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27 Mar 1981
“बाप पसन्द, लोक पसन्द, मन पसन्द कैसे बनें?”
27 March 1981 · हिंदी
आज बापदादा विशेष किसलिए आये हैं? आज विशेष डबल विदेशी बच्चों से रूहरूहान करने के लिए आये हैं। लेन-देन करने के लिए आये हैं। दूर-दूर से सब बच्चे मधुबन में आये हैं तो मधुबन वाले बाप आये हुए बच्चों की खास ज्ञान के रूहरूहान की खातिरी करने आये हैं। आज बापदादा बच्चों से सुनने के लिए आये हैं कि किसी को भी किसी बात में कोई मुश्किल तो अनुभव नहीं होता। बाप और आपका मिलना भी सहज हो गया ना! जब मिलन सहज हुआ, परिचय सहज मिला, मार्ग सहज मिला, फिर भी कोई मुश्किल तो नहीं है! मुश्किल है नहीं लेकिन कोई ने मुश्किल बना तो नहीं दिया है? बाप द्वारा जो खजाना मिला है उनकी चाबी जब चाहो तब लगाओ, ऐसी विधि आ गई है? विधि है तो सिद्धि भी जरूर है। विधि में कमी है तो सिद्धि भी नहीं होती। क्या हाल-चाल है?
सब उड़ रहे हो? जब ऊंचे बाप के सिकीलधे बच्चे बन गये तो चलने की क्या जरूरत है! उड़ना ही है। रास्ते पर चलेंगे तो कहाँ बीच में रूकावट आ सकती है, लेकिन उड़ने में कोई रूकावट नहीं होती। सब उड़ते पंछी हैं। ज्ञान और योग के पंख सभी को अच्छी तरह से उड़ा रहे हैं। उड़ते-उड़ते थकावट तो नहीं होती? सबको ‘अथक भव' का वरदान मिल चुका है? बात भी बड़ी सहज ही है। अनुभव करना और अनुभव सुनाना। तो अनुभव सुनाना बहुत सहज होता है ना। अपनी ही बात सुनाते हो। इसलिए है ही बहुत सहज। सम्बन्धों की बातें सुनाना इसमें मुश्किल क्या है! दो बातें सिर्फ सुनानी है।
एक अपने परिवार की अर्थात् सम्बन्ध की बात और दूसरी प्राप्ति की बात। इसलिए बापदादा सदा बच्चों को हर्षित ही देखते हैं। कभी सारे दिन में एकरस स्थिति के बजाए और रस आकर्षित तो नहीं करते हैं? एक रस हो गये हो? नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप हो गये? अब तो गीता का युग समाप्त होना चाहिए। ज्ञान की प्रालब्ध में आ गये ना सभी! स्मृति स्वरूप होना - यह है ज्ञान की प्रालब्ध। तो अब पुरुषार्थ समाप्त हुआ। जो वर्णन करते हो स्व स्वरूप का, वह सर्वगुण सदा अनुभव में रहते हैं ना। जब चाहो आनन्द स्वरूप हो जाओ, जब चाहो तब प्रेम स्वरूप हो जाओ। जो स्वरूप चाहो, जितना समय चाहो उसी स्वरूप में स्थित हो सकते हो? यह भी नहीं, हुए पड़े हो ना? बाप के गुण वही बच्चों के गुण। जो बाप का कर्तव्य वह बच्चों का कर्तव्य। जो बाप की स्टेज वह बच्चों की स्टेज इसको कहा जाता है संगमयुगी प्रालब्ध। तो प्रालब्धी हो या पुरुषार्थी हो? प्राप्ति स्वरूप हो? प्राप्त करना है, होता नहीं है, कैसे होगा, यह भाषा बदल गई ना? आज धरनी पर कल आकाश में, ऐसे आते जाते तो नहीं हो ना? आज क्वेश्चन में कल फुलस्टाप में, ऐसे तो नहीं करते हो? एकरस