सस्ता सौदा है। मैंने उनसे वायदा किया कि मैं पवित्र रहूँगी। बहनों ने भी वायदा किया कि हम आपको आबू ले चलेंगी।

क्यों नहीं बच्ची, बाबा तो आप माताओं के लिए ही आया है

खुशी-खुशी से बाबा को पत्र लिखना शुरू किया। पहले पत्र में मैंने बाबा को लिखा कि “बाबा आपने इन बहनों को 14 साल अपने पास रखकर पालना की, तपस्या करायी। मैंने आपकी भक्ति की, पूजा, पाठ, व्रत, उपवास किये लेकिन आप मुझे नहीं मिले। अभी आपका परिचय मिला है, मैं आप से मिलना चाहती हूँ। आप ज़रूर अपने पास बुलाना।” लाल अक्षरों में बाबा का उत्तर आया कि “क्यों नहीं बच्ची, बाबा तो आप माताओं के लिए ही आया है, जब चाहो बाबा के पास आ जाना।” लेकिन परिवार बहुत बड़े खानदान का होने के कारण अकेली घर से आ नहीं सकती थी। सेन्टर पर जाकर बहनों को कहा कि मैं आबू अकेली जा नहीं सकती इसलिए सास को साथ में ले चलती हूँ। बहनों ने मना कर दिया क्योंकि सास ने ज्ञान नहीं समझा था। मैंने कहा, मेरे साथ घर का कोई-न-कोई व्यक्ति चाहिए, नहीं तो मैं बाबा के पास जा नहीं सकती इसलिए आप बाबा से पूछ लो। बाबा से छुट्टी मिली कि भले सास को साथ ले आओ। सन् 1955 में जब आबू पहुँची तो उस समय आश्रम धौलपुर हाउस में था। मैं तैयार होकर बाबा से मिलने गयी तो बाबा को देखते ही दिव्यता और अलौकिकता नज़र आयी। मुझे ऐसा लगा कि ऐसा दिव्य व्यक्तित्व दुनिया में कहीं है ही नहीं। ऐसा दिव्य रूप मैंने ज़िन्दगी में कभी देखा ही नहीं था। विचित्र रूहानी कशिश थी। मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि यह ऊपर से उतरकर आये हैं। इस दुनिया के नहीं हैं। साथ-साथ मैं बाबा को देखते-देखते किसी दूसरी दुनिया में चली गयी जहाँ आनन्द ही आनन्द था। मेरी तन्द्रा टूटी तो बाबा ने कहा कि यह कल्प पहले वाली बच्ची है, बाप को पहचाना है। मुझे भी यही अनुभव हुआ कि यही मेरा जन्म-जन्म का पिता है, जो मैं बहुत समय से बिछड़ गयी थी, अभी मेरा बाबा मुझे मिल गया। मैं इतनी मस्त हो गयी थी कि मुझे यह भी याद नहीं था कि मुझे वापस लौकिक घर जाना है। मैंने समझा कि अब मुझे यहीं रहना है। एक सप्ताह बीतने के बाद जाने की तैयारी होने लगी। मुझे आश्चर्य लगा कि जब बाप मिल गया तो वापस जाने की क्या दरकार है ? मैं बाबा के पास जाकर कहने लगी कि बाबा, मुझे कहीं नहीं जाना है। तब बाबा ने बड़े स्नेह से कहा, हाँ बच्ची, तुमको कहीं नहीं जाना है। तुम्हें यहीं रहना है। बाबा ने इतना कहा तो मैं शान्त हो गयी। जब मैं शान्त हो गयी तो बाबा ने कहा, बच्ची तुम्हें जाना नहीं है, तुम्हें तो सेवा करके अन्य आत्माओं को लाने जाना है। अगर यह बहनें सेवा पर नहीं जाती तो तुम यहाँ कैसे आती? इसलिए बाबा तुम्हें सेवा पर भेज रहा है। तुम जाकर सेवा करेंगी तो और बच्चे बाबा से मिलने आयेंगे। जब बाबा ने ऐसा कहा तो मैंने सेवा पर जाना स्वीकार कर लिया। हमने बैलगाड़ी पर सामान रखा और बाबा से विदाई ले पैदल बस स्टैण्ड गये। उस समय साधन कम थे लेकिन साधना बहुत थी। मधुबन में आते ही हरेक आत्मा अलौकिकता का अनुभव करती थी। मम्मा-बाबा के सामने आते ही हर आत्मा अलौकिक अनुभूतियों में डूब जाती थी, शरीर से परे हो जाती थी। दिल करता था कि सदा हम इसी अलौकिक दुनिया में रहें।

