Search for a command to run...
31 Dec 1999
“नई सदी में अपने चलन और चेहरे से फरिश्ते स्वरूप को प्रत्यक्ष करो”
31 December 1999 · हिंदी
आज बापदादा अपने परमात्म पालना के अधिकारी बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं। कितने भाग्यवान हैं जो स्वयं परमात्मा की पालना में पल रहे हैं। दुनिया वाले कहते हैं कि हमें परम आत्मा पाल रहा है, लेकिन आप थोड़ी सी विशेष आत्मायें प्रैक्टिकल में पल रहे हो। परमात्म पालना है, परमात्म श्रीमत है, उसी श्रीमत से चल रहे हो, पल रहे हो। ऐसे अपने को विशेष आत्मायें अनुभव करते हो? अपनी महानता को जानते हो? वर्तमान समय तो ब्राह्मण आत्मायें महान हैं ही, और भविष्य में भी सर्व श्रेष्ठ महान हो। द्वापर में भी आपके जड़ चित्र इतने महान बनते हैं जो कोई भी चित्रों के आगे जायेगा तो नमन करेगा। इतनी आपकी महानता है जो आज दिन तक अगर किसी भी आत्मा को बनावटी देवता बना देते, लक्ष्मी-नारायण बनायेंगे, श्रीराम बनायेंगे, तो जब तक वह आत्मा देवता का पार्ट बजाता है, तो उस आत्मा को जानते हुए भी कि यह साधारण मनुष्य है, लेकिन जब देवता रूप का पार्ट बजाते हैं तो उस साधारण आत्मा को भी नमन करेंगे। तो आपके रूप की महानता तो है लेकिन नामधारी आत्माओं को भी महान समझते हैं। तो ऐसी महानता अनुभव करते हो? जानते हो, समझते हो वा इमर्ज रूप में अपने को अनुभव करते हो? क्योंकि मूल आधार ही है अनुभव करना।
बापदादा सभी बच्चों को अनुभवी मूर्त बनाते हैं। सिर्फ सुनने वा जानने वाले नहीं। अनुभव का तो हर एक के चेहरे से, चलन से पता पड़ जाता है। चाल से उसके हॉल का पता पड़ जाता है। तो सोचो हमारी चाल क्या है? ब्राह्मण चाल है? ब्राह्मण अर्थात् सदा सम्पन्न आत्मा। शक्तियों से भी सम्पन्न, गुणों से भी सम्पन्न... तो ऐसी चाल है? आपके चेहरे से दिखाई देता है कि यह साधारण होते हुए भी अलौकिक है? आप सबकी दृष्टि, वृत्ति, वायब्रेशन्स अलौकिक अनुभव करते हैं? जब लास्ट जन्म तक आपकी दिव्यता, महानता जड़ चित्रों से भी अनुभव करते हैं, तो वर्तमान समय चैतन्य श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा अनुभव होता है? जड़ चित्र तो आपके ही हैं ना!
अमृतवेले से लेकर हर चलन को चेक करो - हमारी दृष्टि अलौकिक है? चेहरे का पोज़ सदा हर्षित है? एकरस, अलौकिक है वा समय प्रति समय बदलता रहता है? सिर्फ योग में बैठने के समय वा कोई विशेष सेवा के समय अलौकिक स्मृति वा वृत्ति रहती है व साधारण कार्य करते हुए भी चेहरा और चलन विशेष रहता है? कोई भी आपको देखे - कामकाज में बहुत बिजी हो, कोई हलचल की बात भी सामने हो लेकिन आपको अलौकिक समझते हैं? तो चेक करो कि बोल-चाल, चेहरा साधारण कार्य में भी न्यारा और प्यारा अनुभव होता है? कोई भी समय अचानक कोई भी आत्मा आपके सामने आ जाए तो आपके वायब्रेशन से, बोल-चाल से यह समझेंगे कि यह अलौकिक फरिश्ते हैं? क्योंकि आज का दिन संगम का दिन है, पुराना जा रहा है, नया आ रहा है। तो क्या नवीनता विश्व के आगे दिखाई दे? अन्दर याद रहता है वा समझते हैं, वह बात अलग है लेकिन स्थापना के समय को सोचो - कितना समय स्थापना का बीत गया! बीते हुए समय के प्रमाण बाकी कितना समय थोड़ा रहा हुआ है? तो क्या अनुभव होना चाहिए? बापदादा जानते हैं कि बहुत अच्छे-अच्छे पुरुषार्थी, पुरुषार्थ भी कर रहे हैं, उड़ भी रहे हैं लेकिन बापदादा इस 21वीं सदी में नवीनता देखने चाहते हैं। सब अच्छे हो, विशेष भी हो, महान भी हो लेकिन बाप की प्रत्यक्षता का आधार है - साधारण कार्य में रहते हुए भी फरिश्ते की चाल और हाल हो। बापदादा यह नहीं देखने चाहते कि बात ऐसी थी, काम ऐसा था, सरकमस्टांश ऐसे थे, समस्या ऐसी थी, इसीलिए साधारणता आ गई। फरिश्ता स्वरूप अर्थात् स्मृति स्वरूप में हो, साकार रूप में हो। सिर्फ समझने तक नहीं, स्मृति तक नहीं, स्वरूप में हो। ऐसा परिवर्तन किसी समय भी, किसी हालत में भी अलौकिक स्वरूप अनुभव हो। ऐसे है या थोड़ा बदलता है? जैसी बात वैसा अपना स्वरूप नहीं बनाओ। बात आपको क्यों बदले, आप बात को बदलो। बोल आपको बदले या आप बोल को बदलो? परिवर्तन किसको कहा जाता है? प्रैक्टिकल लाइफ का सैम्पल किसको कहा जाता है? जैसा समय, जैसा सरकमस्टांश वैसे स्वरूप बने - यह तो साधारण लोगों का भी होता है। लेकिन फरिश्ता अर्थात् जो पुराने या साधारण हाल-चाल से भी परे हो।