अर्थात् एक ही सम्पन्न मूड में रहने वाला। मूड भी बदली न हो। बापदादा वतन से देखते हैं कई बच्चों के मूड बहुत बदलते हैं। कभी आश्चर्यवत् की मूड, कभी क्वेश्चन मार्क की मूड, कभी कनफ्यूज़ की मूड। कभी टेन्शन, कभी अटेन्शन का झूला तो नहीं झूलते? मधुबन से प्रालब्धी स्वरूप में जाना है। बार-बार पुरुषार्थ कहाँ तक करते रहेंगे। जो बाप वह बच्चा। बाप की मूड ऑफ होती है क्या! अभी तो बाप समान बनना है। मास्टर हैं ना। मास्टर तो बड़ा होना चाहिए। कम्पलेन्टस् सब खत्म हुई? वास्तव में बात होती है छोटी। लेकिन सोच-सोचकर छोटी बात को बड़ा कर देते हो। सोचने की खातिरी से वह बात छोटी से मोटी बन जाती है। सोचने की खातिरी नहीं करो। यह क्यों आया, यह क्यों हुआ। पेपर आया है तो उसको करना है। पेपर क्यों आया, यह क्वेश्चन होता है क्या? वेस्ट और बेस्ट सेकेण्ड में जज करो और सेकेण्ड में उसको समाप्त करो। वेस्ट है तो आधाकल्प के लिए वेस्ट पेपर बॉक्स में डाल दो। वेस्ट पेपर बाक्स बहुत बड़ा है। जज बनो, वकील नहीं बनो। वकील छोटे केस को भी लम्बा कर देते हैं। और जज सेकेण्ड में हाँ वा ना की जजमेंट कर देता है। वकील बनते हो तो काला कोट आ जाता है। है एक सेकेण्ड की जजमेंट, यह बाप का गुण है वा नहीं। नहीं है तो वेस्ट पेपर बॉक्स में डाल दो। अगर बाप का गुण है तो बेस्ट के खाते में जमा करो। बापदादा का सैम्पुल तो सामने है ना। कॉपी करना अर्थात् फॉलो करना। कोई नया मार्ग नहीं बनाना है। कोई नई नालेज इन्वेन्ट नहीं करनी है। बाप जो सुनाता है वह स्वरूप बनना है। सब विदेशी 100 प्रतिशत प्रालब्ध पा रहे हो? संगमयुगी प्रालब्ध है ‘बाप समान।' भविष्य प्रालब्ध है ‘देवता पद'। तो बाप समान बन बाप के साथ-साथ उसी स्टेज पर बैठने का कुछ समय तो अनुभव करेंगे ना। कोई भी राजा तख्त पर बैठते हैं, कुछ समय तो बैठेगा ना। ऐसे तो नहीं अभी-अभी बैठा और अभी-अभी उतरा। तो संगमयुग की प्रालब्ध है - बाप समान स्टेज अर्थात् सम्पन्न स्टेज के तख्तनशीन बनना। यह प्रालब्ध भी तो पानी है ना और बहुत समय पानी है। बहुत समय के संस्कार अभी भरने हैं। सम्पन्न जीवन है। सम्पन्न की सिर्फ कुछ घड़ियाँ नहीं हैं लेकिन जीवन है। फरिश्ता जीवन है, योगी जीवन है। सहज जीवन है। जीवन कुछ समय की होती है, अभी-अभी जन्मा, अभी-अभी गया - उसे जीवन नहीं कहेंगे। कहते हो पा लिया, तो क्या पा लिया? सिर्फ उतरना चढ़ना पा लिया? मेहनत पा लिया? प्रालब्ध को पा लिया? बाप समान जीवन को पा लिया? मेहनत कब तक करेंगे? आधाकल्प अनेक प्रकार की मेहनत की। गृहस्थ व्यवहार, भक्ति, समस्यायें, कितनी मेहनत की। संगमयुग तो है मुहब्बत का युग। मेहनत का युग नहीं, मिलन का युग है। शमा और परवाने के समाने का युग है। नाम मेहनत कहते हो लेकिन मेहनत है नहीं। बच्चा बनना मेहनत होती है