निश्चय की परीक्षा आरम्भ हो गयी

बाबा के मिलने से पहले ही मेरी पवित्र रहने की इच्छा हो रही थी। जब मधुबन में बाबा से मिलकर वापस घर आयी तो पति, पति के रूप में दिखायी नहीं पड़ता था। ऐसा लगता था कि आत्मा भाई है। इतनी आत्मिक दृष्टि पक्की हो गयी थी। लौकिक पति ने भी तीन वर्ष सहयोग दिया, हमारे जीवन में सुख-शान्ति रही। सभी कहते थे कि ईश्वरीय जीवन बड़ा कठिन है लेकिन मैं कहती थी कि यह बहुत सहज है। तीन वर्ष के बाद पति को लोगों ने भड़काया तो उसकी भावना भी बदल गयी और मुझे आश्रम जाने से रोकने लगा, तंग करना शुरू किया, उल्टा-सुल्टा बोलने लगा। मैं जब आश्रम जाने के लिए सुबह-सुबह तैयार होती थी तो बच्चियाँ (सुधा और रानी) भी तैयार हो जाती थीं। पति गुस्से से बोलता था कि तुम जाती हो और बच्चियों को भी ले जाती हो। इसलिए वह मुझे आश्रम जाने से रोकता था और कहता था कि सुबह चार बजे आश्रम नहीं जाया करो। तुम्हें रात भर सिर में दर्द रहता है और उल्टी होती है इसलिए तुम विश्राम करो। मुझे सिरदर्द कड़ी धूप में बाहर जाने की वजह से होता था क्योंकि लौकिक में कभी धूप में वा बस में जाने की आदत नहीं थी। इस कारण पति सुबह आश्रम जाने से मना करता था। मैं कहती थी कि ठीक है, मैं नहीं जाऊँगी, आप सो जाइये। जब वह सो जाता था तो मैं आश्रम चली जाती थी।

मैं विमान में बैठकर क्लास करने जाती थी

हमारा घर कमला नगर सेन्टर के नज़दीक था तो घर वालों ने सोचा कि यहाँ रहने से यह आश्रम जाना नहीं छोड़ेगी, घर बदली कर देंगे। उन्होंने शाहदरा में घर ले लिया। शाहदरा से कमला नगर दूर पड़ता था और उस समय सुबह-सुबह चार बजे बसें तो चलती नहीं थीं। लेकिन मैंने आश्रम जाना छोड़ा नहीं। मैं क्या करती थी, सुबह-सुबह सब्ज़ी के ठेले पर बैठकर सेन्टर पर जाया करती थी। ठेले वाले पूछते थे कि आप इस समय कहाँ जाती हो? कभी कहती थी कि गॉडली युनिवर्सिटी में जाती हूँ, कभी कहती थी कि सत्संग में जाती हूँ। एक बार मम्मा साउथ एक्सटेंशन में आयी थी और सुबह उनसे मिलने जाना था। रेलवे स्टेशन से बस पकड़नी थी। मैं चार बजे ठेले में बैठकर स्टेशन पर आयी तो वहाँ कमला नगर से जगदीश भाई और गुलज़ार बहन भी आये। शाहदरा से नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के बीच में जंगल पड़ता था। कोई मकान आदि भी नहीं थे। मैं सब्ज़ी के ठेले पर बैठ जाती थी। मुझे कोई डर नहीं था। बाबा की याद में मस्त रहकर निकल पड़ती थी। जब जगदीश भाई और गुलज़ार बहन ने मुझे उस दिन स्टेशन पर देखा तो पूछा कि तुम किस में आती हो? इस समय न कोई बस, न कोई टैक्सी मिलती है। मैंने हँसते हुए कहा कि बाबा मेरे लिए विमान भेजता है, उसमें आती हूँ। एक दिन बहुत बारिश पड़ रही थी। उस दिन मैं सुबह ठेले में बैठकर आ रही थी। जब ठेला जमुना का पुल पार कर रहा था, पुल के ऊपर से ट्रेन निकली और ट्रेन से कोयले मेरे ऊपर गिरे, शाल काली हो गयी। जब दिल्ली स्टेशन पर पहुंची तो जगदीश भाई ने देखा और कहने लगे कि तुम रोज़ विमान में आती हो, आज तुम्हारे विमान को क्या हुआ जो शाल काली हो गयी? तब मैंने सारी बात बतायी। ऐसे रोज़ मेरे साथ कोई-न-कोई घटना घटती थी।