अभी आपकी टॉपिक है ना - “समय की पुकार''। तो अभी समय की पुकार आप विशेष महान आत्माओं के प्रति यही है कि अभी फरिश्ता अर्थात् अलौकिक जीवन स्वरूप में दिखाई दे। क्या यह हो सकता है? टीचर्स बोलो, हो सकता है? कब होगा? हो सकता है तो बहुत अच्छी बात है ना, कब होगा? एक साल चाहिए, दो हजार पूरा हो जाए? जो समझते हैं कुछ समय तो चाहिए चलो एक साल नहीं, 6 मास, 6 मास नहीं तो 3 मास, चाहिए? इसमें हाथ नहीं उठाते। आपका स्लोगन क्या है? याद है? “अब नहीं तो कब नहीं''। यह स्लोगन किसका है? ब्राह्मणों का है या देवताओं का है? ब्राह्मणों का ही है ना! तो इस नई सदी में बापदादा यही देखने चाहते हैं कि कुछ भी हो जाए लेकिन अलौकिकता नहीं जाए। इसके लिए सिर्फ चार शब्दों का अटेन्शन रखना पड़े, वह क्या? वह बात नई नहीं है, पुरानी है, सिर्फ रिवाइज करा रहे हैं।
एक बात शुभचिंतक। दूसरा शुभचिंतन, तीसरा शुभ भावना, यह भावना नहीं कि यह बदले तो मैं बदलूं। उसके प्रति भी शुभ भावना, अपने प्रति भी शुभ भावना और 4- शुभ श्रेष्ठ स्मृति और स्वरूप। बस एक शुभ शब्द याद कर लो, इसमें 4 ही बातें आ जायेंगी। बस हमको सबमें शुभ शब्द स्मृति में रखना है। यह सुना तो बहुत बारी है। सुनाया भी बहुत बारी है। अब और स्वरूप में लाने का अटेन्शन रखना है। बापदादा जानते हैं कि बनना तो इन्हों को ही है। और जो आने वाले भी हैं वह साकार रूप में तो आप लोगों को ही देखते हैं।
आज वर्ष के अन्त का दिन है ना! तो बापदादा ने मैजॉरिटी बच्चों का वर्ष का पोतामेल देखा। क्या देखा होगा? मुख्य एक कारण देखा। बापदादा ने देखा कि मिटाने और समाने की शक्ति कम है। मिटाते भी हैं, उल्टा देखना, सुनना, सोचना, बीता हुआ भी मिटाते हैं लेकिन जैसे आप कहते हो ना कि एक है कॉन्सेस दूसरा है सब-कॉन्सेस। मिटाते हैं लेकिन मन की प्लेट कहो, स्लेट कहो, कागज कहो, कुछ भी कहो, पूरा नहीं मिटाते। क्यों नहीं मिटा सकते? उसका कारण है - समाने की शक्ति पावरफुल नहीं है। समय अनुसार समा भी लेते लेकिन फिर समय पर निकल आता। इसलिए जो चार शब्द बापदादा ने सुनाये, वह सदा नहीं चलते। अगर मानों मन की प्लेट वा कागज पूरा साफ नहीं हुआ, पूरा नहीं मिटा तो उस पर अगर बदले में आप और अच्छा लिखने भी चाहो तो स्पष्ट होगा? अर्थात् सर्व गुण, सर्व शक्तियां धारण करने चाहो तो सदा और फुल परसेन्ट में होगा? बिल्कुल क्लीन भी हो, क्लीयर भी हो तब यह शक्तियां सहज कार्य में लगा सकते हो। कारण यही है, मैजारिटी की स्लेट क्लीयर और क्लीन नहीं है। थोड़ा-थोड़ा भी बीती बातें या बीती चलन, व्यर्थ बातें वा व्यर्थ चाल-चलन सूक्ष्म रूप में समाई रहती हैं तो फिर समय पर साकार रूप में आ जाती हैं। तो समय अनुसार पहले चेक करो, अपने को चेक करना दूसरे को चेक करने नहीं लग जाना क्योंकि दूसरे को चेक करना सहज लगता है, अपने को चेक करना मुश्किल लगता है। तो चेक करना कि हमारे मन की प्लेट व्यर्थ से और बीती से बिल्कुल साफ है? सबसे सूक्ष्म रूप है - वायब्रेशन के रूप में रह जाता है। फरिश्ता अर्थात् बिल्कुल क्लीन और क्लीयर। समाने की शक्ति से निगेटिव को भी पॉजिटिव रूप में परिवर्तन कर समाओ। निगेटिव ही नहीं समा दो, पॉजिटिव में चेंज करके समाओ तब नई सदी में नवीनता आयेगी।
दूसरी बात बतायें क्या देखी? बतायें या भारी डोज़ है? जैसे बापदादा ने पहले कहा है कि कैसे भी करके मुझे अपने साथ परमधाम में ले ही जाना है, चाहे मार से चाहे प्यार से ले ही जाना है। अज्ञानियों को मार से और आप बच्चों को प्यार से। ऐसे ही बापदादा अभी भी कहते हैं कि कैसे भी करके दुनिया के आगे महान आत्माओं को फरिश्ते रूप में प्रत्यक्ष करना ही है। तो तैयार हो ना? बापदादा ने सुनाया ना - कैसे भी करके बनाना तो है ही। नहीं तो नई दुनिया कैसे आयेगी। अच्छा, दूसरी बात क्या देखी?