क्या! वर्से में मिला है कि मेहनत में मिला है। बच्चा तो सिर का ताज होता है। घर का श्रृंगार होता है। बाप का बालक सो मालिक होता है। तो मालिक फिर नीचे क्यों आते? आपके नाम देखो कितने ऊंचे हैं? कितने श्रेष्ठ नाम हैं। तो नाम और काम एक है ना। सदा बाप के साथ श्रेष्ठ स्टेज पर रहो। असली स्थान तो वही है। अपना स्थान क्यों छोड़ते हो? असली स्थान को छोड़ना अर्थात् भिन्न-भिन्न बातों में भटकना। आराम से बैठो। नशे से बैठो। अधिकार से बैठो। नीचे आकर फिर कहते हो अब क्या करें। नीचे आते ही क्यों हो, जो फिर कोई बोझ अनुभव हो। बोझ अपने सिर पर नहीं रखो। जब मैं-पन आता है तो बोझ सिर पर आ जाता है। मैं क्या करूँ, कैसे करूँ, करना पड़ता है। क्या आप करते हो? वा सिर्फ नाम आपका है, काम बाप का रहता है? उस दिन खिलौना देखा - वह खुद चल रहा था या कोई चला रहा था। साइन्स चला सकती है, तो क्या बाप नहीं चला सकता? यह तो बाप बच्चों का नाम बाला करने के लिए निमित्त बना देते हैं क्योंकि बाप इस नाम रूप से न्यारा है। जब बाप आपको ऑफर कर रहे हैं कि बोझ बाप को दे दो, आप सिर्फ नाचो, उड़ो फिर बोझ क्यों उठाते हो? कैसे सर्विस होगी, कैसे भाषण करेंगे... यह तो क्वेश्चन ही नहीं। सिर्फ निमित्त समझ कनेक्शन पावर हाउस से जोड़कर बैठ जाओ। फिर देखो भाषण होता है वा नहीं! वह खिलौना चल सकता है, आपका मुख नहीं चल सकता! आपकी बुद्धि में प्लैन नहीं चल सकते। कैसे कहने से ही जैसे तार के ऊपर रबड़ आ जाता है। रबड़ आ जाने के कारण कनेक्शन जुटता नहीं और प्रत्यक्षफल नहीं दिखाई देता। इसलिए थक जाते हो - पता नहीं क्या होगा! बाप ने निमित्त बनाया है तो अवश्य होगा। अगर कोई स्थान पर हैं ही 6-8 तो दूसरे स्थान से निकालो। दिलशिकस्त क्यों होते हो, चक्कर लगाओ। आस-पास जाओ, चक्कर तो बहुत बड़ा है। कहाँ से 8 निकले, वह भी कम नहीं। फिर भी कोने में छिपे हुए को निकाला तो आपके कितने गुण गायेंगे। बाप के साथ निमित्त बनी हुई आत्मा को भी दिल से दुवायें तो देते हैं ना। कहाँ से एक रत्न भी निकला, एक के लिए भी जाना तो पड़ेगा ना। क्या उसको छोड़ देंगे! वह आत्मा वंचित रह जायेगी। जितने निकलें उतने निकालो, फिर आगे बढ़ो। अब तो विश्व के सिर्फ कोने तक पहुँचे हो। शिकार भी बहुत है, जंगल भी बहुत बड़ा है। सोचते क्यों हो? सोचने का कारण क्या होता? बुद्धि में व्यर्थ भर जाने के कारण टचिंग नहीं होती। परखने की शक्ति कार्य नहीं करती। जितना स्पष्ट होगा उतना जो जैसी चीज होगी, वह स्पष्ट दिखाई देगी। तो क्यों, क्या के कारण निर्णय शक्ति, टचिंग पावर कार्य नहीं करती। फिर थकावट होती है या दिलशिकस्त होते हैं। जहाँ भी गये हो वहाँ कोई न कोई छिपा हुआ रत्न निकला है तब तो पहुँचे हो ना। ऐसा तो कोई स्थान नहीं जहाँ से एक भी न निकला हो। कहाँ वारिस