बाबा न्यायनिधि भी और दयानिधि भी

मैंने सदा बाबा का बहुत प्यारा रूप ही देखा था। बाबा की दृष्टि सदा मेरे लिए रूहानी स्नेह की होती थी। परन्तु बाबा जितने लवफुल थे उतने ही लॉफुल भी थे। यह अनुभव मुझे एक बार हुआ। सन् 1963 की बात है। बड़ी दीदी कमला नगर में हर बुधवार को माताओं का क्लास कराती थी। मैं क्लास करके शाम को घर लौट जाती थी। मुझे पता पड़ा कि कल सुबह राजौरी गार्डेन में बाबा सभी से मिलेंगे। मुझे संकल्प आया कि अभी घर जाकर सुबह राजौरी गार्डेन जा नहीं सकूँगी। बाबा दिल्ली में आये और मैं बाबा से नहीं मिलूँ यह कैसे हो सकता है? मेरा मन था कि बाबा को देखकर जाऊं। दीदी का क्लास पूरा हुआ, सभी मातायें चली गयीं। मैं भी घर जाने के लिए रेलवे स्टेशन तक गयी। लेकिन मुझे संकल्प आया कि एक रात की ही तो बात है। आज रात आश्रम पर रुककर कल सुबह बाबा से मिलकर ही क्यों नहीं घर जाऊँ? फिर उसी बस में कमला नगर सेन्टर पर आ गयी। सेन्टर पर गयी तो रूक्मणी बहन ने कहा, तुम वापस आ गयी? मैंने कहा, आज रात यहीं रहूँगी और कल बाबा का क्लास करके जाऊँगी। रूक्मणी बहन ने कहा, अगर रात को तुम्हारा पति आया तो? मैंने कहा, आप कहना कि वह यहाँ से क्लास करके चली गयी। मैं रात को रूक्मणी बहन के बिस्तर पर सो गयी और अन्दर से दरवाज़ा बन्द कर दिया। थोड़े ही समय के बाद पति सेन्टर पर आया और पूछा, पुष्पाल कहाँ है? मुझे उसकी आवाज़ सुनायी पड़ी। उसको कहा गया कि वह यहाँ से चली गयी। पति को पता था कि बाबा आये हैं। वह उसी समय राजौरी गार्डेन सेन्टर पर गया और बहनों को कहा कि पुष्पाल अभी तक घर नहीं आयी है। यह कहकर वह चला गया। सुबह होते ही मैं, रुकमणी बहन और जगदीश भाई एक टैक्सी लेकर राजौरी गार्डेन गये। बाबा ऊपर वाले कमरे में ठहरे थे और आलराउण्डर दादी बाबा के पास थी और बाबा को कह रही थी कि रात को पुष्पाल का पति आया था, वह कह रहा था कि पुष्पाल घर पर नहीं पहुंची है, तो वह कहाँ गयी है? बाबा ने कहा, बच्ची, बाबा से मिलने यहाँ आ गयी होगी, देखो। और क्या वह बच्चा रात को 12 बजे तक भटकता रहा? तो वह रात को कहाँ रही होगी? मैं पीछे से सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। मैंने कहा, बाबा मैं यहाँ हूँ। रात को कमला नगर में थी। बाबा ने कहा, वहाँ होते हुए भी उस बच्चे को तुमने भटकाया? बेचारे को