साल का अन्त है ना! देखो, बापदादा मैजारिटी शब्द कह रहा है, सर्व नहीं कह रहा है, मैजारिटी कह रहा है। तो दूसरी बात क्या देखी? क्योंकि कारण को निवारण करेंगे तब नव-निर्माण होगा। तो दूसरा कारण - अलबेलापन भिन्न-भिन्न रूप में देखा। कोई-कोई में बहुत रॉयल रूप का भी अलबेलापन देखा। एक शब्द अलबेलेपन का कारण - “सब चलता है''। क्योंकि साकार में तो हर एक के हर कर्म को कोई देख नहीं सकता है, साकार ब्रह्मा भी साकार में नहीं देख सके लेकिन अब अव्यक्त रूप में अगर चाहे तो किसी के भी हर कर्म को देख सकते हैं। जो गाया हुआ है कि परमात्मा की हजार आंखे हैं, लाखों आंखें हैं, लाखों कान हैं। वह अभी निराकार और अव्यक्त ब्रह्मा दोनों साथ-साथ देख सकते हैं। कितना भी कोई छिपाये, छिपाते भी रॉयल्टी से हैं, साधारण नहीं। तो अलबेलापन एक मोटा रूप है, एक महीन रूप है, शब्द दोनों में एक ही है “सब चलता है, देख लिया है क्या होता है! कुछ नहीं होता। अभी तो चल लो, फिर देखा जायेगा!'' यह अलबेलेपन के संकल्प हैं। बापदादा चाहे तो सभी को सुना भी सकते हैं लेकिन आप लोग कहते हो ना थोड़ी लाज़-पत रख दो। तो बापदादा भी लाज़ पत रख देते हैं लेकिन यह अलबेलापन पुरुषार्थ को तीव्र नहीं बना सकता। पास विद ऑनर नहीं बना सकता। जैसे स्वयं सोचते हैं ना “सब चलता है''। तो रिजल्ट में भी चल जायेंगे लेकिन उड़ेंगे नहीं। तो सुना क्या दो बातें देखी! परिवर्तन में किसी न किसी रूप से, हर एक में अलग-अलग रूप से अलबेलापन है। तो बापदादा उस समय मुस्कराते हैं, बच्चे कहते हैं देख लेंगे क्या होता है! तो बापदादा भी कहते हैं देख लेना क्या होता है! तो आज यह क्यों सुना रहे हैं? क्योंकि चाहो या नहीं चाहो, जबरदस्ती भी आपको बनाना तो है ही और आपको बनना तो पड़ेगा ही। आज थोड़ा सख्त सुना दिया है क्योंकि आप लोग प्लैन बना रहे हो, यह करेंगे, यह करेंगे... लेकिन कारण का निवारण नहीं होगा तो टैप्रेरी हो जायेगा, फिर कोई बात आयेगी तो कहेंगे बात ही ऐसी थी ना! कारण ही ऐसा था! मेरा हिसाब-किताब ही ऐसा है। इसलिए बनना ही पड़ेगा। मंजूर है ना! टीचर्स मंजूर है? फारेनर्स मंजूर है? बापदादा कहते हैं बनना ही पड़ेगा। फिर नई सदी में कहेंगे बन गये। ऐसा है ना - कम से कम समय लेना चाहिए। लेकिन बापदादा एक वर्ष दे देता है फिर तो सहज है ना। आराम से करो। आराम का अर्थ है, आ राम अर्थात् बाप को याद करके फिर करना। वह डनलप वाला आराम नहीं करना। बापदादा का आपसे ज्यादा प्यार है, या आपका बाप से ज्यादा प्यार है? किसका है? बाप का या आपका?
बापदादा को आप सबमें निश्चय है कि आप सभी बच्चे प्यार का रिटर्न अव्यक्त ब्रह्मा बाप समान अवश्य बनेंगे। बनेंगे ना! बापदादा छोड़ेगा नहीं! प्यार है ना! जिससे प्यार होता है उसका साथ नहीं छोड़ा जाता है। तो ब्रह्मा बाबा का आपमें बहुत प्यार है। इन्तजार करता रहता है, कब मेरे बच्चे आयें! तो समान तो बनेंगे ना!
