दिवाली की तैयारियों का अपना ही आनंद होता है। हम घर की साफ़-सफ़ाई करते हैं, पुरानी और बेकार चीज़ें निकालते हैं, दरवाज़े पर रंगोली बनाते हैं, दिये सजाते हैं, मिठाइयाँ और उपहार तैयार करते हैं और कोशिश करते हैं कि त्योहार आने से पहले सब कुछ अच्छे से तैयार हो जाए। कभी सफ़ाई करते हुए कोई ऐसी अलमारी खुल जाती है, जिसे हमने महीनों से नहीं खोला। तो कभी पूरा घर सजाने के बाद याद आता है कि एक कोना अभी भी साफ़ करना बाकी है।
लेकिन क्या आपने कभी उस घर के बारे में सोचा है, जो हमारे अपने भीतर है?
हमारा मन भी एक ऐसा स्थान है, जहाँ बहुत कुछ इकट्ठा होता रहता है। लोगों के बारे में विचार, बीती हुई बातों की यादें, आने वाले कल की चिंताएँ और समय के साथ बने हमारे संस्कार। इनमें से कुछ विचार हमें शांति और खुशी देते हैं, तो कुछ अनजाने में ही हमारी ऊर्जा कम करते रहते हैं। दिवाली पर हम अपने घर को तैयार करने में इतना समय लगाते हैं। क्यों न कुछ पल अपने मन की दुनिया को सँवारने के लिए भी निकालें? आखिर साफ़-सुथरा और सजा हुआ घर तो अच्छा लगता ही है, लेकिन जब मन में शांति हो और रिश्तों में प्यार हो, तो त्योहार की खुशी और भी बढ़ जाती है।
तो आइए, इस दिवाली अपने भीतर के घर के पाँच हिस्सों की एक छोटी-सी सैर करते हैं। हर पड़ाव पर दिवाली की किसी जानी-पहचानी परंपरा का एक गहरा अर्थ समझेंगे और उसे अपने जीवन में उतारने का एक छोटा-सा अभ्यास करेंगे।
शुरू करने से पहले एक छोटी-सी बात... यह ब्लॉग सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि धीरे-धीरे अनुभव करने और उसमें खो जाने के लिए है। इस अनुभव को और गहराई से महसूस करने के लिए हेडफोन लगाएँ, साथ दिया गया ऑडियो चलाएँ और पढ़ते हुए दीपावली से जुड़े हर दृश्य को मन में महसूस करें।

प्रवेश-द्वार: हम किन विचारों का स्वागत कर रहे हैं?
आइए, शुरुआत करते हैं घर की रंगोली से
शुरू करने से पहले, यह मधुर संगीत चलाएँ।
दिवाली पर हम घर के प्रवेश-द्वार का खास ध्यान रखते हैं। दरवाज़े के आसपास सफ़ाई करते हैं, सजावट करते हैं और सुंदर रंगोली बनाते हैं। हम चाहते हैं कि घर में आने वाले हर व्यक्ति को अच्छा महसूस हो। अब ज़रा अपने मन के प्रवेश-द्वार के बारे में सोचिए।
दिनभर हमारे मन में तरह-तरह के विचार आते हैं। कुछ अच्छे और उपयोगी होते हैं, तो कुछ चिंता और तुलना करने, आलोचना या संदेह से भरे होते हैं। जैसे, सोशल मीडिया पर किसी और की दिवाली की तस्वीरें देखकर तुरंत विचार आता है, "इनका घर तो हमारे घर से कितना अच्छा लग रहा है!" या घर में कोई तैयारियों में मदद नहीं करता, तो मन कहता है, "मुझे तो कभी कोई मदद नहीं करता।" शायद किसी ने दिवाली की शुभकामनाएँ देने के लिए फ़ोन नहीं किया और हम सोचने लगते हैं कि उसने ऐसा क्यों किया।
बाहर एक छोटी-सी बात होती है, लेकिन उसके बारे में हम मन में कितने ही विचार बना लेते हैं।
कई बार घटना तो कुछ ही पलों में समाप्त हो जाती है, लेकिन उसके विचार मन में लंबे समय तक चलते रहते हैं। हर विचार को मन में आने से रोकना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन उस विचार को आगे बढ़ाना है या नहीं, यह चुनाव हम कर सकते हैं। हम बार-बार जैसे विचार करते हैं, उनका प्रभाव हमारी भावनाओं, बोल और कर्मों पर पड़ता है। धीरे-धीरे यही विचार हमारी आदतों और संस्कारों का रूप लेने लगते हैं।
तो जिस तरह हम अपने घर के दरवाज़े पर क्या रखना है, इसका ध्यान रखते हैं, क्या उसी तरह हम अपने मन में स्थान पाने वाले विचारों पर भी ध्यान दे सकते हैं?