इतना तंग किया? उस समय बाबा के चेहरे पर उस बच्चे (लौकिक पति) के प्रति बेहद दया भावना स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ रही थी। बाबा एक क्षण गहरी शान्ति में चले गये। बाबा को मालूम था कि वह बच्ची को परेशान करता है, तो भी उसके प्रति बाबा का करुणा भाव उमड़ रहा था। बाबा ने कहा, तुमने बच्चे को रात भर भटका कर उसको परेशान क्यों किया? मैंने कहा, बाबा क्लास पूरा होते ही में यहाँ से चली जाऊँगी। बाबा ने अपने हाथ पीछे बाँधकर कहा, आज बाबा क्लास में जायेंगे ही नहीं। बाबा बैठ गये और कहा, तुमने उस बच्चे को परेशान किया है इसलिए बाबा क्लास में नहीं जायेंगे, पहले तुम घर जाओ। मुझ से भी रहा नहीं गया। मैंने जाकर बाबा का हाथ पकड़ा और कहा, बाबा दुनिया मुझे ठुकराती है, आप भी मुझे ठुकराते हैं? ठीक है, मैं जा रही हूँ। मेरे ये शब्द सुनते ही बाबा की आँखें भर आयीं परन्तु आँसू बाहर नहीं निकले। जब भी बाबा का प्यार उमड़ता था तब नयन भर आते थे। मैंने बाबा को कहा, मैं जाती हूँ। इतना कहकर, बाहर निकल गयी। तुरन्त बाबा ने जगदीश भाई और अन्य भाइयों को भेजा कि जाओ, बच्ची ने रात को कुछ खाया नहीं होगा, सुबह-सुबह इतनी सर्दी में आयी है, चाय भी नहीं पी होगी। उसको चाय पिलाकर भेजो। बाबा ने रूक्मणी बहन को कहा, वह रात को तुम्हारे पास थी इसलिए तुम उसको घर छोड़कर आओ। जब मैं गेट पर पहुँची तो कोई टोली लेकर, कोई चाय लेकर दौड़े आ रहे थे। मैंने कहा, मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं कुछ नहीं खाऊँगी। लेकिन रूक्मणी बहन साथ चल दी। मैंने उसे आने के लिए मना किया और कहा, यह मेरा विषय है, जो होगा मैं देखूँगी, तुम वापस जाओ, मैं अकेली जाऊँगी। जब मैं घर पहुँची तो सभी अपने जोश में बैठे हुए थे। कहने लगे कि आ गयी? चलो, आज तुम्हारा फैसला हो जाये। रोज़-रोज़ के झगड़े हमसे देखे नहीं जाते। मैंने भी कहा, चलो, फैसला हो जाये तो बहुत अच्छा है। पति मुझे लौकिक रिश्तेदारों के पास लेकर गया और बोला कि यह ब्रह्माकुमारियों के पंजे में आ गयी है और उन्होंने इसको भटका दिया है। पति बहुत बोलता रहा लेकिन मैं चुप रही, कुछ नहीं बोली। पति बार-बार कहने लगा कि ब्रह्माकुमारियों ने इसका दिमाग ख़राब कर दिया है। तो सभी ने फैसला किया कि इसके दिमाग (ब्रेन) का टेस्ट किया जाये।