ब्रह्मा बाप की एक रूहरिहान सुनाते हैं। अभी 18 जनवरी आने वाली है ना! तो ब्रह्मा बाप शिव बाप को कहते हैं कि आप बच्चों से डेट फिक्स कराओ, मैं कब तक इन्तजार करूँ? यह डेट फिक्स कराओ। तो शिव बाप क्या कहेंगे? मुस्कराते हैं। बापदादा फिर भी कहते हैं बच्चे ही डेट फिक्स करेंगे, बापदादा नहीं करेंगे। तो ब्रह्मा बाप बहुत याद करता है। तो डेट फिक्स करेंगे?
नये वर्ष में यह समान बनने का दृढ़ संकल्प करो। लक्ष्य रखो कि हमें फरिश्ता बनना ही है। अब पुरानी बातों को समाप्त करो। अपने अनादि और आदि संस्कारों को इमर्ज करो। स्मृति में रखो - चलते फिरते मैं बाप समान फरिश्ता हूँ, मेरा पुराने संस्कारों से, पुरानी बातों से कोई रिश्ता नहीं। समझा। इस परिवर्तन के संकल्प को पानी देते रहना। जैसे बीज को पानी भी चाहिए, धूप भी चाहिए तब फल निकलता है। तो इस संकल्प को, बीज को स्मृति का पानी और धूप देते रहना। बार-बार रिवाइज करो - मेरा बापदादा से वायदा क्या है! अच्छा। आज कौन सा ग्रुप है? (ज्युरिस्ट और कल्चरल)
ज्युरिस्ट:- आपस में मीटिंग की। अच्छा क्या नया प्लैन बनाया? वारिस कब निकालेंगे, उसकी डेट फिक्स की? यह अच्छी बात है कि वारिस भी निकालेंगे, माइक भी लायेंगे लेकिन माइक थोड़े-थोड़े आये हैं, फारेन वाले लाये थे। अभी और समीप आयेंगे। जो लाये थे वह समीप हैं? ऐसे तैयार हैं जो भाषण करें? आपके बदलें में वह परिचय दें, ऐसे तैयार हैं? (मार्जिन है) तो भारत उनसे आगे जाओ। इन्होंने तो लाये, चाहे सेकेण्ड नम्बर माइक हो या फर्स्ट हो, तो भारत वाले थोड़ी भी मार्जिन नहीं छोड़ो और लाओ। यह रेस है, रीस नहीं। रीस नहीं करना रेस भले करना। फारेन वालों ने हिम्मत तो रखी। उसमें कुछ-कुछ क्वालिटी अच्छी है जो आगे बढ़ सकती है। भारत की टीचर्स क्या करेंगी? कब माइक लायेंगी? भारत की टीचर्स ने वारिस या माइक लाया है? पाण्डवों ने लाया है? अन्दर तैयार कर रहे हैं? स्टेज पर आवें ना! माइक उसको कहा जाता है जिसका प्रभाव जनता के ऊपर पड़ जाए। जैसे आप लोग स्पीच करते हो, कुछ तो प्रभाव पड़ता है ना! पूरा नहीं पड़ता है कुछ तो पड़ता है। तो ऐसे माइक तैयार करो। बापदादा ने कहा समय अनुसार आप माइट बनेंगे, वह माइक बनेंगे। क्या लास्ट तक आप लोग ही भाषण करते रहेंगे? अपना परिचय आपेही देते रहेंगे? तो सामने लाओ। अगर तैयार हो तो बापदादा के सामने नहीं लेकिन दादियों के आगे लाओ। अच्छा।
तो बापदादा ज्युरिस्ट मीटिंग को कहते हैं कि जैसे आपने मीटिंग में प्लैन बनाया है, प्लैन तो सब अच्छे बनाये हैं, मुबारक हो। अभी जैसे प्रोग्राम की डेट फिक्स बताई, दो प्रोग्राम बना दिये, (एक जयपुर में ज्युरिस्ट कॉन्फ्रेन्स रखी है, दूसरी आबू में) अच्छा किया राजस्थान को उठाया है। ऐसे ही ऐसी मीटिंग करो जो वारिस या माइक की डेट फिक्स हो जाए। वकील और जज तो केस में फैसला करते हैं ना तो यह भी फैसला करो। ज्युरिस्ट मीटिंग वालों के नाम तो नोट हैं ना तो बापदादा उन्हों को खास विशेष लड्डू खिलायेंगे। बहुत ताकत वाले लड्डू दादी बनवाती है। (आज टीचर्स को खिलाया है) टीचर्स फिर तो माइक लायेंगी ना। लड्डू खाया है तो माइक तो आयेंगे ना।
कल्चरल विंग वाले हाथ उठाओ:- आप लोगों ने क्या प्लैन बनाया, क्या मीटिंग की? आप लोगों ने कलचरल का बनाया या कलचर का बनाया? (मीटिंग करना बाकी है) तो लड्डू भी बाकी है। जो भी वर्ग पहले वारिस या माइक लायेगा उनको 8-8 लड्डू खिलायेंगे। भण्डारा तो भरपूर है। (आप कहेंगे तो 16 भी खिला देंगे) बड़ी दादी है तो बड़ी दिल है। अच्छा है, यह वर्ग के प्रोग्राम भी अच्छे सेवा में समीप ला रहे हैं और सभी वर्ग अपनी-अपनी सेवा में अच्छे आगे बढ़ रहे हैं। और यह भी जो हर वर्ग वालों को चांस दिया है, वह भी अच्छा है। दिखाई तो देते हैं कौन-कौन हैं, कितने हैं! आये तो कम होंगे लेकिन यह वर्ग हैं, कुछ कर रहे हैं - यह तो पता पड़ता है।