निकलेंगे, कहाँ प्रजा, कहाँ साहूकार, सब चाहिए ना। सब राजा तो नहीं बनेंगे। प्रजा भी चाहिए। प्रजा बनाने का यह कार्य निमित्त बने हुए बच्चों को ही करना है। या आप रॉयल फैमिली बनायेंगे बाबा प्रजा बनायेंगे? दोनों ही बनाना है ना। सिर्फ दो बातें देखो - एक लाइन क्लीयर है? दूसरा मर्यादाओं की लकीर के अन्दर हैं? अगर दोनों बातें ठीक हैं तो कभी भी दिलशिकस्त नहीं होंगे। जिसका कनेक्शन ठीक है चाहे बाप से चाहे निमित्त बनने वालों से, वह कभी भी असफल नहीं हो सकता। सिर्फ बाप से ही कनेक्शन हो वह भी करेक्ट नहीं। परिवार से भी चाहिए क्योंकि बाप से तो शक्ति मिलेगी लेकिन सम्बन्ध में किसके आना है? सिर्फ बाप से? राजधानी अर्थात् परिवार से सम्पर्क में आना है। तीन सर्टीफिकेट लेने हैं। सिर्फ एक नहीं।
एक बाप पसन्द अर्थात् बाप का सर्टीफिकेट। दूसरा लोक पसन्द अर्थात् दैवी परिवार से सन्तुष्टता का सर्टीफिकेट। तीसरा मन पसन्द, अपने मन में भी सन्तुष्टता हो। अपने आप से भी मूंझा हुआ न हो। पता नहीं कर सकूंगा, चल सकूंगा...। तो अपने मन पसन्द अर्थात् मन की सन्तुष्टता का सर्टीफिकेट। यह तीन सर्टीफिकेट चाहिए। त्रिमूर्ति हैं ना। तो यह त्रिमूर्ति सर्टीफिकेट चाहिए। दो से भी काम नहीं चलेगा। तीनों चाहिए। कोई समझते हैं हम अपने से सन्तुष्ट हैं, बाप भी सन्तुष्ट है, चल जायेगा। लेकिन नहीं। जब बाप सन्तुष्ट है, आप भी सन्तुष्ट हो तो परिवार सन्तुष्ट न हो, यह हो नहीं सकता। परिवार को सन्तुष्ट करने के लिए सिर्फ छोटी सी एक बात है। ‘रिगार्ड दो और रिगार्ड लो।' यह रिकार्ड दिन रात चलता रहे। रिगार्ड का रिकार्ड निरन्तर चलता रहे। कोई कैसा भी हो लेकिन आप दाता बन देते जाओ। रिटर्न दे वा न दे लेकिन आप देते जाओ, इसमें निष्काम बनो। मैंने इतना दिया। उसने तो कुछ दिया नहीं। हमने सौ बार दिया, उसने एक बार भी नहीं। इसमें निष्काम बनो तो परिवार स्वत: ही सन्तुष्ट होंगे। आज नहीं तो कल। आपका देना जमा होता जायेगा, वह जमा हुआ फल जरूर देगा। और बाप पसन्द बनने के लिए क्या चाहिए? बाप तो बड़े भोले हैं। बाप जिसको भी देखते हैं सब अच्छे ते अच्छे हैं। ‘अच्छा नहीं' है, ऐसा तो कोई नज़र ही नहीं आता। एक एक पाण्डव, एक एक शक्ति एक से एक आगे हैं। तो बाप पसन्द बनने के लिए ‘सच्ची दिल पर साहेब राजी।' जो भी हो सच्चाई, सत्यता बाप को जीत लेती है। और मन पसन्द बनने के लिए क्या चाहिए? मनमत पर नहीं चलना। मनपसन्द और चीज है। मन पसन्द बनने के लिए बहुत सहज साधन है श्रीमत की लकीर के अन्दर रहो। संकल्प करो तो भी श्रीमत की लकीर के अन्दर। बोलो, कर्म करो जो कुछ भी करो लकीर के अन्दर। तो सदा स्वयं से भी सन्तुष्ट और सर्व को भी सन्तुष्ट कर सकेंगे। संकल्प रूपी नाखून भी बाहर न हो।