दो बार ब्रेन-टेस्ट हुआ

सन् 1965 में मेरे दिमाग का टेस्ट रामतीर्थ हॉस्पिटल में कराया गया, उस समय पीठ से एक बोतल पानी निकाला गया जिस कारण मेरी पीठ कमज़ोर हो गयी। रिपोर्ट मिली कि इसका दिमाग ठीक है। आराम के बाद भी मैं बैठ नहीं सकती थी, खड़ी नहीं हो सकती थी। दिन-प्रतिदिन दर्द बढ़ता गया। उसी समय मम्मा अव्यक्त हुईं। आख़िर मेरी चाची ने कहा कि तुम मुंबई आ जाओ। मुंबई में डॉक्टर को दिखायेंगे। मैं जैसे-तैसे मुंबई पहुँच गयी। मेरी चाची का लड़का बहुत बद्धिमान था, वह समझ गया कि इसको क्लास में जाने नहीं दे रहे हैं, तंग कर रहे हैं इसलिए दिमाग में तनाव रहता है। तो वह रोज़ मुझे और चाची को सुबह टैक्सी में सेन्टर पर छोड़ आता था। 

मैं छह महीने मुंबई में रही। फिर उसने कहा कि एक बार ब्रेन का टेस्ट कराना चाहिए। वह एक पारसी डॉक्टर के पास ले गया। वह डॉक्टर मुझे देखकर अवाक् रह गया। वह सोचने लगा कि यह महिला इतने साधारण वस्त्रों में! वह कहने लगा कि हमारी किताबों में लिखा हुआ है कि जब महिलायें इतने साधारण वस्त्र पहनेंगी तब दुनिया बदलेगी। मैंने कहा, अब तो दुनिया बदलने वाली ही है। वह मेरी बात बहुत उत्सुकता से सुनने लगा। लेकिन दूसरा डॉक्टर उसको कहने लगा कि ब्रह्माकुमारियाँ भाई-बहन बनाती हैं, घर-बार छुड़ाती हैं और कई उल्टी बातें सुनाने लगा तो पारसी डॉक्टर ने उसकी बातें नहीं सुनीं और मेरे से कहा, मैं समझता हूँ कि आपका दिमाग खराब नहीं है। फिर भी आपके परिवार वालों को सर्टिफिकेट देना है इसलिए टेस्ट करना ज़रूरी है। मेरा टेस्ट पूरा हुआ और वह पारसी डॉक्टर फूल माला लेकर आया और मेरे गले में डालकर कहा, यू आर आल ओके, ब्रेन इज़ वेरी ओके (आप बिल्कुल ठीक है, आपका दिमाग बहुत अच्छा है)। इस प्रकार मैं मुंबई में एक साल रही, उसके बाद वापस दिल्ली आयी।