अच्छा - आज का क्या प्रोग्राम है? मतलब 12 बजायेंगे, संगम पूरा करेंगे। यह 12 भले बजाना, लेकिन संगम का अन्त भी जल्दी लाना।
डबल विदेशी:- जैसे भारत हर टर्न में आता है, फारेन वाले भी कम नहीं हैं। हर टर्न में अपना अधिकार ले लेते हैं। अच्छा है, बापदादा सदा कहते हैं कि फारेनर्स इस जन्म के फारेनर्स हैं लेकिन अनेक जन्म के ब्राह्मण परिवार के हैं। अगर आप लोग विदेशी नहीं बनते तो विदेश के भिन्न-भिन्न देशों की सेवा कैसे होती! अगर आप विदेश के रूप में नहीं आते तो बापदादा को सब देशों की भाषा के यहाँ क्लास रखने पड़ते, तैयार करने पड़ते। तो आप लोग जो भिन्न-भिन्न देश में गये हो, वह सेवा के प्रति गये हो। समझा। ओरीज्नल आप ब्राह्मण आत्मायें हो, विदेशी आत्मायें नहीं हो। भिन्न-भिन्न विश्व की सेवा के लिए गये हो, देखो भारत में भी हर भाषा के बच्चे आये हैं और सेवा कर रहे हैं, नहीं तो पहले एक ही सिन्ध का ग्रुप था। फिर धीरे-धीरे भिन्न-भिन्न ग्रुप चाहे भारत के, चाहे विदेश के आते रहे और बढ़ते रहे, यह भी ड्रामा में बना हुआ खेल है। वैसे भी पहले जड़ में थोड़े होते हैं फिर धीरे-धीरे तना और शाखायें निकलती हैं। वह फाउण्डेशन बना - निमित्त सिन्ध देश का, फिर धीरे-धीरे वृक्ष बढ़ता गया। भाषायें और देश की शाखायें, आप शाखाओं में नहीं हो, आप तो बापदादा के साथ हो।
(दिल्ली ग्रुप सेवा में आया है):- दिल्ली वाले हाथ उठाओ। सेवा की सेवा और वैरायटी मेवा भी खाया ना! सेवा का मेवा अवश्य मिलता है। जो भी सेवा में आते हैं उनको सबसे अच्छा चांस क्या मिलता है, मालूम है? इतने बड़े परिवार की सेवा करते हैं तो सबसे पहले बापदादा की दुआयें हैं ही लेकिन इतने सारे परिवार के आत्माओं की दुआयें मिलती हैं और यह दुआयें बहुत काम में आती हैं। इस समय तो साधारण लगता है लेकिन दुआओं का खजाना समय पर बहुत बल देता है। अच्छा - आप लोगों ने नये वर्ष में बहुत कार्ड भेजे हैं ना। बापदादा ने देख लिया, कार्ड हैं, पत्र भी हैं। तो आप लोग सभी नये वर्ष में सिर्फ कार्ड देकर हैपी न्यु इयर नहीं करना लेकिन कार्ड के साथ हर एक आत्मा को दिल से रिगॉर्ड देना। रिगॉर्ड का कार्ड देना और एक दो को सौगात में छोटी मोटी कोई भी चीज़ें तो देते ही हो, वह भी भले दो लेकिन उसके साथ-साथ दुआयें देना और दुआयें लेना। कोई नहीं भी दे तो आप लेना। अपने वायब्रेशन से उसकी बद-दुआ को भी दुआ में बदल लेना। तो रिगार्ड देना और दुआयें देना और लेना - यह है नये वर्ष की गिफ्ट। शुभ भावना द्वारा आप दुआ ले लेना। अच्छा।
देश-विदेश के बच्चे साकार में भी बैठे हैं लेकिन आकारी रूप में भी मधुबन में हाजिर हैं। तो ऐसे चारों ओर के हाज़िर होने वाले बच्चों को हज़ूर भी जी हाज़िर की यादप्यार दे रहे हैं। अच्छी हिम्मत से, मेहनत से कोई जागते भी हैं, कोई किस समय बैठते, कोई किस समय बैठते, इसलिए एक-एक बच्चे को नाम सहित पदमगुणा मुबारक भी है और विदाई और बधाई के संगम की मुबारक भी है, ग्रीटिंग्स हैं। जिन्होंने भी कार्ड भेजे हैं, यादप्यार भेजे हैं, उन सभी देश विदेश के बच्चों को बापदादा दिलाराम दिल से रिटर्न यादप्यार दे रहे हैं। सदा आगे उड़ते रहो।
(जो देश विदेश में इन्टरनेट पर मुरली भेजते हैं, बापदादा ने उन्हें सामने बुलाया)