एक छोटा-सा विचार प्रयोग
अगली बार जब मन में कोई व्यर्थ विचार आए, तो उसे बढ़ाने के बजाय बदलने का प्रयास करें। जैसे: "मेरी तो कोई मदद ही नहीं करता" सोचने के बजाय सोचें, "मुझे जिस काम में मदद चाहिए, मैं शांति से कह सकता हूँ।" "उन्होंने मुझे फ़ोन क्यों नहीं किया?" सोचने के बजाय सोचें, "क्यों न मैं ही पहले फ़ोन करके शुभकामनाएँ दूँ?" कभी-कभी सिर्फ़ एक विचार बदलने से हमारी भावना और प्रतिक्रिया, दोनों बदल सकती हैं।
आज का दिवाली अभ्यास: जब भी रंगोली देखें, अपने मन में एक अच्छा विचार बनाने का संकल्प करें। वह विचार शांति का हो सकता है, किसी के प्रति सम्मान का या किसी के लिए शुभकामना का। जैसे रंगोली घर के प्रवेश-द्वार को सुंदर बनाती है, वैसे ही हमारे अच्छे विचार मन के वातावरण को शांत और सुंदर बना सकते हैं।

भूला हुआ कमरा: क्या कोई कोना अब भी साफ़ करना बाकी है?
साफ़ करने के लिए बचा एक कोना
आइए, अगले संगीत को सुनते हुए, उस अलमारी को खोलते हैं जिसकी सफ़ाई हम टालते आए हैं। हमने बैठक, रसोई और कमरों की सफ़ाई कर ली। दिवाली के लिए सब कुछ तैयार लग रहा है। तभी अचानक एक अलमारी याद आती है। वही अलमारी, जिसमें हम महीनों से यह सोचकर चीज़ें रखते आए हैं कि
"इसे बाद में ठीक कर लेंगे।"
जब उसे खोलते हैं, तो कई ऐसी पुरानी चीज़ें मिलती हैं जिनका अब कोई उपयोग नहीं है। कुछ तो ऐसी होती हैं जिन्हें हम भूल ही चुके थे।
हमारे मन में भी ऐसा ही कुछ होता है। रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा होता है, लेकिन भीतर कहीं हम किसी पुरानी घटना, अपेक्षा या आदत को पकड़े हुए होते हैं, जो धीरे-धीरे हमारे स्वभाव का हिस्सा बन गई है और कई बार तो हम इन आदतों को छोड़ना भी नहीं चाहते, क्योंकि हमें लगता है कि इनकी ज़रूरत है। जैसे हम सोचते हैं, "अगर मैं गुस्सा नहीं करूँगा, तो मेरी बात कोई नहीं सुनेगा।" या फिर, "अगर मैं चिंता करना छोड़ दूँ, तो कहीं लापरवाह न हो जाऊँ।"
हम एक ही तरह से प्रतिक्रिया देते-देते इतने आदी हो जाते हैं कि यह सोचते ही नहीं कि क्या इसका कोई बेहतर तरीका भी हो सकता है। लेकिन क्या बिना गुस्सा किए अपनी बात दृढ़ता से नहीं रखी जा सकती? क्या बिना लगातार चिंता किए ज़िम्मेदार नहीं बना जा सकता?
यहीं से मन की सच्ची सफ़ाई शुरू होती है। यह सिर्फ़ पुरानी बातों को भूलने या नकारात्मक विचारों को हटाने तक सीमित नहीं है। इसके लिए उन पुराने संस्कारों को भी पहचानना और बदलना ज़रूरी है, जिन्हें हम अनजाने में अब तक अपने साथ लिए चल रहे हैं। जिस तरह दिवाली पर हम घर के हर कोने की सफ़ाई करते हैं, उसी तरह मन की उन छोटी-छोटी आदतों पर भी ध्यान दे सकते हैं, जिन्हें हम आमतौर पर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