आख़िर लौकिक बन्धन टूट गया

आख़िर मेरे बन्धन टूटने का समय भी आ गया। मैंने दोनों बच्चियों को टिकट देकर ट्रेन में बिठा दिया और कहा कि स्टेशन से रिक्शा लेकर चन्द्रमणि दादी के पास आश्रम पर चले जाना। खाने-पीने के लिए कुछ नहीं दिया था। सिर्फ एक बैग में कपड़े डालकर भेज दिया था। दादी चन्द्रमणि को आश्चर्य लगा कि ये दिल्ली से अकेली आयी हैं। दो बेटों को भी अपनी लौकिक माँ के पास अमृतसर भेज दिया। बच्चों को भेजने के बाद मैं फ्री हो गयी और मुझे प्रबल संकल्प आने लगा कि यहाँ से जाऊं। मैंने पटना जाने की योजना बनायी। मैंने जगदीश भाई को कहा कि मेरे पटना जाने की टिकट बना दे। जगदीश भाई ने कहा, तुम स्टेशन पर आ जाना, मैं टिकट लेकर स्टेशन पर इन्तजार करूँगा। पता नहीं उस दिन पति घर से बाहर गया ही नहीं। इसलिए मैं घर से बाहर जा नहीं सकी। फिर दूसरे दिन जगदीश भाई को फोन किया कि कल ज़रूर टिकट करा देना, मैं ज़रूर आ जाऊँगी। दूसरे दिन मैं छोटी-सी अटैची लेकर दोपहर 12 बजे घर से निकल गयी। पति को पता पड़ा तो वह ढूँढ़ता हुआ मेरे पीछे आया। लेकिन गलियों में होती हुई, बस स्टैण्ड पर पहुँची। बस पकड़कर कमला नगर न जाकर, दूसरे सेन्टर पर गयी। उसी रात को पटना मेल में बैठकर पटना पहुँच गयी। उसी दिन से पति और घर वालों के बन्धन से मुक्ति मिल गयी। कुछ वर्षों के बाद बच्चे मुझे वापस आने के लिए ज़बरदस्ती करने लगे क्योंकि मकान, पैसे, ज़ेवर, लॉकर्स आदि सभी मेरे नाम पर ही थे। रिश्तेदारों ने समझा कि इसने सब कुछ ब्रह्माकुमारियों को दे दिया होगा। इसलिए बच्चे बार-बार मेरे पास आकर तंग करने लगे। एक बार बड़ा बेटा आया क्योंकि उसकी शादी थी। शादी में ज़ेवर चाहिएं थे। बेटा बड़ी दीदी के पास जाकर दीदी से पत्र लिखवाकर आया। उस समय मैं विराट नगर, नेपाल में थी। वह वहाँ आया और दीदी का पत्र दिखाया। बड़ी दीदी ने पत्र में लिखा था कि बच्चे की शादी है तो उसको कुछ ज़ेवर आदि दे दो। मैं बाबा के कमरे में गयी और बाबा से पूछा कि मैं जाऊँ या न जाऊँ। मुझे बाबा की टचिंग हुई कि मुझे जाना चाहिए। मैं बेटे के साथ दिल्ली आयी। मैं सेन्टर पर ठहरी, बच्चा घर गया। अगले दिन बेटे को लेकर बैंक गयी। मेरे लॉकर्स में जो कुछ था सब उसको दिखाया। वह देखकर हैरान हो गया क्योंकि हीरे, मोती, सोना, ज़ेवर सब उसमें थे। बेटे ने सुना था कि माँ ने सब कुछ ब्रह्माकुमारियों को दे दिया है। मैंने कहा, तुमको जो चाहिए, जितना चाहिए उठा लो। वह उठाने में संकोच करने लगा। थोड़े समय तक उसको समझ में नहीं आया कि क्या करे, क्या ले और कितना ले। फिर उसने आधा लिया और कहा कि हम दोनों भाइयों के लिए लिया है। मैंने कहा, ठीक है। फिर उसने एक क्षण सोचा और कहा, मम्मी आप तो तीन लोग हैं। फिर उसने जो लिया था उसमें से निकाल कर मेरे में डाल दिया। वह अपना लेकर चला गया। मकान भी लड़कों के नाम लिख दिया और काग़ज़ात भी उन्हें दे दिये। वे सब खुश हो गये। मैंने अपना हिस्सा जो मिला था उसको लेकर लॉकर्स खत्म करके हमेशा के लिए लौकिक सम्बन्ध और बन्धन दोनों तोड़ दिये और निश्चिन्त होकर बाबा की सेवा में व्यस्त हो गयी।