आप लोगों को सब तरफ से जिन्हों को भी पहुँच रहा है, उन सब आत्माओं की तरफ से और बापदादा की तरफ से बहुत-बहुत मुबारक हो, मुबारक हो। यह तो बहुत अच्छा कर रहे हो, बाकी एक बात करनी है। करने के लिए तैयार हो? यह जो किया है उसकी मुबारक दी, अभी ऐसी अच्छी-अच्छी आत्मायें तैयार करो जो कम खर्चा बालानशीन हो। बापदादा के पास रिजल्ट आई, बहुत खर्चा है। तो जैसे आपने यह पुरुषार्थ किया तो सफलता मिली है ना तो अभी लक्ष्य रखो बापदादा फ्री नहीं कहता है, कम खर्चा बालानशीन। ऐसे कोई तैयार करो जो सहयोगी बनें। बन सकते हैं? अच्छा - अभी देखेंगे। काम तो बहुत अच्छा दुआओं का है। बहुत सभी दुआयें देते हैं, अभी सिर्फ एडीशन करो, कम खर्चा। थोड़ा-थोड़ा कम कराते जाओ। इन्वेन्शन करते जाओ, बापदादा के पास यह रिपोर्ट आवे कि कम खर्चा बालानशीन है। भारत में करो, विदेश में करो, कहाँ से भी करो लेकिन यह लक्ष्य रखो, लक्ष्य से सब हो जाता है और होना ही है। यह साइंस बनी ही आप लोगों के लिए है। देखो स्थापना के 100 वर्ष पहले से ही यह सब धीरे-धीरे निकला है। तो किसके लिए निकला? सुख तो ब्राह्मणों को ही मिलना है ना! तो बहुत अच्छा, जब टोली बांटें तो आप लेना, अभी टोली खाना फिर कम खर्च बालानशीन होगा तो लड्डू मिलेंगे। बहुत अच्छा।
चारों ओर की महान आत्माओं को सदा परिवर्तन शक्ति को हर समय कार्य में लगाने वाले, विश्व परिवर्तक आत्माओं को सदा दृढ़ निश्चय से प्रत्यक्ष स्वरूप दिखाने वाले ब्राह्मण सो फरिश्ते आत्माओं को सदा एक बाप दूसरा न कोई, बाप समान बनने वालों को बापदादा के प्यार का रिटर्न देने वाली महावीर आत्माओं को, बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
पहली जनवरी 2000 प्रात: (रात्रि 12 बजे के बाद) बापदादा ने सभी बच्चों को नये वर्ष, नई सदी की मुबारक दी
सभी ने न्यु ईयर मनाया। चारों ओर के बच्चों को नये वर्ष, नये युग की, नये जीवन की मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। इस नये वर्ष में ब्रह्मा बाप के द्वारा उच्चारे हुए महावाक्य सदा याद रखना - निराकारी, निरंहकारी साथ में नव निर्माणधारी। सदा निर्मान और निर्माण के कर्तव्य का बैलेन्स रखते उड़ते रहना। इस वर्ष में विशेष स्व परिवर्तन की विशेषता को सामने रखते हुए उड़ते और उड़ाते रहना। सदा ब्रह्मा बाप को हर कदम में फॉलो फादर करते रहना। तो मुबारक हो, मुबारक हो। पदमगुणा मुबारक हो।
(दिल्ली में एकेडमी बनाने के लिए जमीन ली गई है, बापदादा को समाचार सुनाया)
आप सबको मालूम है कि बेहद के सेवा की सौगात दिल्ली को मिली है। इसमें सदा बेहद के प्लैन बनते चारों ओर सन्देश मिलते जायेंगे और सर्व का सहयोग है क्योंकि सर्व की राजधानी बनने वाली है। तो बीज डालने से फल मिलता है। अभी बीज डालेंगे तो वहाँ भविष्य में रिटर्न पदमगुणा होकर मिलना ही है। तो प्लैन भी ऐसे बनाओ, सिस्टम भी ऐसे बनाओ जो बेहद की फीलिंग आवे। कोई छोटा सा सेन्टर है यह नहीं। फलाने का है, फलानी का है यह नहीं, सबका है। और बेहद की सिस्टम से बेहद की स्थापना करते चलो, एक एक्जैम्पल बनें। नाम दिल्ली का है लेकिन सब समझें कि हमारा है। जैसे बापदादा को सब समझते हैं हमारे हैं, दादियों को सब समझते हैं हमारी दादियां हैं, ऐसे यह सेवा हमारी सेवा है, इस बेहद रूप से, नवीनता के रूप से स्थान चलाकर दिखाना। दिल्ली वालों को यह बेहद की सौगात मिली है। देश-विदेश के बीज से यह वरदान मिला है। तो हर एक समझे कि बेहद का स्थान है और इससे ही बेहद को सन्देश मिलेगा। अच्छा है नये वर्ष में यह फाइनल करके आप लोगों को सौगात मिल गई। मिली है ना सौगात! (नाम क्या रखें?) पहले सजाओ तो सही। मकान बनाओ फिर नाम पड़ेगा। लेकिन सदा बाबा और बाबा का बेहद का स्थान। सदा मन, वाणी और कर्म - जिससे भी सहयोग दे सको वह देते रहो। एक एक्जैम्पुल हो, नवीनता हो। तो आपस में राय करके ऐसा प्लैन बनाओ। अच्छा - सभी को गुडनाइट भी हो गई, गुडमार्निंग भी हो गई।