बापदादा भी जानते हैं कि कितनी लगन है, कितना दृढ़ संकल्प है। सिर्फ बीच-बीच में थोड़े से नाजुक हो जाते हो। जब नाज़ुक बनते तो नखरे बहुत करते। प्यार ही इन्हों की टिकेट है तब पहुँचते हैं। प्यार न होता तो प्यार की टिकेट बिना यहाँ कैसे पहुंच सकते। यही टिकेट मधुबन निवासी बनाती। चारों ओर सेवा के लिए निमित्त बनाती। बापदादा ने आफरीन तो दी ना। जो वायदा करके गये वह निभाया। बाकी वृद्धि होती रहेगी। स्थापना तो कर ली ना। स्व उन्नति और सेवा की उन्नति - दोनों का बैलेन्स हो तो सदा वृद्धि होती रहेगी।
यह भी एक विशेषता देखी। बहुत समय के इन्डीपेन्डेन्ट रहने वाले, अपने को संगठित रूप में चला रहे हैं। यह भी बहुत अच्छा परिवर्तन है। एक एक अलग रहने वाले 4-6 इकट्ठे रहें और फिर संस्कार मिलाकर रहें - यह भी स्नेह का रिटर्न है। पाण्डव भवन, शक्ति भवन सफल रहे यह भी विशेषता है। बापदादा इस रिटर्न को देख हर्षित होते हैं। एकनामी, एकानामी यह भी रिटर्न है ना। अपना शरीर निर्वाह और सेवा का निर्वाह दोनों में हाफ-हाफ कर (आधा-आधा करके) चलाना - यह भी अच्छी इन्वेंशन निकाली है। डबल कार्य हो गया ना। कमाया और लगाया चाहे शरीर में चाहे सेवा में। लेकिन यहाँ कमाया और लगाया, यहाँ का बैंक बैलेन्स नहीं बनता लेकिन भविष्य जमा होता है। बुद्धि तो फ्री है ना? आया और लगाया, बेफिकर बादशाह। शक्तियों और पाण्डवों दोनों की रेस है। दीपक जगा और जगाने चल पड़ते। लक्ष्य बहुत अच्छा रखा है। भारत में हैण्ड्स निकालने की मेहनत करते और वहाँ बने बनाये हैण्ड्स सहज निकल आते हैं, यह भी वरदान है। पीछे आने वालों को यह लिफ्ट है। यहाँ वालों को बन्धन काँटने में टाइम लगता और इन्हों का बन्धन कटा कटाया है। तो लिफ्ट हो गई ना। सिर्फ मन का बन्धन नहीं हो। अच्छा।
टीचर्स के प्रति :- टीचर्स ने भी मेहनत की है। टीचर बनना अर्थात् सेवा के बन्धन में बांधना। लेकिन नाम सेवा है प्राप्ति बड़ी है क्योंकि पुण्य आत्मा बनते हो ना। टीचर का अर्थ ही है महापुण्य आत्मा बनना। पुण्य का फल तो भक्ति में भी मिलता है। और यहाँ प्रत्यक्ष फल मिलता है। जितनी सेवा करते उतना हुल्लास, हिम्मत, उमंग रहता। और ज्ञान के मुख्य राज अन्दर ही अन्दर स्पष्ट होते जाते। तो सेवाधारी बनना अर्थात् प्राप्ति स्वरूप बनना। इसलिए सब फॉलो करते हैं कि हम भी सेवाधारी बनें।
सिर्फ टीचर कहते हैं तो कभी टीचर का थोड़ा सा रोब भी आ जाता है, लेकिन हम मास्टर शिक्षक हैं। मास्टर कहने से बाप स्वत: याद आता है। बनाने वाले की याद आने से स्वयं स्वत: ही निमित्त हूँ यह स्मृति में आ जाता है। विशेष स्मृति यह रखो कि हम पुण्य आत्मा हैं। पुण्य का खाता जमा करना और कराना यह है विशेष सेवा। पाप का खाता रावण ने जमा कराया और पुण्य का खाता बाप निमित्त शिक्षकों के द्वारा कराते। तो पुण्य करना और कराना, पुण्य आत्मा कभी पाप का एक