मन का एक कोना साफ़ करें
आज घर की कोई चीज़ साफ़ करते या व्यवस्थित करते समय अपनी एक ऐसी आदत के बारे में सोचें, जिसे आप अब तक इसलिए पकड़े हुए हैं क्योंकि आपको लगता है कि वह ज़रूरी है। खुद से पूछें: क्या मैं इसी परिस्थिति को किसी दूसरे गुण के साथ हल कर सकता हूँ? शायद चिड़चिड़ेपन की जगह धैर्य, चिंता की जगह विश्वास या हर चीज़ को अपने अनुसार चलाने की आदत के स्थान पर समझदारी अपना सकते हैं। एक गुण चुनें और जब भी अवसर मिले, उसे व्यवहार में लाने का सचेत प्रयास करें।
आज का दिवाली अभ्यास: किसी पुरानी अलमारी या शेल्फ़ की सफ़ाई करते समय अपने एक पुराने संस्कार को बदलने का संकल्प लें। बाहर की सफ़ाई आपको भीतर चल रहे इस परिवर्तन की याद दिलाए।

अकौनट्स : नए साल में हम क्या साथ लेकर जाएँगे?
आइए एक नया खाता शुरू करें
अब इस त्योहार से जुड़ा मधुर ऑडियो सुनें।
कई परिवारों और व्यापारियों के लिए दीपावली पुराने हिसाब-किताब बंद करने और नए खाते शुरू करने का भी समय होता है। पुराने रिकॉर्ड देखे जाते हैं, लेन-देन का हिसाब जाँचा जाता है और नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत की तैयारी की जाती है। ऊपर दिया गया ऑडियो सुनते हुए आइए, इसी तरह अपने अंदर के हिसाब-किताब पर भी ध्यान दें। यानी हम कैसे विचार करते हैं, कैसे बोलते हैं और कैसे कर्म करते हैं। हमारा हर व्यवहार हमारे कर्मों के खाते में कुछ न कुछ जोड़ता है। जब हम धैर्यता से बात करते हैं या बिना किसी अपेक्षा के किसी की मदद करते हैं, तो हमारे खाते में अच्छे कर्म जमा होते हैं। वहीं, बार-बार दूसरों की आलोचना करना, गुस्सा करना या अपने व्यवहार से किसी को दुख पहुँचाना ऐसे कर्मों का खाता बनाता है, जिसका असर हमारे रिश्तों और मन की शांति पर पड़ता है।
दिलचस्प बात यह है कि दूसरों ने हमारे साथ क्या कहा या क्या किया, वह तो हमें अक्सर याद रहता है। लेकिन अपने विचारों, बोल और व्यवहार पर हम कितना ध्यान देते हैं? अपना हिसाब देखने के बजाय कई बार हम दूसरों की गलतियों का पूरा हिसाब रखते हैं। क्यों न ऐसे समय पर हम खुद को जाँचें? यह सोचने के बजाय कि सामने वाले को क्या अलग करना चाहिए था, हम एक पल रुककर खुद से पूछ सकते हैं, "क्या मैं इस परिस्थिति में थोड़ा और धैर्य, समझदारी या सम्मान के साथ व्यवहार कर सकता था?"
जब ऐसी परिस्थितियाँ दोबारा आती हैं, तो हमारे पुराने संस्कार हमें फिर से उसी तरह प्रतिक्रिया करने के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन हर बार जब हम सोच-समझकर एक बेहतर प्रतिक्रिया चुनते हैं, तो पुराने संस्कार को बदलने और एक अच्छा खाता बनाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ते हैं।