बाबा के अन्तिम दिनों की स्थिति का अनुभव

सन् 1968 में मैं बाबा से मिलने आयी। उस समय मुझे बाबा अलग दिखायी पड़ते थे। मुझे लगता था कि बाबा बदल गये हैं, पहले वाले बाबा नहीं हैं। एक दिन मैं और न्यूयार्क वाली मोहिनी बहन बाबा के कमरे में गये। बाबा एकदम मगन अवस्था में थे। पहले कभी बाबा के कमरे में जाते थे तो बाबा कहते थे, आओ, बच्चे आओ। उस दिन हम दोनों बहुत देर तक खड़ी रहीं परन्तु बाबा ने कुछ नहीं कहा। हमें महसूस हुआ कि बाबा का शिव बाबा के साथ बहुत गहरा कनेक्शन जुड़ा हुआ है। बहुत तल्लीन अवस्था में हैं इसलिए हम बाबा को डिस्टर्ब नहीं करेंगे। हम जाने की सोच ही रहे थे कि बाबा की नज़र हम पर पड़ी तो बाबा ने कहा, बच्ची आयी हो? इतना कहकर फिर शिव बाबा की याद में मगन हो गये। हमें लगा कि बाबा उपराम हो गये हैं। फिर एक दिन बाबा क्लास कराकर बाहर आ रहे थे और बाबा के साथ लच्छू बहन और ईशू बहन थी। उस समय मुझे एक अनोखा दृश्य दिखायी दिया। बाबा के पाँव धरती से बहुत ऊपर दिखायी पड़ रहे थे और इन दोनों बहनों के पाँव बहुत नीचे धरती पर दिखायी पड़े। मैं यह दृश्य बहुत ध्यान से देखने लगी और ऐसा लगा कि बाबा सम्पूर्ण फ़रिश्ता बन गये हैं। एकदम इस दुनिया से उपराम हो गये हैं। बाद में मैंने बहुत भाई-बहनों को भी बताया कि बाबा की अवस्था बहुत ऊँची हो गयी है, बाबा सम्पूर्ण फ़रिश्ता दिखायी दे रहे हैं। इस प्रकार बाबा के अन्तिम दिनों की स्थिति को भी मैंने देखा। यह मेरा सौभाग्य है।

मुख्यालय एवं नज़दीकी सेवाकेंद्र

अनुभवगाथा

Bk kamlesh didi odhisha anubhavgatha

कटक, उड़ीसा से ब्रह्माकुमारी ‘कमलेश बहन जी’ कहती हैं कि उन्हें ईश्वरीय ज्ञान 1962 में मिला और साकार बाबा से 1965 में मिलीं। बाबा ने उन्हें “विजयी भव” और “सेवा करते रहो” का वरदान दिया। बाबा के वरदानों ने कमलेश

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Dadi shantamani ji

ब्रह्मा बाबा के बाद यज्ञ में सबसे पहले समर्पित होने वाला लौकिक परिवार दादी शान्तामणि का था। उस समय आपकी आयु 13 वर्ष की थी। आपमें शुरू से ही शान्ति, धैर्य और गंभीरता के संस्कार थे। बाबा आपको ‘सचली कौड़ी’

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Didi manmohini anubhav gatha

दीदी, बाबा की ज्ञान-मुरली की मस्तानी थीं। ज्ञान सुनते-सुनते वे मस्त हो जाती थीं। बाबा ने जो भी कहा, उसको तुरन्त धारण कर अमल में लाती थीं। पवित्रता के कारण उनको बहुत सितम सहन करने पड़े।

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Experience with dadi prakashmani ji

आपका प्रकाश तो विश्व के चारों कोनों में फैला हुआ है। बाबा के अव्यक्त होने के पश्चात् 1969 से आपने जिस प्रकार यज्ञ की वृद्धि की, मातृ स्नेह से सबकी पालना की, यज्ञ का प्रशासन जिस कुशलता के साथ संभाला,

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Dadi pushpshanta ji

आपका लौकिक नाम गुड्डी मेहतानी था, बाबा से अलौकिक नाम मिला ‘पुष्पशान्ता’। बाबा आपको प्यार से गुड्डू कहते थे। आप सिन्ध के नामीगिरामी परिवार से थीं। आपने अनेक बंधनों का सामना कर, एक धक से सब कुछ त्याग कर स्वयं

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Bk sudhesh didi germany anubhavgatha