परसेन्ट, संकल्प मात्र भी नहीं कर सकती। पाप का संकल्प भी आया तो पुण्य आत्मा नहीं। मास्टर शिक्षक का अर्थ ही है पुण्य का खाता जमा करने और कराने वाले। शिक्षक को बापदादा विशेष समान फ्रैण्ड्स का रूप देखते। फ्रैण्ड्स तब बनते जब समानता होती, संस्कार मिलन होता। जो निमित्त बनते हैं उनके हर संकल्प में, बोल में, कर्म में बाप ही दिखाई दे। जो भी देखे तो उनके मुख से यही निकले कि यह तो बाप समान है। जो कहावत है बड़े तो बड़े छोटे सुभान अल्ला। यह कहावत प्रैक्टिकल अनुभव करायेंगे।
याद प्यार तो है ही। महिमा योग्य को सदा हर पल बाप द्वारा यादप्यार मिलता है। यह तो रीति-रसम के कारण देना पड़ता है। याद और प्यार के सिवाए आप सब बड़े कैसे हुए! इसी यादप्यार से ही बड़े हुए हो। यादप्यार ही मुख्य पालना है। इसी पालना के आधार पर मास्टर बन गये हो।
विदेशी बच्चों ने विशेष कौन सा नया प्लैन बनाया है? (प्लैन सुनाया) सभी ने चारों ओर कॉन्फ्रेंस रखी है। कान्फ्रेंस के कनेक्शन से वी.आई.पीज् से तो मिलना होगा ही, जाल डालने का तरीका अच्छा है। हरेक के शुद्ध संकल्प से आत्माओं को आकर्षण तो होती ही है। इसलिए चारों ओर के संकल्प और प्लैन चारों ओर नाम बाला करेंगे। जितना जल्दी विशेष आत्माओं को सम्पर्क में लायेंगे उतना ही जल्दी आवाज़ बुलन्द होगा। जब भारत में आवाज़ निकले तब समझो सेवा की समाप्ति होगी। एक तरफ आवाज़ बुलन्द होगा दूसरे तरफ हालतें खराब होंगी। दोनों का मेल होगा। इसलिए सहज ही अनुभव करेंगे कि हमने क्या किया, अब जल्दी जल्दी तैयारी करो। जैसे फारेन में विनाश के साधन बहुत बढ़िया बना रहे हैं ना। वैसे नाम बाला, आवाज़ बुलन्द करने के स्थापना के निमित्त भी आप अच्छे प्लैन बनाओ। अभी सन्देश मिलना रहा हुआ है। इसलिए विनाश का बुलन्द आवाज़ नहीं निकला है, वह भी बिचारे सोच में हैं क्या हो रहा है। स्थापना के कारण विनाश रूका हुआ है। जैसे विनाश की सामग्री सिर्फ बटन तक रही हुई है, इतनी तैयारी हो गई है, ऐसे स्थापना की तैयारी भी इतनी पावरफुल हो जाए। जो आवे सेकेण्ड में जो प्राप्ति चाहे वह कर ले। संकल्प का बटन दबाना पड़े बस। तब वह भी बटन दबेगा। तो इसकी भी तैयारी करनी पड़े। संकल्प इतने पावरफुल हों। सिर्फ एक बाप सदा संकल्प में हो तो सेवा भी स्वत: होती रहेगी। अभी अटेन्शन रखना पड़ता है लेकिन नेचुरल पावरफुल स्टेज बन जाए। तो ऐसे बटन तैयार हैं? टीचर्स क्या समझती हैं? अभी कॉन्फ्रेंस करना माना शस्त्र चलाना, और वह बटन दबाना। अभी तो आपको निमंत्रण देना पड़ता, स्टेज बनानी पड़ती और फिर स्वयं आयेंगे, अभी सुनने के लिए आते हैं फिर लेने के लिए आयेंगे। कुछ दे दो, माँगनी करेंगे, जरा भी दे दो। बटन दबाते जायेंगे और स्टैम्प लगती जायेगी, प्रजा साहूकार, पहली प्रजा, दूसरी प्रजा। तो अब यह करना पड़ेगा।