आज एक नई एंट्री करें
कल्पना कीजिए कि आपने अपने कर्मों के खाते का एक नया पन्ना खोला है।आपको अपनी हर गलती याद करने या संकल्पों की लंबी सूची बनाने की ज़रूरत नहीं है। बस इस एक वाक्य को पूरा कीजिए:
"इस दिवाली, ________ के साथ प्रतिक्रिया करने के बजाय मैं ________ का अभ्यास करूँगा।"
उदाहरण के लिए: "दूसरों से प्रशंसा की अपेक्षा रखने के बजाय मैं प्यार से अपना काम करने का अभ्यास करूँगा।" अब जब ऐसी परिस्थिति सामने आए, तो अपने इस संकल्प को व्यवहार में लाने का प्रयास करें।
आज का दिवाली अभ्यास: आज किसी से बातचीत करते समय जवाब देने से पहले एक पल रुकें और खुद से पूछें, "मैं अपने इन शब्दों से कैसा कर्मों का खाता बना रहा हूँ?" हो सकता है कि हम बीते हुए हर कर्म को बदल न सकें, लेकिन इस पल से हम जो नए खाते बना रहे हैं, उनकी ज़िम्मेदारी ज़रूर ले सकते हैं।

रोशनी का कमरा: क्या हमने अपने भीतर का दीया जलाया है?
अब दीये जलाने का समय है।
सफ़ाई पूरी हुई। अब दीये जलाने का समय है। तो आइए, अब यह उत्सव भरा मधुर ऑडियो सुनें।
दिवाली की सारी तैयारियों के बाद सबसे खास पलों में से एक होता है दीये जलाना। एक छोटा-सा दीया जलता है और देखते ही देखते घर के चारों ओर दीपों की पंक्तियाँ सज जाती हैं। हम ध्यान रखते हैं कि दीये ठीक से रखे जाएँ और उनकी लौ जलती रहे। लेकिन इन दीयों को जलाते समय क्या हमें अपने भीतर की जीवित ज्योति याद आती है?
आध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार, हम आत्माएँ हैं—चेतना के छोटे-छोटे ज्योति-बिंदु। आत्मा ही इस शरीर के द्वारा सोचती है, अनुभव करती है, निर्णय लेती है और कर्म करती है। शांति, प्रेम, पवित्रता और सुख हमारे मूल गुण हैं। लेकिन रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हम अपनी भूमिकाओं और ज़िम्मेदारियों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि इस सच्चाई को भूल जाते हैं।
हमें याद रहता है कि हम माता-पिता हैं, किसी के बच्चे हैं, किसी के मित्र हैं या किसी व्यवसाय से जुड़े हैं। हमें याद रहता है कि क्या काम करना है, कहाँ जाना है और दूसरे हमसे क्या अपेक्षा रखते हैं। लेकिन हम कितनी बार रुककर याद करते हैं कि मैं एक आत्मा हूँ?
अपनी सच्ची पहचान को केवल एक बार याद कर लेना पर्याप्त नहीं है। काम करते हुए, बातचीत करते हुए और लोगों के साथ व्यवहार करते हुए भी हमें इस स्मृति का अभ्यास करना होता है। राजयोग मेडिटेशन के द्वारा हम स्वयं को आत्मा समझकर अपने विचारों को परमात्मा से जोड़ते हैं, जो शांति और प्रेम के सागर हैं। यह संबंध हमें परिस्थितियाँ बदलने पर भी शांत और स्थिर रहने की शक्ति देता है।

अपने भीतर ज्ञान का दीप जलाएँ
जैसे हम अपने घरों में दीप जलाते हैं, वैसे ही आइए अपने भीतर भी ज्ञान और गुणों का दीप जगाएँ। इस मेडिटेशन के माध्यम से हम अपने सच्चे स्वरूप यानी आत्मा से जुड़ते हैं और परमात्मा के प्रेम, शक्ति और सुरक्षा का अनुभव करते हैं। कुछ पल रुककर इस मेडिटेशन को सुनें और अपनी आंतरिक यात्रा पर चिंतन करें। अपने भीतर परमात्मा के दिव्य प्रकाश को अनुभव करें और उसकी शांतिपूर्ण तरंगें अपने प्रियजनों और पूरे विश्व तक पहुँचाएँ।
अनुभव करेंआज का दिवाली अभ्यास: आज जब भी कोई दीया जलाएँ या जलता हुआ दीया देखें, कुछ पलों के लिए रुकें। स्वयं को आत्मा अनुभव करें और अपने मन को परमात्मा से जोड़ें। फिर उसी स्मृति में अपना काम आगे बढ़ाएँ।हमारे घरों में जलने वाले दीये कुछ घंटों तक जलते हैं, लेकिन आत्मिक शांति की यह स्मृति ऐसी है, जिसे हम हर दिन अपने साथ रख सकते हैं।