जर्मनी की ब्रह्माकुमारी सुदेश बहन जी ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि 1957 में दिल्ली के राजौरी गार्डन सेंटर से ज्ञान प्राप्त किया। उन्हें समाज सेवा का शौक था। एक दिन उनकी मौसी ने उन्हें ब्रह्माकुमारी आश्रम जाने

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Dadi rukmani ji anubhavgatha 2

रुकमणी दादी, वडाला की ब्रह्माकुमारी, 1937 में साकार बाबा से मिलीं। करांची से हैदराबाद जाकर अलौकिक ज्ञान पाया और सुबह दो बजे उठकर योग तपस्या शुरू की। बाबा के गीत और मुरली से परम आनंद मिला। उन्होंने त्याग और तपस्या

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Dadi sheelindra ji

आपका जैसा नाम वैसा ही गुण था। आप बाबा की फेवरेट सन्देशी थी। बाबा आपमें श्री लक्ष्मी, श्री नारायण की आत्मा का आह्वान करते थे। आपके द्वारा सतयुगी सृष्टि के अनेक राज खुले। आप बड़ी दीदी मनमोहिनी की लौकिक में

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Bk satyavati didi anubhavgatha

तिनसुकिया, असम से ब्रह्माकुमारी ‘सत्यवती बहन जी’ लिखती हैं कि 1961 में मधुबन में पहली बार बाबा से मिलते ही उनका जीवन बदल गया। बाबा के शब्द “आ गयी मेरी मीठी, प्यारी बच्ची” ने सबकुछ बदल दिया। एक चोर का

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Bk brijmohan bhai ji anubhavgatha

भारत में प्रथा है कि पहली तनख्वाह लोग अपने गुरु को भेजते हैं। मैंने भी पहली तनख्वाह का ड्राफ्ट बनाकर रजिस्ट्री करवाकर बाबा को भेज दिया। बाबा ने वह ड्राफ्ट वापस भेज दिया और मुझे कहा, किसके कहने से भेजा?

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Dadi situ ji anubhav gatha

हमारी पालना ब्रह्मा बाबा ने बचपन से ऐसी की जो मैं फलक से कह सकती हूँ कि ऐसी किसी राजकुमारी की भी पालना नहीं हुई होगी। एक बार बाबा ने हमको कहा, आप लोगों को अपने हाथ से नये जूते

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Bk jayanti didi anubhavgatha

लन्दन से ब्रह्माकुमारी ‘जयन्ती बहन जी’ बताती हैं कि सन् 1957 में पहली बार बाबा से मिलीं, तब उनकी आयु 8 वर्ष थी। बाबा ने मीठी दृष्टि से देखा। 1966 में दादी जानकी के साथ मधुबन आयीं, बाबा ने कहा,

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Bk aatmaprakash bhai ji anubhavgatha

मैं अपने को पद्मापद्म भाग्यशाली समझता हूँ कि विश्व की कोटों में कोऊ आत्माओं में मुझे भी सृष्टि के आदि पिता, साकार रचयिता, आदि देव, प्रजापिता ब्रह्मा के सानिध्य में रहने का परम श्रेष्ठ सुअवसर मिला।
सेवाओं में सब

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Dadi sandeshi ji

दादी सन्देशी, जिन्हें बाबा ने ‘रमणीक मोहिनी’ और ‘बिंद्रबाला’ कहा, ने सन्देश लाने की अलौकिक सेवा की। उनकी विशेषता थी सादगी, स्नेह, और ईश्वर के प्रति अटूट निष्ठा। उन्होंने कोलकाता, पटना, और भुवनेश्वर में सेवा करते हुए अनेकों को प्रेरित

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Dada anandkishore ji

दादा आनन्द किशोर, यज्ञ के आदि रत्नों में से एक, ने अपने अलौकिक जीवन में बाबा के निर्देशन में तपस्या और सेवा की। कोलकाता में हीरे-जवाहरात का व्यापार करने वाले दादा लक्ष्मण ने अपने परिवार सहित यज्ञ में समर्पण किया।

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