(श्रीलंका गवर्मेन्ट ने 10 एकड़ जमीन सेवा के लिए दिया है। ग्लोबल हाउस के पास भी जमीन मिल गई है)
आप लोग सुन रहे हैं, तो यह नहीं समझो दिल्ली को मिली, लण्डन को मिली, श्रीलंका को मिली, नहीं। आप सबको मिली। आप सबका है। राजस्थान को भी मिलनी है। तो सभी को कितने स्थान मिल रहे हैं। आपके हैं ना। तो नये वर्ष की बहुत-बहुत सौगातें सेवा प्रति मिली हैं। अभी सभी खूब तालियां बजाओ। अभी ऐसी कोशिश करो जो दिल्ली को और जमीन फ्री मिले, फिर ज्यादा तालियां बजाना। (सभी ने खूब ज़ोर की तालियां बजाई) ऐसी तालियां बजाते हो इससे सिद्ध है मिलेगी। अच्छा - तालियां तो बहुत जल्दी बजा दी, अभी एक सेकेण्ड में फरिश्ता बन सकते हो? तो अभी फरिश्ता बन जाओ। अच्छा।
ज़ोन वाइज़ सेवाधारियों के ग्रुप से
1- गुजरात:- निर्विघ्न गुजरात? टीचर्स भी सभी हिम्मत वाली हैं। जब बुलाओ तब गुजरात “जी हाजिर'' का पाठ पढ़ता है। हाँ जी, हाँ जी करने वालों को अनेक जन्म सभी सामने से हाँ जी, हाँ जी करेंगे। अच्छा है। देखो पहला चांस गुजरात को सेवा का मिला है। दादियों की हुज्जत है, बुलाओ और हाजिर।
2- यू.पी.:- सेवाधारियों को कितने फायदे हैं। सदा गाया हुआ है, ब्राह्मणों की सेवा महान पुण्य है। भक्ति मार्ग में 100 या 200 ब्राह्मणों की सेवा करते हैं और मधुबन में कितने ब्राह्मणों की सेवा करते हो और एक-एक ब्राह्मण की दुआ सेवाधारियों को स्वत: ही मिलती है। कहने की आवश्यकता नहीं है लेकिन जमा हो ही जाती है एक तो दुआओं का खाता जमा होता, दूसरा सेवा के पुण्य का खाता जमा होता, तीसरा ब्राह्मणों के समीप सम्बन्ध में आते हैं और बापदादा से मिलने का एक्स्ट्रा टर्न मिल जाता है। तो सेवा का फल कितना है! सेवाधारी अर्थात् जमा करने वाले। तो बहुत अच्छी सेवा की। दिल से सेवा की और दिलाराम के पास पहुँच गई। तो जो भी सेवाधारी बनकर आता है उसको प्रत्यक्ष फल मिलता है। भविष्य तो मिलेगा लेकिन वर्तमान समय में भी जमा होता है।
3- बॉम्बे:- यह सेवा का चांस अच्छा लगता है? इसी बहाने से सेवा से ब्राह्मणों की पहचान मिलती है। ब्राह्मण परिवार में परिचय हो जाता है और बेहद में आने का चांस है। सेवा का बल भी कम नहीं है। देखो जो भी पुराने, जिसको दादियां कहते हो, इन्हों में एक्स्ट्रा बल है। किसका बल है? सेवा का। स्थापना में सेवा की है। आप सब जो यहाँ बैठे हो वह आदि में, इन्हों की मेहनत, सहनशक्ति, त्याग वृत्ति, इन्हों का फल आप हो। इन्हों को बल मिला आपको फल मिला। सभी की हिस्ट्रियां तो सुनी हैं ना। क्या नहीं त्याग किया! आप तो बने बनाये आधार पर आ गये हो। मक्खन इन्होंने निकाला आप खाने पर आ गये। अच्छा लगता है ना। आदि के पाण्डव भी हैं, उन्होंने भी त्याग किया है। अभी भी देखो जहाँ भी प्रोग्राम होता है, अभी तक भी कहते कोई दादियां आ जाएं। तो दादियों का त्याग का भाग्य तो है ना। त्याग की हिस्ट्रियां तो, कहानियां तो बहुत हैं ना। अभी भी सेवाधारी सेवा चारों ओर करने वाले बहुत हैं, यह आदि हैं और आप अभी के सेवाधारी भी अच्छे अच्छे हैं। कितने-कितने सेन्टर्स खोले हैं? बापदादा तो एक-एक की महिमा करना शुरू करे तो कितनी रातें लग जाएं! और एक एक की महिमा है, हर एक की विशेषता है और रहेगी।
4- दिल्ली:- सेवा की सेवा और वैरायटी मेवा भी खाया ना! सेवा का मेवा अवश्य मिलता है। जो भी सेवा में आते हैं उनको सबसे अच्छा चांस क्या मिलता है, मालूम है? इतने बड़े परिवार की सेवा करते हैं तो सबसे पहले बापदादा की दुआयें हैं ही लेकिन इतने सारे परिवार के आत्माओं की दुआयें मिलती हैं और यह दुआयें बहुत काम में आती हैं। इस समय तो साधारण लगता है लेकिन दुआओं का खजाना समय पर बहुत बल देता है।