बालकनी: हम दूसरों तक कौन-सी रोशनी पहुँचा रहे हैं?
अंत में, आइए घर के बाहर भी दीये सजाएँ
जैसे-जैसे संगीत में दीपावली का उत्साह बढ़ता है और दिवाली की शाम होते ही हम बालकनी, खिड़कियों और दरवाज़ों पर दीये सजाते हैं। एक दीया सुंदर लगता है, लेकिन जब कई दीये एक साथ जलते हैं, तो दीपमाला बन जाती है।
जब हम दीपमाला देखते हैं, तो कई ज्योतियाँ एक साथ जलती हुई दिखाई देती हैं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि दीपमाला का यह भाव हमारे रिश्तों में कैसे दिखाई दे सकता है? क्या हम किसी से असहमत होने पर भी उसका सम्मान बनाए रख सकते हैं? क्या बदले में कुछ पाने की उम्मीद किए बिना किसी का सहयोग कर सकते हैं? क्या किसी दूसरे का मूड बदलने पर भी हम अपनी मनःस्थिति स्थिर रख सकते हैं? दीपमाला हमें केवल अपनी आत्मिक ज्योति की याद नहीं दिलाती, बल्कि यह भी सिखाती है कि जब हम इन गुणों को जीवन में अपनाते हैं, तो हमारे रिश्ते कितने सुंदर बन सकते हैं। और जिस तरह एक दीये से दूसरा दीया जलाया जा सकता है, उसी तरह एक शांत और प्रेमपूर्ण आत्मा अपने विचारों, बोल और व्यवहार से दूसरों को भी प्रेरित कर सकती है।
दिवाली पर हम परिवार, मित्रों और पड़ोसियों के साथ मिठाइयाँ और उपहार बाँटते हैं। लेकिन कुछ उपहार ऐसे भी हैं, जिन्हें न खरीदा जा सकता है, न पैक किया जा सकता है। धैर्यता का उपहार। क्षमा का उपहार। बीच में टोके बिना किसी की बात सुनने का उपहार। दूसरों तक अपनी रोशनी पहुँचाने के लिए हमेशा कुछ बड़ा करना ज़रूरी नहीं है। कई बार इसकी शुरुआत इस बात से होती है कि हम किसी के बारे में क्या सोचते हैं।
जब हम दूसरों को उनकी भूमिका, व्यवहार और गलतियों से परे एक आत्मा के रूप में देखते हैं, तो उनके प्रति शुभभावना और शुभकामनाएँ रखना आसान हो जाता है।
और जब हमारा मन शांति और प्रेम के परम स्रोत, परमात्मा से जुड़ा होता है, तो हमारे भीतर इन गुणों को बिना किसी अपेक्षा के दूसरों के साथ बाँटने की शक्ति बढ़ती है।

ऐसा उपहार दें, जो दिखाई नहीं देता
किसी एक व्यक्ति को अपने मन में याद करें। वह आपके परिवार का कोई सदस्य, मित्र, सहकर्मी या कोई ऐसा व्यक्ति भी हो सकता है, जिसके साथ आपके संबंधों में कुछ दूरी आ गई हो। कुछ पलों के लिए उसने क्या कहा या क्या किया, इन बातों को एक ओर रख दें। उसे भी अपने समान एक आत्मा के रूप में देखें। मन ही मन उसके लिए ये शुभकामनाएँ करें: आप एक शांत स्वरूप आत्मा हैं। आपके जीवन में सुख और शक्ति बनी रहे। आपका मन शांत रहे। आपको हर परिस्थिति का सामना करने के लिए आवश्यक सहयोग और शक्ति मिले।
आज का दिवाली अभ्यास: आज मिठाइयों और उपहारों के साथ किसी एक व्यक्ति को ऐसा उपहार भी दें, जो दिखाई नहीं देता वो है—शांति, सम्मान, प्रोत्साहन या सच्ची शुभकामनाएँ। जब एक आत्मा दूसरी आत्मा के साथ शांति और प्रेम बाँटती है, तो दीपों का यह उत्सव केवल घरों तक सीमित नहीं रहता।