5- राजस्थान:- बहुत अच्छा सेवा का चांस राजस्थान को मिला। राजस्थान का जैसे नाम है राजस्थान, तो राजस्थान से राजे क्वालिटी वाले निकालो। प्रजा नहीं, राज-घराने के राजे निकालो। तब जैसा नाम है राजस्थान, वैसे ही जैसा नाम वैसे सेवा की क्वालिटी निकलेगी। हैं कोई छिपे हुए राजे लोग या अभी बादलों में हैं? वैसे जो बिजनेसमैन हैं उन्हों की सेवा पर विशेष अटेन्शन दो। यह मिनिस्टर और पोट्री तो बदलते ही रहते हैं लेकिन बिजनेसमैन बाप से भी बिजनेस करने में आगे बढ़ सकते हैं। और बिजनेसमैन की सेवा करने से उनकी परिवार की मातायें भी सहज आ सकती हैं। अकेली मातायें नहीं चल सकती हैं लेकिन अगर घर का स्तम्भ आ जाता है तो परिवार आपेही धीरे-धीरे बढ़ता जाता है इसलिए राजस्थान को राजे क्वालिटी निकालनी है। ऐसे कोई नहीं हैं, ऐसा नहीं कहो। थोड़ा ढूंढना पड़ेगा लेकिन हैं। थोड़ा सा उन्हों के पीछे समय देना पड़ता है। बिजी रहते हैं ना! कोई ऐसी विधि बनानी पड़ती जो वह नजदीक आवें। बाकी अच्छा है, सेवा का चांस लिया, हर एक ज़ोन लेता है यह बहुत अच्छा नजदीक आने और दुआयें लेने का साधन है। चाहे आप लोगों को सब देखें या नहीं देखें, जानें या नहीं जाने, लेकिन जितनी अच्छी सेवा होती है तो दुआयें स्वत: निकलती हैं और वह दुआयें पहुँचती बहुत जल्दी हैं। दिल की दुआयें हैं ना! तो दिल में जल्दी पहुँचती हैं। बापदादा तो कहते हैं सबसे सहज पुरुषार्थ है दुआयें दो और दुआयें लो। दुआओं से जब खाता भर जायेगा तो भरपूर खाते में माया भी डिस्टर्ब नहीं करेगी। जमा का बल मिलता है। राजी रहो और सर्व को राजी करो। हर एक के स्वभाव का राज़ जानकर राजी करो। ऐसे नहीं कहो यह तो है ही नाराज़। आप स्वयं राज़ को जान जाओ, उसकी नब्ज को जान जाओ फिर दुआ की दवा दो। तो सहज हो जायेगा। तो सहज पुरुषार्थ करो, दुआयें देते जाओ। लेने का संकल्प नहीं करो, देते जाओ तो मिलता जायेगा। देना ही लेना है। दाता के बच्चे हैं ना! कोई दे तो दें। नहीं, दाता बनके देते जाओ तो आपेही मिलेगा। अच्छा।
6- महाराष्ट्र:- महाराष्ट्र में सेवा की वृद्धि अच्छी हो रही है। तो महाराष्ट्र 9 लाख जल्दी बना सकेगा। 9 लाख बनाने में नम्बरवन लेंगे ना! अच्छा है। आप सबको भी खुशी होती है ना! अगर आपके परिवार में वृद्धि होती है तो खुश होते हो ना! और सब यही चाहते हैं कि जल्दी-जल्दी वृद्धि हो जाए। तो महाराष्ट्र वृद्धि कर रहा है और सभी ज़ोन भी ऐसे वृद्धि कर जल्दी-जल्दी सम्पन्न बन, सम्पूर्ण बन बाप के साथ चल सकेंगे। साथ चलना है, यह भूलना नहीं। बापदादा ने पहले भी कहा है कि प्यार से नहीं चलेंगे तो जबरदस्ती भी ले चलेंगे। साथ नहीं चलेंगे तो पीछे-पीछे भी लेके चलेंगे। लेकिन मजा नहीं होगा। अच्छा।
7- पंजाब:- सेवा का यह चांस बेहद की कारोबार सिखाता है। सतयुग में राजधानी सम्भालेंगे तो सम्भालने का अभ्यास तो यहाँ ही डालना है ना। तो हर एक ज़ोन को यह अच्छा चांस मिलता है। ब्राह्मणों को सेवा से सन्तुष्ट करने का और सन्तुष्टता से दुआयें जमा करने का। तो अनुभव किया पंजाब वालों ने? सम्भालने का अनुभव होता जाता है ना! बेहद का सम्भालना। सेन्टर पर तो हद का हो जाता है ना। बेहद का राज्य सम्भालना है, उसके संस्कार भरते जाते हैं। सेवा के साथ-साथ राज्य चलाने की ट्रेनिंग भी मिलती रहती है। समीप भी आते हैं। सेवा से समीपता स्वत: ही आती है। तो बहुत अच्छा किया और सदा ही अच्छे ते अच्छा होना ही है। अच्छा। ओम् शान्ति।