दिवाली के बाद क्या?
दिवाली के कुछ दिन बाद सजावट हटा दी जाती है, मेहमान अपने घर लौट जाते हैं और ज़िंदगी फिर से अपने रोज़मर्रा के ढर्रे पर आ जाती है। और इसी दिनचर्या में वही पुरानी परिस्थितियाँ फिर सामने आती हैं। कोई हमसे रूखेपन से बात करता है। कोई काम हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होता। घर का कोई सदस्य फिर वही गलती दोहराता है, जिस पर हमें पहले भी कई बार गुस्सा आया था।
हम जानते हैं कि हमें शांत रहना चाहिए। हम यह भी जानते हैं कि गुस्से में प्रतिक्रिया देने से बात नहीं बनेगी। फिर भी, कई बार हमें पता भी नहीं चलता और हम पहले की तरह ही प्रतिक्रिया दे देते हैं। और कभी-कभी तो यह कहकर बात खत्म कर देते हैं,
"मेरा स्वभाव ही ऐसा है।"
लेकिन क्या सचमुच यही हमारा स्वभाव है? या यह केवल एक ऐसी आदत है, जिसे हमने इतने लंबे समय तक दोहराया है कि अब वह हमें स्वाभाविक लगने लगी है? यहीं दिवाली का गहरा अर्थ समझ में आता है। पुराना खाता बंद करने का मतलब केवल बीती हुई बातों को भूल जाना नहीं है। इसका अर्थ उन पुराने विचारों, प्रतिक्रियाओं और संस्कारों को पहचानना भी है, जिन्हें हम आज भी अपने साथ लिए चल रहे हैं। और नया खाता खोलने का अर्थ है, उन्हें बार-बार न दोहराने का संकल्प करना।
तो इस दिवाली कई सारे संकल्प लेने के बजाय अपनी एक ऐसी पुरानी प्रतिक्रिया चुनें, जिसे आप सचमुच बदलना चाहते हैं। शायद जब कोई आपकी बात नहीं सुनता, तो आप चिढ़ जाते हैं। या कोई आपकी गलती बताता है, तो आप तुरंत अपनी सफ़ाई देने लगते हैं।

अगली बार जब ऐसा हो, तो कुछ अलग करने की कोशिश करें। कुछ पलों के लिए रुककर स्वयं को याद दिलाएँ, मैं एक शांत स्वरूप आत्मा हूँ। मैं चुन सकता हूँ कि मुझे कैसी प्रतिक्रिया देनी है। परमात्मा की याद से शक्ति लें और फिर परिस्थिति के अनुसार जो कहना या करना ज़रूरी है, वह करें—लेकिन अपनी पुरानी आदत के वश होकर नहीं। हो सकता है कि आप हर बार ऐसा न कर पाएँ। लेकिन जब भी आप अपनी पुरानी आदत को पहचानकर सोच-समझकर कोई दूसरी प्रतिक्रिया चुनते हैं, तो आप एक नया संस्कार बनाने का प्रयास कर रहे होते हैं। और अपनी प्रगति को जाँचने का एक सरल तरीका भी है।
दिन के अंत में कुछ पल रुककर खुद से पूछें: क्या आज मेरे व्यवहार से किसी को पहले से थोड़ा अधिक धैर्य, समझदारी या सम्मान का अनुभव हुआ?
शायद बदलाव बहुत छोटा था। आपने बीच में टोकने के बजाय किसी की बात पूरी सुनी। चिढ़कर बोलने के बजाय शांति से अपनी बात समझाई। या फिर किसी बेकार की बहस को आगे नहीं बढ़ाया। यही वे छोटे-छोटे पल हैं, जब आध्यात्मिक ज्ञान केवल समझने की बात नहीं रहता, बल्कि धीरे-धीरे हमारे स्वभाव का हिस्सा बनने लगता है।
क्योंकि हमारे भीतर की दिवाली का असली उत्सव शायद इस बात में नहीं है कि त्योहार के दिन हमने क्या अनुभव किया, बल्कि इस बात में है कि जब ज़िंदगी फिर से वही पुरानी परिस्थिति हमारे सामने लाती है, तब हम कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।









